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@dawriter

82 kg एक सच्ची प्रेम कहानी (1)

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आज न्यूज़पेपर में एक खबर पर ठहर गयी दर्शना की निगाहें. "पुलवामा में आतंकियो के मंसूबों पर पानी फेरने वाले भारतीय सेना के कैप्टन अभिषेक रंजन का सम्मान. राजकीय सम्मान के साथ पुरस्कृत होंगे स्वतंत्रता दिवस पर.

खबर निश्चय ही अच्छी थी.वो अभिषेक की वर्दी वाली फाइल फोटो देख ,उसे थोड़ा नज़दीक उठा कर पहचानने लगी. इस खबर से उसकी पलकें भीग सी गयीं ..और अपनी आंखें पोंछ कर उसे पहचानने की कोशिश करने लगी. इतने दिनों की खोज आखिर आज सफल हुई. खुशी से चेहरे को देख तो पहचान गयी दर्शना उसे..और सोचा आज भी वैसा ही है ये तो. वो सोचने लगी कि, अभि ने अपना वादा तो पूरा किया .और वो भी इस चेलेंज के साथ..कि, " एक दिन तुम्हारी आँखों मे मेरे लिए खुशी के आंसू होंगे ..!" और इतने वर्षों बाद पहचान ही लिया दर्शना ने अपने अभि को. और अतीत की गलियों में खो गयी.

अभिषेक : 82 kg ! कैसी है तू ? रोल किये हुए पेपर से सिर पे चपत लगाते हुए ..अभिषेक ने दर्शना को छेड़ते हुए कहा.

दर्शना : "क्या 82 kg, 82 kg बोलते हो तुम अभि. देख लेना एक दिन सच में हो जाउंगी मैं 82 kg की..तब पछताओगे. मैंने सुना है कि, दिन में एक बार सरस्वती बैठती हैं मुँह में, जो बोलो सच भी हो सकता है.  अभिषेक हंसते हुए...तो क्या हुआ! हो जाओ ,मोटू हो कर भी तुम मुझे इतनी ही प्यारी लगोगी.

ये सुनकर दर्शना गुस्से से लाल पीली होती और रोल पेपर छीन कर अभिषेक की पिटाई करने लगती.अभिषेक उसे चिढ़ाता और दर्शना तिलमिलाती.कभी झगड़ती..फिर

दोनो खिलखिला कर हंस पड़ते. दर्शना को याद आ गया .अभि और उसका अनकहा प्यार. कितना प्यारा रिश्ता था दोनो का.समाज के गंदे दृष्टिकोण से परे.उसे याद है जब अभि उसके लिए तैयार होकर आता और दर्शना उसकी खिल्ली उड़ा देती.मुँह बना कर अभि रह जाता और दर्शना उसके लटके मुँह को देख दिन भर उसकी हंसी उड़ाती. वे अपनी पढ़ाई पूरी करते, कभी प्रयोगशाला तो कभी पुस्तकालय.कभी एक्स्ट्रा क्लास तो कभी प्रोजेक्ट. उनका 11th पूरा हो गया था. दर्शना और अभि ने कभी एक दूसरे का हाथ तक स्पर्श न किया था. केवल हंसी मजाक, अपनत्व और चुहलबाजी.. छात्र जीवन में सबसे खूबसूरत हिस्सा होती है ये जीवनशैली. दोस्ती और सिर्फ दोस्ती.

दरअसल दर्शना को कभी प्रेम का स्वरूप मित्रता से परे दिख ही नही सका. उनके बीच का ये लगाव शारीरिक आकर्षण से अछूता रहा. किन्तु धीरे धीरे समय बीता.यौवन की दहलीज पर खड़े दोनो ही किशोरावस्था की समाप्ति के चरण पर थे...फलतः प्रेम के अंकुरण का आरम्भ हो चला था जिसकी आशंका दर्शना को सदैव रहती थी..और ये आशंका तब विश्वास की ओर बढ़ती जब उसकी सखियां उसे अभि के नाम से चिढ़ाने लगती. और उधर अभिषेक के मित्र भी उसके दर्शना के साथ के लगाव को "क्या सीन पहुँचा है, तेरी कहानी का" कहकर संबोधित करते, जो अभि को तनिक भी न सुहाता किन्तु अभि व दर्शना के बीच जो पनप रहा था वो प्रेम ही था.मगर अभिषेक कभी दर्शना से कुछ कह नही पाता था.

