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@dawriter

बच्चे हैं सुपर हीरो नही

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अजी सुनते हो ! वो शर्मा जी का बेटा है न ! वो क्लास में हमेशा फर्स्ट आता था और आज उसका सलेक्शन शहर के सबसे बड़े स्कूल में हो गया वो भी बिना डोनेशन के..! और एक ये वरुण है किसी काम का नही ! होमवर्क भी करना नही चाहता, सेल्फ स्टडी की तो आप रहने ही दो ...! " 

पास में बैठा वरुण सुन रहा था, जब से शर्मा अंकल के बेटे नैतिक का सेलेक्शन हो गया है माँ तो उसे जीने ही नही दे रही..! बेचारा टेंशन में है..खेलने भी नही गया..टीवी भी नही देखने नही दे रही मम्मी..! 

बच्चे ...हमारे आने वाले कल का चेहरा ..! इस दौड़ती भागती जिंदगी की दौड़ में, हम सभी चाहते हैं कि हमारा बच्चा हमेशा अग्रणी रहे..! ऐसा न हो कि, सबके बच्चे आगे निकल जाएं और हमारी संतान पीछे रह जाये ..' कहीं इस प्रगतिशील जीवनशैली में हमारे नौनिहाल पीछे न रह जाएं .. इन सब मे जीवन प्रत्याशाओं का भार ..झेलते हैं हमारे मासूम बच्चे ..!मात्र  प्रत्याशाओं का भार ही नही अपितु हमारे अपने सपने भी उनके भविष्य के लिए चुने गए मार्ग भी उनके बचपन और उनके आत्म के लिए घातक होते हैं.. जैसा आज से कुछ वर्षों पहले बनी एक बेहतरीन फ़िल्म ' थ्री इडियट्स ' में दिखाया गया था , कि किस प्रकार प्रेशर में एक बच्चा आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाता है, और वहीं दूसरे एक बच्चे में किसी दूसरे प्रोफ़ेशन के प्रति रुचि थी, एवम जबरन उसे इंजीनियर बनने के लिए , दबाव डाला जा रहा था..भले ही वो उसमे अच्छा प्रदर्शन कर पाए या नही ! ये कहाँ तक उचित है?

माता पिता के द्वारा देखे गए सपने ..कि, बच्चे को भविष्य में क्या बनाना है डॉक्टर इंजीनियर, आई ए एस , पी सी एस, या फिर कुछ और ..! इन सबमें झेलता कौन है केवल हमारे मासूम बच्चे..ये विचारणीय है कि, एक माता पिता के लिए क्या महत्वपूर्ण है, संतान सुरक्षित व स्वस्थ रहे..खुश रहे अथवा ..प्रत्याशाओं के बोझ तले अपना बचपन और मासूमियत खो दे..?

मुझे ये बेहद चिंताजनक और सोचने योग्य विषय लगा कि, छोटे छोटे मासूम बच्चों पर इतना बोझ लादना जरूरी है क्या ? अरे ये बेचारे बच्चे हैं सुपर हीरो नही ..! जो पढ़ाई, कोर्स ,एक्स्ट्रा एक्टिविटीज, कल्चरल प्रोग्राम्स, जूडो, तैराकी, ताइक्वांडो, और इंग्लिश स्पीकिंग से लेकर साइकिल से लेकर चेस खेलने तक की ट्रेनिंग लेने भेजे जाते हैं..! आप खुद सोचिये महज ढाई साल की उम्र से उन्हें मैनर सीखने प्ले स्कूल में डाल दिया जाता है, और जल्द ही बस्तों का बोझ उठाने में इनके कंधे झुक जाते हैं..! समय से पहले परिपक्व होते ये बच्चे, जीवन के हर क्षेत्र में अग्रणी होने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं और जब हमारे आपके आयु क्रम में पहुचते हैं तब अपने बचपन को किताबों में ढूंढते हैं ..! जो मेरी निगाह में तो बेहद शोचनीय है। 

जरूरी नही कि, हर बच्चा इतना अधिक टैलेंटेड हो कि वह हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर सके..! और उस पर माता पिता का बच्चों को अपमानित करना और उनका हतोत्साहन करना , हो सकता है उनमें नकारात्मकता को जन्म दे और वे अपनी जान के साथ कोई खिलवाड़ कर लें..अपना नुकसान कर बैठें ! इतना तो हम सभी माता पिता समझते हैं कि, हमें अपने बच्चों को कैसे मजबूत बनाये रखना है.. और किस प्रकार उनका उचित मार्गदर्शन करना है... बस ये ध्यान रखना है..कि, कहीं हम अपने सपनो की चाह में अपने जिगर के टुकड़ों को खो न दें, और इस आगे रहने की दौड़ में कहीं वे पिछड़ न जाएं , और खुशियों की गली में भटक न जाएं ।

मेरे विचार आवश्यक नही कि, सभी को उपयुक्त लगें, क्योकि सभी के अपने निजी विचार व संवेदनाएं हैं..! किन्तु यदि कही आप इससे सहमत हों तो मुझे बताना न भूलें । 

-कविता जयन्त श्रीवास्तव



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