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@dawriter

घर के भेड़िये

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मेरे ऑफिस में एक लड़की है 'चित्रा'। आज उसने अपने जीवन की ऐसी घटना, ऐसा जीवंत और डरा देने वाला सच साझा किया जो जितना दर्दनाक है उतना ही भयानक भी है। पर कहीं एक उम्मीद देता है हमको..उम्मीद क्या है आइये जानते है "खुद चित्रा" के शब्दों में-

 

मैं हूँ "चित्रा"। बात उन दिनों की है जब मैं नौवीं में पढ़ा करती थी। बाकी बच्चों की तरह मेरी भी दुनिया बस किताबों और खिलौनों के चारों ओर घूमती थी।क्या रवानगी लिए हुए था वो भोला सा बचपन। हमारे घर में मेरे माता-पिता और दो बड़े भाई थे और थी मेरी छोटी बहन "गुड्डू"जो मुझसे 2 साल छोटी थी। तो ये था हमारा कुल 6 लोगों का छोटा परिवार।

 


पिता जी का सब्ज़ी का काम था। वो मंडी से सब्ज़ियां ला कर बाज़ार में बेचते थे।जिससे कि घर का गुज़ारा चलता था। बहुत मेहनत करते हैं ना ये पापा लोग। लेकिन इनकी मेहनत और प्यार छिप जाता है क्योंकि ये कुछ कहते नहीं। पर जब कभी किसी लड़की की डोली उठती है तो मैंने इस पिता नाम के प्राणी को माँ से ज़्यादा रोते हुए देखा है। जो सैलाब दबाए हुए रहते है ये वो फटता है ज्वालामुखी बन कर। ऐसे महान होते हैं पिता।
हमारे भी पापा ऐसे ही थे। हम दोनों बहनों को इतना लाड-प्यार से रखते थे चाहे भैया लोगों की धुलाई करनी पड़ जाए पर हमसे कभी गुस्सा नहीं होते थे।

 


उन दिनों पापा 'शम्भू' को घर ले आए थे। 'शम्भू' एक बिना माँ-बाप का लड़का था जो होगा करीब 18 साल का। पापा ने उसको काम पर रख लिया था। वो सुबह पापा के साथ मंडी जाता और उनकी सहायता करता बोरे भरवाने में। बाज़ार भी जाता और पापा के साथ ही रात को घर आता। उसका कोई नहीं था इसीलिए पापा ने उसके रहने और खाने का इंतज़ाम हमारे घर में ही कर दिया था। अब वो हमारे साथ ही रहता और यकीन मानिए करीब एक महीने में ही वो हम सबसे इतना घुल-मिल गया था के अब वो हमारे घर का ही सदस्य सा बन गया था। माँ उसको अपने छोटे भाई की तरह मानती थी। वो था भी उम्र में मेरे सगे भाइयों से बड़ा तो हम सब भाई बहन उसको 'शम्भू मामा' कह कर ही बुलाते थे।
समय बीता दसवीं के बाद मैं दो साल के लिए बुआ जी के यहाँ रहने चली गयी थी छुट्टियों में। बुआ जी के कहने पर मैंने 2 साल वहीँ रह कर बारहवीं तक की पढाई की। इस बीच छुट्टियों के दौरान मेरा घर आना-जाना लगा रहा।

 


बारहवीं के बाद मैं वापिस अपने घर आ गयी थी और मैंने ग्रेजुएशन के लिए कॉलेज में एडमिशन ले लिया था। पर कॉलेज भी दूर था तो मैं बुआ जी के यहाँ ही रुक जाया करती थी क्योंकि उनके घर से मेरा कॉलेज पास पड़ता था।

 