और कभी कह भी नही पाता अगर उस दिन लाइब्रेरी के बाहर रवीश ने दर्शना को रोक कर , उससे अपने प्यार का इज़हार न किया होता. अभि को बर्दाश्त ही नही हुआ था जब ..रवीश ने दर्शना से ,ये सब कहा ..दर्शना अवाक थी और अभिषेक गुस्साए स्वर में रवीश का कालर पकड़ उसे झिंझोड़ते हुए बोला था .." तेरी हिम्मत कैसे हुई..दर्शना से ये सब बोलने की.वो सिर्फ मेरी है...समझा तू !! " 

दर्शना को कुछ और सुनाई ही नही पड़ा था जैसे...केवल उसके कानो में ये शब्द ही गूंजते रहे..! 

"वो सिर्फ मेरी है..!!" " वो सिर्फ मेरी है...!!" दर्शना भागकर सीधे घर आयी.आज प्रेम के एहसास से पहली बार रूबरू हुयी थी वो , बेड पर लेट कर छत पर टंगे पंखे को देख , मुस्कुराती कभी शर्माती..! खुद को आईने में देखती तो फिर वो शब्द उसके कानों में गूंजते..." वो सिर्फ मेरी है...! ".....दर्शना का रोम रोम खुशी और रोमांच से भर उठा. शाम को अभि उससे मिलने घर आया..! आज पहली बार दर्शना को अभि से शर्म सी आ रही थी. कैसे सामना करेगी उसका..! माँ ने आवाज दी..और दर्शना उससे मिलने बरामदे में गयी..सोफे पर बैठे अभि को देख ,उसकी शर्म उसके गालों पर बिखर गयी.अभि ने उससे माफी मांगी और बहुत कुछ बोलने लगा ..किन्तु दर्शना ने मानो आज कुछ सुना ही नही. वो चुपचाप नीचे सिर किये देखती रही..तभी अभिषेक बोला 

: ओए 82 kg..! कहाँ खोई हुई हो ..? इतनी देर से क्या कुछ बोल रहा हूँ...सुनती ही नही कुछ .

: फिर से 82 kg बोला तूने !! जा मैं तुझसे कभी बात नही करूँगी.

और दोनो फिर खिलखिला कर हंस पड़े. समय का पहिया घूमता रहा.धीरे धीरे दोनो के इस प्रेम की खबर दर्शना के पिताजी को लगी. उस दिन दर्शना को खूब डाँट पड़ी.किसी ने भड़का दिया था पिताजी को.पिताजी कुछ सुनने को तैयार न थे. उन्होंने साफ साफ कह दिया था कि, दूर हो जा अभिषेक से वरना तुम दोनों को गोली मार कर दफना दूंगा. मेरी इज़्ज़त से खिलवाड़ करता है साला.

सब कुछ याद आने लगा दर्शना को कि कितना डर गई थी वो जब उसने पिताजी को कुछ लोगों से ये कहते सुना था कि "ठिकाने लगा दो उस अभिषेक के बच्चे को. "दर्शना किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठी. रातोरात ही अपनी सहेली अनुसूया के पास गयी और एक पत्र में सब कुछ लिख कर अभि को देने को बोलकर , घर की बाउंड्री लांघ कर वो चुपचाप चली आयी..ये तो अच्छा हुआ कि, पिताजी रात को ड्यूटी पर रहते..वरना उसकी टांगे ही तोड़ देते.

पत्र पढ़कर शायद अभिषेक का दिल भी दहल गया..क्योकि उन दिनों अंतरजातीय विवाह और वो भी प्रेम विवाह एक अपराध था..जिसे शायद कोई समझ नही सकता था..लड़के लड़की के बीच किसी रिश्ते की संभावना मात्र ही उन दोनों के लिए काल के समान हुआ करती थी.अभिषेक ने शायद दर्शना की जान बचाने के लिए उससे दूर हो जाना बेहतर समझा.

