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एक सच्ची घटना- बिना शीर्षक की एक आपबीती

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anonymous dawriter by  
Anonymous

एक सच्ची घटना

मैं कविता दो बेटी और एक बेटे की माँ। मेरा वैवाहिक जीवन भी अच्छा चल रहा हैं। मेरी तीनों संताने बड़ी हो रही हैं और मेरी चिंताए भी। हर माँ की तरह ही मैं भी अपने बच्चों की हर पल सुरक्षा का ध्यान रखती हूं। जब से मेरी बेटियां बड़ी हो रही हैं तब से एक ही डर सताए जा रहा है कि कहीं जो मेरे साथ हुआ वो इनके साथ ना हो। आज भी सहम जाती हूँ उस हादसे को याद करके मैं।

मैं शायद 5 या 6 साल की होऊँगी अच्छे से उम्र याद नहीं। बहुत चंचल नटखट थी मैं। खेलना ही पसंद था सारा दिन घर में कोई मेरी हमउम्र का नहीं था ना ही कोइ भाई या बहन। तो आस पड़ोस के बच्चों के साथ खेलती थीं। पहले जमाने में आस-पड़ोस से इतना विश्वास होता था कि सारा दिन भी बच्चे किसी के घर रहते तो चिंता नहीं होती थी। इसी तरह मेरी माँ की एक सहेली थी जो हमारे घर से तीन गली आगे रहती थी। उनके दो बेटे थे मुझसे 2/4 साल बड़े। वो आंटी बहुत बार हमारे घर आती थी में उनके बेटो के साथ खेलती थी। एकदम भाई-बहन जैसे रहते थे। कभी मैं उनके घर जाती तो कभी वो मेरे घर।

एक दिन माँ और आंटी को कहीं जाना था तो माँ ने मुझे उन आँटी के घर ये कहते हुवे छोड़ दिया कि शाम को ले जाएगी। उस दिन अंकल घर पर थे शायद रविवार होगा उन्होंने अपने दोनों बच्चों को किसी काम से भेज दिया और मुझे रोक लिया। फिर उन्होंने अंदर से दरवाजा बंद कर दिया और मुझे गोद में बैठा लिया और जिस तरह से छुआ मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा फिर वो चॉकलेट लाये और कहा मैं कहूं वो करोगी तो ही सारी चॉकलेट मिलेगी।

चॉकलेट के लालच में मैने हाँ कर दी। फिर उन्होंने मुझे लेटा दिया मेरे कपड़े ऊपर किये मेरे मुँह को एक तरफ किया। फिर जो किया मेरी समझ से परे था पर दर्द बहुत होरहा था। और वो अंकल बस होगया मेरी अच्छी गुड़िया जैसी मीठी मीठी बाते कर रहे थे। फिर मुझे कपड़े पहनाए और सारी चॉकलेट दी और कहा किसी को कहना मत वरना इतनी सारी चॉकलेट नहीं मिलेगी कभी। मैने भी चॉकलेट के लालच में किसी को कुछ नही कहा सोचा मम्मी खाने नहीं देगी चॉकलेट। गलत किया उस वक़्त मैने अपनी माँ से बात छुपा कर बहुत गलत।

फिर कुछ दिन तक नहीं गयी आँटी के घर भूल भी गयी क्या हुआ क्या नहीं। फिर एक दिन मम्मी ने कुछ सामान लाने आँटी के घर भेजा। उस दिन भी अंकल ही थे अकेले घर पर उन्होंने अंदर बुलाया और दरवाजा बंद किया। और वही सब दुबारा हुआ मेरे साथ। अब मुझे उस घर जाने से भी डर लगता था। याद भी नहीं के कितनी बार उस राक्षस ने मेरे साथ ऐसा किया होगा।

मुझे तो पता भी नहीं था कि क्या हो रहा था मेरे साथ। बस इतना पता था कुछ गलत था गन्दा सा था दर्द भी था। और किसी को बताने की हिम्मत भी नहीं थी। बताती भी तो क्या क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था कि मेरे साथ बहुत गलत हुआ था। फिर कुछ महीनों बाद उस अंकल का दूसरे शहर ट्रांसफर होगा सब चले गए। बात पुरानी धुंधली सी होगयीं थी।

जब समझ आयी तो जाना मेरे साथ उस हैवान ने अपनी हवस पूरी की थी मेरा एक बार नहीं कई बार बलात्कार हुआ था। बहुत रोई मैं नफरत हो गयी थी खुद से वो सारी धुंधली याद साफ -साफ दिखाई दे रही थी। कुछ अच्छा नही लगता था सबकुछ उदासीन सा था। सोचती क्यों किया उसने मेरे साथ ऐसा। क्या बिगाड़ा था मैंने उसका। बहुत गुस्सा आता था उस हैवान पर भी और खुद पर भी। 

