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@dawriter

कहानी— सोच के दायरे

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दोपहर के एक बजे बैंगलोर रेल्वे स्टेशन के टिकट काउंटर से टिकट लेकर उम्र में पच्चीस(25) साल का क्लीन शेव चेहरे वाला सुन्दर हाथ में ऑफ़िस बैग लिये प्लेटफार्म पर आकर चेयर पर बैठ गया.

तनावग्रस्त सुन्दर को देखकर साफ़ पता चल रहा था, कि सुन्दर किसी वजह से बहुत परेशान और मायूस हैं.

कुछ देर बाद हॉर्न बजाते हुए मैसूर जाने वाली ट्रेन आकर रूक गई. यात्री ट्रेन से उतरने लगे. सभी यात्रियों के उतरने के बाद सुन्दर पानी पीकर ट्रेन में जाकर लम्बी सीट पर अपना बैग गोद में रखकर खिड़की के पास बैठ गया.

एक घंटे बाद ट्रेन हॉर्न बजाते हुए चल पड़ी. अगले स्टेशन पर ट्रेन रूकने के बाद माथे पर तिलक लगाए बिना दाढ़ी–मूँछ के क्लीन शेव चेहरे वाले उम्र में सतावन(57) साल के मूरलीधर और बालों में फूलों का गजरा लगाए साड़ी पहने हुई उम्र में उनसठ(59) साल की शांथला आए. दोनों अपना सामान ऊपर रखकर सुन्दर के सामने वाली सीट पर बैठ गए.

ट्रेन चलते ही मूरलीधर और शांथला ने कन्नड़ बोलते हुए आपस में कुछ बात करके मूरलीधर ने मुस्कुराकर सुन्दर से कन्नड़ में कुछ कहा.

सुन्दर ने कहा—“मैं समझा नहीं. मुझे कन्नड़ नहीं आती.”

मूरलीधर—“ओह…तुम कन्नड़ नहीं होना ?”

सुन्दर—“नहीं, मैं राजस्थानी हूँ.”

मूरलीधर—“कोई बात नहीं, मई(मैं) इन्दी(हिन्दी) जानता हैं. माई नेम मूरलीधर, तुम्हारा नाम क्या हैं ?”

सुन्दर—“मेरा नाम सुन्दर हैं.”

मूरलीधर ने मुस्कुराकर कन्नड़ में शांथला से कुछ कहा और दोनों मुस्कुराने लगे.

मूरलीधर ने सुन्दर से कहा—“तुमसे एक रिक्वेस्ट कर सकता मई ?”

सुन्दर—“हाँ, कहिये.”

मूरलीधर—“ये मईरा(मेरी) वाईफ़ को खिड़की के पास बैठना अच्चा(अच्छा) लगता. लेकिन इदर धूप होता. यिगर(अगर) तुमको कोई प्रोब्लम नहीं होना, तो तुम इदर(इधर) बैठ जाओ, अम(हम) उदर(उधर) बैठ जाएगा. खिड़की तो इदर भी हैं ना.”

सुन्दर ने मुस्कुराते हुए कहा—“हाँ, कोई बात नहीं. आईये.”

आमने–सामने की सीट बदलकर शांथला खिड़की की तरफ मूरलीधर के साथ बैठ गई और मूरलीधर के साथ कन्नड़ बोलते हुए बातें करने लगी.

दोपहर के दो बजे मूरलीधर ने ऊपर की सीट से अपना एक बैग उतारकर शांथला को दिया. शांथला ने बैग में से खाना निकाला और मूरलीधर ने बैग वापस ऊपर रख दिया.

शांथला ने पापड़ जितनी पतली लेकिन तवे जितनी बड़ी दो रोटी और सब्जी, अचार, चटनी सामने की सीट पर बैठे सुन्दर को देने लगी.

सुन्दर ने मना करते हुए कहा—“आप लोग खाईये, मुझे भूख नहीं हैं.”

मूरलीधर—“ले लो, ले लो, तोरा(थोड़ा) ही तो हैं. अमको(हमको) अकैले काना(खाना) अच्चा नहीं लगता.”

सुन्दर ने मना किया लेकिन शांथला ने मुँह से कुछ बोले बिना चेहरे पर बहुत अपनेपन का भाव लाकर सुन्दर को खाना खाने के लिए आगृह किया.

सुन्दर मना नहीं कर पाया और शांथला से खाना ले लिया. शांथला और मूरलीधर भी खाना खाने लगे. रोटी–सब्जी खाने के बाद शांथला ने सुन्दर को चावल भी दिये.

सुन्दर को साउथ इंडियन चावल बहुत अच्छे लगे. और खाना चाहता था, लेकिन संकोच के कारण माँग नहीं पाया.

शांथला सुन्दर के चेहरे का हावभाव देखकर समझ गई और शांथला ने सुन्दर को चावल दे दिये.

खाना खाने के बाद सुन्दर ने कहा—“थैक्यू सॉ मच, खाना बहुत अच्छा हैं और चावल तो लाजवाब. मुझे चावल बिल्कुल पसन्द नहीं हैं, लेकिन यहाँ के लोग तो चावल कमाल के बनाते हैं.”

शांथला ने असमंजस के भाव से मूरलीधर से कन्नड़ में कुछ कहा.

मूरलीधर ने मुस्कुराते हुए शांथला को कन्नड़ में जवाब देकर सुन्दर से कहा—“ये मईरा वाईफ का मैजिक हैं. इसके आतो(हाथों) का काना जो भी काता(खाता) हैं, ओ काने(खाने) का तारीफ किये बिना रह नहीं पाता.”

सुन्दर ने मुस्कुराकर—“ये भी सही हैं. आपकी वाईफ़ ओह सॉरी अंटी जी खाना सच में बहुत अच्छा बनाती हैं.”

मूरलीधर ने हँसकर कहा—“तुम सच बताना, तुमको बहुत बूक(भूख) लगा था ना ?”

सुन्दर ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, मैनें दो–तीन दिन से कुछ नहीं खाया.”

मूरलीधर ने कहा—“मईरा वाईफ कन्नड़ में मुझे यहीं बोला, ये बहुत बूका(भूखा) हैं.”

सुन्दर ने मुस्कुराती हुई शांथला की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा—“थैक्यू सॉ मच.”

शांथला मुस्कुराकर मूरलीधर की तरफ़ देखने लगी.

मूरलीधर ने कन्नड़ में शांथला से कुछ कहा.

शांथला ने कुछ बोले बिना मुस्कुराते हुए सुन्दर के थैक्यू का जवाब दिया.

मूरलीधर ने कहा—“इसको इन्दी–इंग्लिश नहीं आता. ये ऑनली(सिर्फ) कन्नड़ जानता हैं.”

सुन्दर ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही हैं. लेकिन कोई बात नहीं. भाषा समझने से ज्यादा जरूरी होता हैं, भावनाओं को समझना.”

मूरलीधर—“हाँ, लेकिन तुम दो–तीन दिन से काना क्यों नहीं काया(खाया) ?”

सुन्दर—“बस ऐसे ही, थोड़ा परेशान हूँ.”

मूरलीधर—“क्या बात हैं ? यिगर तुम बता सकता हैं, तो अमको बताओ. अम तुम्हारा हेल्प करेगा.”

सुन्दर—“नहीं, ऐसी कोई बड़ी प्रोब्लम नहीं हैं. राजस्थान में मेरी मम्मी बीमार हैं, इसलिए परेशान हूँ.”

