0
Share




@dawriter

82 kg एक सच्ची प्रेम कहानी (2)

0 723       

अब तक आपने पढ़ा. न्यूज़ पेपर में कैप्टन अभिषेक की वीरता व सम्मान की खबर पढ़ कर दर्शना जैसे पागल सी हो उठी, और अभि के उस प्रेम के विषय में जो , बचपन की दोस्ती की सीमाएं लांघ ,यौवन की उठान तक पहुँचा ही था कि, समाज के डर से ,दर्शना और अभि बिछड़ जाते हैं. अब उसी अपने बिछड़े प्रेमी से मिलने के लिए अधीरता के चरम पर पहुँच चुका था उसका प्रेम.

आपने पढ़ा कि दर्शना अभि से मिलने की तमाम कोशिशें करती है मगर सुबह से रात होने को होती है और वो लाख कोशिशों के बावजूद अभि तक पहुंच नही पाती है...और अंत मे एक छोटी सी चिट में लिखती है  Proud of you सिर्फ तुम्हारी -82 kg  होटल रिसेप्शन वाली लड़की उस सम्बोधन को पढ़कर चौंक जाती है कि, "82 kg ? भला ये कैसा नाम है ?" खैर वो मुस्कुराती है और दर्शना को बोलती है 

"मैम आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें मैं ये सन्देश कैप्टन अभिषेक रंजन तक भिजवाती हूं."

दर्शना 'हां ' में सिर हिला कर बेचैनी से एक ओर बैठ जाती है .और सोचती है थोड़ी प्रतीक्षा ? फिर मन ही मन मुस्कुराती है कि, इसे क्या पता कि मेरी प्रतीक्षा कितनी लम्बी चली. अतीत से लेकर आने वाले लम्हों की कल्पित भूमिका बनाती दर्शना सोचने लगी यदि अभि ने बुलाया तो क्या बोलेगी वह ? किस तरह मिलेगी उससे, गले लग जायेगी या फिर औपचारिक रूप में सिर्फ एक आगन्तुक की भांति मिलेगा उससे अभि ?

थोड़ी ही देर में उसने देखा कोई अपनी ओर आता दिखा ...ये क्या ये तो स्वयं अभिषेक था. दर्शना के पांव कांपने लगे, होंठ कम्पन करने लगे ,समूचे शरीर में जैसे थरथराहट सी होने लगी. ओह्ह वो सुखद पल आ ही गया. एक पल को लगा ये स्वप्न है और दर्शना अचेत होकर गिर पड़ी.

आंख खुली तो दर्शना ने खुद को एक कमरे में पाया . सामने अभि और एक नर्स बैठी हुई थी.उसके होश में आते ही ...अभि हड़बड़ा कर खड़ा हो गया और बेड के नजदीक आ गया और बोला ," कैसी हो तुम दर्शना ? " "मैं ठीक हूं ...पर मैं बेहोश कैसे हो गयी थी ? "  "आप कमजोरी के कारण बेहोश हो गयी थी और ब्लड प्रेशर कम भी है आइये मैं एक बार और ब्लड प्रेशर चेक कर लूं ." कहकर नर्स ने उसका ब्लड प्रेशर चेक करने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी..औपचारिकताएं पूरी कर नर्स ने विदा ली . अब कमरे में रह गए अभिषेक और दर्शना. दोनों एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे मानों आज के बाद ये समय दोबारा नही आएगा. आंखों में आंसू और होंठों पर मुस्कुराहट .. न जाने कितनी बातें थी करने को और न जाने कितने दर्द थे बांटने को.  दर्शना- " तो पहचान ही लिया तुमने मुझे कैप्टन अभिषेक रंजन ...!  अभि- " हां, और क्या ! पहचानता कैसे नही आखिर 82kg इस दुनिया में एक तुम ही तो हो.

दर्शना- " सच कहा था तुमने कि, ढूँढोगी तुम मुझे . बहुत ढूंढा ,पर मिले ही नही तुम !  अभि- " कैसे नही मिला ? देखो खड़ा हूँ तुम्हारे सामने आज भी तुम्हारे लिए ..जहां तुमने मुझे छोड़ा था मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ. "  दर्शना का दिल जोरों से धड़कने लगा ..ये क्या कह रहा है अभि ? क्या वह भी आज तक अकेला है उसकी ही तरह ..? क्या उसने भी शादी नही की ? हज़ारो सवाल कौंध गए उसके जेहन में . पर वो कुछ बोल नही सकी ,खोई रही उधेड़बुन में.. अभि - "क्या हुआ क्या सोच रही हो ? यही कि ,कहीं मेरी शादी तो नही हुई ? है ना ?  दर्शना- " हां , तो क्या तुमने शादी नही की अब तक ?" 

अभि- "नही दर्शना , मैंने तुमसे प्यार किया था ..किसी और के लिए मेरी जिंदगी में कोई एहमियत नही ..पर तुम ? तुमने कैसे बचाया खुद को ? तुम्हारी शादी के लिए आफत नही मचाई गयी ? मुझे तो यही लगता था कि, तुम्हारे पिताजी ने शादी कर दी होगी तुम्हारी ! दर्शना- " हाँ कोशिश तो बहुत की...पर उस वक़्त मैंने पढ़ाई का हवाला देकर उन्हें रोक दिया .कुछ समय बाद पिताजी का देहांत हो गया .और मेरी सरकारी नौकरी लग गयी.

