50
Share




@dawriter

अखबार वाला

0 184       
mmb by  
mmb

अखबार वाले की दीवाली

रविवार की सुबह अखबार पढ़ रहा था। श्रीमती जी ने चाय का कप सामने टेबल पर रखा और डायरी में कुछ लिखने लगी। चाय का कप उठा कर दो घूंट चाय की चुस्की ली।

"आज सुबह सुबह किस बात पर उलझी हुई हो। डायरी में लिखना शुरू कर दिया, सूखी चाय पिला दी, कोई बिस्कुट नहीं दिया। तबियत तो ठीक है ना।"

बिस्कुट शब्द सुन कर चौंकी "क्या बिस्कुट नहीं दिया।" कह कर फटाफट बिस्कुट का पैकेट सामने रख दिया। उसको पता है कि मैं सूखी चाय नहीं पीता। साथ में बिस्कुट जरूर लेता हूं। इतनी सुबह कौन सा काम आ गया कि डायरी में उलझ गई। मूड कुछ ठीक नहीं दिख रहा। चुपचाप बिस्कुट का पैकेट खोला, दो बिस्कुट निकाले, चाय के साथ लिए। चाय समाप्त करने के बाद श्रीमती जी से पूछा कि आखिर किस बात की नाराज़गी है?
"ऑफिस जाना और छुट्टी वाले दिन अखबार पढ़ना इसके अलावा और कोई काम करते हो तो बताओ?"

मन ही मन सोचा कि आज तो शामत है। चुपचाप श्रीमती जी की हां में हां मिलाते जाओ। यही सोच कर साहस किया और पूछा "काम बताओ।"

श्रीमती जी ने डायरी हाथ में थमा दी "दीवाली आ रही है, खर्चे का हिसाब लगा रही हूं। तुम्हारा कोई खर्च हो तो लिख लो और रकम खर्चे के लिए मुझे दे दो।"

मैं डायरी में लिखे अनुमानित खर्च को देखा। कोई अनुचित खर्च नहीं लगा, फिर भी आदतन कह दिया "थोड़ा कम करना पड़ेगा।"

"कौन सा खर्च काम करुं, ये तो समझाओ?"
"दीवाली पर खर्च कुछ अधिक ही हो जाता है। दूसरों की देखा देखी लेनदेन हर वर्ष बढ़ता जाता है।"
"हमने दूसरों का क्या करना है।अपनी आमदनी देख कर खर्च लिख रही हूं। चादर से बाहर पैर कभी नहीं निकाले।"
श्रीमती जी की बात में दम था। हर महीने पूरी तनख्वाह श्रीमती जी के हाथ में रखता हूं, क्योंकि मुझे मालूम है कि उसने किफ़ायत से चलना है। कभी फ़िज़ूल खर्च नहीं किया।

अगले दिन ऑफिस में ट्रान्सफर आर्डर की ईमेल आ गई। कंपनी के नियमों के अनुसार हर वर्ष अप्रैल के महीने के ट्रान्सफर होते हैं, परंतु इस वर्ष तो छः महीने बाद ही ट्रान्सफर आर्डर आ गए। पता चला कि मेरा नाम भी लिस्ट में है। आज पांच वर्ष बाद मेरे ट्रान्सफर हो रहा है, ख़ुशी सातवें आसमान पर पहुंच गई क्योंकि ट्रान्सफर दिल्ली के लिए था। एक तो दिल्ली में अपना घर, दूसरा कंपनी का हेड ऑफिस। फ़ौरन श्रीमती जी को फ़ोन लगा कर खुश खबरी दी।