मूरलीधर ने हैरान होकर कहा—“हम्म…तुम्हारा मम्मी बीमार. और तुम बोलता, कोई बड़ी प्रोब्लम नहीं हैं.”

सुन्दर—“क्योंकि मैं यहाँ कर्नाटक में जॉब करता हूँ, मेरी मम्मी सिर्फ इसलिए बीमार हैं.”

मूरलीधर—“मई समझा नहीं, तुम्हारा बात.”

सुन्दर—“समझाता हूँ, मैं आठ महिने पहले घर से भाग कर आया था. इसलिए मेरे मम्मी–पापा चाहते हैं, मैं घर वापस चला जाऊँ और वहीं रहूँ.”

मूरलीधर—“हो………लेकिन तुम भागकर क्यों आया ? ये तो गलत बात होना.”

सुन्दर—“मेरे मम्मी–पापा के कारण ही. उनकी सोच बहुत अजीब हैं. वो चाहते हैं, मैं कोई बड़ी जॉब ना करुँ. मैं किसी दूसरे शहर में ना जाऊँ. बस उनके पास रहकर मजदूरी करुँ या कोई भी छोटा–मोटा काम मतलब मार्केट में किसी दुकान पर झाडूँ–पोंछा करुँ और उन दुकानदारों की गालियाँ सुनना, ये सब करुँ. बैईज्जत होता रहूँ, शर्मिन्दी महसुस करुँ, लेकिन शहर से बाहर ना जाऊँ. कोई अच्छी इज्जत वाली नौकरी या कोई इज्जत वाला काम ना करुँ. इसलिए मैनें भी उनकी परवाह करना छोड़ दिया और घर छोड़कर चला आया.”

मूरलीधर ने हैरान होकर कहा—“लेकिन वो ऐसा क्यों सोचते ?”

सुन्दर—“पता नहीं. वो खुद तो कभी शहर से बाहर गए नहीं, इसलिए मुझे भी नहीं जाने देते. बोलते हैं, बाहर की दुनिया खराब हैं, हर कोई धोखेबाज–बैईमान हैं, खबरों में सुनते नहीं क्या ? हर रोज कितने लोग गायब हो जाते हैं, बड़े शहरों में आदमी को मारकर खा जाते हैं.”

मूरलीधर—“हो…मम्मी–पापा को चिन्ता रहता हैं ना तुम्हारा, इसलिए ऐसा बोलते हैं.”

सुन्दर—“लेकिन अंकल, इतनी चिन्ता भी किस काम की ? जिसमें इन्सान कैदी जैसा महसुस करने लगे.”

मूरलीधर—“तुम्हारा बात सही हैं, लेकिन घर छोड़कर भागना सोल्यूशन नहीं होता. तुम किसी से हेल्प लेकर तुम्हारे मम्मी–पापा को समझाने का कोशिश करो.”

सुन्दर—“ऐसा कोई नहीं हैं, अंकल. जो उनको समझा सके.”

मूरलीधर—“क्यों ? तुम्हारे पड़ौस में, तुम्हारा फैमिली में और लोग नहीं हैं ?”

सुन्दर—“हैं…बहुत हैं. पड़ौस में भी और परिवार में भी. लेकिन वो समझाने वाले नहीं हैं. वो सब तो और ज्यादा भड़काते हैं. ऐसी डरावनी–डरावनी और भयानक–भयानक बातें बताते हैं, जिसे सुनकर कोई भी काँप जाए.”

मूरलीधर—“एईसा(ऐसा) कौनसा डरावना और भयानक बात बताते हैं.”

सुन्दर—“झूठ मिला–मिलाकर बताते हैं. फोर एग्जामपल, मेरे घर के पास हरियाणा की एक फैमिली रहती हैं, उनके घर के कुछ लोग मुम्बई में काम करते हैं, तो वो लोग हमेशा मुम्बई की बुराई करेगें. मुम्बई में सब गुंडे–बदमाश हैं, मुम्बई में सब पैसे के पीछे भागते हैं, मुम्बई में हर कोई धोखेबाज हैं, बात–बात पर मर्डर कर देते हैं. इसी तरह मेरे ननिहाल के कुछ लोग साउथ की बुराई करते हैं, साउथ के लोग तो इन्सानों को गाजर–मूली की तरह काटते हैं.”

मूरलीधर ने हँसकर कहा—“मईरे(मेरे) को लगता हैं, ओ लोग साउथ की फिल्में ज्यादा देखता ओएगा(होगा).”

सुन्दर ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, वो तो देखते हैं और देखते भी सिर्फ एक्शन फिल्में हैं.”

मूरलीधर—“इसलिए वो लोग ऐसा सोचता हैं. अब तुम इदर आठ मन्थ(महिने) से हैं, तुमको कैसा लगा, इदर का लोग ?”

सुन्दर—“मुझे तो यहाँ बहुत अच्छे लोग मिले. बस कभी–कभी किसी प्रोजेक्ट के लिए गांवों में जाना पड़ता हैं, तब लैग्वेज(भाषा) की प्रोब्लम होती हैं. इसके इलावा और कोई प्रोब्लम नहीं हैं. शहरों में तो लैग्वेज की भी प्रोब्लम नहीं हैं.”

मूरलीधर—“हाँ, तो इस बार तुम जब घर को जाओ, वहाँ सबको यहाँ के बारे में बताना. फिर तुम्हारे मम्मी–पापा का मिसअण्डरटेनिग(गलतफहमी) दूर हो जाएगा.”

सुन्दर—“वो नहीं समझेगें. वो सोचेगें, मैं उनको बहलाने के लिए झूठ बोल रहा हूँ और बार–बार बस एक ही रट लगाएगें, यहीं कोई काम देख ले, यहीं कोई नौकरी देख ले. लेकिन मैं ये नौकरी नहीं छोड़ूगा. यहाँ सैलरी भी अच्छी हैं और रिस्पेक्ट(इज्जत) भी बहुत मिलती हैं.”

मूरलीधर—“वहाँ तुमको अच्छी सैलरी और रिस्पेक्ट नहीं मिलता ?”

सुन्दर—“नहीं, मैं ज्यादा पढ़ा–लिखा नहीं हूँ. मैं टेन्थ(दसवीं) में फैल हो गया था, वो भी मेरे मम्मी–पापा के ही कारण.”

मूरलीधर—“मतलब ? मम्मी–पापा के कारण कैसे फैल हो गया ?”

सुन्दर—“मेरे मम्मी–पापा सारा दिन मुझे ताने मारते थे. बोलते थे, पढ़ाई–लिखाई से कुछ नहीं होता, हाथ का हुनर होना जरूरी हैं, काम करना जरूरी हैं. हर वक्त मुझ पर होने वाला खर्चा मुझे गिनवाते रहते थे, तू इतने रूपये का पानी पीता हैं, तू इतने रूपये का खाना खाता हैं, तू इतने रूपये की बिजली खर्च करता हैं, तू नहाने में इतने रूपये की साबून लगाता हैं, तू बालों में इतने रूपये के शेम्पू लगाता हैं, तेरी पढ़ाई पर इतने रूपये खर्च होते हैं. खर्चा तो तू इतना करता हैं और कमाता एक रूपया भी नहीं हैं. वो देख, वो सात साल का लड़का कचरा उठाकर दिन में सौ रूपये कमा लेता हैं. वो देख, वो दस साल का लड़का घर–घर घूमकर कबाड़ इक्कठ्ठा करके दिन में तीन सौ रूपये कमा लेता हैं. और तू ! तू घर में बैठकर पढ़ाई के नाम पर मुफ्त की रोटियाँ खा रहा हैं.”

