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@dawriter

किसान आत्महत्या का खौफ़ उनके बच्चों के दिलो में

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vandita by  
vandita

 

"कमला, ये कमला" हा माँ, "बिटिया तैयार होई गयी स्कूल के लिए?" हा माँ हम तैयार हो गये। माँ ने कमला को उसका खाने का डिब्बा पकड़ाया। कमला की आंखे किसी को ढूंढ रही हैं। माँ, माँ सुनो न माँ। माँ भीतर से बोली हा "बोल"। का हुआ ? काहें माँ माँ बुलाये रही है? कछु काम है का? नही माँ। माँ बापू कहाँ है? मुझे दिखे न बापू, कहाँ है बापू? ये भगवान ई बापू की बेटी तो बिना बापू के बेचैन होई जात है। और कहाँ होइहे बापू, खेत गये हैं। अच्छा माँ ठीक है। बस माँ के बताते ही कमला ने अपने पैरों में चप्पल डाली और भागते खेत पहुँची। अपनी आँखें चारो तरफ दौड़ा कर देखा तो बापू बेजान पड़े खेत को निहार रहे थे। भाग कर बापू के पास गयी," बापू, बापू," ध्यान टूटते ही, "हा बिटिया हा", बोलो का हुआ? बापू मुझे तो कुछ न हुआ, पर आप को क्या हो गया? आप इतना क्यूँ परेशान नजर आ रहे हैं ? क्या बात है बापू, बताओ न? कुछू नही बिटिया तुम स्कूल जाओ, हमका कौनो परेसानी नाही है। हम तो बस ई जमीन का देखत आही, और बरसा होई का इंतजार करत आही। कब से बारिश नाही भाइ है, ये ही लिए जमीन प्यासी होई गयी है और अनाज नही हुई पा रहा। पर बिटियां इन सब से तुमको कौनो मतलब नाही है। तुम स्कूल जाओ औऱ मन लगाई के पढ़ाई करो। हा बापू। (कमला स्कूल के लिए चली तो गयी पर अपना मन अपने पिता के पास छोड़ कर। वो सब समझ रही थी कि इतने दिनों से बारिश नही हुई है, जिस कारण जमीन बंजर बनती जा रही है। पिता के ऊपर कर्ज भी है और अनाज न होने से आर्थिक परेशानी बढ़ती जा रही है। )

कमला का ये रोज का काम हो गया था कि वो हर वक्त अपने बापू की चिंता में व्यथित रहती थी। सुबह जल्दी से तैयार हो अपने बापू के पीछे-पीछे लगी रहती थी। हर वक्त मानो चौकीदारी कर रही हो। जब बापू खेत जाया करते तो उनका पीछा करती और देखती रहती कि वो क्या कर रहे हैं। उन्हें खेत मे काम करता देख सन्तुष्ट हो जाने पर कमला स्कूल जाती थी। कमला घर की छोटी-छोटी सभी चीजें जिससे व्यक्ति अपने को चोट पहुँचा सकता है ढूंढ-ढूंढ कर छिपा देती। एक दिन माँ रसोईघर में खाना बनाने के लिए गयी और सब्जी काटने के लिए चाकू ढूंढते-ढूंढते परेशान हो गयी। कमला " हा माँ, क्या हुआ, बिटिया जा जरा सुरेश चाचा के दुकान से एक चाकू लाई दे, ना जाने मरी कहाँ चली गई है, ढूंढत-ढूंढत बहुत देर हुई गई है, अबही तुम्हरे बापू भी आई जहिये, उन्हें भूख भी लगी होई, ले पैसा"। रहने दे माँ, चाकू दे रही हूँ, चाकू मेरे पास है। का, तुमका का काम पडगा रहे चाकू से ? हम कबसे परेशान आही। "लो माँ"। माँ को चाकू देकर कमला पढ़ने बैठ गयी। ऐसे ही एक दिन कमला ने रसोईघर में रखा सारा घासलेट फेक दिया और माँ से झूठ बोल कि, " माँ मुझसे गलती से गिर गया"। माँ कमला की इन छोटी-छोटी हरकतों से बहुत परेशान हो रही थी और कमला की परेशानी को भांपने की कोशिश कर रही थी। ये जी, "जरा सुनिये तो"। ह्म्म्म का है, बोलो। "ई कमला कुछु परेशान है, लागत है कुछु बात हमसे झुपावत है, आज कल घर से समान भी गायब हुई जात है, न जाने का बात है"। आरे, "तुहो न सोई जा, बहुत रात हुई गई है, तुम कुछ ज्यादा ही सोचत हो"।

