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@dawriter

किडनी के पत्थर

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प्रकाश अपने घर में सबसे छोटा है, उसे मैं काफी समय से जानता हूँl उसकी दोनों बहनों की शादी हो चुकी हैl जो अब विदेश में रहते हैl प्रकाश अपने पिता को लेकर बहुत भावुक हैl दोनों बहने भी बार-बार उसे यह कह कर अपने पास बुला रही थी, कि यहाँ आकर पढाई पूरी कर लो लेकिन प्रकाश इसलिए नही जा रहा था कि उसके जाने के बाद माँ और पिताजी का ख्याल कौन रखेगा? उसकी माँ की भी तबियत ठीक नही रहती थीl पिता ने मेहनत मजदूरी कर के सभी बच्चो का पालन पोषण कियाl अभी कुछ समय पहले प्रकाश को किडनी में पथरी की शिकायत हुई थीl जिसके इलाज में काफी खर्चा हो गया था, जो एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए मामूली बात न थीl फिर इलाज करवा कर वो किसी तरह किडनी स्टोन से निजात पा गयाl

सब कुछ जैसे ठीक ही चल रहा था कि एक दिन पढ़ते हुए अचानक प्रकाश के पेट में जोर का दर्द उठा, दर्द इतना तेज था की असहनीय हो गया, और वह बेहोश हो कर वही जमीन पर कटे वृक्ष की भांति गिर पड़ाl पिता जल्दी से उसे उठा कर अस्पताल ले गएl अब जांच के द्वारा पता चला की की उसकी दूसरी किडनी भी कुछ धीमी गति से कार्य कर रही हैl डा. ने बताया की उसकी दूसरी किडनी में mild hydronephrotic (विषाक्त जल के कारण कुछ भाग क्षतिग्रस्त) हुआ हैl वह किडनी जिसमे पथरी थी वह ठीक कार्य कर रही हैl केवल १९ वर्ष की कम उम्र में उसे इन समस्याओ का होना उसे कुछ आश्चर्य में डाल रहा थाl बातचीत करने पर पता चला उसे पिछले महीने भी ऐसे ही दर्द उठा था, लेकिन मामूली दर्द समझ कर उसे वह यूँ ही टालता रहाl जिसके चलते अब उसे लम्बे समय तक अस्पताल में रखा जाना थाl अब वो बहुत कमजोर हो चला कई बार भावुक हो कर बच्चो की तरह रोने लगता है, अपनी बाते कहते कहते प्रकाश का गला भर आता परन्तु अपने आप पर एक कुशल चालक की भांति पूरा नियंत्रण करते हुए वो बातचीत जारी रखताl मैं पहली बार प्रकाश का ये रूप देख रहा थाl अपने सपने पुरे न कर पाने और सब कुछ ख़त्म होने का डर उसके चेहरे पर ही नहीं बल्कि पुरे शरीर पर फैला हुआ थाl ऐसा लग रहा था की अपने पुरे परिवार पर होने वाली पर होने वाली एक-एक शारीरिक तकलीफ़ को वह स्वयं झेल रहा होl पहली बार शायद उसने अपने भीतर के भय को बाहर आने की थोड़ी स्वतंत्रता दीl अन्यथा वह चेहरे पर हमेशा सब कुछ ठीक होने का भाव रखता हैl मेरे थोडा कुरेदने पर वह फूट पड़ा और कहा कि उसे बहुत डर लगता हैl उसके माँ पिताजी ही उसकी पूरी जिंदगी हैl वो अगर कही बाहर चला भी गया तो उनका ख्याल कौन रखेगा? और उसे यह प्रेम, यह आत्मीयता फिर कहाँ से मिलेगी? जो यहाँ मिलती हैl बड़ी मुश्किल से उसके दो आँसू टपके और उसने अपने इस व्यवहार से थोडा अजीब सा महसूस कियाl यहाँ उसके कुछ भावों को अपने शब्दों में पिरो रहा हूँ...

मैंने पूछा इतना जर्जर जीवन लेकर प्रकाश

कैसे कंकर - पत्थर की छोटे सहता तू?

वह बोला “किस चोट से चोट मिट जाती है”

यह बात स्वयं घायल को भी मालूम नही

किस आँसू से पुतली उजली हो जाती है?

यह बात स्वयं काजल को भी मालूम नहीं

खिल-खिल कर, हंस-हंस कर, झर-झर कर कांटो में,

उपवन का ऋण तो भर देता हर फूल मगर,

मन की पीड़ा कैसे खुशबु बन जाती है,

यह बात स्वयं पाटल को भी मालूम नहीं...

खैर एक लम्बे इलाज के बाद अब प्रकाश काफी हद तक स्वस्थ हैl एक बात(डा.आत्मो मनीष की बात) जो मैंने उस वक्त प्रकाश से कही थी, और आज आप को बता रहा हूँl मनोशारीरिक भाव में “किडनी के पत्थर” उन आंसुओं का मूर्त रूप है जो समय पर बहे नहीं, जिन्हें हमने अपने भीतर दबा दिया? हमारे शरीर की उर्जा मनोशरीर से मुक्त नहीं हो पायी, उसने पत्थरी का आकर ले लिया, वह सख्त हो गयीl मनोशारीरिक विज्ञान के अनुसार भावों की उर्जा जिसे हमने दबा दिया वह शरीर में पथरी, सिस्ट, फायब्रोइड, गठान आदि कोई भी आकर ले सकती हैl

आँसू जो न बह सके नयन से कुछ वक्त अगर,

वह मूर्त रूप में “किडनी के पत्थर” बन जाते हैं,

गर व्यक्त किया भावों को जो सही वक्त पर,

वह भाव सभी किडनी से रक्त सहित छन जाते हैं,

जो प्रश्न किया न, उलझन पर अपनी तुमने,

वह लोग हमेशा ही, स्वयं प्रश्न बन जाते हैंll

किडनी हमारे शरीर में एक छलनी की भांति कार्य करती हैl यह रक्त के सभी हानिकारक पदार्थो को शरीर से बहार कर देती हैl मनोशारीरिक विज्ञान के अनुसार यह रक्त शुद्ध करने के साथ शरीर से नकारात्मक विचारो का भी विसर्जन कर मन को साफ रखती हैl किन्तु नकारात्मक विचारों का शरीर से निकलना तभी संभव है, जब हम इन विचारों के प्रति जागरूक होl

इसके लिए जरुरी है कि हम अपने भावों के संपर्क में रहेंl और उसकी लहर आने पर उसे सुचारू रूप से अभिव्यक्त करेंl अगर हम अपने भावों के प्रति जागृत हैं तो यह अभिव्यक्ति सृजनात्मक भी हो सकती हैl भाव उर्जा शरीर में हारमोन्स द्वारा नियंत्रित होती हैl यह उर्जा शरीर की तैयारी है स्थिति से निपटने के लिएl

यह एक स्वाभाविक उर्जा है पर हम सामाजिक और व्यावहारिक कारणों के चलते इसे दबा देते हैंl और यह उर्जा तब विषाक्त हो एक मलबे की भांति हमारे अवचेतन मन में जमा होने लगती हैl क्या आपने कभी इस विषय में सोचा है कि घर की सफाई के लिए तो हम जी-जान, पैसा सब कुछ लगा देते हैं, पर मन की सफाई के लिए हम क्या करते हैं? शरीर की सफाई, लीपा पोती के लिए हम हजारो रूपए खर्च कर देते हैंl पर मन की सफाई के लिए क्या?



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