मूरलीधर ने हैरान होकर कहा—“ऐसा होना. तुम्हारा मम्मी भी ऐसा बोलता, तुमको ?”

सुन्दर—“दोनों एक से बढ़कर एक हैं. उनको देखकर ऐसा लगता हैं, जैसे दोनों एक–दूसरे के साथ कॉम्पीटिशन कर रहे हो, कि बेटे का सत्यानाश कौन ज्यादा करता हैं ? और मेरे लिए मुसीबत ये हैं कि मैं किसी को अपनी ये प्रोब्लम बता भी नहीं सकता. लोग मुझे ही बुरा बोलते हैं, कहते हैं, देखो, इस बेशर्म को. पढ़ाई–लिखाई तो की नहीं, माँ–बाप की सेवा करता नहीं और माँ–बाप को बुरा–भला बोलता हैं.”

मूरलीधर—“वैरि सैड, तुम्हारा प्रोब्लम मई समझ रहा हूँ. तुम्हारा भाई–बहिन नहीं हैं ?”

सुन्दर—“हैं, ना. दो भाई हैं और एक बहन हैं. लेकिन वो लोग भी मेरे मम्मी–पापा जैसी सोच के ही हैं. मजदूरी करो, दुकानों पर काम करो, बैईज्जती करवाओ और बस खाना खाकर जिन्दा रहो. बीस–बाईस(20–22) साल की उम्र होने के बाद शादी करके बच्चे पैदा करो, बच्चों के बड़े होने के बाद बच्चों की शादी करो और फिर बुढ़े होकर मर जाओ. मेरी फैमिली, मेरे आस–पड़ौस, हमारे रिश्तेदार, इन सबकी सोच बस इतनी ही हैं.”

मूरलीधर ने गंभीरता भरी आवाज़ में कहा—“तुमको ये जानकर ऐरानी(हैरानी) ओएगा, ज्यादातर लोगों का सोच यहीं होता हैं. बस ये बैईज्जती वाला बात समझ में नहीं आया.”

सुन्दर—“ये भी सही हैं. ये बात भी समझा देता हूँ. ये मार्केट में दुकानदार होते हैं, किरयाना वाले, कॉस्मेटिक वाले, मेडिकल वाले, फर्नीचर वाले, बरतन वाले, कपड़े वाले, गैराज वाले, वैल्डिंग वाले ऑवर–ऑल सभी दुकानवाले, ये सब अपने कस्टमर(ग्राहक) के साथ बहुत अपनेपन और इज्जत से बात करते हैं. ऐसा लगता हैं, जैसे इनसे अच्छा इन्सान तो दुनिया में कोई हैं ही नहीं. सब कुछ इनसे ही खरीद लो.”

मूरलीधर—“हो…बात तो ऐसे ही करते हैं. तभी तो कस्टमर आता.”

सुन्दर—“हम्म…लेकिन सिर्फ कस्टमर या जो इनको काम देते हैं, सिर्फ उनके साथ. जो लोग इनकी दुकान पर या इनके पास काम करते हैं, उनके साथ ये लोग बहुत बदतमीजी से बात करके उन काम करने वालों को बुरी तरह बैईज्जत करते हैं.”

मूरलीधर—“हाँ, ऐसा देखा तो, मई भी देखा हैं.”

सुन्दर एक्टिंग करके बताने लगा—“कस्टमर के सामने इतना नहीं बोलते. कस्टमर के जाने के बाद बोलते हैं.

पंजाब में अगर लड़का पाँच मिनट देर से आए तो बोलेगें, ओए खोते दे पुतर ! लावा दो कन थल्ले. तैनू किन्नी बार केया हैं, दुकान खुलण तो पाँज मिन्ट पैला आया कर.

हरियाणा में बोलेगें, अरे, बावळीबूच !  तेरा बाप गो माल समझ लियो के ? हराम का रिपया कोनी देयू तन. टैम उ आया कर.

हमारे राजस्थान में कोई कस्टमर कुछ खरीदे बिना चला जाए तो बोलते हैं, ठा तो कोनी भैड़ गी पूँछ किन्ने होवै. आजगा काम करन न. बा किया गई पाछी. बैरो कोनी तन समान किया बैच्या करे ? डांगर नहीं हौवे तो.

इसके बाद गुजरात में कुछ देर के लिए लड़का यहाँ–वहाँ चला जाए तो बोलते हैं, सू का मरी ग्यो, गधेडा. कोई काम पण कर्या कर, पैसा तो महिनो पुरो थाय के तरत ज मांगी ले छे. जेटलु ध्यान पैसा पर छे एटलु काम पर केम नथी लागतु ? केम तारी दानत मा खोट छे ? बधा ने बस हराम ना रुपिया जोइए छे.

और आगे महाराष्ट्र पहुँचने पर सुनाई देता हैं, हे इथे पड़लेली आहे, हे इथे पड़लेली आहे, तुला दिसत नाहीं का ? दू एक झापड़ कान इठे, कोई काम नहू येत तुला, कोईच काम करत नाहीं, बस फोकट चे पैसे पाहिजे.

इन सबके बाद आपके कर्नाटक और तमिलनाडू के मार्केट वाले भी किसी से कम नहीं हैं. तमिल–कन्नड़ मुझे समझ नहीं आती, लेकिन यहाँ भी एन्द्रे–सुमिरे, हूड़े–हाड़े, इड़े–उड़े, कंगड़मड़ा–कुंगड़मुड़ा, चिकड़मल्ली–आऊपल्ली जैसे डायलॉग बहुत से लड़के बताते रहते हैं.”

मूरलीधर ठहाका लगाकर हँसे और सुन्दर की तमिल–कन्नड़ में बोली हुई बात का मतलब बताकर बोले—“तुम सब जगह से तोरा–तोरा एक्सपीरियस(अनुभव) लिया हैं.”

सुन्दर ने हँसकर कहा—“बस ऐसे ही हैं. कुछ मेरा खुद का एक्सपीरियस हैं, बाकि दोस्त लोग हैं, वो बताते रहते हैं. और ये तो मैनें नॉर्मल(साधारण) बातें बताई हैं. लड़कों और आदमियों को काम पर रखने वाले बहुत से लोग तो माँ–बहन–वाईफ़–बेटी की बहुत ही घटिया और गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालते हैं. इतनी ज्यादा घटिया और गन्दी गालियाँ, जिसके बारे में मैं आपको बता भी नहीं सकता, मुझे शर्म महसुस हो रही हैं.”

मूरलीधर—“हो…ये तो बहुत बुरा बात हैं.”

सुन्दर—“हाँ, यहीं हाल मजदुरी करने वालों का होता हैं. मजदुरों के जो ठेकेदार और मिस्त्री होते हैं, वो लोग अपने मालिकों से तो इन मार्केट वाले दुकानदारों की तरह बहुत अपनेपन और इज्जत से बात करते हैं, लेकिन मजदुरों को बात–बात पर गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालकर बुरी तरह बैईज्जत करते हैं.”

मूरलीधर—“फिर ऐसे में लोग उनके पास काम कैसे करता हैं ?”

सुन्दर—“मजबुरी अंकल जी, मजबुरी. इसके इलावा एक रीत बनी हुई हैं, कि शुरू–शुरू में ये सब सहन करना ही पड़ता हैं, गरीबों को तो ये सब सहन करना ही पड़ता हैं, वगैरह–वगैरह. मुझे भी मेरे मम्मी–पापा और भाई यहीं बोलते हैं, थोड़ा–बहुत तो सहन करना ही पड़ेगा. तू कोई करोड़पति–अरबपति नहीं हैं. लेकिन मैनें साफ़–साफ़ बोल दिया, मैं बैईज्जती सहन करके कोई काम नहीं करुँगा.”

