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@dawriter

अज्ञात आतंकवादी

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अज्ञात आतंकवादी


ब्रेकिंग न्यूज़ - मनेर के विधायक के भाई की गोली मार कर हत्या । साथ में तीन और लोग मौके ओर मृत्य पाये गए ।

हत्या करने वाला अपराधी मौके पर गिरफ्तार ।

विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि , कातिल का किसी आतंकवादी समूह से संबंध है । जो देश के छोटे छोटे राज्यों में भी अब अपनी गतिविधियाँ तेज़ कर रहा है ।।।।।।।

“अभिनव” अभी सुबह सुबह सोया ही हुआ था , रात का नशा अभी तक उतरा नहीं था , की उसके फ़ोन की घंटी बजी । फ़ोन उसके बॉस “राजीव त्रिपाठी” का था । अभिनव के हेल्लो बोलने से पहले ही उसका बॉस राजीव अपना आदेश उसको दे चुका था । “अभिनव जल्दी से टी.वी पर समाचार देखो , और जितनी जल्दी हो सके ऑफ़िस आओ ।

अभिनव जल्दी से अपने बिस्तर पर से उठ कर तुरंत अपना टी.वी चालू किया । और न्यूज़ देखने लगा । सभी जगह ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी ।

अभिनव ये ख़बर देख कर भौचक्का रह गया । क्योंकि जिसकी हत्या हुई थी उसका नाम “रंजन सिंह” है । और रंजन सिंह अभिनव के बड़े भाई वैभव कर्ण के स्कूल के सहपाठी थे ।  और इस कारण अभिनव अपने बचपन में बहुत बार रंजन सिंह से मिल चुका था । वो अपने बड़े भाई और उनके मित्रों के साथ बचपन में क्रिकेट , फुटबॉल खेला करता था । बाद में अभिनव अपने मामा के साथ कोलकत्ता चला गया , और वही से उसने अपनी दसवीं और बारवीं  की बोर्ड की परीक्षा दी । फिर वो वहाँ से भोपाल चला गया , वहाँ पर उसने माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढाई की । पढाई पूरी होने के बाद उसे एक अच्छे न्यूज़ चैनल पर एक पत्रकार की नौकरी मिल रही थी । पर उसने वो नौकरी ठुकरा दी । वो अपने राज्य बिहार आ गया , यहाँ उसने पटना में एक समाचार पत्र “सर्वोदय” में नौकरी करना शुरू कर दिया । उसे एक क्राइम रिपोर्टर बनना था , और उसका विचार यह था वो एक टी.वी न्यूज़ रिपोर्टर से अच्छा एक समाचार पत्र का रिपोर्टर बन सकता है । उसको लिखने का भी शौक़ था । इसी शौक़ ने उसे समाचार पत्र की तरफ आकर्षित किया था ।

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अरे सर ये कब हुआ ? अभिनव ने अपने बॉस से पूछा ,

यही कोई 10 बजे की घटना है , रंजन सिंह अपने तीन दोस्तों के साथ अपने गाँव बिहटा जा रहा था । तभी वो लोग एक ढाबे पर नाश्ते के लिए रुके । तभी अचानक कहीं से वो हमलावर आ कर इन चारों को मौत की नींद सुला दिया । और सबसे बुरा हाल तो रंजन सिंह का है , ऊपर से नीचे तक उस पर गोलियां दागी है - राजीव ने यह सारी जानकारी अभिनव के साथ शेयर की ।

सर उस कातिल के बारे में अपने सूत्रों से क्या पता चला है , मतलब उसका नाम कहाँ का रहने वाला है वो ।

टी.वी पर तो उसको आतंकवादी दिखाया जा रहा है - अभिनव ने अपनी बात अपने बॉस को बतायीं ।

अपने सूत्रों से यह पता चला है कि वो अपना मुँह नहीं खोल रहा है । बस एक ही बात तब से बोले जा रहा है “प्लीज शूट मी” - राजीव के पास जो भी जानकारी थी उसने वो सब अभिनव को बता दिया ,

सर इस केस में मैं काम करना चाहता हूँ , क्योंकि रंजन सिंह मेरे बड़े भाई वैभव कर्ण के स्कूल के सहपाठी थे , मैं उनको बचपन में बहुत बार देख चूका हूँ - अभिनव ने अपनी इच्छा राजीव के सामने रख दी ।

ठीक है इस केस में तुम मुझे असिस्ट करना , और हाँ एक बात का ध्यान रखना ये एम.एल.ऐ(बाहुबाली विधयाक) राजू सिंह के भाई का मर्डर केस है तो हम लोग अपना कदम फूंक फूंक रखेंगे । तुम गाडी निकालो हम लोग अभी दानापुर थाना जाएंगे । क्योंकि वो आतंकवादी को अभी तत्काल वहीं  पर गिरफ्तार कर के रखा गया है - राजीव ने अपना फरमान अभिनव को सुना दिया ।

अभिनव और राजीव दोनों दानापुर थाना के लिए निकल चुके थे । रास्ते में अभिनव ने राजीव से एक सवाल पूछा - सर कल की अखबार में हम उस कातिल का क्या नाम लिखेंगे ?

अरे टी.वी न्यूज़ चैनल वालों ने तो उसका नाम भी रख दिया है - अज्ञात आतंकवादी - राजीव ने अभिनव के सवाल का जवाब देते हुए कहा । ।।।

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दानापुर थाना पर पत्रकारों और न्यूज़ चैनल वालों का हजूम टूटा हुआ था । पटना के डी.एस.पी “भूपेश सरकार” एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर रहे थे । और घटना की तमाम जानकारी पत्रकारों के साथ साझा कर रहे थे । धीरे धीरे भीड़ वहाँ से खत्म हुई ।

तब राजीव और अभिनव थाना के अंदर घुसे , राजीव को देखते हुए भूपेश अपनी जगह से उठ खड़े हुए और अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा - अरे यार राजीव कहाँ रहते हो , इतने दिन बाद मिल रहे हो ?

राजीव ने हाथ मिलाते हुए जवाब दिया - तुम तो जानते ही हो हम पत्रकार लोगों का , किसी से मिलने की फुर्शत ही नहीं मिलती है । और वैसे भी पत्रकार और पुलिस का हमेशा छत्तीस का ही आँकड़ा रहा है । हमारी दोस्ती दुनिया के सामने ज्यादा ना आये उसी में भलाई है ।

और यह नौजवान लड़का कौन है तुम्हारे साथ - डी.एस.पी भूपेश ने अभिनव की तरफ इशारा करते हुए पूछा ।

ओह यह अभिनव कर्ण है , हमारे ऑफिस में काम करता है , ये क्राइम रिपोर्टर बनना चाहता है , इसलिये मैं इसको ट्रेनिंग दे रहा हूँ । इसके बाबूजी हम लोग के स्कूल के गणित के शिक्षक हुआ करते थे - राजीव ने अभिनव के बारे में सभी जानकारी भूपेश को दी ।

ओह तो यह अपने प्रभाकर सर का बेटा है । कैसे है प्रभाकर सर अभिनव - भूपेश ने इस बार सवाल अभिनव से किया था ।

पर अभिनव तो दूसरी ही दुनिया में खोया हुआ था । वो तो बस उस कातिल “अज्ञात आतंकवादी” को और उसके बाँह पर बने गोदने(टैटू) को देखे जा रहा था ।

अरे अभिनव कहाँ खोये हुए हो - राजीव ने अभिनव के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा ,

सर मैं इस टैटू को पहले कहीं तो देखा है , जब मैं पटना में पढ़ता था , उस समय किसी के बाँह पर मैंने एकदम यही टैटू देखा था - अभिनव ने जवाब दिया ।

राजीव और भूपेश के नज़र अब उस टैटू की तरफ मुड़ चुके थे । वो एक गोदना था , जो पहले के जमाने के लोग, मेले में गोदने वाले से अपने शरीर पर गुदवाते थे । उस कातिल के बाँह पर भी गोदना ही था जो एक दिल का निशान था उसमें एक तीर भी बना था । और दिल के अंदर बने दो जगह थे जिसमें अंग्रेजी के दो अक्षर लिखे हुए थे K और J.