अगली सुबह हुई, वही रोज की दिनचर्या, माँ का वही घर का काम, बापू का खेत-खलिहान और बारिश की उम्मीद। उस दिन कमला के स्कूल की छुट्टी थी। अन्दर कमला पढ़ रही थी कि अचानक बाहर की ओर देखा और खुशी से चहकती हुई कमला "माँ", माँ, आज तो भगवान ने हमारी सुन ली, देख बारिश की बूंदे शुरू हुई हैं, अरे माँ कहा है तू? पर जब बाहर आ कर देखा तो ये कमला का भ्रम था। माँ ने कपड़े धोये थे, जिसे छप्पर पर डाल रही थी, जो दूर से कमला को बारिश की बूंदे लगीं। कमला बहुत दुखी हुई, और मुँह लटका के बैठ गई। तभी अचानक से कमला की नज़र दीवार पर टगी मोटी रस्सी पर गई और वो बावरी हो बापू, बापू कह खेत की तरफ भागी। वहाँ उसने जो देखा उससे कमला जैसे बद-हवाश सी हो गई, "नही बापू, नही, ऐसा मत करो, रुक जाओ बापू, हमको छोड़ कर ऐसे नही जा सकते, रुक जाओ बापू"। पर उस समय कमला के पिता को कुछ नही सुनाई दे रहा था, वो सामने के पेड़ पर रस्सी फेक कर फंदा बना रहे थे और जैसे ही वहाँ पडे जर्जर से स्टूल पर पैर रख लर फंदे को पकड़ा, वैसे ही कमला ने जा अपने बापू के पैरों को पकड़ लिया और जोर जोर से रोते हुए," नही बापू, ऐसा मत करो, हमको अकेले छोड़ कर नही जाओ"। आरे,आरे बिटियां, छोड़ो हमरा पैर, हम कहीं नहीं जा रहे, तुम काहे को इतना रोई रही हो, चुप होई जा मेरी लाड़ो। हम तो तुमरे लिए झूला डाल रहे थे और तुम हो कि रोई रही हो। सच बापू , "आप वो नही कर रहे थे जो रामू काका, भोला काका, बड़के बापू ने किया किया? इन सब ने हताश हो कर फाँसी लगा ली थी और मर गए। बापू आप ऐसा मत करना, कोई बात नही आज नही तो कल भगवान हमलोगों की जरूर सुनेंगे। बारिश होगी और हमारे खेत फिर से लहरायेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो आप और कुछ काम कर लेना पर हमको छोड़ कर कभी मत जाना, आप आत्महत्या नही करना बापू"। नही मेरी बच्ची ऐसा मै कभी नही करूँगा। दोनों बाप-बेटी एक दूसरे के गरे लग मनुहार कर रहे थे।

( कमला अपने पिता से बेहद प्यार करती थी और उसके मन मे आने पिता को कही खो न दे, इस बात का डर अंदर ही अंदर उसे परेशान कर रहा था। पिछले कुछ सालों से किसान की बढ़ती आत्महत्या की घटनाएं उनके बच्चों के दिलों की दहशत बन गयी है। बिना बारिश के खराब होती फसले या बेमौसम बारिश से बर्बाद होती फसलों के कारण एक किसान आर्थिक रूप से परेशान हो और जब कोई रास्ता नही मिलता और न ही कोई सहायता तो वो खुदखुशी करने पर मजबूर हो जा रहा है। पिछले कुछ समय की किसान आत्महत्या के कारणों से आप सभी अच्ही तरह से अवगत होंगे। ये कहानी कमला और उसके परिवार की ही नही है बल्कि उन किसानों की और उनके बच्चों की है, जो हताश हो फाँसी के फंदे पर लटक गये और आज भी न जाने कितने किसान ऐसा कर रहे हैं। किसानों की आत्महत्या का खौफ़ उनके बच्चों के दिलो में समाता जा रहा है। आखिर कब उन्हें न्याय मिलेगा? )

 #farmers



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