पांच वर्षों से बंगलुरु ही अपना घर बन गया था। बच्चे कॉलेज के होस्टल में, दिल्ली वाला घर किराये पर दे रखा था। यह भी एक इतेफाक हुआ कि किरायेदार का पिछले महीने तबादला हुआ और प्रॉपर्टी ब्रोकर्स को नया किरायेदार ढूंढने को कह रखा था, खैर इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी, अब खुद रहना है। फटाफट दिल्ली ऑफिस में पद संभालना था। हम दिल्ली पहुंच गए लेकिन घर का सामान नहीं पहुंचा। हम तो फ्लाइट पकड़ कर ढाई घंटे में दिल्ली पहुंच गए लेकिन सामान वाले ट्रक को समय चाहिए बंगलुरु से दिल्ली आने में।ट्रक वाले से बात कि ट्रक को दो दिन अभी लगने थे आने में। रसोई का सामान ट्रक में था, रात का खाना रेस्टोरेंट में खा कर बाहर निकले तो आईसक्रीम खाने के लिए ट्राली पर जैसे ही रूके, एक जाना पहचाना सा चेहरा सा लग रहा था आइसक्रीम बेचने वाले का।
“सर जी कौन सी आईसक्रीम दूं।“
यह आवाज उस अखबारवाले की थी, जो पांच वर्ष पहले अखबार डाला करता था वो आज आइसक्रीम बेच रहा था
आईसक्रीम खाते खाते उससे बातें होती रही। “क्या अखबार का काम छोड दिया?“
“नही सर जी, सुबह अखबार बांटता हूं, शाम को आईसक्रीम की ट्राली लगाता हूं। आपकी उस बात ने मेरी जिन्दगी बदल दी, कि कोई काम छोटा नही होता, बस इज्जत का काम होना चाहिए। अखबार बांटना, आईसक्रीम बेचना इज्जत का काम है। कोई ढंग की नौकरी मिली नही, तो काफी सोच विचार के बाद इसी नतीजे पर पहुंचा कि अखबार और आईसक्रीम बेचने में कोई बुराई नहीं, आज आईसक्रीम की ट्राली है, कल भगवान ने चाहा तो आईसक्रीम पार्लर भी हो जाएगा।“ अखबारवाले में बातों में आत्मविश्वास था।
“अब हम वापिस आ गए है। सुबह अखबार डाल देना।“
मुस्कुराते हुए अखबारवाले ने कहा “जरूर, कल पहला अखबार आपके घर डालूंगा।
“चलो आपकी बातों से कम से कम अखबारवाले की निराशा दूर हुई।“ श्रीमती जी ने हंसते हुए कहा।

रात सोते हुए अतीत में मन विचरण करने लगा। कॉलिज के दिनों में एक बुरी लत गई थी, जो आज तक पीछा नही छोङ रही है। कई बार श्रीमती जी से भी बहस हो जाती है, मेरे से ज्यादा प्यारा अखबार है जिसके साथ जब देखो चिपके रहतो हो। क्या किया जाए अखबार पढने का नशा ही कुछ ऐसा है कि सुबह नही मिले तो लगता है कि दिन ही नही निकला। खैर श्रीमती जी की अखबार वाली बात को गंभीरता से नही लेता हूं क्योंकि मेरे ऑफिस जाने के बाद खुद उसने पूरा अखबार चाटना है। पढी लिखी श्रीमती जी चाहे, वो हाऊस वाईफ हो, एक फायदा तो होता है कम से कम वह अखबार का महत्व समझती है। प्रेम भरी तकरार पति, श्रीमती जी के प्यार को अधिक गाढा करती है। प्रेम भरी तकरार ही गृहस्थ के सूने पन को दूर करती है। तकरार ही आलौकिक प्रेम की जननी है।
पहले ऑफिस घर के समीप था। सुबह अखबार तसल्ली से पढ कर ऑफिस जाता था, लेकिन नई नौकरी और ऑफिस घर से थोडा दूर हो गया तो घर से जल्दी निकलना पङता था। ढंग से अखबार सुबह पढ नही पाता था, जैसे हर समस्या का समाधान होता है, इसका भी निकल आया। एक नजर ङाल कर ऑफिस रवाना होने लगा। शाम को तसल्ली से संपादकीय और दूसरे ऑर्टिकल पढने की आदत बना ली। इधर कुछ दिनों से कोफ्त होने लगी, कि लत कभी छूट नही सकती। कारण अखबारवाला। अखबारवाले का लङका बदल गया। पुराना लङका सुबह उठने से पहले ही अखबार ङाल जाता था लेकिन यह नया लङका देरी से आता था, जिस कारण कई बार तो अखबार पढना ही रह जाता। खैर कोई बात नही, शाम को अखबार पढने लगा। महीने बाद अखबारवाला जब बिल के पैसे लेने आया, बिल पकङते ही मुख से शब्द अपने आप निकल आए “भाई साहब, बिना अखबार पढे ही बिल का भुगतान कर रहा हूं, इतनी देर से अखबार डालता है, कि पढने का समय ही नहीं मिल पाता।“