सर मुझे याद आ गया , ये टैटू मैंने किसके हाथ पर देखी थी । पर मुझे विशवास नहीं हो रहा है , की ये आदमी और वो आदमी एक हो सकता है - अभिनव ने कहा ।

प्लीज भूपेश सर मुझे एक बार उस कातिल से बात करने की आज्ञा दे दीजिए । मेरे दिमाग में जो उथल पुथल मची है , उस शंका को दूर करना चाहता हूँ - अभिनव ने भूपेश से आज्ञा मांगी ,

पर वो कुछ बोल ही  नहीं रहा है , सुबह से केवल इतना ही बोल रहा है कि “मुझे गोली मार दो” - भूपेश ने बताया ।

लेकिन वो अब बोलेगा ,मुझे एक बार अंदर जा कर उससे मिलने दीजिये - अभिनव ने मिन्नत की ।

ठीक है जाओ मिल लो , लेकिन जल्दी करना 40-45 मिनट में एस. पी सर आ जायेंगे , उनके आने से पहले तुमको जो भी बात करना है कर लो - डी.एस.पी भूपेश ने अपना इजाजत देते हुए कहा ।

अभिनव बिना देरी किये हुए , उस कातिल से मिलने अंदर चला गया ।

उस आतंकवादी के पीठ तक लंबे बाल थे , ढाड़ी देख कर ऐसा लग रहा था मानो कितने सालों से उसने अपने ढाड़ी पर उस्तुरा नहीं चलवाया हो । आँख अंदर की और धसी हुई । बाल काले से ज्यादा सफ़ेद दिख रहे थे । शरीर भी उसका साधारण ही था ।

अभिनव ने उसे कुछ देर तक गौर से देखा , शायद वो उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था । उसने उस आतंकवादी की आँखों में देखा , उसकी आँखों से अभिनव को यह अंदाज़ा हो गया कि इस आतंकवादी को गांजा पीने का लत लगा हुआ है ।

क्या तुम कैलाश शंकर को जानते हो ? - अभिनव ने पहला सवाल किया ,

आतंकवादी चुप रहा ।

मैंने पूछा क्या तुम कैलाश शंकर को जानते हो ? - अभिनव ने अपना सवाल दुबारा दोहराया ,

कैसे हो “चट्टान सिंह”  ? - उस आतंकवादी ने 15 मिनट बाद अपना मुँह खोला ,

पर असलियत में मुँह तो अभिनव का खुला रह गया था । अभिनव को बचपन में उसके बड़े भाई वैभव के जिगरी दोस्त कैलाश शंकर ही केवल “चट्टान सिंह” के नाम से पुकारते थे । क्योंकि बचपन में क्रिकेट के मैदान पर अभिनव रोज़ कैलाश दा को आउट करता था , अपनी गेंदबाज़ी से । इसलिये कैलाश दा ने उसका नाम “चट्टान सिंह” रखा था । चट्टान की तरह भारी , और सिंह की तरह तेज़ था अभिनव अपनी गेंदबाज़ी में ।

आपको कैसे पता की मेरा नाम चट्टान सिंह था ? - अभिनव ने आश्चर्य से पूछा ,

कैलाश दा , याद है लेकिन उनकी शक्ल तुम्हें याद नहीं क्यों ? - उस आतंकवादी ने इस पूरे वार्तालाप में पहली दफा अपनी नज़रे अभिनव के नज़रो से मिला के बात की,

और याद भी कैसे रहेगा , गांजे की लत इंसान को सब कुछ भूला देती है । एक दिन में कितना चिल्लम पी लेते हो चट्टान सिंह - आतंकवादी ने अभिनव से सवाल किया ,

न न न नहीं नहीं मैं कभी गांजा नहीं पीता हूँ , - अभिनव ने अपनी सफाई पेश की ,

एक गांजा पीने वाला इंसान , दूसरे गांजा पीने वाले इंसान को एक नज़र में जान लेता है । तुम्हारी आँखे और उंगलियाँ साफ़ इशारा कर रही है कि तुम गांजा पीते हो - आतंकवादी ने अपने अकाट्य तर्क प्रस्तुत कर दिए थे ।

ठीक ठीक है , मैं मानता हूँ की मैं गांजा पिता हूँ । पर  कैलाश दा आप और आतंकवादी यह विशवास नहीं हो रहा है मुझे । मैं जानना चाहता हूँ आप आतंकवादी क्यों बने ? - अभिनव ने कैलाश उर्फ़ अज्ञात आतंकवादी से सवाल किया ,

कैलाश चुप था ।

अभिनव बार बार अपनी घड़ी को देख रहा था , और अपना सवाल दोहराये जा रहा था । जिसके जवाब में कैलाश की चुप्पी उसे मिल रही थी ।

बार बार घड़ी क्यों देख रहे हो , किसी का इंतज़ार है या किसी से मिलने जाना है , कोई लड़की का चक्कर है क्या ? - कैलाश ने अभिनव से पूछा ,

मेरे पास ज्यादा समय नहीं है , प्लीज मुझे सब बात बता दीजिए कैलाश दा , ताकि मैं आपकी मदद कर सकूँ - अभिनव ने कैलाश से कहा ,

पहले मेरे सवाल का जवाब दो , किसी से प्यार करते हो , कोई लड़की है - कैलाश ने अपना सवाल फिर से पूछा ,

हाँ मैं करता हूँ एक लड़की से प्यार उसका नाम नूपुर है । मिल गया आपको जवाब , अब आप मेरे सवालों का जावब दीजिये - अभिनव ने गुस्से में कहा ,

क्या कर सकते हो उसके लिए , जान दे सकते हो या जान ले सकते हो । अगर ये नहीं कर सकते हो तो कम से कम उसपर भरोसा जरूर करो - कैलाश दा ने कहा ,

ये फालतू के बातों में समय जाया नहीं कीजिये - अभिनव समय की कमी के कारण गुस्से में बोला ,

आप आतंकवादी क्यों बने ? क्यों आपने रंजन सिंह और उसके तीन दोस्तों की हत्या की ? जबकि आप मेरे भैया वैभव कर्ण और रंजन सिंह तो आप तीनो स्कूल में क्लासमेट थे ना जी । और आप तो गायब हो चुके थे 8 साल पहले । फिर 8 साल बाद अचानक इस तरह से आना , एक आतंकवादी के रूप में । और चार लोगो की निर्मम हत्या । उसमे से एक आपका क्लासमेट । क्यों क्यों क्यों - अभिनव मेज पर हाथ पटकते हुए कहा ,

जूही दीदी याद है तुम्हें - कैलाश ने अपना मुँह खोलते हुए कहा

जूही दी , कौन जूही दी । हाँ याद आया मेरे बचपन के दोस्त मुकेश की मौसी की बेटी । हम सब तो एक ही स्कूल में थे । आप लोग उस समय क्लास 10th में थे और मैं क्लास 3rd में था । और जूही दी शायद 8th क्लास में थी - अभिनव ने अपने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा ।

वो उस समय 9th में थी - कैलाश ने अभिनव के याददाश्त को सुधारते हुए , तुरंत जवाब दिया

पर इन सब बातों से क्या लेना देना - अभिनव ने कैलाश दा को टोकते हुए कहा

जानते हो जूही के साथ क्या हुआ था ? - कैलाश ने अभिनव से पूछा ,

हाँ मुझे कुछ कुछ याद है , उन्होंने 8 साल पहले आत्महत्या कर ली थी । जैसा की मैंने सुना था उनके आत्महत्या का कारण नहीं पता चल सका था । उस समय तक मैं कोलकाता शिफ्ट हो चूका था - अभिनव ने जवाब दिया ,

उसने आत्महत्या नहीं की थी । उसका खून हुआ था - कैलाश के हाथ पैर कांफ रहे थे , ये बोलते वक़्त ,

अभिनव अवाक् था । वो चुप था ।

क्या ? मैं समझा नहीं - अभिनव ने कहा ,

हाँ मैं और जूही एक दूसरे से प्यार करते थे , पर हमारी ख़ुशी उस रंजन सिंह ने छीन ली । इन सब ने मिलकर जूही के कत्ल को आत्महत्या साबित कर दिया - कैलाश ने कहा ,

उसके आँखों में सुकून के आँसू थे ।

पर ……. - अभिनव कुछ और पूछना चाहता था । लेकिन उससे पहले राजीव अंदर आ गया । और उसने अभिनव से कहा कि चलो मिलने का समय खत्म हो गया है । एस.पी सर आ गए है , इस आतंकवादी को मजिस्ट्रेट के सामने हाज़िर करना है ।

अभिनव ना चाहते हुए भी बाहर निकल गया ।

“मेरे जीवन का मकसद पूरा हो चूका है चट्टान सिंह । मुझे इस दुनिया से मुक्ति दिलवा दो ” - कैलाश अंदर से पागलों की तरह चिल्ला रहा था । ।।।