मैं जब भी अपने घर आती मैं देख रही थी मेरी छोटी बहन गुड्डू पिछले कुछ दिनों से बहुत परेशान है। हमेशा उदास रहती है। मेरे लाख पूछने पर भी उसने अपनी उदासी की वजह नहीं बताई। बहुत पूछा मैंने -
"क्या किसी लड़के का चक्कर है या कोई और बात है तो बताओ?"
"नहीं दीदी कुछ नहीं बस तबियत खराब रहती है।"

 


लेकिन बात कुछ और थी जो वो छिपा रही थी पर वो बात क्या थी ये मैं समझ नहीं पा रही थी।

 


उस रात जब मैं घर आई और उसके साथ ही सो रही थी तो रात में मुझे किसी के सुबकने की आवाज़ आई। मैं जाग कर उठ बैठी। गुड़िया फफक के रो रही थी।
"क्या हुआ गुड्डू...क्या हुआ बोल?"
मेरी चिंता बढ़ गयी थी।
"दीदी..." वो आगे कुछ ना बोल पाई जैसे उसका गला बंद हो गया हो। कुछ कहना चाह रही थी पगली अपनी दीदी से जिससे उसने आज तक सब शेयर किया था।
आखिरकार फुट पड़ी वो मासूम..मेरी गुड्डू।
"दीदी शम्भू मामा...."
"क्या हुआ शम्भू मामा को...बोल?"
"दीदी मामा ने मेरे साथ...."
इतना कह कर वो मुझसे लिपट गयी और फूट-फूट कर रोने लगी।
मेरे पैरों तले की ज़मीन खिसक गयी।
मैंने गुड्डू को चुप कराया उसको दिलासा दिया के सब ठीक हो जाएगा।

 


जब वो संभल गयी तो उसने बताना शुरू किया पिछले कई महीनों से शम्भू मामा उस पर नज़र रखते हैं। एक बार राहुल से जो की गुड्डू का क्लासमेट है उससे बात करते हुए शम्भू मामा ने देख लिया था। तबसे ही वो उसको अजीब नज़रों से देखते हैं। कैसे वो रात में सबके सो जाने पर वो उसके कमरे में घुस आते हैं और वो सब करते हैं जिसको बताना रिश्ते के परखच्चे उड़ाना कहा जा सकता है।

 


कैसे मामा ने एक रोज़ कोल्ड ड्रिंक में कुछ मिला कर गुड्डू को पिलाया था जब घर में कोई नहीं था। फिर कैसे उन्होंने गुड्डू की बेहोशी का फायदा उठा कर उसके साथ दुष्कर्म किया था। कैसे उसकी वीडियो बना ली थी मोबाइल से और तबसे ले कर आज तक वो गुड्डू का यूज़ कर रहे थे उसको डरा कर.... के अगर किसी को बताया तो वो राहुल के बारे में सबको बता देंगे और उसकी वीडियो भी इंटरनेट पर डाल देंगे। वो सब बताया मुझे गुड्डू ने। मैं हर पल के साथ तार-तार हुई जा रही थी। मेरी मासूम सी गुड्डू कितना कुछ झेल रही थी। मैं किसी भी हालत में अब उसकी ऐसी हालत करने वाले इंसान को सज़ा देने का सोचने लगी।

 


मैंने माँ को सब कुछ बताने का सोचा। फिर लगा कहीं एक दम से बवाल होने पर वो दरिंदा घर से भाग ना जाए और हम उसको सज़ा ना दिलवा पाएं। ये भी हो सकता है वो खुद को बचाने का रास्ता खोज ले। अब हमें कोई ऐसा प्लान सोचना था के वो रंगे हाथों धरा जाए।

 


मैंने पापा और माँ को सब बता दिया। उनके भी होश उड़ गए। माँ ने बोला कि मामले बाहर गया तो बदनामी अपनी ही होगी। इस बात को दबा दो और शम्भू को निकाल दो नौकरी से।

 