“कल से समय पर आ जाएगा।“ कह कर एजेंसी के मालिक ने तसल्ली दी।

वाकई, अगले दिन अखबार पहले वाले समय पर आ गया। शिकायत का असर फौरन। सोचने लगा, यह काम पहले करता तो अखबार शाम में पढने की आदत नहीं पढ़ती। लेकिन दस बारह दिनों के बाद अखबार का समय फिर से बदल गया यानी फिर से लेट। यह सिलसिला बीस दिनों तक चला, और फिर कुछ दिन जल्दी तो कुछ दिन लेट। यह गुथ्थी समझ से परे थी लेकिन इतना समय नहीं है, कि दिमाग में बोझ ङाल कर गुथ्थी सुलझाई जाए।

उस दिन गर्मियों के बाद बारिश के मौसम ने उस दिन करवट बदली, आसमान में काले बादल छाए हुए थे। लम्बी गर्मी के बाद मौसम मस्ती के मूङ में था। रविवार का दिन, दिल चाहता है, कि देर तक साया जाए लेकिन बदन में एक ऑटोमैटिक अलार्म फिट है, नींद सुबह के पांच बजे हर रोज की तरह खुल गई। एसी में ठंङ लगने लगी, बाहर मौसम ने करवट ले रखी थी। एसी बंद करके खिङकी खोली, एक मस्त हवा का झोका सुस्त बदन को खोल गया, इतने मे श्रीमती जी ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा “यह क्या, खिडकी क्यों खोल दी, आज संङे को क्यों जल्दी उठ गए।“
“संङे को गोली मार, बाहर मस्त मौसम की बाहार ने आनन्दित कर दिया।“
चादर में से मुंह निकाल कर खिङकी के बाहर मस्त मौसम का जायजा लिया और राकेट की रफ्तार से बिस्तर छोङ बाथरूम में घुस गई। बाथरूम में से आवाज लगाई “मॉर्निग वॉक चले, मौसम मस्ताना है।“

नेकी और पूछ, कभी कभी बैसाखी, दिवाली पर ही मॉर्निंग वॉक नसीब होती है। सोने पर सुहागा, यह मस्त मौसम वो भी संङे को। बीस मिन्टों में कार स्टार्ट की और सीधे जापानी पार्क। पार्क के पास बहुत सारे अखबारवाले बैठे थे। उनको देख कर मुख से यूही निकल पङा “यहां देखो, अखबार ही अखबार नजर आ रहे हैं, एक हमारा अखबारवाला ग्रेट है, आठ बजे अखबार ङाल कर जाता है।“
“अरे देखो, अपना अखबारवाला भी बैठा है।“
“हां, वोही तो अखबारवाला है।“ कह कर मैने कार उसके पास रोकी। उसका ध्यान हमारी तरफ आया, कि अचानक कौन कार में है, जो एकदम उसके पास आ कर रूका। हमें देख कर एकदम अटेंशन की मुद्रा में खङा हो गया। “गुङ मॉर्निग, सर जी, मॉर्निंग वॉक करने आए है। अखबार घर पर ङाल दूंगा। आप शौक से मॉर्निग वॉक कीजिए।” अखबारवाले ने सुझाव दिया तो मैंने कहा “अब पकङा ही दो, मौसम सुहाना है, बैंच पर बैठ कर ठंङी हवा के झोको के बीच अखबार पढने का मजा भी ले लेगें।“
“सर जी, अभी अंग्रेजी के अखबार की गाङी नहीं आई है, वो मैं बाद में घर पर डाल दूंगा।“ कह कर उसने हिंदी का समाचार पत्र पकङा दिया। मेन अखबार, सप्लीमेंट और क्लासीफाइङ अलग अलग पकङा दिया।
यह देख कर श्रीमती जी ने नराजगी जाहिर की “यह क्या भैया अलग अलग पन्ने पकड़ा दिये।“
हंसते हुए उसने कहा, “कंपनी वाले तो ऐसे ही हमें देते है। हम सप्लीमेंट अखबार में ङाल कर एक बनाते है। आप देख ही रहे हैं। हमारा एक घंटा तो इसी काम में लग जाता है। हम यहां दूसरी गाङी का इंतजार कर रहे है। सुबह चार बजे यहां जाते है। गाङियों के इंतजार में अच्छा खासा समय लग जाता है।“