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अभिनव और राजीव दोनों चाय दुकान पर चाय पी रहे थे।

क्या हुआ अभिनव - राजीव ने पूछा ,

सर मैं इस केस के तह तक जाना चाहता हूँ , मैं एक बार फिर उस कातिल से मिलना चाहता हूँ - अभिनव ने कहा ,

वो एक कातिल नहीं है , वो एक आतंकवादी है । आज शाम पटना पुलिस एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाली है , जिसमे वो सभी सबूत सामने रखेगी , जिससे यह पता चल जायेगा की वो एक आतंकवादी है - राजीव ने अभिनव से कहा ।

ह्म्म्म…. जितना हमे दिखता है , जरुरी नहीं की वही सच हो । और सच्चाई पर्त दर पर्त छिपी रहती है । और मैं उस सच्चाई को बाहर ला कर रहूँगा - अभिनव ने कहा ।

ठीक है , लेकिन आगे का क्या प्लान है ? - राजीव ने जानना चाहा ,

फ़िलहाल तो मैं ऑटो लेकर , नूपुर से मिलने जा रहा हूँ । फिर वही से अपने फ्लैट चला जाऊंगा । और सर मुझे 5 दिन की छुट्टी चाइये । मैं 5 दिन बाद इस केस पर अपनी रिपोर्ट आपके पास जमा कर दूंगा । और कल  मैं दुबारा उस कातिल से मिलने जाऊंगा - अभिनव ने कहा ।

ठीक है जाओ , पर पाँचवे दिन मुझे फ़ोन नहीं करना पड़े , तुम खुद याद से आ जाओगे - राजीव ने उसे छुट्टी देते हुए कहा ।

अभिनव ऑटो पकड़ कर नूपुर से मिलने चला गया । उस दिन पूरे शहर में केवल उस “अज्ञात आतंकवादी” के ही चर्चे थे । न्यूज़ चैनल , और अख़बार वालो को तो गज़ब की न्यूज़ मिली हुई थी । एक तो आतंकवादी और दूसरा उसमे विधायक के भाई रंजन सिंह की हत्या । पुरे ख़बर को सुबह से शाम तक मिर्च मसाला के साथ परोसा जा चूका था । लोगों ने उस न्यूज़ को देख कर अपना अपना नजरिया भी तैयार कर लिया था ।।।।

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अभिनव अपने फ्लैट में अकेला था । और चिल्लम में गांजा डाल कर पिये जा रहा था । हर कस के साथ उसका आँख लाल हुए जा रहा था । इतना नशा दो बोतल शराब से भी नहीं होता है , उससे ज्यादा वो गांजा पी चूका था । उसे केवल सुबह की बातें याद आ रही थी । कैलाश की एक एक बात उसके कानों में घुंज रही थी । और अंतिम पंक्ति उसको झकझोर रहा था “मुझे मुक्ति दे दो , चट्टान सिंह” । ये सब सोचते सोचते पता नहीं कब अभिनव नींद की आगोश में चला गया ।

सुबह 8 बजे अभिनव का आँख खुला । पूरा शरीर उसका टूट रहा था । चिल्लम उसके बिस्तर पर ही था । चिल्लम देखते ही रात की सभी बात उसे याद आने लगी । वो सोचने लगा की काश कैलाश दा के साथ पीने को मौका मिले । सामान्यतः एक गंजेड़ी दूसरे गंजेड़ी से बहुत जल्दी मित्रवत हो जाता है , दोनों एक दूसरे को महादेव का भक्त समझ के आपस में दोस्ती कर लेते है ।।।

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अभिनव तैयार हो के कैलाश से मिलने जा रहा था । रास्ते में अपने अख़बार सर्वोदय का एक प्रति खरीद लिया । उसके मुख्यपृष्ठ केवल “अज्ञात आतंकवादी” के बारे में छपा था । अभिनव ने अपने सूत्रों से पता कर लिया था की उस अज्ञात आतंकवादी को कहाँ रखा गया है । और पुलिस के पूछ ताछ में उसने क्या क्या बोला , ये सारी बातें अभिनव ने अपने सूत्रों से पता कर लिया था । 1 घंटे के बाद अभिनव बेउर जेल के बाहर खड़ा था । वो जेलर से आदेश लेकर वो कैलाश से मिलने चला गया जेल के अंदर ।

कैसे है कैलाश दा ? - अभिनव ने पूछा ,

लगता है कल रात तुम ठीक से सोये नहीं हो चट्टान सिंह - कैलाश ने पूछा ,

हाँ कल रात कुछ ज्यादा नशा हो गया था , पूरी रात आप ही के बारे में सोच रहा था ।और जूही दी के बारे में , की क्या हुआ था उस समय - अभिनव ने जवाब दिया ,

तो कैलाश दा , क्या आप मुझे सब बात बताएँगे शुरू से , ताकि मैं आपकी कुछ मदद कर सकूँ - अभिनव ने कहा ,

क्यों करना चाहते हो मेरी मदद ? - कैलाश ने जानना चाहा ,

मैं दुनिया को बताना चाहता हूँ की आप कोई आतंकवादी- वतंकवादी नहीं है । आप मेरे कैलाश दा है । मैं बचपन में यही सोचता था कि बड़ा हो के आप जैसा इंसान बनूँगा । आपकी सोच और आपके विचार मुझे बहुत प्रभावित करते थे । उसे आज कैसे आतंकवादी घोषित होने दूँ - अभिनव ने जवाब दिया ।

ठीक है मैं सब कुछ बताऊंगा , लेकिन एक वादा करो - कैलाश दा ने कहा ,

कैसा वादा ? - अभिनव ने चौकते हुए पूछा

अगर तुम मुझे और जूही को न्याय नहीं दिला सके , तो मुझे मुक्ति दिलवा देना कैसे भी कर के - कैलाश दा अपनी शर्त रख चुके थे ,

अभिनव चुप रहा ।

चुप क्यों हो जवाब दो , क्या हुआ न्याय दिलाने की हिम्मत जवाब दे गयी चट्टान सिंह ,

मैं मुक्ति का अर्थ नहीं समझ पा रहा हूँ - अभिनव ने मुक्ति के अर्थ ना जानने का नाटक किया ।

अगर तुम मुझे और जूही को न्याय नहीं दिलवा सके , तो मुझे मार देना । क्योंकि मेरे जीवन का मकसद पूरा हो चूका है । और तुम जानते हो जूही मुझे रोज़ दिखाई देती है , वो मेरे आस पास हमेशा रहती है । वो इस पल भी इस कमरे में मौजूद है । बस अब मैं उसके साथ हमेशा के लिए उस दुनिया में चला जाना चाहता हूँ - कैलाश ने पागलों की तरह बातें की ,

अभिनव ने मन में सोचा , की क्या थे कैलाश दा और आज के समय में क्या हो चुके है , एक पागल कातिल और दुनिया इनको आतंकवादी समझती है ।

ठीक है मैं वादा करता हूँ  अगर मैं आपको न्याय नहीं दिलवा सका तो , आप जैसा चाहते है मैं वैसा ही करूँगा - अभिनव ने कहा ,

कैलाश ने बताना शुरू किया , ।।।।

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मैं , तुम्हारा भाई वैभव और जूही तीनों अच्छे दोस्त थे । रंजन  सिंह भी हम लोग के साथ उसी स्कूल में था ।वैसे जूही हम लोग से एक साल जूनियर थी । फिर भी हम अच्छे दोस्त थे । धीरे धीरे ये दोस्ती कब प्यार में बदल गयी पता ही नहीं चला ।  हम दोनों एक दूसरे से बेइंतिहा मोहब्बत करने लगे थे । ये बात हमारे घर वालों को पता लग गया । हम दोनों एक ही जाती के थे इसलिए हमारे घर वालों ने ज्यादा विरोध नहीं किया । पर जूही के बाबूजी ने एक शर्त रख दी मेरे सामने , अगर जूही से शादी करनी है तो पहले सरकारी नौकरी होनी चाइए । और इसके लिए उन्होंने मुझे 2 साल की मौहलत दिए ।