मूरलीधर—“और फिर तुम्हारे घर में सब लोग तुमसे नाराज हो गया ओएगा.”

सुन्दर—“नाराज ! मेरा जीना मुश्किल कर दिया. मैं आपको शुरू से बताता हूँ. जब मैं पढ़ता था, तब मेरे घरवाले मुझे बात–बात ताने मारते थे. मैं अपनी बुकस लेकर पढ़ने बैठता और कोई ना कोई मेरे पास बैठकर भाषण देना शुरू कर देता. कुछ कमा, सिर्फ पढ़ाई से कुछ नहीं होगा–कुछ कमा, सिर्फ पढ़ाई से कुछ नहीं होगा. हालाकि मैं काम करता था, गर्मियों की छुट्टियों में किसी दुकान पर लग जाता या मजदुरी करने जाता. दीवाली की छुट्टियों में किसी दुकान पर काम कर लेता. लेकिन घरवालों के लिए इतना काफ़ी नहीं था. उनके भाषण कभी खतम नहीं हुए. एट्थ(आठवी) तक मैं पढ़ाई में बहुत अच्छा था. लेकिन फिर घरवालों की बातें सुन–सुनकर मेरा दिमाग खराब हो गया और पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगा. मैं टेन्थ में फैल हो गया. मैनें एक फोटो स्टूडियो में फोटोग्राफी का काम सीखा था, तो मुझे एक कम्पनी में फोटोग्राफर की जॉब मिल गई. वहाँ मेरी बहुत इज्जत थी, सब मुझे सुन्दर जी, सुन्दर साहब कह कर बुलाते, मुझे बहुत अच्छा लगता.”

मूरलीधर—“फिर वो जॉब तुमने क्यों छोड़ा ?”

सुन्दर—“वो जॉब मैनें नहीं छोड़ा. मेरे घरवालों ने छुड़वा दिया.”

मूरलीधर—“क्यों ?”

सुन्दर—“वहाँ मुझे सिर्फ तीन हजार पर मन्थ(महिना) मिलते थे. घरवाले बोले, मजदुरी में तीन सौ पर डे(दिन) मिलते हैं. मजदुरी नहीं होती, तो किसी दुकान पर लग जा. दुकान पर भी पाँच–छः हजार मिल जाएगें. मैनें कहा, मेरे लिए पैसे से ज्यादा जरूरी इज्जत हैं. तो घरवाले बोले, तेरी इस तीन हजार की इज्जत को चाटे क्या ? तीन हजार कमाते हुए शर्म नहीं आती तुझे ?”

मूरलीधर—“ये तो बड़ा प्रोब्लम हो गया तुम्हारे लिए.”

सुन्दर—“हाँ, ऐसी प्रोब्लम बहुत बार हुई. मैं किसी तरह कोशिश करके बहुत मुश्किल से कोई इज्जत वाली जगह जॉब ढूंढता था और मेरे घरवाले वहाँ पहुँचकर कम सैलरी का रोना रोकर कोई ना कोई पंगा करके सब चोपट कर देते. बस इसी से तंग आकर मैं घर से भाग आया.”

मूरलीधर—“ओह…फिर तुमको यहाँ जॉब कैसे मिला ?”

सुन्दर—“यहाँ एक लड़की ने जॉब दिलाया. मैं घर से भागकर पहले जयपुर आया. जयपुर आकर मैनें मुम्बई में कुछ फेसबुक के दोस्तों को कॉल किया. पहले तो उन सबने मुझे समझाया कि वापस चला जा. इस तरह घरवालों को परेशान करना ठीक नहीं हैं. लेकिन मैनें साफ़ बोल दिया, तुम लोग कुछ हेल्प कर सकते हो, तो ठीक हैं. वरना कोई बात नहीं. घर तो वापस नहीं जाऊँगा.”

मूरलीधर—“हो…तुम फेसबुक वाले दोस्तों के भरोसे घर से भाग आया.”

सुन्दर—“हाँ, आया तो उनके भरोसे ही था और उन सबने मेरी हेल्प भी बहुत की. यहाँ मैसूर में जिस लड़की ने मुझे जॉब दिलाई, वो भी फेसबुक पर ही दोस्त बनी थी.”

मूरलीधर—“अच्चा बात हैं, लेकिन इट्स वैरि डेंजरस(खतरनाक). तुम उन फेसबुक वाले दोस्तों से पहले कभी मिला था.”

सुन्दर—“अंकल ! हमें सोचने–समझने के लिए दिमाग नाम की चीज मिली हैं. मैं इसको काम में भी लेता हूँ. मैनें फेसबुक पर सिर्फ अच्छे लोगों को ही अपना दोस्त बनाया. जिनमें किसी भी तरह की कोई गलत आदत या कोई बुराई नहीं हैं. इसके इलावा सबकी फैमिली और सबके घर–परिवार के लोगों के बारे में भी उनसे पूछ लिया. बाकि ये लड़कियों और महिलाओं के पीछे भागने वाले, धर्म–मजहब की बहसबाजी करने वाले, राजनीति में उलझे रहने वाले, ऐसे लोगों से मैं दूर ही रहता हूँ.”

मूरलीधर—“ये तो तुम्हारा बहुत अच्चा बात हैं. लेकिन फेसबुक पर कैसे पता चलता ? कौन अच्चा ? कौन बुरा ?”

सुन्दर—“अब ये कैसे समझाऊँ ? लोग फेसबुक पर जो करते हैं, उससे पता चल जाता हैं. उनके पोस्ट, उनके कॉमेन्ट, मैसेज करके क्या बातें करते हैं और कौनसी बातें किस तरीके से बातें करते हैं ? इससे पता चल जाता हैं.”

मूरलीधर—“अच्चा, तुम लड़का हैं ना. ये प्रोब्लम गर्ल्स को रहता हैं.”

सुन्दर—“गर्ल्स में भी कोई प्रोब्लम नहीं हैं. इस तरह की बातों पर ध्यान देकर वो भी सब समझ सकती हैं, बस हर बात पर सोच–समझकर ध्यान देने की जरूरत हैं.”

मूरलीधर—“फिर भी गर्ल्स ऐसे हर किसी से नहीं मिल सकता. आजकल बहुत बुरा लोग होता.”

सुन्दर—“बुरे लोग होते हैं, इसलिए तो कह रहा हूँ. किसी लड़की को किसी फेसबुक फ्रैंड से मिलना हो, तो सुनसान जगह पर नहीं मिलना चाहिए. किसी रेस्टोरेंट या किसी ऐसी जगह पर मिलना चाहिए, जहाँ आस–पास बहुत से लोग मौजूद हो और कोई कुछ बुरा ना कर सकें. या फिर अपनी जान–पहचान के कुछ लोगों को साथ लेकर जाना चाहिए. दो–चार सहैलियों को, दो–चार दोस्तों को और जिससे मिलने जा रहे हो, उसको मत बताओ कि मेरे साथ और भी लोग हैं. अब मुर्खों की तरह यू ही मुँह उठाकर निकल गए, चलो जी चलो, फेसबुक फ्रैंड ने मिलने बुलाया हैं. तब तो किस्मत की बात हैं, गलत लोग तो मुर्खता का फायदा उठाते ही हैं.”