मौसम की नजाकत देखते हुए अखबार बगल में दबा कर जापानी पार्क में सुबह की सैर और सुहाने मौसम का लुत्फ लेने लगे। दो घंटे बाद जब वापिस घर पहुंचे, तो श्रीमान अखबारवाला सोसाइटी के गेट पर टकराया।
“क्यों भाई, दूसरे अखबार की गाङी क्या अब आई?“
मेरे प्रश्न पर वह झेप गया और धीरे से इस तरह से बोला कि दूसरे को सुनाई न दे “सर जी, किसी को कहना नहीं, दूसरी सोसाइटी में पहले चला गया था। कल से आने वाले दस दिनों कर पहले आपकी सोसाइटी में आउंगा।“
“क्या कह कहा था?“ श्रीमती जी ने आश्चर्य से पूछा।

अखबारवाले की बात सुन कर श्रीमती जी झल्ला कर बोली “आपने उसे सिर पर बैठा रखा है। डांट मार कर सबसे पहले अपनी सोसाइटी में आने को कहते।“
“क्या फायदा डांटने का, जिसके यहां देर से अखबार डालेगा, डांट तो सुनेगा।“
“आपने कभी डांट लगाई, क्या? रोज देर से आता है। आप ऑफिस चले जाते हो, अखबार सजा हुआ पूरे दिन टेबुल पर पडा रहता है। बंद कर दो, अखबार। बासी अखबार का क्या फायदा।“

श्रीमती जी ने तो अपनी भड़ास निकाल ली, लेकिन अखबार की लत नहीं छूटी। क्या किसी शराबी ने शराब छोडी? क्या सिगरेट बीडी पीने वाले ने सिगरेट बीडी छोडी? नहीं न, फिर मैं कैसे अखबार छोड सकता था। अखबारवाला कभी जल्दी तो कभी देरी से। कभी हमारी सोसाइटी में तो कभी दूसरी सोसाइटी में जल्दी। रोज रोज झगडने से क्या फायदा। एक दिन सुबह डोरबेल बजी, दरवाजा खोला तो अखबारवाला था।

“गुडमॉनिंग सर, लीजिये आप का पेपर।" मैं आश्चचकित कि आज पहली बार एक मंजिल ऊपर आ कर हाथों में अखबार पकडाया जा रहा है, वर्ना सारे अखबार वाले बास्केटबॉल चैंपियन होते हैं। एक निशाने में चौथी मंज़िल की बालकनी में अखबार पहुंचा देते हैं। सोचता हूं कि सरकार यदि सोचे तो अखबार वालों की बास्केटबॉल टीम ओलंपिक्स में भेज दे तो मैडल पक्का हमारा ही होगा। लेकिन बिना हाव भाव प्रकट किए अखबार लेकर उसके गुडमॉनिंग का जवाब दिया।
“सर जी आप की ईएसआई अस्पताल में कोई जान पहचान है?“
अस्पताल का नाम सुन कर मैं थोड़ा आश्चर्य में आ गया “क्या हुआ, सब खैरियत तो है न?“
“जी सर सब ठीक है, वहां मैं इंटरव्यू देकर आया हूं। हांलाकि पोस्ट टेम्परेरी है और उम्मीद कम नजर आ रही है, फिर भी कोई जुगाड लग जाए।“
“ईएसआई अस्पताल तो सरकारी अस्पताल है। मैं तो प्राईवेट नौकरी करता हूं। सरकारी जान पहचान तो है नहीं ।“
“कोई बात नहीं सर, बस यही कोशिश कर रहा हूं कि सरकारी नौकरी लग जाए तो अखबार डालने का काम छोड दूंगा। चार सोसाइटियों में अखबार डालता हूं, जहां देर हो जाए, लोग खाने को पड़ते हैं। मजे का काम नहीं है अखबार डालना।“

उसकी बातों में उदासी और निराशा थी। वह अपने पेशे से खुश नहीं था। खैर उसकी बात नहीं। मैं कौन सा खुश हूं अपनी नौकरी से। दूसरे की थाली में सबको देसी घी नजर आता है। दूसरे की नौकरी और व्यवसाय सबको अच्छे लगते है।
“देखो मेरी तो कोई जान पहचान है नहीं लेकिन तुम कोशिश करते रहो। जब तक कोई नौकरी नहीं मिलती अखबार डालते रहो।“
जी सर कह कर अखबार वाला चला गया। श्रीमती जी ने हमारी बातें सुन कर कहा “बहुत निराशावादी लगता है, अखबारवाला।“

“हां है तो सही खुद की पेपर ऐजन्सी होती तो खुश होता। करता तो नौकरी है। हर कोई चाहता है सरकारी नौकरी लग जाए तो उम्र भर की तसल्ली हो जाती है और रिटायरमेट के बाद पेंशन।“