मैं पटना से बैचलर डिग्री करने के बाद , दिल्ली चला गया । वुहां पर मैंने मुख़र्जी नगर में एक कोचीन संस्था में दाखिला ले लिया । और इधर जूही पटना में अपनी मास्टर डिग्री की पढाई के लिए अनुग्रह नारायण कॉलेज में दाखिला ले ली । यही 2 साल मुझे मेहनत करनी थी , और एक सरकारी मुलाजिम बनना था । मैंने और जूही ने एक दूसरे से वादा किया कि ये 2 साल हम लोग एक दूसरे से कोई बातचीत नहीं करेंगे । वो सिर्फ अपनी मास्टर डिग्री की पढाई पर ध्यान देगी और मैं सरकारी नौकरी की तैयारी जी जान से करूँगा ।

2 साल के अंदर मेरे मेहनत का फल मुझे मिला ।  रेलवे की नौकरी में लोको पायलट के पद पर मेरा चयन हुआ था । मैं बहुत खुश था । इस खुशी में मैंने एक नया मोबाइल ख़रीदा और सबसे पहले अपने दोस्त वैभव को फ़ोन लगाया । सबसे पहले यह खुशखबरी मैंने उसी को बताया । उसके बाद मैं अपने घर में यह बात बतायी और कहा ये ख़बर जूही के घर में भी बता दीजिए ।

अब मैं दिल्ली से वापस पटना आने की तैयारी कर रहा था  । जिस दिन मेरा जन्मदिन था मैं उसी दिन पटना आया । और सीधे वैभव से मिलने चला गया । वैभव ने मुझे एक एक नया शर्ट निकाल के दिया और उसने बोला की यह शर्ट जूही मेरे लिए खरीदी है , और बोली है जन्मदिन के दिन यही शर्ट पहनने के लिए । हम वो शर्ट पहन के जूही से मिलने जा ही रहे थे , की वैभव ने मुझे बताया कि जूही के माँ , बाबूजी गाँव गए हुए है  । वो अभी पटना में नानाजी के यहाँ रुकी हुई है । तो मैंने सोचा अभी जूही से मिलना अच्छा नहीं होगा । हम उसी समय अपने गाँव जाने की तैयारी करने लगे । वैभव से हमने विदा लिया और चल पड़े अपने गाँव “कारांडे” । जमुई ज़िला जाने वाले बस में हम बैठ चुके थे । मेरे गाँव से 18 k.m आगे जूही का भी गाँव था । तो हमने सोचा जूही के माँ बाबूजी से वहीं मुलाकात कर लेंगे । जब बस अपना आधा सफर तय कर चुकी थी , तब हमें याद आया की मेरा नया मोबाइल वैभव के रूम पर ही छूट गया है । ये वो दौर था , मोबाइल सबके पास नहीं होता था । फिर मैंने सोचा की कल परसों वापस आना ही है पटना तो ले लेंगे मोबाइल ।

हम अपना घर आ चुके थे,  वहां कोई नहीं था । घर में ताला लगा हुआ था । पूछने पर पता चला की घर के सभी लोग जूही के यहाँ गए हुए है । मैं अपना सामान बगल वाले के यहाँ रख कर , उनसे उनकी मोटरसाइकिल लेकर जूही के गाँव निकल गया । मैं मन ही मन खुश था , की सबसे एक जगह ही मुलाकात हो जायेगा ।

जब मैं वहाँ पहुँचा तो वहाँ सब चुप थे , ये बात मुझे कुछ अजीब लगी । मैंने सबके पैर छू कर प्रणाम किया , लेकिन किसी ने आशीर्वाद नहीं दिया । तभी मेरे बड़े भैया ने रूम का दरवाज़ा बंद कर दिया । तब हमारी माँ रोने लगी ।

का भल माँ , रो काहे रहल बानी , का भल बतावा - मैंने माँ से पूछा ,

एगो दुखः के ख़बर बा , हिम्मत रख तू - बाबूजी ने हमसे कहा ,

का भल , बतावा जा सन - मेरे मन में बेचैनी बढ़ते जा रही थी ।

जूही ऐ दुनिया में अब नइखे बा - भैया ने हमारे कंधे पर हाथ रखते हुए बोले ,

देखे हमरे साथे अइसन मजाक ना करी , बोहते मंगहा पड़ी तोहनी के - मेरा बेचैनी बढ़ते जा रहा था ।

ऐ चाची तू बतावा , ई सब का कहत हवन - मैंने जूही के माँ से पूछा ,

मेरे पूछने के बाद वो हमको पकड़ के रोने लगी । अब हमको लगा हमारा तो सारा संसार ही उजड़ गया हो । मेरे आँखों के सामने अँधेरा छा रहा था । मुझे चक्कर आया , और मैं वही बेहोश हो गया ।

तीन दिन बाद मुझे होश आया । होश आने पर हमको पता चला की , जूही का अंतिम संस्कार कर दिया गया है । घर वालों से पता चला की वो आत्महत्या की थी । उसने फाँसी लगा कर अपनी जान दे दी थी । जिस दिन मेरा जन्मदिन था , उसी दिन उसने फाँसी लगायी थी ।

पुलिस ने यह कह कर केस बंद कर दिया था कि उन्हें सुसाइड पॉइंट से कोई सुसाइड लेटर नहीं मिला ।

जूही का छोटा भाई मुझे बताया कि जूही दी आपको उस दिन आपके मोबाइल पर एक मैसेज की थी । जूही का छोटा भाई उस दिन पटना में जूही के साथ ही था । ये बात मेरे लिए काफी कुछ इशारा कर रही थी । मैंने तुरंत वैभव से बात की , की मेरा मोबाइल उस दिन उसके रूम पर रह गया था । पर वो साफ़ अंजान बन गया , मोबाइल के बारे में । मैंने उससे लाख बार पूछा पर वो अपना मुँह नहीं खोला ।

मुझे इस दुनिया और वैभव जैसे लोगों से घृणा आने लगी । मैं घर से भाग आया पटना , और सीधे वैभव से जा कर मिला । और उसको केवल इतना बोला की तुम मेरे जिगरी दोस्त हो इसलिए तुमको छोड़ रहा हूँ । मुझे पता है तुम किसी के दवाब में आकर बात छिपा रहे हो । जब भी मन करे सच्चाई बताने को तो उत्तराखंड आ जाना , मैं अब वहीं जा रहा हूँ । साधु संत के साथ रहना । वो उस समय भी चुप रहा । पर मैंने उससे एक वादा ले लिया की वो कभी भी मेरे बारे में किसी को ना बताएं की मैं कहाँ हूँ ।

मैं अब उत्तराखंड में अब साधु संत के साथ रहने लगा । फिर भी मुझे शांति नहीं मिल रही थी । मुझे जूही का एहसास हर पल होता था ।

मैं वहां रह कर काफी कुछ सीखा गुरुओं के साथ रह कर मैंने गांजा पीना सीखा , योग विद्या , जड़ी बूटी का ज्ञान , रोज़ तपस्या करता था । पर मेरा मन शांत नहीं हो रहा था । अपने मन को शांत करने के लिए मैं गुरुओं के साथ अमरकंटक से नर्मदा की पैदल यात्रा भी की , पर मेरा मन शांत नहीं हो पा रहा था ।

छः साल बाद हमारे आखड़े के गुरूजी ने मुझे अपने कक्ष में बुलाये । और उन्होंने मुझे कहा - अभी जो मैं आपसे बात कहने जा रहा हूँ उससे आप विचलित नहीं होना । वैसे भी आप छः साल में तपोबल से अपने आप को सम्भाल लिया है । आपको यह बात जाननी अत्यंत आवश्यक है । उसके बाद आप जो भी फैसला लेंगे उसमे हम आपका समर्थन करेंगे ।

मैं उनकी हर बात को ध्यानपूर्वक सुन रहा था ।

उन्होंने बताया कि जब मैं छः साल पहले उनके आश्रम में आया था , शांति की तालाश में । तो उसके छः महीने बाद वैभव और मिनाक्षी ( जूही की कॉलेज की दोस्त) गुरूजी से मिलने आये थे । वो दोनों जूही के बारे में गुरूजी को कुछ बता के गए थे ।

लेकिन हमने उस समय आपको यह बात बताना उचित नहीं समझा , क्योंकि उस समय आप अपने आप पर काबू नहीं रख पाते । फिर आपको यहाँ रहने का तौर तरीका सिखाया गया ताकि आप अपने आप पर काबू रखना सिख सके । और अपने गुस्से को पालना सिख सके । हमने सोचा समय के साथ आप अपनी पुरानी ज़िन्दगी भूल जायेगा , परन्तु आप कभी अपने बीते हुए कल को नहीं भूला सके । तो हमने और आपके दोस्त वैभव ने मिल कर पिछले हफ्ते निश्चय किया कि आपको सच बता दिया जाये -