कई बार सोचा माँ को बता दू। लेकिन हिम्मत ही नहीं हुई और होगा भी क्या अब बता के वो हैवान कहां है अब कुछ ना पता था। मुझे ही दोषी समझेगे। मुझे ही चुप करा दिया जाएगा समाज के डर से। यह सब सोच मेरी हिम्मत ही नहीं होती। बस खुद से नफरत सी हो गयी थी खुद को गंदा मानती थी। बस जी रही थी अंदर ही अंदर घुट रही थी किसी को कुछ नहीं बता पा रही थी। भूलने की कोशिश भी करती लेकिन याद आ ही जाता सब और सहम सी जाती।

फिर कुछ साल बाद दीपक मेरी जिंदगी में आये। उन्हें मुझसे प्यार हो गया था। लेकिन मैं तो खुद को अपवित्र समझती थी किसी के लायक नहीं समझती थी खुद को। कौन प्यार करेगा मुझसे मेरा अतीत जान कर। लेकिन शायद दीपक मुझसे सच्चा प्यार करते थे मुझे समझते भी थे और सिर्फ मुझसे ही शादी करेंगे ऐसा कहते थे।

दीपक एक बहुत अच्छे और सुलझे इंसान थे। लेकिन मैं तो खुद को किसी के भी लायक नहीं समझती थी दीपक जैसे अच्छे और सच्चे लड़के के तो बिल्कुल नहीं। लेकिन दीपक नहीं माने हर रोज कोशिश करते मुझे मनाने की मेरे ना कहने की वजह भी पूछते। बहुत जिद के बाद एक दिन मैने ना जाने कैसे वजह बता दी। रोते जा रही थी अपनी आपबीती बताते हुवे। 

जैसे ही खत्म की दीपक ने गले से लगाया और कहा रो ले आज जी भर के कितना कुछ अपने अंदर दबा के रखा है इतने सालों तक। आज आखिरी बार उस हादसे को याद कर रो लो लेकिन आज के बाद कभी नही। और मैं फिर बहुत रोई उस दिन दीपक के सामने। फिर जैसे ही शांत हुई मानो एक तूफान सा आया जो थम गया बरसो पुराने दर्द में मरहम सा लगा हो।

कुछ देर की शांति के बाद दीपक ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे समझाया कि जो कुछ भी हुआ उसमे तुम्हारी कोई गलती नहीं है खुद को दोषी मत समझो। खुद को इस तरह सजा मत दो तुम। सारा दोष उस गलत इंसान का था उसकी गंदी सोच का था। उसने गलत काम किया तुम्हारे साथ गलत वो है। वो एक घटिया सोच का घटिया व्यक्ति था। 

तुम्हारी कोई गलती नहीं थी खुद को दोष मत दो। रही बात तुम्हारी पवित्रता की तो तुम मेरे लिए आत्मा से पवित्र हो। तुम तन से ही नहीं मन से भी पवित्र हो। और में तुमसे बहुत प्यार करता हूं। आज के बाद कभी उस हादसे को याद नहीं करोगी ना खुद को आज में जीने से रोकोगी। अपने बुरे अतीत से बाहर निकलो कविता एक बहुत बुरा सपना समझ भूल जाओ सब। मानता हूँ आसान नही लेकिन तुम्हारा कोई दोष नहीं है इसमें। जिंदगी बहुत खूबसूरत हैं इसे खुल के जिओ। दूसरे की गलतीं की सजा खुद को ना दो।

दीपक की इन सारी बातों से मुझे एक अलग ही आत्मविश्वास मिला। सालो से अंदर बसे अतीत से दीपक ने मुझे बाहर निकाल दिया था। उससे शादी करके जैसे एक नया जीवन मिला। तीन बच्चों की माँ बनी। दीपक ने बहुत प्यार और सम्मान दिया मुझे।लेकिन जैसे ही आज के  समाज के हालात देखती हूं। अखबारों में पड़ती हूँ तो सहम जाती हूँ कि कही मेरे बच्चों के साथ ऐसा कुछ ना हो। उन तक कोई बुरा साया भी नहीं आने देना चाहती मैं।

हाँ मैं कुछ ज्यादा ही अपने बच्चों पर नजर रखती हूं उन्हें समय -समय पर गलत सही के बारे में बताती रहती हूं। कहती हूं चाहे कुछ हो जाये मुझे सब बात बताये मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं। हां मैं खुद को एक असुरक्षित भावना में महसूस करती हूं लेकिन क्या करूँ कई साल गुजारे हैं मैने उस दर्द में। माना गलत सोच उसकी थी सारी गलती भी उसी की थी। लेकिन जो चोट उसने मुझे दी उसका कोई मरहम नहीं है। और ना ही मन की वो चोट कभी ठीक होगी।

सब अभिवावकों से बस इतना अनुरोध है अपने बच्चों को कभी भी किसी के भरोसे ना छोड़े चाहे वो कितना ही भरोसेमंद क्यों ना हो। अपने बच्चों को समय समय पर गलत -सही के बारे में बताते रहे। अच्छे बुरे छुअन के बारे में भी। और उनकी हर बात सुन समझे और उनका साथ दे।

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