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@dawriter

मेला

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कल रात जो मैंने सपना देखा,
हंसती-खेलती जिंदगी को तनहा देखा,
भीड़‌ लगी थी जिस मेले में,
खुद को वहां अकेला देखा,
कल रात जो मैंने सपना देखा।

देख ना सका कोई मेरा दर्द,
आंख लिए अंधों को देखा,
सुन ना सका कोई मेरा रोना,
कान लिए बहरों को देखा,
कल रात जो मैंने सपना देखा।

पीठ थपथपा जो दिलासा दे सका,
लाखों हाथों में एक न देखा,
भीड़ में खड़ा खुद को रोता देखा,
चलते फिरते लोगों को सोता देखा,
कल रात जो मैंने सपना देखा।

दूर दिखी परछाई मां की,
रोता चेहरा खिलता देखा,
रोक न सका कोई आंसू मेरे,
लिपट लिपट कर रोते देखा,
कल रात जो मैंने सपना देखा।

© उत्कृष्ट शुक्ला



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