लेटर में केवल यही लिखा ... मेरी ,सिर्फ मेरी 82 kg ..

जा रहा हूं ....एक दिन आऊंगा... जब खुशी के आँसुओ में तुम मुझे पहचान नही पाओगी.

वादा है मुझे ढूँढोगी तुम.  सिर्फ तुम्हारा - अभि 

********

तब से आज तक दर्शना अकेली ही रही. पिताजी ने उसके विवाह के प्रयास किये किन्तु कहीं बात जमी नही. फिर अचानक उनका देहांत हो गया..और सभी भाई बहनों की जिम्मेदारी दर्शना के ऊपर ही आ गयी.इन सब के बीच दर्शना को खुद के बारे में सोचने का वक़्त ही न मिला. और अब जब 34 बसन्त देख लिए तो कोई उनकी कानों पर झांकती सफेदी के कारण..उसे प्राथमिकता नही देता. दर्शना अतीत से बाहर आ गयी.घड़ी देखा तो 11 बज रहे थे.आनन फानन में उसने तैयारी की और ऑफिस निकल गयी. रास्ते भर सोचती रही..कि दिल्ली जाना होगा और मिलना होगा अभिषेक से. और फिर अभी 15 अगस्त में काफी समय शेष था.

*****

कार्यक्रम में शामिल होने के लिए 15 अगस्त सुबह 7 : 10 पर पहुच गयी दर्शना दिल्ली ......और लालकिले स्थित तमाम सैन्य पदाधिकारियों के सम्मान व प्रदर्शन के स्थल पर पहुचने की कोशिश भी की. किन्तु उसने दूर से ही अभिषेक को सम्मानित होते देखा. गर्व, इस अवसर पर खुशी से उसकी आंखें छलक उठी.  दूर दूर से ही दर्शना ने इतने सालों बाद अभि को एकटक देखा . अजीब सी खुशी और तड़प के साथ. प्रेम की चरम उत्कंठा ,जब प्रिय आंखों के सामने हो किन्तु, आप उसकी दृष्टि में न हों. तब वो पाने और पहचान करवाने की तीव्र इच्छा ..अपने चरम पर होती है. उस तीव्र इच्छा से व्याकुल थी दर्शना ..आज इतने सालों बाद उसका प्यार उसकी आँखों के सामने जो था. तमाम आशंकाएं भी साथ थी..अभि ने शादी की या नही? उसे मैं याद आती थी या नही? 

कभी अल्हड़ किशोरी तो कभी लज्जा युक्त स्त्री..कभी विरहन तो कभी चिर एकल प्रेमिका ..बहुत से भावों से युक्त थी दर्शना आज. कार्यक्रम समाप्ति के बाद जब कैप्टन अभिषेक लौटने लगे ..तो दर्शना को लगा कि, किस तरह आवाज़ दे और अभिषेक को पुकार ले. इसके बाद गेट टूगेदर पार्टी में भी दर्शना ने अभिषेक से मिलने की कोशिश की...किन्तु सैकड़ो लोगों से घिरे अभिषेक से मिल नही सकी. हार कर उसने उस होटल का रुख किया,जिसमे अभिषेक समेत सभी सम्मानित गेस्ट रुके थे..रिसेप्शन पर उसने कैप्टन अभिषेक रंजन से मिलने के लिए जब आई कार्ड देने की बात हुयी तो असमंजस में पड़ गयी दर्शना. 

सोचने लगी कि ,क्या परिचय दूँ ..? क्या इतने सालों बाद अभि को मेरा नाम याद होगा? किस तरह और क्या लिखूं जिसे देख अभि को मेरा चेहरा याद आ जाये ..और फिर उसने कुछ क्षण सोच कर एक कोरे कागज पर लिख दिया. "Proud of you 💐

 ' from 

सिर्फ तुम्हारी -82 kg ''

(आगे क्या हुआ ये जाने ,कहानी के अगले भाग में )

82 kg एक सच्ची प्रेम कहानी (2)



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