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@dawriter

आज की सीता

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सिया, उधर से नहीं, उधर..वो.. खड़े होंगे...रश्मि की आँखों मे खौफ उतर आया था।
कौन खड़े होंगें ? तू इतना डर क्यों रही है। चल मेरे साथ, सिया ने रश्मि का हाथ पकड़ा और चल दी।
रश्मि इस तरह चल रही थी जैसे बदन में जान ही ना हो। आखिर वही हुआ। जिसका रश्मि को डर था।
कोने की प्रेस वाले की गुमटी पर मजमा लगा था मजनुओं का।
रश्मि के पैर जैसे सौ सौ मन के हो गए हो।
वो चल नहीं रही थी, सिया उसे खिंचती हुई ले जा रही थी।
दोनों गुमटी तक पहुँचती उसके पहले ही एक मजनूं ने दूसरे को टहोक कर आँखों ही आँखों मे रश्मि ओर सिया की तरफ इशारा किया।
दोनों की आँखों मे चमक उभरी।
कहाँ चली फुलझड़ी, एक ने तुरन्त आवाज़ मारी।
सिया चुइंगम चबाती हुई अपनी ही रौ में रश्मि का हाथ थामे बेपरवाही से आगे बढ़ती रही।
अपने सवाल के जवाब में ऐसी धृष्टता की उम्मीद नहीं थी उन्हें।
उन्हें तो खौफ से कांपती रश्मि की आदत थी।
इस तरह की बेरुखी से उनका पुरुषवादी अहम उभर आया।
एक ने लपक कर रश्मि का हाथ थामना ही चाहा था कि जैसे बिजली सी चमकी हो।
अब तक की लापरवाह सिया अचानक वो हरकत कर चुकी थी, जिसकी उम्मीद उन लौंडों को थी नहीं।
अब दूसरा सिया को मजा चखाने के लिए आगे बढ़ा मगर वो ये नहीं जानता था कि हश्र तो उसका भी वही होना था जो पहले का हुआ।
सो उसने अपनी वीरता प्रदर्शित करने सिया की तरफ कदम बढ़ाए ओर अगले ही पल सिया उसे गिरा उसकी छाती पर सवार थी।
उसके बाद सिया रुकी नहीं। साक्षात चंडी ही उस पर सवार हो गई ऐसा लगने लगा था।

दोनों मजनूं धूल चाटने के बाद अपने टूटे फूटे अंगों को समेट भागने की जुगत में जुटे ही थे कि अब तक जो भीड़ ये मजमा देखने जुटी थी, उन्हीं में से कुछ लोग हाथ साफ करने जुट गए। कुछ लोग वीडियोग्राफी में।

अब तक थर थर कांपती रश्मि भी जोश में आ चुकी थी।
उसने भी अपनी चप्पल उतारी ओर लफंगों की तब तक पिटाई करती रही, जब तक के उसके अंदर की बेबसी और लाचारी अश्रुओं की शक्ल में ना बहने लगी।
अब जाकर रश्मि का खौफ निकला था।

सिया ने एक बार फिर रश्मि का हाथ थामा ओर भीड़ को चीर अपना रास्ता बनाती हुई इस अंदाज से निकली जैसे कह रही हो आज की सिया, इन रावणों का मुकाबला करना बेहतर ढंग से जानती हो।


फिर कोई रावण आज की सिया पर नज़र भी डालने से पहले सौ बार सोचेगा -"कहीं सिया उसकी आँखें नोच उनसे कंचो की तरह न खेलने लगे।

#EnoughIsEnough

Image Source: sajha



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