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@dawriter

कश्मीर : जन्नत या उजड़ा चमन

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जिस घर जिस शहर जिस देश में हम जनम लेते हैं वही हमारी पहचान होता है। उसकी मिट्टी, उसकी खुशबू, उसकी हर दर-ओ-दिवार, हर इंसान चाहे हम उसे जाने या न जाने उससे एक रिश्ता सा जुड़ जाता है हमारा। जब से होश संभाला तो पाया कि मेरा देश भारत है, भारतीयता मेरी पहचान। भारत जो पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण हर दिशा में बेहद खूबसूरत है। कहीं ऊँचे पहाड़ और हरी भरी वादियां इसका श्रृंगार करती हैं तो कहीं अनंत समुंदर इसके चरण स्पर्श करता है। कहीं रेतीला रेगिस्तान कुभ निकले खड़ा है तो कहीं हरे भरे चाय के बागान लहराते हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी हो या गुजरात से गुवाहाटी हर एक राज्य, हर प्रदेश, हर नदी, हर वादी, हर जंगल, हर शहर यही कहता है मैं तेरा हिस्सा हूँ और तू मेरा।भारत अनेकता में एकता का देश है और इसका हर राज्य दूसरे से लग है। हर दस कोस पर नयी बोली। हर मोड़ पर नया दृश्य। कितनी नादिया कितने पहाड़ पर कहते है कि भारत का बेहद खूबसूरत राज्य है कश्मीर। कहते हैं कि कश्मीर जन्नत है। कश्मीर भारत का ताज है। किताबों,किस्से कहानियों में कश्मीर की ख़ूबसूरती के किस्से सुन मन मचल जाता था। उसपे फिल्मों में तो इसे और भी खूबसूरती से दर्शाया जाता, इसकी खूबसूरती पर गीत लिखे जाते। कश्मीर में फिल्माया गया गाना स्विस्ज़रलैंड से कम अनुभव नहीं देता था । उसकी ऐसी खुबसूरती का बयान सुन मन कश्मीर जाने को मचल जाता। 

लेकिन न जाने किस की बुरी नज़र लग गई मेरे कश्मीर को। अचानक कश्मीर दहशत, आतंकवाद, डर, मौत, और बर्बादी का मंजर दिखने लगा। हर रोज़ न जाने कितनी लड़ाइयां, कितनी मौतें, कितनी दहशत, कितना दर्द कश्मीर देखने लगा। घर धुं धूं हो जलने लगे। हिन्दू हो या मुस्लमान कोई सुरक्षित नहीं था वहां। मेरा कश्मीर जलने लगा। इसका असर सिर्फ कश्मीर पर नहीं बल्कि पूरे भारत में दिख रहा था। दहशत, डर और आतंकवाद के बढ़ते कदम । लोग अब कश्मीर से पलायन करने लगे। अब लोग कश्मीर में रहने में डरने लगे। जब वहां के मूल निवासी ही नहीं रह रहे थे वहां तो पर्यटक कैसे जाता। पर्यटन तो कश्मीरियों की रोजी रोटी था। पर अब सब बंद। 

कश्मीर हमेशा से ही सियासत का मोहरा रहा है। पाकिस्तान ने अपना सर कश्मीर में आतंकबाद के जरिये फैलाने शुरू कर दिए थे। कश्मीर जलता रहा और भारत रोता रहा । और सियासत खुद को चमकाती रही। पर फिर कुछ सालों में धीरे धीरे हालात बदले। कश्मीर की धरती फिर से जीने लगी। हालाँकि कुछ ख़ास नहीं बदला था लकिन शायद कश्मीर ने खुद को संभालना सिख लिया था अब तक। अब फिर कश्मीर की रौनक लौटने लगी । अब फिर मेरे महोल्ले की गलियों में कश्मीरी फिरन और कफ्तान बेचने आने वाले अंकल की आँखों में ख़ुशी झलकने लगी थी। 

शायद मेरा देश और उसकी इस औलाद ने डर और दहशत को हराने का मन बना लिया था। कश्मीर रोज़ अपने हक़ की लड़ाई लड़ता। हालाँकि पाकिस्तान ने उस पर अपना हक जाताना बंद नहीं किया था । सुन्दर बर्फीली पहाड़ियां और सुन्दर मनोहक वादियां, पर अफ़सोस कुछ मौका परास्त देश द्रोही हो गए थे। अब तो वह कश्मीर को बरगलाते उसे तोड़ने की कोशिश करते। उसको हिन्दू मुस्लिम में बाँटने की कोशिश करते । 

