18
Share




@dawriter

सागर के किनारे

2 35       

सागर के दो तटस्थ किनारे,

एक दूसरे से अलग,एक दूसरे के सहारे..

कुछ नहीं होता है,उनके वश में,

एक दूसरे से जुड़े होकर भी ,कश्मकश में..

वे हैं एक सागर की परिधि में, सागर से अभिन्न..

किन्तु नियति से हारते हैं,रह कर भिन्न भिन्न...

नहीं हो सकता ,उन्हें मिलाने का प्रयास,

ये कल्पना भी है एक सारहीन आस..

....

हम भी हैं इसी तरह, संसार सागर के दो किनारे,

एक दूसरे से भिन्न, एक दूसरे के सहारे

' अहं ' का ये खारा पानी,

है हमारे अलगाव की निशानी..

ये सागर की ऊंची नीची लहरें,

कभी एक किनारे के पास न ठहरे,

क्या कभी दुख के ये ज्वार -भाटे ,

तुम्हारे दिल को भी छुए है?

हुंह, भूल जाओ!

क्या कही दो किनारे भी,कभी एक हुए हैं...

...

लहरों का माध्यम प्रेम का स्पर्श तो कराता है,

किन्तु दोनो के मध्य की दूरी मिटा नहीं पाता है..

..

"प्रेम अहं से नहीं चलता" ...

,ये सत्यता तू क्यों नहीं समझ पाता है?

फिर भी, ऐ मेरे सहारे!

इस सागर के दूसरे किनारे..!

ये तेरा अहंकार है? या बीच मे संसार है?

- कविता जयन्त श्रीवास्तव



Vote Add to library

COMMENT