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@dawriter

कुछ ऐसे अहसास जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता..

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माँ बनने के सुखद अहसास को शायद ही कोई शब्दों में पिरो पाया है। ये वो खुशी है जिसको शब्दों में बयां ही नहीं की जा सकती। सिर्फ महसूस की जा सकती है। जैसे मेरा ये अहसास जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है उसे बयां करने की कोशिश कर रही हुं।

उस रात को अचानक पेट में हल्का सा दर्द हुआ। नवां महीना पूरे हुए दो दिन हो गए थे। आज मुझे थोड़ा -थोड़ा दर्द का अहसास हुआ तो माँ ने कहा हिम्मत रख सब ठीक होगा। दर्द कम ही था तो सुबह होने का इंतजार किया। सुबह होते ही मुझे अस्पताल ले गए, कुछ जाँच करके भर्ती किया गया। मुझे बहुत डर भी लग रहा था, पर माँ बार -बार हौसला दे रहे थे मेरे पति भी साथ ही थे, वो भी क्या बोलते उनका भी तो पहला अनुभव था।

उतने में ससुराल वाले भी आ गए। मुझे दर्द कम था तो डाक्टर ने इंतजार करने को कहा और दर्द का इंजेक्शन भी लगाया। इस बीच वार्ड में और भी गर्भवती महिलायें आई। कोई तेज दर्द में आयीं और कुछ देर में उनका बच्चा हो गया तो कोई तेज दर्द में तड़प रही थी।

मैं भी ये सब देख सुन रही थी। मेरे मन में भी डर और सवाल चल रहे थे कि क्या होगा, कैसै होगा, पर जब शाम तक मुझे दर्द नहीं हुआ तो डाक्टर ने आपरेशन की सलाह दी। सबकी सहमति से आपरेशन हुआ। मैने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। जब मुझे इस बात का पता चला तो मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था क्योंकि मुझे और मेरे पति को बेटी ही चाहिए थी।

मैं पूरी तरह से होश में नहीं आई थी। जब होश में आई तब तक सब चले गए थे सिवाय मेरी माँ के। अब मैंने अपनी बेटी को गोद में लिया। उसे निहार रही थी। नन्हें- नन्हें से हाथ पैर छु रही थी। उसके माथे को चूमा। आपरेशन से हुई थी तो माँ ने ज्यादा देर में लेने से मना किया और उसे मेरे पास सूला दिया। मेरे पास शब्द नहीं थे कुछ कहने को पर मैं बहुत खुश थी। बताना चाहती थी सबको के ये मेरी बेटी है मैंने इसको जन्म दिया जैसे कि मैं कोई पहली महिला हूँ जिसने यह काम किया है।

मन मयूर सा नाच रहा था आज से पहले ऐसी खुशी महसूस ही नहीं की थी मैंने। सब सो रहे थे पर मेरी आँखों में नींद ही नहीं थी। बस सारी रात अपनी बेटी को निहार रही थी। कुदरत के इस अनुपम उपहार पर आश्चय कर रही थी। मन तो कर रहा था अपनी बेटी को गोद में उठा कर नाचूं , गाऊं सबको बताऊ के माँ बन गई..हाँ मैं 'मां' बन गई...।

मैं बस अपनी बेटी को देख रही थी और सोच रही थी कल तक ये मेरे अंदर थी महसूस करती थी हर पल इसे आज मेरे सामने है। नौ महीनों का हर दिन आँखों के सामने आ गया हो। कई महीनों की उलटी तो कभी कुछ ऐसा खाने का मन जो बस अभी का अभी खाना होता। माँ का हर घंटे कुछ न कुछ खाने को देना। तुझे हर दिन अपने अंदर बढ़ते महसूस करना। अकेले में तुम से बातें करना। तुम्हारा मुझे लात मारना। हर महीने फिर हफ्ते अस्पताल आकर तेरे दिल की धड़कन सुनना। मुझे ना इस करवट सोने देना ना उस करवट। शैतान!। और आज मेरे सामने मासूम सी प्यारी सी 'मेरी बेटी '।



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