मूरलीधर ने हँसकर कहा—“तुम बहुत इंटेलीजेंट बॉय. तुम्हारा बात से लगता, तुम अच्चे लोगों को ही दोस्त बनाया होगा.”

सुन्दर—“हम्म…और मैनें जिन लोगों से दोस्ती की, उन सबने मेरी बहुत हेल्प भी की हैं. यहाँ आने से पहले मैं बीस–पच्चीस(20–25) दिन मुम्बई में रहा. मुम्बई के दोस्तों ने मेरे रहने और खाने–पीने का बहुत ध्यान रखा. उन दोस्तों में चार–पाँच लड़कियाँ और लेडिज भी हैं. लेकिन वहाँ मुझे कोई जॉब नहीं मिली. फिर मेरी मैसूर की एक फ्रैंड से बात हुई. उसने कहा, तुम मैसूर आ जाओ, मैं मेरे बॉस से बात करती हूँ, तुम्हारी जॉब के लिए. मैं मैसूर आया तो उसके बॉस ने कहा, तुम्हें पहले तीन महिने ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी. मैनें सब कुछ एक महिने में ही सीख लिया. पहले दस हजार पर मन्थ सैलरी की बात हुई थी, लेकिन ट्रेनिंग के बाद मेरा काम देखकर मुझे सीधे पन्द्रह हजार दिये और इस साल दीवाली के बाद अठारह हजार सैलरी हो जाएगी.”

मूरलीधर—“ये तो बहुत अच्चा हैं. तुमने तुम्हारे मम्मी–पापा को नहीं बताया ये सब ?”

सुन्दर की आँखे नम हो गई और सुन्दर ने मायूस होकर कहा—“बताया. वो लोग कहते हैं, हमें अठारह हजार नहीं चाहिए. हमें तू सही–सलामत घर चाहिए. ये नौकरी–वॉकरी छोड़ और घर आजा. मैनें नौकरी छोड़ने से मना किया, तो मेरे घरवाले कहते हैं, तुझे अठारह हजार की नौकरी हम घरवालों से ज्यादा प्यारी हैं. इसलिए मैं परेशान हूँ. तीन दिन पहले ऑफ़िस के काम से बैंगलोर आया था, तब से इस टेन्शन में कुछ खाया भी नहीं. चाहे कुछ भी हो, आखिर हैं तो मेरे मम्मी–पापा और भाई–बहन. अब अगर घरवालों की बात मानकर मैनें ये जॉब छोड़ दी, तो मुझ दसवीं फैल को इतनी अच्छी और इज्जत वाली जॉब दूबारा नहीं मिलेगी. इससे पहले मैनें जो फोटोग्राफर की जॉब की थी, वहाँ मुझसे ज्यादा पढ़े–लिखे लोग मेरे जूनियर थे. उनको ये पसन्द नहीं था, उनसे कम एजयूकेडेट लड़का उनका सीनियर हैं और उनको ऑर्डर देता हैं. इसलिए हमेशा मेरे खिलाफ़ कुछ ना कुछ करते रहते थे. लेकिन यहाँ सब लोग बहुत अच्छे हैं, सबके साथ मेरी बहुत अच्छी बनती हैं. मुझे मैसूर आए छः महिने से ज्यादा हो गए. मैसूर में मैनें अभी तक होटल में खाना नहीं खाया. दिन में स्टाफ के लोग अपना टिफिन शेयर कर लेते हैं. रात का खाना मुझे मकान–मालिक खिला देते हैं. जिनके पास मैं किराये पर रहता हूँ, वो लोग भी बहुत अच्छे हैं. कुछ समझ में नहीं आ रहा, ये सब घरवालों को कैसे समझाऊँ ?”

मूरलीधर—“बहुत अजीब प्रोब्लम हैं, तुम्हारा. ऐसी प्रोब्लम से मई भी गुजर चुका हैं.”

सुन्दर—“मतलब ?”

मूरलीधर—“बताता हूँ. मईरे बचपन में मईरे आई–अप्पा(माता–पिता) में बहुत झगड़ा होता. कभी आई सही और अप्पा गलत होता, तो कभी अप्पा सही और आई गलत होता. मई हमेशा कन्फ्यूज़न(दुविधा) में रहा, आई की साइड बोलता, तो अप्पा नाराज. अप्पा की साइड बोलता, तो आई नाराज. इसी में मईरा बचपन निकल गया. मई ट्वंटी(बीस) ईयर का हुआ, तो मेरा आई–अप्पा ने मेरा शादी कर दिया. मई चाहता था, शादी से पहले मई सेल्फ–डिपेन्ड बन जाऊँ. लेकिन आई–अप्पा ने मेरा बात नहीं सुना.”

सुन्दर—“फिर ?”

मूरलीधर—“फिर पहले से बड़ा प्रोब्लम. मईरा शादी के बाद मईरा आई–अप्पा मईरा वाईफ़ से झगड़ा करता. सैम कंडीशन, कभी आई–अप्पा सही और वाईफ़ गलत होता, कभी वाईफ़ सही और आई–अप्पा गलत होता. मई जिसका भी साइड से बोलता, तो सबसे ज्यादा गलत मई ही बन जाता. मई समझ गया, ये प्रोब्लम हमेशा यईसे ही रईगा(रहेगा). इसलिए मई बस चुप रहता और मईरे सामने जब झगड़ा होता, तो वाईफ़ को बाहर घूमाने ले जाता. वाईफ़ सारी शिकायतें मुझे सुनाता और मई चुपचाप सुनता रहता.”

सुन्दर—“फिर सब ठीक हो गया ?”

मूरलीधर—“ठीक तो नहीं हुआ. घर का प्रोब्लम कभी पूरी तरह ठीक नहीं होता. कभी–कभी मईरा और वाईफ़ में भी झगड़ा हो जाता. लेकिन पहले से कम हो गया. लेकिन आई–अप्पा के साथ उसका प्रोब्लम हमेशा रहता.”

सुन्दर—“फिर आई–अप्पा को कैसे समझाया आपने ?”

मूरलीधर—“आई–अप्पा को मई नहीं समझा पाया. क्योंकि जब आई–अप्पा गलत होता, वो अपना गलती नहीं मानता. घर के बाकि लोग बड़े बुजुर्ग का साथ देता. इसलिए मईरा बात वो कभी नहीं समझा और वाईफ़ के साथ मईरा झगड़ा ज्यादा होता. वाईफ़ कहती, जब मईरा गलती होता, तुम मुझे समझाता. लेकिन आई–अप्पा को तुम कभी कुछ नहीं बोल पाता.”

सुन्दर—“हम्म…मतलब आपके और अंटी जी के झगड़े बन्द नहीं हुए.”

मूरलीधर—“हाँ, मई बताया ना. घर का प्रोब्लम कभी खतम नहीं होता. बस वाईफ़ के साथ मईरा झगड़ा कम हो गया. फिर मईरे बच्चे हो गए. दो लड़का, एक लड़की. मई सोच लिया, जैसे मईरा आई–अप्पा के झगड़े में मईरा बचपन टेन्शन में चला गया, मई अपने बच्चों का बचपन ऐसे नहीं जाने देगा. इसलिए मई खुद में थोरा चेन्ज(बदलाव) किया. जब मईरा गलती होता, तो मई वाईफ़ को सॉरी बोलने में कभी देर नहीं किया. जब मई वाईफ़ को सॉरी बोलकर अपना गलती मान लेता, तो वाईफ़ को बहुत अच्चा लगता. और यिगर वाईफ़ का गलती होता, मई तब भी वाईफ़ से झगड़ा नहीं करता था, वाईफ़ को कुछ दिन बाद समझाता, जब वाईफ़ का ब्रेन(दिमाग) ठंडा रहता और वाईफ़ मईरा बात समझने का कंडीशन में होता. फिर धिरे–धिरे वाईफ़ भी खुद को चेन्ज किया और मईरा वाईफ़ के साथ मईरा अच्चा जमने लगा. अमारा(हमारा) अण्डरस्टैडिंग अच्चा हो गया.”