आज से तीन साल पहले मुझे मौका मिला मेरी देश की जन्नत को देखने जानने का । हम कश्मीर गए और उसकी वादियों को देख मेरे मुंह से यही निकाला

 ‘ अगर फिरदौस बार रू-ए ज़मीं असत, हमीन असत-ओ हमीन असत-ओ हमीन असत’

‘ कितनी खूबसूरत यह तस्वीर है यह कश्मीर है’ 

हम भले ही वहाँ एक पर्यटक के तौर पर गए थे, लेकिन कश्मीर का दर्द साफ़ दिख रहा था। आज़ादी के इतने सालों बाद भी कश्मीर मुझे पिछड़ा हुआ लगा और उसका कारन था आतंकवाद जो उससे हर बार पीछे खींच लेता था जब भी वह आगे बढ़ना चाहता। कश्मीर में मुझे कई जगह उसके गहरे जख्म दिखे । जितनी मुझे उसकी खूबसूरती दिखी उतनी ही उसकी आहत हुई आत्मा भी। क्यूँ हमारा एक हिस्सा इतना आहात हो रहा है और हम कुछ नहीं कर पा रहे। मैंने जब वहां हर कुछ कोस पर घर घर की छत पर एक एक सेना के जवान को खड़े देखा तो सोचा क्या जिंदगी है उस कश्मीरी की जो रोज़ सुबह शाम हर वक़्त हर लम्हा एक दहशत के साए में गुजरता है। अगर ऐसा मंजर मुझे मेरे शहर में देखने को मिले रोज़ तो मुझे कैसा लगेगा। पर उस कश्मीरी से कोई नहीं पूछता की उसको कैसा लगता होगा। मैंने विकास के नज़र से भी देखा तो भी कश्मीर इन 70 सालों में पिछड़ा हुआ है। वहां कोई इंडस्ट्री नहीं है। सेब या केसर या मेवे भी होते हैं वो भी तो उस विकास के अधीन हैं। कश्मीर अगर सब सामान्य होता तो आज हमारे देश का ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का सबसे बेहतरीन पर्यटक स्थल होता और भारत की नाक ऊँची करता, पर अफ़सोस उस नाक की हमने कदर ही नहीं की । 

मुझे नहीं पता और न ही मुझे जानना है कि कश्मीर में कितने हिन्दू हैं कितने मुसलमान। मुझे बस इतना पता है कि कश्मीर मेरे देश का एक हिस्सा है और वो हिस्सा बहुत आहात है। चोट खाया हुआ है। पिछले साल से खबर है कि कश्मीरी युवक हमारी सेना पर पत्थर मारते हैं और बदले में सेना को करवाई करनी पड़ती है। कौन आतंकवादी है कौन एक निर्दोष नागरिक ये समझना शायद वहां सबके लिए मुश्किल है। 

मैं नहीं जानती की क्या हो रहा है क्यूं हो रहा है। कौन करवा रहा हैं,कौन सी पार्टी की सरकार है कौन सरकार बनायेगा?

मुझे तो इतना पता है कि एक बार राजनितिक कुटिल इच्छाओं की बलि 70 साल पहले एक देश चढ़ चूका है। कुछ लोगो की आत्म संतुष्टि देश से बड़ी थी इस लिए मेरा देश दो टुकड़ों में बांट दिया गया। और आज 70 साल बाद भी वही इच्छाएं फिर अपना सर उठा रही हैं। मेरी सिर्फ एक ही इल्तज़ा है कि …..

मत काट उसके जिस्म को टुकड़ो टुकड़ों में

मत काट उसके जिस्म को टुकड़ों टुकड़ों में 

वो तेरी माँ है, लापरवाह सही

माना कि किया प्यार उसने तुझसे ज्यादा किसी और को

पर औलाद है तू उसकी नाजायज़ तू नहीं

कश्मीर था वो कल भी कश्मीर वो आज भी है 

जन्नत था वो कल भी एक ख्वाब वो आज भी है

है मेरी इल्तज़ा ये इस तस्वीर का रंग और निखरे

मैं ही नहीं मेरी पीढ़ी दर पीढ़ी भी एक जन्नत को देख पिघले

इतराये की वो है उस देश के वासी 

जहाँ आती है हर अप्सरा नाचती इठलाती

जन्नत का रंग न पड़े फीका कभी 

तिलक बन माथे पे चमके बस हूँ ही 

कश्मीर और कश्मीर के हालात मुझे परेशान करते हैं । पर में चाहती हूँ और दिल से दुआ करती हूँ की जल्द ही तस्वीर बदलेगी। और कश्मीर ही नहीं मेरा पूरा देश खिलखिलायेगा मुस्कुराएगा। 

जय हिन्द जय भारत 



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