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@dawriter

मुंतजिर

2 27       

 

मेरे राह की मुंतजिर है वो सखियां,

जिनके कल्ब-ए-सहर पर मेरा नाम था।

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मुंतजिर था, मुंतजिर हूं और शायद मुंतजिर ही रहूंगा,
अगर ये कायनात यूं ही हक से ज्यादा बटोरती रही।

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बस एक रात सोया था ख्वाब देखने को,
तमाम उम्र मुंतजिर है उत्कृष्ट उसे पाने को।

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मुंतजिर है आंखें, तेरी एक झलक के लिए 

कुछ सितारे दामन में है तेरी पलक के लिए।

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मुंतजिर सा है हर शख्स इस कायनात का,
कोई मेरा-तेरा और कोई इसका-उसका।

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उत्कृष्ट शुक्ला

©utkrisht



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