सुन्दर ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही हैं. तो आप अंटी जी के सामने अंटी जी की बुराई कर रहे हैं. अंटी को हिन्दी नहीं आती, इसका फायदा उठा रहे हो क्या ?”

मूरलीधर ने हँसकर कहा—“नहीं–नहीं, आ एम सॉरी, मई तुमको बताया नहीं. मईरा फर्स्ट वाईफ़ टेन ईयर(दस साल) पहले दुनिया से चला गया, उसको इन्दी आता था. ये मेरा सैकण्ड वाईफ़ हैं.”

सुन्दर—“ओह…एम सॉ सॉरी.”

मूरलीधर—“इट्स ओके. कोई बात नहीं, मईरे को बुरा नहीं लगा.”

सुन्दर—“थैक्यू, अंकल जी.”

मूरलीधर—“इसका नाम शांथला हैं. अमारा शादी को सिक्स ईयर(छः साल) हो गया.”

सुन्दर—“तो शांथला अंटी के साथ आपकी लव–मैरिज हुई हैं क्या ?”

मूरलीधर—“नहीं, ये भी अरैंज मैरिज ही हैं. मईरा पहला शादी मईरे आई–अप्पा करवाया और ये दूसरा शादी अमारे बच्चों ने करवाया.”

सुन्दर ने हैरान होकर कहा—“ये भी सही हैं. आपके बच्चों ने तो एक नई मिसाल बना दी, अपने पापा की शादी करवाकर.”

मूरलीधर—“सिर्फ मईरा अकैले का बच्चे नहीं. शांथला के दोनों बच्चे भी. शांथला को एक लड़का और एक लड़की.”

सुन्दर—“शांथला अंटी के बच्चे और आपके बच्चे एक–दूसरे को जानते हैं क्या ?”

मूरलीधर—“हाँ, बचपन से. शांथला को मई ट्वंटी–सेवन ईयर(सताईस साल) से जानता.”

सुन्दर—“अच्छा.”

मूरलीधर—“हम्म…जब मई थर्टी(30) ईयर(तीस साल) का हुआ, तब मईरे को गवर्मेंट स्कूल में टीचर का जॉब मिल गया. मईरा फर्स्ट पोस्टिंग एक विलैज(गांव) में हुआ. शांथला वहाँ स्कूल में चपरासी का काम करती थी. जब मुझे इसका दुःख भरा कहानी मालूम हुआ, तो मईरे को बहुत दुःख हुआ.”

सुन्दर—“इनके साथ क्या हुआ था ?”

मूरलीधर—“शांथला का फर्स्ट हैंसबैंड बहुत बुरा आदमी होना, वो ड्रिंक(शराब) करता और शांथला को बहुत मारता. शांथला का अप्पा इसके बचपन में ही चला गया और इसका भाई उस टाइम छोटा था, इसलिए ये हैंसबैंड का मार सहन करती रही. जब शांथला का भाई बड़ा होकर तुम्हारी उम्र का हुआ, तब वो शांथला के हैंसबैंड को मारपीट करने से मना किया. शांथला का हैंसबैंड नहीं माना, तब शांथला का भाई ने कभी रिलेटिव(रिश्तेदार) को बोला, कभी पुलिस में जाने का बोला. लेकिन शांथला का हैंसबैंड फिर भी नहीं माना. फिर शांथला का भाई शांथला और शांथला के दोनों बच्चों को अपने घर ले आया और शांथला के हैंसबैंड को बोल दिया, जब तुम सुधर जाओ, तब मईरा सिस्टर और बच्चों को ले जाना. वरना अब से ये मईरे पास ही रहेगा.”

सुन्दर—“फिर वो सुधर गया, अंटी का फर्स्ट हैंसबैंड ?”

मूरलीधर—“वो बहुत बुरा आदमी. वो नहीं सुधरा. वो शांथला के भाई के साथ झगड़े करता. शांथला उसको बोला, तुम अपना जिन्दगी देको(देखो), मईरे लिए क्यों परेशान होता. लेकिन शांथला का भाई शांथला से बहुत प्यार करता, वो शांथला को दुःखी नहीं देख सकता था, इसलिए वो बोला, तुम चिन्ता मत करो. अगर तुम्हारा हैंसबैंड तुमको इज्जत से नहीं रखेगा, तो मई तुमको वहाँ नहीं जाने देगा. तुम इदर मईरे पास रहो, तुमको कोई प्रोब्लम हो, तुम मुझे बताओ.”

सुन्दर—“फिर क्या हुआ ?”

मूरलीधर—“फिर शांथला का हैंसबैंड शांथला के भाई से बहुत झगड़ा करता, शांथला को वापस भैजने के लिए. शांथला के भाई ने शांथला को वापस ससुराल भेज भी दिया. लेकिन शांथला का हैंसबैंड शांथला के साथ पहले से ज्यादा मारपीट करने लगा. फिर शांथला का भाई शांथला को वापस ले आया. इससे गुस्सा होकर एक दिन शांथला के हैंसबैंड ने शांथला के भाई का मर्डर कर दिया.”

सुन्दर—“ओह…ये तो बहुत बुरा हुआ. ये शराब पीने वालों को तो उल्टा लटकाकर जूतों से पीटना चाहिए.”

मूरलीधर—“हाँ, शराब का आदत बहुत बुरा. इन्सान जानवर बन जाता.”

सुन्दर—“हम्म…अब कहाँ हैं ? इनका वो फर्स्ट हैंसबैंड.”

मूरलीधर—“उसको सजा हो गया था, फिर वो जैल में ही मर गया.”

सुन्दर—“ये भी सही हैं. ऐसे लोग जिन्दा रहकर भी क्या करेगें ? किसी ना किसी की जिन्दगी ही खराब करते हैं, कभी दुःखी होने का नाटक करके लेडिज के साथ अय्याशी करते हैं और कभी किसी भाई या पति का मर्डर कर देते हैं. हैरानी तो तब होती हैं, जब लेडिज इन शराबियों को दुःख–दर्द में डूबा हुआ सच्चा–प्रेमी या आशिक समझती हैं और इन हवस के भूखे भेड़ियों की हवस मिटाती हैं, प्यार के नाम पर.”

मूरलीधर ने कहा—“तुमको पता नहीं, लेडिज का अक्ल घूटनों में होता. लेडिज के साथ अच्ची बातें करके अच्चा होने का नाटक करो, वो इम्प्रेस हो जाता. गाली देकर गुस्सा करो, तो वीर पुरुष समझ लेता. अपना बेवकूफी से धोका काता और सारे आदमियों को बुरा बोलता.”

सुन्दर—“ये भी सही हैं. इन लेडिज की यहीं प्रोब्लम हैं, पहले तो बिना सोचे–समझे, गलत और बेकार लोगों से प्यार करती हैं. गलत और बेकार लोगों को कभी तो सबक सिखाने के नाम पर प्यार और अपनापन देती हैं, और कभी गलत लोगों को प्यार और अपनेपन से सुधारने के नाम पर उनको प्यार और अपनापन देती हैं. फिर धोखा खाने के बाद अच्छे पुरुषों को भी बुरा बोलने लगती हैं.”