गुरूजी बिना रुके बोले जा रहे थे , और मैं एक अबोध बालक की तरह उन्हें सुने जा रहा था ।

कैसा सच गुरूजी ? - मैंने पूछा

जूही की आबरू(इज्जत) लूटी गयी थी । उसका बलात्कार हुआ था - गुरूजी कुछ देर मौन रहने के बाद बोले ,

क्या ? - मैं तो जैसे बदहवास हुए जा रहा था ,

हाँ शिष्य मैं सच बोल रहा हूँ । इस बात का प्रमाण है मेरे पास - गुरूजी ने कहा ,

तुम्हारे साथ स्कूल में पढ़ने वाला रंजन सिंह याद है । वो जूही के साथ उसी के कॉलेज में था । रंजन सिंह के बाबूजी उस समय मनेर के विद्यायक थे । और रंजन सिंह अपने कॉलेज के छात्रसंघ का नेता था । तुम उस वक़्त दिल्ली में थे । रंजन सिंह ने कॉलेज में सबके सामने जूही से अपने प्यार का इजहार किया था , गलत ढंग से । इसपर जूही ने उसपर हाथ उठा दिया । बस इसी बात का बदला वो लिया । उसने जूही को रास्ते से अपहरण किया , और एक सुनसान जगह पर ले जाकर उसके इज्ज़त को बर्बाद कर दिया । इस काम में रंजन सिंह के तीन दोस्त और शामिल थे । उनका नाम है - राज ठाकुर , अमित अस्थाना और जयंत यादव । उन तीनों ने अपने मोबाइल पर उस घृणित काम का चलचित्र(एम.एम.एस) लिया । उसके बाद रंजन सिंह और उसके तीनो दोस्तों ने रोज़ जूही को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया । वो रोज़ उसे धमकी देता की वो mms सबको दिखा देगा । और वो लोग यह बात भी बोलते थे की ये mms तुम्हें(कैलाश) दिखा देंगे । फिर उसके बाद वो तुमसे कभी प्यार नहीं करेगा । जूही इन सब बातों से परेशान रहने लगी , उसके पास कोई चारा नहीं बचा था । उसको आत्महत्या का रास्ता सबसे आसान लगा । पर उसने मरने से पहले एक चिट्ठी अपने सहेली मीनाक्षी को लिखी थी । जिसमे उसने अपने साथ हुए इस घटना का जिक्र की थी । - गुरूजी अपनी बात खत्म कर चुके थे ।

मेरे आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहा था । गुरूजी ने मुझे उठाया , और कहा बेटा हिम्मत रखो । अभी मुझे कुछ और बताना है ।

जूही के मौत के बाद मीनाक्षी वो चिट्ठी लेकर उस इंस्पेक्टर के पास गयी जो जूही के मौत के केस पर काम कर रहा था । उस इंस्पेक्टर ने वो चिट्ठी मीनाक्षी के सामने फाड़ दी । और उसने मीनाक्षी को धमकाते हुए कहा कि अपना मुँह बंद रखे , रंजन सिंह और उसके बाप बड़े ऊँचे लोग है । जो हाल जूही का हुआ वो तुम्हारे साथ भी हो सकता है । और तुम्हारा जो मोबाइल था , वो भी उसी पुलिस वाले ने ही वैभव से माँग कर अपने कब्ज़े में ले लिया था , और वैभव को भी चुप रहने को कह दिया गया था । बिहार में व्यापत उस समय “जंगलराज” के डर से वो दोनों चुप रह गए । जब मामला शांत हो गया तब मीनाक्षी ने यह सभी बातें वैभव को बताई । और तुम जब घर छोड़ के गए थे और तुम कहाँ हो ये बात केवल वैभव को पता था । वो और मीनाक्षी मेरे पास आये और उन दोनों ने मुझे यह सारी बातें  बताई ।

क्या जूही को मुझपर इतना भी विश्वास नहीं था , की मैं उसका साथ दूँगा । गुरूजी जूही ने मुझे धोखा दिया , प्यार में किया वादा वो भूल गयी - मैंने रोते हुए कहा ,

नहीं बेटा उसने कोई धोखा नहीं दिया , तुम दोनों ने एक वादा किया था कि तुम दोनों एक दूसरे से 2 साल तक बात नहीं करोगे । तुम्हारी पढ़ाई बाधित ना हो इसलिए उसने तुम्हें कुछ नहीं बताया । वो तुम्हें एक सरकारी मुलाजिम के तौर पर देखना चाहती थी । वो अपने वादे की पक्की थी । पर उसके सामने ऐसे परिस्थिति थी और ऐसे हालात में मानसिक संतुलन लोग खो देते है और मौत को गले लगा लेते है - गुरूजी ने मुझे समझाते हुए कहे ,

पर गुरूजी वो आत्महत्या नहीं था , यह एक हत्या हुई ना- मैंने अपना पक्ष रखा

हाँ पुत्र यह एक हत्या हुई । रंजन सिंह जैसे लोगो ने तो जूही की आत्मा को उसी दिन मार दिया था , जिस दिन जूही की इज़्ज़त लूटी गयी थी । जब इंसान की आत्मा को ही मार दिया जाए तो उसके शरीर में भावना नहीं बचती है । वो बाजार में बिकने वाले मूर्ति से भी बेजान हो जाती है - गुरूजी ने मुझे समझाया ।

अब आगे तुम जो भी फैसला लोगे , उसमे मेरा पूर्ण समर्थन तुम्हारे साथ है - गुरूजी ने कहा ,

मुझे उन चारों से बदला लेना है , उसके बाद अपना शरीर त्याग देना है - मैं फैसला कर चुका था ,

रुको , शायद तुमको पता नहीं उस घटना के बाद रंजन सिंह के बाबूजी ठाकुर बलदेव सिंह ने अपने बेटे रंजन सिंह और उसके वो तीनों दोस्त को विदेश भेज दिया पढ़ने के नाम पर - गुरूजी ने बताया ,

अब मैं क्या करूँ ? - मैंने गुरूजी से पूछा ,

सही समय का इंतज़ार - गुरूजी ने कहा ,

अगले हफ्ते वैभव और मीनाक्षी को मैंने यहाँ बुलाया है , उनसे बात करो और आगे का कार्यक्रम का रूपरेखा तैयार करो - गुरूजी ने कहा ,

मैं उस रात छक के गांजा पिया । मैं अपने अंदर के गुस्से को जमा कर रहा था ।

एक हफ़्ते बाद ।

वैभव और मीनाक्षी आये हुए थे । वहाँ पर हम चारों ने आगे का रूपरेखा तैयार किया । मैं , गुरूजी, वैभव और मीनाक्षी । पता चला रंजन सिंह के बाबूजी अब इस दुनिया में नहीं रहे । रंजन सिंह का बड़ा भाई अब मनेर का विद्यायक है । रंजन सिंह और उसके बाकी दोस्त अभी भी विदेश में था । अब बारी थी उन चारों को मारने की प्लानिंग ।

तो आधा काम वैभव कर चुका था । रंजन सिंह के बड़े भाई जो अब मनेर का विधायक था ,उसके  बॉडीगॉर्ड में से एक बॉडीगार्ड मीनाक्षी का छोटा भाई था । और जूही का छोटा भाई रंजन सिंह के कॉम्पनी में अपना असली पहचान छिपा कर नौकरी कर रहा था । और वो रंजन सिंह का सबसे विश्वासपात्र था । रंजन सिंह के साथ वो हर पल ऑफिस में रहता था । यानी ये दोनों रेकी का काम करने वाले थे । अब चक्कर था इन चारों को मुझे एक साथ एक जगह मारना था । और मैं विदेश जा नहीं सकता था । दुनियावालों की नज़रो में , मैं कब का मर चुका था । मेरे घर वालों ने भी मान लिया था कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है ।

तब वैभव ने बताया कि रंजन सिंह का बड़ा भाई राजू सिंह अपने बेटे की शादी 2 साल बाद करने वाला है । और उस शादी में सब एक जगह आएंगे । रंजन सिंह और उसके तीनों दोस्त ।

2 साल बाद क्यों हो रहा है शादी - मैंने पूछा

क्योंकि वो लड़का अभी विदेश में पढाई कर रहा है - वैभव ने बताया ,

यानी मुझे 2 साल और इंतज़ार करना होगा । ठीक है मैं करूँगा इंतज़ार - मैंने वैभव से कहा ,

