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@dawriter

घर वाकई स्वर्ग है

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

शाम होने के बाद घर से बाहर मत जाना । बाज़ार का कुछ अलूल जलूल मत खाना । किसी से झगड़ा किया तो मार मार के टाँगें तोड़ दूंगा । फिल्म देखेगा हाँ बिगड़ा हुआ बनेगा, घर में टी वी पर देखो सिनेमा हाॅल में कभी भी नहीं । इतनी बंदिशें थीं घर में कि हमेशा सोचता था यार कब इस जेल से निकलूंगा । समय बीता समय के साथ घर के नियम कानून बदले या पापा को मेरी वजह से बदलने पड़े पता नहीं मगर पहले से बहुत अच्छा था शायद पापा समझ गए थे कि बेटा बड़ा हो गया है अब अपने अच्छे बुरे को खुद समझ सकता है इसीलिए रोकना टोकना बंद । सब अच्छा था मगर घर से बाहर रहने की ललक मन से मिटी नही थी । आखिर ये सपना भी पूरा हुआ । पिछले छः सालों से घर से बाहर का हो कर ही रह गया हूँ । इतना बाहर का कि कोई अगर पूछता है कि भाई कहाँ रहते हो तो सोचना पड़ता है पटना कहूँ दिल्ली कहूँ पंजाब कहूँ यूपी कहूँ या इंतज़ार करूं इस बात का कि कहीं और किसी राज्य में ना निकलना पड़ जाए । 
इतना वक्त बाहर रह कर बस एक ही बात जान पाया कि किसी ने ये क्यों कहा “घर दूसरा स्वर्ग है” । पिछले डेढ़ दो महीने से मध्यप्रदेश में था । जब से बिमार हुआ उसके बाद से धूल मिट्टी ज़हर सी हो गई है मेरे लिए । ज़रा सी धूल और खाँसी शुरू । और एम पी के बिहड़ इलाकों में तो धूल मिट्टी माँ के दुलार जैसी है मतलब हद से ज़्यादा । अब धरती माँ का इतना दुलार मिलते ही खाँसना शुरू । मगर घर से इतनी दूर आपको अपनी खुद परवाह नही होती तो और कोई क्या परवाह करेगा । फिर भी प्राणप्यारी के भेजे कफ सिरप ने थोड़ा आराम दिया था मगर ये खांसी थोड़े से मानती कहाँ है और ज़्यादा ध्यान वो भी खुद का हमसे रखा नही जाता । इसीलिए जैसे तैसे वक्त काट लिया आलसी सा बन कर । आप काम पर कहीं बाहर हों तो रात भर बाहर ही बिता दो किसे परवाह होती है । मन खुद ही सोच लेता है यार भला अपना कौन इंतज़ार कर रहा है फिरते रहो बाहर ही । 
मगर जब आप घर आ रहे होते हैं तो माँ की दो आँखें बड़ी बेसब्री से आपके इंतज़ार में होती हैं । एक दिन पहले ट्रेन मिस हो गई थी माँ परेशान थी की बैटा पहुंचा क्यों नही । परसों जब ट्रेन फिर पकड़ी तब से माँ ने भाई को नेट पर आँखें गड़ाए रखने पर मजबूर कर दिया । भार बार उससे कहे जा रही थी “देख ना उसकी ट्रेन कहाँ पहुंची, कितनी लेट है ट्रेन ? कब तक पहुंचेगा वो ?” घर आया तो सबसे पहले माँ ने गले लगाते हुए कहा “शुक्र है तू पहुंच तो गया ।” ये था घर के स्वर्ग होने का पहला प्रमाण । दूसरा प्रमाण माँ के हाथों का प्यार में डूबा हुआ खाना और तीसरा प्रमाण जब मैं एक बार खांसता तो माँ का डर से मेरे चेहरे को देखना । मुझे खांसी आती है तो उसे वो पल याद आजाते हैं जब मैं बिमार था । जब मुझे देखते ही सामने वाले के मन में आजाता था ये नहीं बचेगा । इसीलिए माँ का डरना लाज़मी था । 
दवा मंगा कर दी और जब थोड़ा शांत देखा खांसी को तब उसे थोड़ा आराम मिला । बच्चों की छोटी सी बिमारी माँ को बहुत बिमार कर देती है और यही वजह है कि लाख परेशान कर ले ज़िंदगी मगर हम इसकी परेशानियों को किनारा कर के मुस्कुरा देते हैं माँ के लिए । ज़िंदगी अपना धर्म निभाए हम अपना कर्म करते रहेंगे । माँ है तो घर वाकई में स्वर्ग है । पहले घर आने की खुशी दो भागों में बंटी होती थी, आधी माँ के लिए आधी पापा के लिए । मगर अब तो पापा वाला हिस्सा भी माँ का ही है । घर में घुसते ही पापा वाला खाली पलंग जब तक रुलाए तब तक माँ की मुझे देख चमकती आँखें मुस्कुराने पर मजबूर कर देती हैं और लगता है माँ में ही कहीं पापा भी बाहें फैलाए सीने से लगाने को बेचैन हैं



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