पर मेरा और पापा का खून खौल रहा था। घर में माँ-पापा, गुड्डू और मैं ही थे क्योंकि दोनों भैया किसी शादी में गये हुए थे।
मैंने पापा को थाने ले जा कर इंस्पेक्टर को सारी घटना बता दी। उन्होंने हमारी पूरी मदद करने का भरोसा दिया। हमने थाने में ही एक योजना बनाई।

 


शाम को पापा ने सबके सामने ही शम्भू से कहा-
"शम्भू ... मैं, चित्रा और उसकी माँ अभी शिवपुर वाले महेशजी के यहाँ जा रहे है शाम को किसी काम से। कल सुबह आएँगे। आज एक काम करना गुड्डू घर में अकेली होगी। तुम रात को बाजार से जल्दी आ जाना माल बेच कर और घर का ध्यान रखना।" फिर शाम को शम्भू बाजार चला गया माल बेचने।

 


प्लान के अनुसार पापा मम्मी कहीं चले गए और उनके साथ चली गयी गुड्डू भी। जैसी योजना थी। हमने बिजली मेन कनेक्शन से काट दी। और मैं गुड्डू के बिस्तर में जा कर सो गयी। करीब 10 बजे वो शैतान आया। अँधेरा तो था ही.....वो सीधा मेरे कमरे में आ गया और मेरे बिस्तर पर मेरे बगल में ही लेट गया। उसके मुंह से शराब की बू आ रही थी। मैं जागी हुई थी और मैं अब समझ सकती थी कि गुड्डू पर ऐसी हालत में क्या बीतती होगी। नशे में धुत्त वो अजीब सी गंध जैसे अभी उलटी गिर पड़ेगी। अब मैंने महसूस किये उस भेड़िये के हाथ मेरे हाथ को स्पर्श करते हुए मेरी छाती तक बढ़ रहे थे। गुड्डू का रोता चेहरा मेरी आँखों के आगे घूमने लगा। मैं उठ बैठी। जैसा मुझे अंदेशा था वही किया उसने। मुझे गुड्डू समझ बैठा था वो दरिंदा। मैंने नीचे पड़ी चप्पल उठा कर उसके मुंह पे दे दना-दन मारना शुरू किया। वो शैतान होश में नहीं था। लेकिन जैसे ही चप्पलें पड़ने लगी उसके मुंह पर वो होश में आ गया और पहचान गया के ये गुड्डू नहीं चित्रा है। वो भागने लगा। पर भाग कर जाता कहाँ। बाहर घर के गेट पर ही पापा 4 पुलिस वालों के साथ खड़े थे। सबनें मिल कर उसकी ऐसी धुलाई करी के वो सात जन्मों तक याद रखेगा।

 

अगर हिम्मत ना करते उसको ऐसे ही जाने देते तो क्या होता। शायद गुड्डू मेरे पास ना होती। शायद वो ख़त्म कर लेती खुद को और वो भेड़िया... वो निकल पड़ता अपने अगले शिकार पर। बोटी नोंचने किसी और गुड्डू की। आज उस बात को 10 साल हो गए हैं। आज भी वो भेड़िया जेल में सड़ रहा है।

 

भेड़िये सिर्फ जानवर नहीं आज प्रयाय बन चुके हैं एक मानसिकता का... जो बोटी नोंचने के लिए तत्पर दिखाई पड़ती है। पर सोचना हमें है के हम इन भेड़ियों के आगे लाचार हो जाते है, सामजिक बदनामी के डर से इनको बोटी नोंचने देते हैं .. या डट कर इन भेड़ियों का सामना करते है। ये भेड़िये आपके मेरे हम सबके घरों में दफ्तरों में कहीं भी मिल सकते है। हमें पहचानना है इन घर के भेड़ियों को। बिना डरे ....एक हिम्मत के साथ।।


******समाप्त****

#stopsexualabuse


लेखक परिचय
नाम-मुकेश जोशी
जन्म-10/06/1990 (दिल्ली)
व्यवसाय-शिक्षक
Email- thedreamstown@rediffmail.com
Facebook-JoshiMukesh1010



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