तुम उन सब से कह दो , जो जो इस पुरे प्लानिंग में मेरे साथ है , की एक नया मोबाइल और एक नया नम्बर ले । और उस नम्बर से केवल हम लोग आपस में जुड़े रहे । वो नम्बर बाकी किसी को पता ना चले । काम खत्म होने के बाद सब कोई अपना मोबाइल फेंक देंगे । उसके बाद तुम में से कोई भी मुझे नहीं पहचानता है । ठीक - मैंने उन चारों के मर्डर का प्लान बना लिया ।

सब मेरे प्लान में तैयार थे ।

हम सब ने वहीं उत्तराखंड में सब के लिए मोबाइल और नया नम्बर लिये । उन दोनों के लिए भी मोबाइल और नम्बर लिए जो मेरी मदद करने के लिए उनके गढ़ में घुसे हुए थे । मीनाक्षी के भाई और जूही के भाई के लिए ।

उसके बाद वैभव और मीनाक्षी पटना चले गए ।।।

।।।।

अमरनाथ की यात्रा शुरू होने वाली थी , गुरूजी ने मुझे आदेश दिया की मैं भी उन लोगों के साथ अमरनाथ यात्रा पर चलूँ । मेरा मन जाने का बिलकुल भी नहीं था । पर गुरूजी ने कहा मेरे जीवन का अगला पड़ाव वहीं है । तो उनकी बात मान कर मैं उनके साथ चल पड़ा । हम लोग उत्तराखंड से पैदल अमरनाथ के यात्रा पर थे । हम लोग को पूरे तीन महीने बीस दिन लगे । पूरा रास्ता गांजे के महक में सराबोर था । अमरनाथ के मंदिर आने से पहले गुरूजी मेरे पास आये और उनके साथ एक और आदमी था ।

गुरूजी बोले - यह आदमी तुम्हें तुम्हारे मंजिल के और निकट ले जाएगा , इसके बारे में कुछ भी मत पूछना । परंतु ये तुम्हारे बारे में सब जानता है । यह तुम्हें हथियार चलाने की शिक्षा देगा । हमारा साथ यही तक का था । अपने मकसद में कामयाब होना । प्रभु तुम्हारी रक्षा करे । इतना बोलने के बाद गुरूजी अपने दल के साथ आगे चले गए और मैं उस आदमी के साथ उसके रास्ते पर चला गया । वो जो जगह मुझे ले गया वो एक आतंकवादी ट्रेनिंग सेंटर था । वहाँ मुझे 1.5 साल तक ट्रेनिंग दिया गया । जब मैं वहाँ से वापस पटना आ रहा था तो रास्ते में वो आदमी मुझसे अपना गुरुदक्षिणा माँगा - मैंने असमर्थता जताई । तो उन्होंने कहा कि उन चारों को बेहरमी से मारना । और मेरी गुरुदक्षिणा वही है , वो सब राजनितिक परिवार से ताल्लूक रखते है और हमारे संगठन का मुख्य उद्देश्य यही है कि भारत के राजनीति से जुड़े लोगो की हत्या । तरीका कोई सा भी हो ।।।।।

।।।।।

अब मैं पटना में था और राजू सिंह के बेटे की शादी में अब केवल 6 महीने ही बचे थे ।

शादी से चार दिन पहले मीनाक्षी के छोटे भाई का फ़ोन आया की वो चारों कल पटना एयरपोर्ट पर आने वाले है । और फिर सीधे वहाँ से वो लोग अपने गाँव बिहटा निकल जाएंगे । रास्ते में प्रभुजी ढाबा में रुक कर नास्ते का प्रोग्राम है । आपको उन चारों को वहीं मारना होगा । और हाँ मैं भी उन लोगों के साथ मौजूद रहूँगा । क्योंकि उन सब को पटना एयरपोर्ट से लाने में ही जा रहा हूँ । एक ड्राइवर और एक बॉडीगार्ड के हैसियत से ।

फिर मैंने उसे फ़ोन पर समझाया , की जब मैं उन चारो को गोली मारूँगा उसके तुरंत बाद वो मुझे मार देगा । इससे उसका फायदा हो जायेगा और पुलिस मुझे आतंकवादी समझ के मेरे केस को भूल जायेगी । क्योंकि मेरे पास उस आतंकवादी संगठन का पहचान पत्र था । और उसको यह भी समझा दिए की कल जब तुम लोग की गाड़ी ढाबे पर रुकेगी उससे पहले एक मिस्ड कॉल मार देना । और ढाबे पर आने से पहले पेशाब का बहाना बना कर बाहर आना और अपना मोबाइल ऑफ और सिम तोड़ के फेक देना । तब ढाबे पर आना ।

इस प्लान की जानकारी सभी को थी , सब अपने अपने मोबाइल और अपना अपना नम्बर इस घटना के बाद बंद करने वाले थे ।

सब कुछ प्लान के हिसाब से हुआ , मैंने उन चारों को बेहरमी के साथ मारा । मारने से पहले मैंने अपना मोबाइल उस ढाबे के बगल में जो तालाब था उसमें फेंक दिया था । फिर मैं मीनाक्षी के भाई के तरफ आँखों से इशारा भी किया , की वो मुझे गोली मार दे । पर उसके हाथ से बन्दूक नहीं चली  । उसके आँखों में मैंने आसूँ देख लिया था । शायद उसके मन में मेरे प्रति भावना जाग गयी थी । उसके बाद पुलिस ने मुझे पकड़ लिया । फिर उस दिन तुम मुझे मिले थाने में ।

उसके बाद आज । ।।।

।।।।

चट्टान मुझे मुक्ति दे दो  , अब मुझे नहीं जीना है । देखो जूही मुझे लेने आयी है । इस कानून के चक्कर में फाँसी भी मुझे 8-9 साल बाद ही मिलेगी । मुझे इस दुनिया से मुक्त कर दो ।

आपको मरने का क्या जल्दी है , आपने वादा किया है की आप मुझे एक मौका देंगे । ताकि मैं आपके ऊपर लगे आतंकवादी का कलंक हटा सकूँ । और जूही दीदी को न्याय दिलवा सकूँ । क्या आप मुझे बता सकते है कि जूही दी के सुसाइड केस की जाँच कौन इंस्पेक्टर कर रहा था ? - मैंने उस पुलिस वाले के बारे में जानना चाहा ,

उस इंस्पेक्टर का नाम है “भूपेश सरकार” - कैलाश दा ने कहा ,

क्या , क्या ये सच है पटना के तत्कालीन डी.एस.पी भूपेश सरकार उस केस का इंस्पेक्टर था - अभिनव ने चौंकते हुए कहा ,

ठीक है , तुम अपनी छान बिन करो । पर मैं इतना विश्वास के साथ कह सकता हूँ की तुम जूही के केस में एक दो सबूत खोज ही निकालोगे । लेकिन गवाह के नाम पर एक लोग भी आगे नहीं आएगा । क्योंकि वो सब 8 साल पहले आगे नहीं आये , तो अब क्या आगे आएंगे । और अब तो वो सब जो मेरा साथ दिए । वो एकदम मुँह नहीं खोलेंगे । उन सब को मेरा मकसद सही लगता है । और मेरा एक काम करना मीनाक्षी के भाई को बोलना मैं उससे गुस्सा नहीं हूँ । सामान्यतः उस समय मैं भी उसके जगह होता तो शायद मेरे हाथ से गोली नहीं चलती - कैलाश दा ने यह सभी बातें विश्वास के साथ कहा ,

मेरे मन में एक सवाल है । एक नहीं दो सवाल है - अभिनव ने कहा ,

पूछो - कैलाश दा ने कहा

आपको यह क्यों लगता है कि मैं जूही दी को न्याय नहीं दिलवा सकूँगा ? और आपको मुझपर इतना क्यों भरोसा है कि मैं ही आपको मुक्ति दे सकता हूँ ? - अभिनव ने पूछा ।

पहले सवाल का जवाब तुमको आने वाले कुछ दिनों में खुद पता चल जाएगा । और दूसरे सवाल का जवाब ये है कि तुममें कोई भाव नहीं है तुम्हारा चेहरे पर हमेशा शून्य के भाव स्पष्ट दिखाई देते है । तुम भी एक गंजेड़ी हो , और जो गंजेड़ी होते है वो अपना गुस्सा पालना जानते है । मुझे पता की तुम अपने परिवार से अलग हो चुके हो । और अपने गुटन को अपने अंदर ही तक रखते हो । तुम एक पत्थरदिल इंसान बन चुके हो । पर सच्चाई यह है की तुम एक नेकदिल इंसान हो । अपने परिवार से अपना नाता मत तोड़ो । और तुम्हारा यह पत्थरदिल इंसान मुझे मेरे मंजिल तक ले जायेगा - कैलाश दा ने कहा ,