कुछ दिनों के बाद एक दिन सुबह अखबारवाला से पूछा तो मालूम हुआ कि नौकरी तो मिली नहीं। रिश्वत देने के लिए पैसे थे नहीं और संघर्ष जारी है जिन्दगी में। दिन बीतते गए, अखबारवाला वोही, कुछ निराशा और उदासी अधिक लगने लगी। दिवाली का दिन था, ऑफिस की छुट्टी, देर तक बिस्तर में लेटा रहा, तभी कॉलबेल बजी। उठ कर दरवाजा खोला तो सामने अखबारवाला हाथ में अखबार लेकर खड़ा था।

“हैपी दिवाली” कह कर मुस्कुराते हुए अखबार पकड़ाया।

एक निराशावादी इंसान को मुस्कुराते हुए देख कर आश्चर्य हुआ फिर संभल कर मुस्कुराते हुए उसकी दिवाली ग्रीटिंग का जवाब दिया। अखबार लेकर मैं वापिस मुड़ा तो उसकी एक बार फिर से आवाज आई “सर जी हैपी दिवाली।“ मुड कर देखा तो वह खड़ा कानों पर हाथ फेरने लगा। मैं समझ गया कि वह दिवाली का इनाम चाहता है। जेब में हाथ डाला, कोई छोटा नोट नहीं था, पांच सौ का नोट था, पता नहीं क्या हुआ, उसे पांच सौ रूपये का नोट दे दिया। रूपए लेकर एक फौजी स्यलूट मार कर चहकता हुआ चला गया। मैं सोचता रहा कि आज तक किसी अखबार वाले ने कभी दिवाली ईनाम नहीं मांगा। यह पहला अखबार वाला था जो देरी से अखबार डालता है और दिवाली ईनाम भी ले गया। भाईदूज के दिन वो मुझे मिला और गीली आंखों से डबडबाते हुए कहा “सर जी आप के दिवाली ईनाम की बदोलत मैं दीवाली पर अपनी बहन को उपहार दे सका। बहुत कश्मकश में था कि बहन को दीवाली उपहार नहीं दिया तो उसके ससुराल वाले ताने देंगे। मेरी बहन ताने सुने, मुझे बर्दास्त तो नहीं था, परंतु कुछ कर नहीं सकता था। आपके पांच सौ से छोटा सा उपहार बहन को दिया और आज भाईदूज पर मैं अपनी बहन को कुछ उपहार हे सकूंगा। दिल्ली शहर की मंहगाई ने कमर तोड़ रखी है। बस दो वक्त की रोटी और रहने की छत की नसीब है। आधी कमाई तो घर के किराए में निकल जाती है। भाईदूज के दिन खाली हाथ बहन के घर जाते शर्म आती है।“ कहते कहते आंखे उसकी भर आई थी।

आखिर हमे समाज की मान्यताओं को निभाने के लिए कई समझोते करने पड़ते हैं। जो हम चाहते है वो अक्सर नही मिलता है। उस अखबार वाले की भी यही समस्या थी। सरकारी नौकरी मिली नहीं। निजी नौकरी काम ज्यादा और वेतन कम। थक हार कर अखबार बांटने का काम न चाहते हुए भी कर रहा था। खैर एक बात की मुझे तसल्ली थी कि मेरे दिए रूपये का सदुपयोग हुआ और एक गरीब की दीवाली और भाईदूज त्यौहार में इजज्त बरकरार रही।

“कोई बात नहीं। संघर्ष ही जिन्दगी का दूसरा नाम है। देर से सही, तुम्हारे मतलब का काम जरूर मिलेगा। काम कोई भी छोटा नहीं होता। इज्जत से रोटी मिल जाए, वोही काम बढिया है।“ मेरी इस बात का उस पर कितना असर हुआ, मुझे नहीं मालूम, लेकिन दिवाली के बाद होली का भी ईनाम अखबारवाला ले गया। यह सिलसिला कोई दो तीन साल तक चलता रहा। फिर मेरा ट्रान्सफर हो गया और आज पांच वर्ष बाद दिल्ली आया।

पुरानी बातें सोचते नींद आ गई।

अगले दिन सुबह उठने से पहले बॉलकोनी में अखबार पड़ा था। वायदे के अनुसार अखबारवाले ने पहला अखबार मेरे घर में डाला था।

मनमोहन भाटिया

Image Source: udaipurtimes



Vote Add to library

COMMENT