फिर सारे घर की जिम्मेदारी मुझपर आ गयी.सब की पढ़ाई लिखाई ,शादी ब्याह करते कराते , मैं खुद के विषय मे जैसे भूल ही गयी थी. " मगर जब सब अपनी अपनी दुनिया मे मस्त हो गए तब मुझे तुम्हारी कमी खलने लगी और मैंने तुम्हें कई जगह ढूढा, तुम्हारे पुराने पते पर ...तुम्हारे नानी के घर वाले पते पर भी मैंने एक दो खत डाले पर कोई जवाब नही आया.फिर एक दिन न्यूजपेपर में तुम्हारी फ़ोटो देखी और तुम्हारा नाम अभिषेक रँजन भी. मैं तो बस खुशी से पागल हो गयी और बस चली आयी तुमसे मिलने. और देखो न दिन भर से तुम्हे मिलने की कोशिश के कारण न कुछ खाया न पिया ...शाम हो गयी थी ..मुझे तो लगा था कि, तुम अपनी 82 kg को भूल ही गए होंगे .पर यकीन मानो जब तुम आते हुए दिखे तो,मैं सुध बुध खोकर गिर पड़ी. ये खुशी बर्दाश्त ही नही हो सकी मुझसे. "  

जाने क्या क्या बोलती गयी दर्शना और आंखों में आंसू भरे उसको देखता रहा अभिषेक. वही दर्शना खड़ी हो कर रोने लगी और अभिषेक उसको पकड़ कर भावावेश में बोलने लगा "बस बस मेरी दरशु.तुम इतना कुछ झेल गयी और मैं उस कठिन वक़्त में तुम्हारे साथ न था ..धिक्कार है मेरे प्यार को ..जो मैं उस कठिन समय पर तुम्हारे कदम से कदम मिलाकर न चल सका. तुम्हारा साथ न दे सका. तुम्हारा लेटर मिलने के बाद मैं जैसे डर ही गया था कि, कहीं मेरी वजह से तुम्हे कुछ न हो जाये..! भटकता रहा काफी दिनों तक ,कभी दिल्ली, कभी चंडीगढ़.पढ़ाई पूरी करी और सेना का फार्म भर दिया सोचा ,प्यार तो मिल नही सका, अब मेरी जिंदगी व्यर्थ गंवाने से बेहतर होगा मैं इसे देश की सेवा करने में लगा दूँ .कम से कम मिट्टी का कर्ज तो चुका सकूं.मन मे केवल एक ही उम्मीद थी कि, काश जिंदगी के किसी मोड पर ,कभी तुम मुझे मिल जाओ और मैं तुम्हे खींच के अपने गले लगा लूं.

ऐसा नही है कि, तुमसे भागने की कोशिश नही की.बहुत बार की ..पर किसी और लड़की के करीब आते ही मुझे उसमे तुम दिखाई देने लगती थी. और हर बार मेरी कोशिश फेल हो जाती थी. खुद को बिगाड़ने की कोशिश भी की .पर हर बार तुम मुझे उस दलदल से निकाल लेती. मैं चाहकर भी कभी तुमसे प्यार करना नही छोड़ पाया. इसीलिए किसी दूसरी लड़की की जिंदगी नही बर्बाद की...उससे शादी करके. क्योंकि मुझे पता था कि, जब तुम लौट कर आओगी तो क्या कहूंगा तुमसे ? कि सॉरी दरशु मैं बिना शादी किये रह नही सका. " बस इसलिए आज तक तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था मुझे पता था कि, तुम जरूर आओगी ..और देखो तुम आ गयी ! "  अभि की बातें सुनती दर्शना खुद को रोक नही सकी और उसके सीने से लग गयी ..." हां मैं आ गयी अभि ! और अब कभी तुम्हे छोड़ कर नही जाउंगी , मैं तुम्हारे बिना नही जी सकती ..बहुत तड़प चुके हम ..अब बस और नही."  "हाँ दरशु ,तुम तो मेरी जिंदगी हो ,मेरी खुशियां हो..वो सब कुछ जो इंसान जिंदा होने पर महसूस करता है वो बस मुझे तुम्हारे साथ महसूस होता है.   और यूँ ही तमाम गिले शिकवे मिटाते ,रात कब गुज़र गयी ,कुछ पता ही न चला .सुबह की चिड़ियों की चहचहाहट से उन दोनों को पता चला कि, रात अब ढल चुकी है और एक नए सवेरे की शुरुआत हो चुकी है.

अभिषेक और दर्शना के इस अनोखे प्रेम और उन दोनों के इस अद्भुत मिलन पर मानों आज आसमान भी खुशी से फूलों की वर्षा कर रहा हो.दूर कहीं जैसे ईश्वर भी उनकी इस बहुप्रतीक्षित खुशी का स्वागत करने हेतु...खुद आसमान से मुस्कुराहट की किरणें चारों ओर बिखेर चुके हों.

****************************

82 kg एक सच्ची प्रेम कहानी (1)



Vote Add to library

COMMENT