हम्म्म्म - अभिनव ने कहा ।

उसके बाद अभिनव जेल से बाहर आ गया । और पान गुमटी के पास खड़ा हो कर सिगरेट पीने लगा । उसके मन में काफी सारे विचार एक साथ चल रहे थे । क्या कोई इंसान किसी से इतना प्यार कर सकता है , की उसके लिए 8 साल बाद आकार उसके मौत का बदला ले । और उसके बाद अपने मौत की भीख माँगे । क्या मैं नूपुर से कभी इतनी मोहब्बत की है । कितनी बार तो मैं उसे इग्नोर भी कर चुका हूँ । क्या सच में , मैं एक पत्थरदिल इंसान हो चूका हूँ । क्या अपने परिवार से रिश्ता तोड़ के मैंने गलत किया ।

यह सब सोचते सोचते उसकी सिगरेट खत्म हो चुकी थी । और वो आगे बढ़ चुका था । उसके सवालों के जवाब उसे बाद में भी मिल जाते । पर इस समय  उसके पास एक महत्वपूर्ण काम था वो था “जूही दी को न्याय दिलाना” ।।।।।।।।।।

अभिनव बिना सोये , बिना खाये तीन दिनों तक जूही दी के केस पर काम करता रहा । उसे एक दो सबूत भी मिले पर गवाह बनने के लिए कोई भी राजी नहीं हुआ । उसने इन सब बातों का आधार बना कर अपनी पच्चीस पेज एक रिपोर्ट तैयार की । उस रिपोर्ट में मुख्य अभियुक्त रंजन सिंह , उस समय के तत्कालीन विद्यायक स्वर्गीय ठाकुर बलदेव सिंह और उस केस के इंस्पेक्टर भूपेश सरकार ।

उसने अपनी रिपोर्ट चौथे दिन , अपने बॉस राजीव त्रिपाठी के पास प्रस्तुत की ।

सर इस रिपोर्ट को पढ़िए , आपको उस अज्ञात आतंकवादी की सच्चाई पता चल जायेगी - अभिनव ने कहा ,

ठीक है मैं आज ही इसे पढ़ लेता हूँ - राजीव ने कहा ।

सर कल अख़बार में प्रथम पृष्ट पर इस रिपोर्ट को पब्लिश कीजिये । लोगों को सच्चाई जानने का हक़ है । बाकी का काम कोर्ट कर लेगा - अभिनव ने कहा ।

ठीक है , मैं करवाता हूँ - राजीव ने आश्वासन देते हुए कहा ।

सर आज मुझे सेकंड हाफ में छुट्टी दे दीजिए । मैं तीन दिनों से लगातार इस केस पर काम किया है , इसलिये थक गया हूँ । आज नूपुर के साथ लंच पर जाना चाहता हूँ - अभिनव ने कहा ।

ठीक है जाओ , मजे करो - राजीव ने कहा ।

अभिनव ऑफिस से निकल आया , वो खुश था कि उसने इस केस से जुड़ी सभी सच्चाई निकाल ली थी । और वो सारी सच्चाई कल सुबह सभी जनता के सामने रहेगी ।

दोपहर का लंच उसने नूपुर के साथ किया । शाम को घर आया , एक - दो चिल्लम गांजा पीने के बाद वो सो गया ।

बाकि दिनों की तुलना में वो आज जल्दी उठ गया था । उठ के वो सबसे पहले बालकॉनी गया , बालकॉनी में पड़े अख़बार को उठाया । पर ये क्या ?

“अज्ञात आतंकवादी के पास से उसके आतंकवादी होने के सबूत मिले” हैडलाइन पढ़ने के बाद अभिनव जैसे अवाक् रह गया । वो बिना देरी किये राजीव को फ़ोन लगाया । पर तीन बार घंटी जाने के बाद भी राजीव ने अभिनव का फ़ोन नहीं उठाया । अभिनव बिना देरी किये अपना ऑफिस पहुँचा । राजीव अपने केबिन में ही बैठा था ।

कितने में बिके है आप ?

राजीव को देखते ही अभिनव ने पहला सवाल किया ।

देखो अभिनव मेरी बात ध्यान से सुनो , उसके बाद जितनी गालियाँ देनी है मुझे दे लेना - राजीव ने कहा ,

अपने अख़बार की सारी फंडिंग विधायक राजू सिंह के कॉम्पनी से होती है , और भूपेश सरकार अभी वर्तमान समय में डी.एस.पी है । सब काम भावनात्मक तरीके से नहीं होती है । कभी कभी हम सब को यथार्थ में जीना होता है । जब मैंने कल वो रिपोर्ट पढ़ी तो उसके बाद सीधे इस अख़बार के संस्थापक को फ़ोन लगाया और उन्हें इस रिपोर्ट की जानकारी दी । वो तुरंत रिपोर्ट को अपने पास मँगवा लिए । और उसके बाद आज का यह न्यूज़ छपा है - राजीव ने कहा ,

ह्म्म्म - अभिनव अपना गुस्सा छिपाते हुए कहा ।

अभिनव जानता था कि उससे गलती हुई क्योंकि उसके पास उस रिपोर्ट की दूसरी प्रति नहीं थी ।

और हाँ , सर ने ये भी कहा है कि तुम्हारी तनख्वाह में 30 प्रतिसत की वृद्धि कर दी जाए । पर तुम आगे से क्राइम पेज पर काम नहीं करोगे । कल से तुम खेल के पेज पर शर्मा जी को असिस्ट करोगे - राजीव ने अभिनव को ऑफर देते हुए कहा ।

सर मुझे सोचने के लिए वक़्त चाइए - अभिनव ने कहा ।

मुझे पता था , की तुम एक समझदार आदमी हो ,तुम जितना चाहे वक़्त ले लो । मुझे पता है की इस केस से तुम्हारी भावना जुडी हुई है । फिर भी सोच समझ के फैसला लेना - राजीव ने कहा ।

उससे पहले अभिनव वहाँ से जा चूका था ।

उस रात उसने जम के गांजा पीया । उसके अंदर का गुस्सा बढ़ते ही जा रहा था । उसे अब वादे के मुताबिक़ कैलाश दा को इस जीवन से मुक्त करना था । वो अपने आप को तैयार कर रहा था ,की किस तरह कैलाश दा को इस पाप की दुनिया से मुक्ति दे दिया जाए । पूरी रात उसने चिल्लम के साथ उनके मुक्ति का योजना बनाया । योजना ऐसा होना चाइए था , कहीं से भी उसको फसने का डर ना हो ।।।

।।।

दूसरे दिन अभिनव बेऊर जेल में अज्ञात आतंकवादी उर्फ़ कैलाश दा से मिलने गया ।

तो कैसे दे रहे हो मुक्ति - कैलाश का पहला सवाल यही था ।

मुझे माफ़ कर दीजिए ,मैं आपके और जूही दी कि लिए कुछ नहीं कर सका । पर मैंने जो आपसे वादा किया था वो जरूर पूरा करूँगा । आपको इस पापी दुनिया से मुक्ति का रास्ता दिखा दूँगा - अभिनव ने कहा ,

इतना बोलने के बाद अभिनव ने अपने शर्ट के ऊपर के तीन बटन खोले । अभिनव के छाती पर एक कागज़ चिपका हुआ था । और उस कागज़ पर कुछ लिखा हुआ था । जैसे जैसे उस कागज पर लिखे उस लेख को कैलाश पढ़ते गया , उसके आँखों में चमक आने लगा ।

तुम मेरे लिए भगवान हो चट्टान सिंह - कैलाश ने कहा ।

मेरी एक इच्छा अधूरी रह गयी कैलाश दा , आपके साथ गांजे पीने की - अभिनव ने कहा ,

अभिनव मेरी एक बात मानों ये गांजा पीना छोड़ दो , ये नशा उन लोगों के लिए है जो अपना गृहस्थ त्याग देते है । नूपुर से शादी कर लो और अपने परिवार में वापस लौट जाओ - कैलाश ने कहा ।