मूरलीधर—“हाँ, ये शांथला के साथ भी ऐसा ही हुआ. शांथला के भाई के मरने के बाद सब इसको बुरी नजर से देखता, सब इसकी मजबुरी का फायदा उठाने को सोचता.”

मूरलीधर कहते–कहते रूक गए.

कुछ देर बाद मूरलीधर ने कहा—“तुम अच्चा लड़का लगता, इसलिए तुमको बताता, इसका भाई के मरने के बाद इसके रिश्तेदारों ने इसका कोई हेल्प नहीं किया. फिर एक आदमी शांथला को स्कूल में काम दिलाने के बदले साथ में सोने को बोला. मजबुरी में शांथला को उसका बात मानना पड़ा. फिर स्कुल में काम मिला तो स्कूल का प्रिंसीपल भी बहुत बुरा आदमी. वो इसको अपने साथ सोने को बुलाता और ये भी अपने दो बच्चों के कारण उसके बुलाने पर चला जाता. मईरे को जब इसका पूरा कहानी मालूम हुआ, मई इसका हेल्प करने का सोचा. लेकिन ये मईरे को गलत समझ लिया. ये सोचा, मई भी इसको मईरे साथ सोने के लिए बोलेगा. मईने इसको कहा, मई शादीशुदा आदमी. मईरा वाईफ़ के साथ कभी–कभी मईरा झगड़ा होता, कभी वाईफ़ मुझे ताने मारता. लेकिन मई उसके साथ बहुत हैप्पी. मई घर से बाहर ये सब नहीं करता. तुम्हारे बारे में पता चला, मई तुम्हारा हेल्प करने का सोचा, तुमको बुरा लगा, तो एम सॉरी. फिर मई इसके साथ दुबारा बात नहीं किया.”

सुन्दर—“फिर क्या हुआ ?”

मूरलीधर—“फिर धिरे–धिरे इसको अपने–आप मईरे बारे में मालूम हो गया. फिर शांथला ने मुझे सॉरी बोला. मई बोला, कोई बात नहीं, मई तुमको दूसरी जगह अच्चा काम दिलाता. तुम ये प्रिंसीपल के पास जाना बन्द कर दो.”

सुन्दर—“फिर अंटी ने मान ली, आपकी बात.”

मूरलीधर—“पहले तो नहीं माना, लेकिन उस प्रिंसीपल का मनमानी बढ़ता गया. इसलिए बाद में मईरे समझाने पर मान गया. फिर मई मईरा एक फ्रैंड के पास शांथला को काम काम दिलाया, फिर शांथला अपने बच्चों के साथ वहाँ रहने लगा.”

सुन्दर ने कहा—“ये आपने बहुत अच्छा किया. लेकिन उस प्रिंसीपल का कुछ नहीं हुआ ?”

मूरलीधर—“वो सिर्फ नाम का प्रिंसीपल. अन्दर से एकदम बुरा और बदमाश आदमी. मई उससे उलझना ठीक नहीं समझा.”

सुन्दर—“ये भी सही हैं. किसी का भला करने के लिए सुरक्षित रहना भी जरूरी हैं.”

मूरलीधर—“हम्म…फिर मईरा लाइफ़ में एक ओर बिग प्रोब्लम.”

सुन्दर—“वो क्या ?”

मूरलीधर—“मई शांथला से मिलने जाता. शांथला का हेल्प करता, इससे मईरा वाईफ़ मुझे गलत समझ लिया.”

सुन्दर—“ओह…फिर ?”

मूरलीधर—“फिर मई वाईफ़ को बहुत समझाया, लेकिन उसको मईरा बात पर भरौसा नहीं हुआ. मई मईरा फ्रैंड को अपनी प्रोब्लम बताया, जिसके पास शांथला काम करती थी. उसने मईरा वाईफ़ को शांथला और शांथला के दोनों बच्चों से मिलवाया. शांथला से मिलकर बात करने के बाद मईरा वाईफ का सारा मिसअण्डरस्टेनिंग खतम हो गया और मईरा वाईफ़ शांथला को अपना सिस्टर माँनने लगा. फिर सब ठीक हो गया.”

सुन्दर—“ये भी सही हैं. फिर आपकी वाईफ़ बीमार हो गई थी क्या ?”

मूरलीधर—“हाँ, उसको कैंसर हो गया था. मई बहुत ईलाज करवाया, लेकिन उसको बचा नहीं पाया.”

सुन्दर—“ओह…फिर शांथला अंटी से आपकी शादी की बात कैसे चली ?”

मूरलीधर ने मुस्कुराकर कहा—“शांथला के बच्चे मुझे और मईरा वाईफ़ को आई–अप्पा की तरह ही मानता. उनका पढ़ाई–लिखाई मई करवाया और उनका शादी भी मई करवाया. शांथला के बेटे का शादी के टाइम तो मईरा वाईफ़ जिन्दा था और मईरे बच्चे भी शांथला को आई की तरह ही मानता. मईरे वाईफ़ का डेथ होने के वन ईयर बाद मई बीमार हुआ, तब मईरे बच्चों के साथ शांथला और शांथला के बच्चों ने छः मन्थ तक मईरा बहुत सेवा किया. शांथला अमारे घर में ही रहा. मईरे ठीक होने के बाद जब शांथला वापस जाने लगा, तब मईरे बच्चों ने शांथला को रोक लिया और कहा, अब से आप हमारे साथ ही रहो. अम बचपन से आपको आई की तरह ही समझा हैं. अमने मना किया, तो सभी बच्चों ने आपस में बात करके कहा, आप दोनों शादी कर लो. अमको ये बात बहुत अजीब लगा. अमने बच्चों को बहुत समझाया, ऐईसे अच्चा नहीं लगेगा. लोग अमारा मजाक बनायेगा. लेकिन बच्चों ने कहा, लोगों को जवाब अम देगा. आप कुछ गलत नहीं कर रहा. जब अम पाँचों भाई–बहन को कोई प्रोब्लम नहीं, अम साथ रहने को तैयार, तो लोगों को क्या प्रोब्लम ? फिर अम बच्चों का बात मान लिया.”

सुन्दर—“हाँ, तो सही हैं. बहुत से बुजुर्ग आदमी इस उम्र में शादी करते हैं. फिर आपकी शादी तो आपके बच्चों ने ही करवाई हैं और सिर्फ आपके ही नहीं, शांथला अंटी के बच्चे भी इससे खुश हैं. ये तो और भी अच्छी बात हैं.”

मूरलीधर—“हम्म…अम भी अब बहुत खुश हैं. अभी अम शांथला का बेटी के ससुराल से ही आ रहे हैं. पहले अमारे रिश्तेदारों को बहुत अजीब लगा, लेकिन अब सब ठीक हैं.”

इस बीच स्टेशन आने पर ट्रेन हॉर्न बजाते हुए धीमी होकर रूक गई. दो अन्य यात्री सुन्दर के पास आकर बैठ गए. ट्रेन हॉर्न बजाते हुए आगे चल पड़ी.

सुन्दर खिड़की से बाहर की तरफ़ देखते हुए अपनी सोच में डूब गया. मूरलीधर शांथला के साथ कन्नड़ में बातें करने लगे.

ट्रेन हर स्टेशन पर रूकते हुए तेजी से मैसूर की तरफ़ बढ़ती हुई हॉर्न बजाते हुए मैसूर जंक्शन पर आकर रूक गई.