अभिनव ने उनके पाँव छु कर आशीर्वाद लिया और निकल गया ।

मोबाइल पर राजीव के तीन मिस्ड कॉल थे ।

अभिनव ने तुरंत कॉल बैक किया ।

हेल्लो - अभिनव ने कहा ,

अरे कहाँ हो , क्या फैसला लिया - राजीव ने उत्शुकता पूर्वक पूछा ।

आपके लिए ब्रेकिंग न्यूज़ खोजने गया था - अभिनव ने कहा ,

मतलब ? - राजीव ने जानना चाहा ।

तीन दिन इंतज़ार कीजिये , ब्रेकिंग न्यूज़ खुद पता चल जाएगा । और मैं अपना फैसला आपको तीन दिन बाद ही बता दूँगा - इतना कह कर अभिनव ने फ़ोन काट दिया।

रात में अभिनव ने अपने ज़िन्दगी का आखिरी बार चिल्लम पी रहा था । क्योंकि वो कैलाश दा से वादा कर के आया था ,उसे अपने फैसले पर नाज़ था कि उसने कैलाश दा को मुक्ति का मार्ग दिखला दिया था ।

।।।।।।।।


तीन दिन बाद ,


ब्रेकिंग न्यूज़ “बेऊर जेल से अज्ञात आतंकवादी आज सुबह जेल से फरार , एक घंटे के भीतर पटना पुलिस ने उसे एनकाउंटर में मार गिराया”

ये ख़बर सबसे ज्यादा राजीव के लिए अजीब थी । उसे कुछ समझ में ही नहीं आया , की तीन दिन पहले अभिनव एक ब्रेकिंग न्यूज़ की बात कर रहा था । और वो ब्रेकिंग न्यूज़ ये है । यानि उसे इसकी जानकारी थी ।

राजीव ने तुरंत अभिनव को फ़ोन लगाया ।

हेल्लो , अभिनव क्या है ये ? - राजीव ने पूछा

मैं आप ही के फ़ोन का इंतज़ार कर रहा था , आप मेरे रूम पर आ जाइए , आप को में सब सच्चाई बताता हूँ । और हाँ ये याद रखिएगा की मैं भी एक पत्रकार हूँ । तो कोई भी चालाकी नहीं । आप केवल आइये , आपके साथ कोई भी इलेक्ट्रॉनिक यंत्र ना हो । मैं नहीं चाहता की आप मेरी बात को रिकॉर्डिंग कर के भविष्य में मुझ पर दवाब देने की कोशिश करे - इतना बोल के अभिनव ने फ़ोन काट दिया ।

।।

आधा घंटा से भी कम समय में राजीव , अभिनव के रूम में था ।

ये सब क्या है अभिनव ? तुम्हें कैसे पता था की उस आतंकवादी को पुलिस एनकाउंटर में मार देगी ? - राजीव ने जानना चाहा ,

आपको किसने बोल दिया की वो एनकाउंटर में मारा गया है - अभिनव गंभीर शब्दों में कहा ,

मतलब ? - राजीव ने कहा ,

जैसे जूही दी की हत्या को पुलिस वालों ने आत्महत्या साबित कर दिया । ठीक उसी तरह कैलाश दा उर्फ़ “अज्ञात आतंकवादी” की आत्महत्या को पुलिस वालों ने एनकाउंटर साबित कर दिया - अभिनव ने कहा ,

मतलब , क्या उसकी मौत आत्महत्या है , पुलिस एनकाउंटर नहीं । और ये बात तुम्हें कैसे पता है - राजीव ने जानना चाहा ,

क्योंकि उनकी मौत की पूरी पृष्ठभूमि मैंने ही तैयार की थी - अभिनव ने बताया ,

कैसे ? - राजीव ने एक और सवाल किया ,

जिस तरह आप , आपके उच्चाधिकारी और भूपेश जैसे उच्च पद पे रहने वाले व्यक्ति अपना ज़मीर बेच सकता है । तो कोई भी बेच सकता है । आज से 4 दिन पहले मैं आखिरी बार कैलाश दा से मिलने गया था । मुझे पता था कि उनसे मिलने से पहले मेरी तलाशी ली जाएगी । इसलिये मैंने एक सादे कागज को अपने छाती पर चिपका लिया । और उसके ऊपर शर्ट और जैकेट पहन लिया । जानते उस कागज़ पर क्या लिखा था । उस पर लिखा था “जेल के हलवाई के पास एक ब्लेड है , वो आपको खाने की थाली में आज मिल जायेगी । लेकिन आपको आज नहीं तीन दिन बाद मरना है । क्योंकि आप आज खुद को मार लेते है तो पूरा शक मुझपर आ जायेगा । पर अगर कुछ दिन रुक कर आप आत्महत्या करते है तो यह जेल प्रशासन के लिये ये बात काफी किरकिरी साबित हो जायेगी । और जेल प्रशासन आपकी आत्महत्या को पुलिस एनकाउंटर साबित कर देगी । और आपका फाइल हमेशा के लिए बंद हो जायेगा ”।

मैं कैलाश दा से मिलने से एक दिन पहले जेल के हलवाई से मिल चुका था । और उसे कैलाश दा और जूही दी कहानी सुनाई । वो दस हज़ार और दो पैकेट गांजे पर मेरा काम करने के लिए तैयार हो गया - अभिनव ने सारा राज़ राजीव के सामने रख दिया ,

और जैसे ही मैं कैलाश दा से उस दिन मिला , मैंने मौका देखते ही अपना शर्ट का बटन खोल के उनको वो कागज़ पढ़वा दिया । बाकी काम तो जेल प्रशासन खुद कर दिया - अभिनव ने कहा ,

वाह अच्छी योजना बनायी । पर तुम भी एक कातिल हो गए ना , कैलाश को मरने में तुमने मदद किया - राजीव ने कहा ,

नहीं मैं कातिल नहीं हुआ । मैं उनके लिए भगवान हूँ । कैलाश दा ने मुझे अपनी अंतिम मुलाकात में कहा था , की मैं उनके लिए भगवान हूँ । क्योंकि मैंने उन्हें इस पाप के दुनिया से मुक्ति दे दिया । और यह हत्या इसलिये नहीं कहलाएगा क्योंकि कैलाश दा को जीने की इच्छा खत्म हो गयी थी । उन्हें हर पल जूही दी का एहसास होता था । अपने परिवार के लिए वो तो कब के मर चुके थे । इसलिए उनके नाम के साथ आतंकवादी जुड़ा इससे उन्हें कोई फर्क नहीं था । उन्हें बस इस दुनिया से मुक्ति चाइए था । जो मैंने दिया । एक हत्या और मुक्ति में यही अंतर होता है - अभिनव ने कहा ,

और हाँ सर , मुझे आपके साथ अब कोई काम नहीं करना है । मैं अपना इस्तीफ़ा आपको मेल कर दिया है - अभिनव ने कहा ,

तो अब तुम क्या करोगे ? - राजीव ने जानना चाहा ,

वापस अपने घर मधुबनी जाऊँगा , वहाँ अपने पापा के स्कूल में बच्चों लोग को शिक्षा दूँगा । उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाऊंगा । ताकि भविष्य में कोई बच्चा राजीव त्रिपाठी , भूपेश सरकार जैसा आदमी ना बने । एक मुजरिम हमारे सभ्य समाज की देन होती है सर - अभिनव के आवाज़ में गुस्सा झलक रहा था ,

राजीव अपनी नज़रे झुका कर अभिनव को सुन रहा था ।

।।।।।

तीन साल बाद

अभिनव और नूपुर एक कब्रिस्तान में एक कब्र के पास बैठे हुए थे । उसी जगह कैलाश दा को दफनाया गया था । अभिनव अपने जेब से चिल्लम निकाल कर उनके कब्र के ऊपर रख देता है ।

तुम अभी भी नशा करते हो - नूपुर ने पूछा ,

नहीं , मैंने यह नशा तीन साल पहले ही छोड़ दिया था । मैंने कैलाश दा से वादा किया था , की तुमसे शादी और अपने परिवार में वापस हो जाने के बाद मैं इस नशे को हमेशा के लिए  छोड़ दूँगा । और मैने अपना वादा उनसे निभाया - अभिनव ने कहा ,

बस मेरी एक इच्छा अधूरी रह गयी  , उनके साथ चिल्लम खिंचने की - अभिनव ने कहा ,

काश ! कुछ लोग अपने पद का गलत उपयोग नहीं करते । काश ! कुछ लोग आगे बढ़ के जूही दी और कैलाश दा के लिए लड़ाई लड़ते , तो आज कुछ और ही हुआ रहता । पर हम सब काश में नहीं जीते है । हमे हकीकत में जीना होता है ,अभिनव - नूपुर ने अपने पति के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा ,।।।।।।



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