अपने बैग लेकर मूरलीधर और शांथला सभी यात्रियों के साथ उतरने लगे.

मूरलीधर ने सुन्दर को खोया देखकर कहा—“मैसूर आ गया, उतरना नहीं हैं क्या ?”

सुन्दर मुस्कुराते हुए खड़ा होकर मूरलीधर और शांथला के साथ ट्रेन से बाहर आया.

मूरलीधर ने सुन्दर से कहा—“तुमको एक सोल्यूशन बताऊँ, शायद तुम्हारा टेन्शन कम हो जाए.”

सुन्दर—“हाँ, जरूर.”

मूरलीधर—“तुम तुम्हारा मम्मी–पापा को यहाँ बुला लो और उनको अपने साथ रको(रखो).”

सुन्दर—“इससे क्या होगा ? यहाँ आकर भी वो मुझे जॉब छोड़कर वापस जाने के लिए ही कहेंगे.”

मूरलीधर—“तुम पहले उनको बुलाओ तो. उनको यहाँ बुलाकर तुम्हारे फ्रैंड्स से मिलाओ, तुम्हारे मकान–मालिक से मिलाओ, तुम्हारा जॉब के बारे में समझाओ. जब तुम्हारे मम्मी–पापा खुद देकेगा(देखेंगा), तुम्हारा फ्रैंड्स बहुत अच्चा, तुम्हारा मकान–मालिक बहुत अच्चा, तुम्हारा जॉब बहुत अच्चा, तुम यहाँ जॉब में बहुत हैप्पी. तो उनका सोच बदलेगा. अभी देको(देखो), तुमने बताया, वो कभी शहर से बाहर नहीं गया, उन्होंने सिर्फ मजदुरी या जो तुम बताया, सिर्फ वो ही काम किया. इसलिए उनका सोच वहीं तक का हैं.”

सुन्दर—“यहीं तो प्रोब्लम हैं.”

मूरलीधर—“हाँ, और इस प्रोब्लम का सोल्यूशन तभी ओएगा, जब तुम उनको उस शहर से बाहर का दुनिया दिकाएगा(दिखाएगा). सब जगह अच्चा लोग भी होता और बुरा लोग भी होता. लेकिन पब्लिसिटी(प्रचार) बुरा लोग का ज्यादा होता और अच्चा लोग का कम होता. मई और मईरा वाईफ़ कन्नड़ में तुम्हारे बारे में ही बात कर रहा था. हर इन्सान का सोच एक जगह तक बँधा हुआ होता. जब इन्सान उस जगह से या उस पॉइंड से आगे बढ़ता हैं, तब इन्सान का सोच भी डेवलप(प्रगति या विकास) होता. जैसे तुमने फोटोग्राफर का जॉब किया, तुमको रिस्पेक्ट(इज्जत) मिला, तो तुमको रिस्पेक्ट पैसे से ज्यादा जरूरी लगने लगा.”

सुन्दर—“हम्म…बात तो आपकी सही हैं.”

मूरलीधर—“हाँ, तुम मईरा इतना बात सुना, इसमें देको, मईरा आई–अप्पा के झगड़े से मई टेन्शन में बचपन निकाला. मई उस टेन्शन को समझता, इसलिए मई अपने बच्चों को उस टेन्शन से दूर रकने(रखने) के बारे में सोचा. इससे मईरे बच्चों के साथ मईरा अण्डरस्टेनिंग बहुत अच्चा हो गया, मई उनका अप्पा कम और फ्रैंड ज्यादा बन गया. वो अपना हर बात सबसे ज्यादा मईरे साथ शेयर करता और मई उनको हर बात प्यार से दोस्त की तरह समझाता. अब मई बुढ़ा हुआ, तो वो भी मईरे बोले बिना मईरा बात समझता.”

सुन्दर ने सर हिलाते हुए कहा—“हाँ…”

मूरलीधर—“और तुम देको, पहले शांथला मईरे को बुरा आदमी समझा. क्योंकि तब तक शांथला सिर्फ बुरा आदमी देका. इसलिए शांथला का सोच वहीं तक. लेकिन जब मईरे को जाना, तो शांथला का सोच चेन्ज(बदल) हो गया. शांथला समझ गया, सब आदमी बुरा नहीं होता. और फिर मई शांथला का हेल्प किया, तब मईरा वाईफ़ मुझसे झगड़ा किया. क्योंकि तब तक मईरा वाईफ़ यहीं सोचता, सब लेडी दूसरे आदमी को फँसा लेता और आदमी दूसरा लेडी के चक्कर में फँस जाता. लेकिन जब वो खुद शांथला से मिलकर शांथला को जाना, तो शांथला को सिस्टर बनाकर खुद भी शांथला को हेल्प करता. तुम टेन्थ तक ही स्टडी(पढ़ाई) किया, फिर भी तुम फेसबुक और इंटरनेट के बारे में कितना जानता, फेसबुक पर कौन अच्चा और कौन बुरा ? तुम पहचान जाता. लेकिन मई स्कूल टीचर होकर भी फेसबुक के बारे में कुछ नहीं जानता, सिर्फ इंटरनेट के बारे में थोरा जानता. क्योंकि मई कभी फेसबुक यूज नहीं किया. तुम फेसबुक यूज किया, इसलिए तुम्हारा फेसबुक का नोलेज डेवलप हैं.”

सुन्दर ने हँसकर कहा—“फेसबुक तो बहुत मामूली बात हैं, अंकल.”

मूरलीधर ने मुस्कुराकर कहा—“तुम्हारा लिए मामूली बात. लेकिन जो लोग मईरा तरह नहीं जानता, उनके लिए ?”

सुन्दर—“ये भी सही हैं.”

मूरलीधर—“हाँ, तुम तुम्हारा मम्मी–पापा को यहाँ लेकर आओ. जब वो खुद देकेगा, तब उनका सोच भी डेवलप ओएगा. तुम ऐसे समझाएगा, तब उनको समझ नहीं आएगा. पहले जब इन्सान चाँद पर नहीं पहुँचा था, उस टाइम चाँद पर जाने का बात करने वालों पर भी लोग हँसकर उनका मजाक बनाता था. लेकिन अब इन्सान मंगल ग्रह पर भी पहुँच गया हैं और सब मानता भी हैं. दूर रहकर सिर्फ बातें सुनने से सोच नहीं बदलता. उनको यहाँ लेकर आओ और उनको दिकाओ(दिखाओ), बड़े शहरों में अच्चा लोग भी होता और तुम अपने दम पर बहुत अच्चा जॉब करके बड़े शहर में रह भी सकता.”

सुन्दर ने मुस्कुराकर कहा—“थैक्यू, अंकल जी. मैं आज ही भाई को कॉल करके बोलता हूँ.”

मूरलीधर—“बहुत अच्चा. तुम मईरा नम्बर ले लो. यिगर मईरा हेल्प का जरूरत हो, तो मुझे बता देना. हो सकता हैं, वो तुम्हें बच्चा बोलकर तुम्हारा बात नहीं समझें. मई उनको समझाएगा, तब वो जरूर समझ जाएगा.”

सुन्दर ने मूरलीधर से मोबाइल नम्बर लेकर कहा—“थैक्यू, अंकल.”

मूरलीधर—“अब चले ?”

सुन्दर—“हाँ, चलिए.”

मूरलीधर, शांथला और सुन्दर मुस्कुराते हुए स्टेशन से बाहर निकल गए.

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समाप्त
लेखक— वर्मन गढ़वाल



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