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@dawriter

'वरना लक्ष्मी रूठ जाएंगी..'

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बात उन दिनों की है जब मेरी नई नई शादी हुई थी दरअसल मैं अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थी और मेरे पालन-पोषण में कभी भी किसी भी प्रकार की कृपणता ,मेरे परिवार जनों द्वारा नहीं की गई । जैसे कि हर माता-पिता अपने बच्चे के पालन पोषण में जी जान लगा देते हैं वैसे ही हुआ था मेरा भी पालन पोषण..... मैं जो भी इच्छा करती ...वो पूर्ण की जाती। मेरा पारिवारिक माहौल शिक्षित था स्वयं मेरी मां उस जमाने की उच्च शिक्षा प्राप्त एवं संस्कार शील महिला रही हैं..हालांकि वर्किंग नहीं थी ! मेरे पिता फैजाबाद विश्वविद्यालय के जाने वाले प्रोफ़ेसर थे कुल मिलाकर मेरे आसपास का पूरा परिवेश मार्डन सोच वाला था मेरे पिताजी धार्मिक आवश्यक है किंतु माता की सोच तनिक भी रुढिवादी न थी, मैं पढ़ाई में भी अच्छी रही। सदा कक्षा में प्रथम हीं आती किंतु ,इसके विपरीत मेरा ससुराल पक्ष बहुत ज्यादा रूढ़िवादी विचारधारा वाला था । सोच में काफी पिछड़े हुए ... लकीर के फकीर ...! मतलब बहुएं पर्दे में रहें, किसी वाद विवाद में उनकी आवाज सुनाई ना पड़े..! कभी घर की छत पर न जाए( कपड़े सुखाने भी) चाय नाश्ता तैयार करके मेहमानों को देने हेतु घर के पुरुष या नौकर इत्यादि ही ड्राइंग रूम में ले जाते थे ....! फिल्म देखने भी मैं एक बार गई थी पूरी तरीके से बहू के रूप में' गले तक घुंघट कर के( उसके बाद आज तक नहीं गई) मेरी सास की सोच इतनी अधिक प्रभुत्ववादी थी ....वह कम पढ़ी-लिखी नहीं थी किंतु उन का माहौल आधुनिक नहीं था। 

प्रारंभ में तो मुझे समझ नहीं आता था कि जो मुझसे हो गया है, उसमें मेरी गलती क्या थी? जैसे कभी 'चाकू का लोटे के साथ रख जाना' वह चिल्ला कर बोलती थी अरे! यह क्या कर दिया तुमने "एक दिन काम करते समय झाड़ू मेरे पैरों से छू गई तो उन्होंने कहा: अरे ऐसा मत करो! वरना लक्ष्मी रुष्ट हो जाती है कभी सिल बट्टा गलती से भी अलग होकर, गिर जाए' तो ,उनके हिसाब से मां से बेटे को अलग कर दिया मैंने...! लक्ष्मी रुष्ट हो जाएंगी। मैं बहुत ज्यादा परेशान थी कि कहां फंस गई हूं मैं? मेरे घर में मैंने कभी यह सब बातें सुनी तक नहीं थी। और उनके यह फंडे मेरी बिल्कुल समझ में नहीं आते थे। कभी कभार ऐसा होता था कि, नींद पूरी न होने के कारण यदि 5:00 से काम से 5:15 बज जाते थे तो सास दरवाजा पीटती कि, घर की लक्ष्मी (बहू ) ही सोएगी तो लक्ष्मी रूठ जाएंगी। ....कुल मिलाकर बहुत ही ज्यादा असमंजस की स्थिति में थी कि क्या करूं? कैसे इन सबकी सोच को बदलूं? मेरे पति और ससुर भी इस स्थिति पर चुप्पी साध लेते थे क्योंकि मां की प्रचलित रिवाजों व मान्यताओं पर वह आंख बंद कर विश्वास करते थे। और मैं कौन होती थी परिवर्तन की आंधी आने वाली है...

किसी तरह दिन बीत रहे थे.... तीज ,करवा चौथ ,गणेश चतुर्थी ,आदि के व्रत में यदि मैं कभी लेट जाऊं या मेरी आंखें झपक जाये तो वही राग..' अरे इससे पाप लगता है व्रत में सोया नहीं जाता" और एकमात्र फंडा ....वही बात ... "लक्ष्मी रूठ जाती है...!"

मेरी पढ़ाई लिखाई सब कुछ एक किनारे हो गया था...मैं भी सोचती थी की अब तक की पढ़ाई तो व्यर्थ थी..! असल पाठ तो मैं अब पढ़ रही हूं। मेरी मां को यह सब पढ़ाना चाहिए था मुझे। कभी यह सोचने लगती की, शायद वह खुद को मुझसे बेहतर साबित करना चाहती हैं.. क्योंकि मैं थोड़ा बहुत उनके परिवेश से अलग परिवेश से आई थी वह मुझे नीचा दिखाने के लिए संभवत: इन बातों पर हाय तौबा मचाती थी, खुद को भी मुझसे ज्यादा संस्कारी दिखाने के लिए मेरी छोटी गलती को बड़ा बता देती थीं। मुझे हमेशा लगता था कि, मेरी मां कहती थी और उनकी चार बातों से तुम्हें दिक्कत नहीं होनी चाहिए बल्कि इस तरह तुम्हारी सहनशक्ति ही बढ़ेगी' ... संभवत मेरी मां भी यह सोचती थी कि कोई विवाद न हो! और वह स्वयं मेरे परिवार के बीच में नहीं पड़ना चाहती थी वरना इस पर भी शायद मुझे ही सुनाया जाता कि तुम्हारी मां ने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया। बेटी की परवरिश भी ढंग से नहीं की।

फिर मैं बेहद परेशान से रहने लगी और मेरे भीतर का आत्मविश्वास कहीं गायब हो गया। मैं दिन भर घर के कामों में लगी रहती .... कभी आईने में अपना चेहरा भी नहीं देखती आंख खुलते ही जुड़ा बांध, बाथरूम में घुसती और नहा धोकर साड़ी बेतरतीब सी लपेट कर किचन में घुस जाती ताकि माताजी के उठने के पूर्व आधे से ज्यादा काम निपटा लूं और उनकी भावभंगिमा न बिगड़े ! शायद उनकी कसौटी पर खुद को खरा साबित करने के लिए मैं स्वयं को भूल गई थी ..कि अभी मेरा नया नया विवाह हुआ है मेरे भी कुछ सपने हैं ! हनीमून पर जाना हमारे घर के संस्कारों में शामिल न था तब मैं वहां भी न जा सकी..! मैं भीतर ही भीतर कुंठित सी हो गई थी.. कथा वार्ता होने पर मैं किसी से बात नहीं करती किसी के सामने अपनी राय नहीं रखती.. शाम को क्या सब्जी बनेगी? दिन में क्या खाना बनेगा? यह निर्णय भी मैं स्वयं लेने में डरती थी..' यदि माताजी दी बोलेंगी कि यह क्यों बनाया ?पूछ नहीं सकती क्या? तो क्या बोलूंगी मैं? मैं उनसे बिना पूछे कोई काम नहीं करती। यहां तक कि यदि कहीं जाना होता तो मेरे द्वारा पहने जाने वाली साड़ी का चयन भी वे स्वयं करती ...

मेरे पति अक्सर मुझसे कहते... कि, तुम गुमसुम मत रहा करो खुश रहा करो !एक बार मेरे पति ने आईने में मुझे दिखाते हुए कहा : देखो! खुद को, क्या हो गया है तुम्हें? सज धज के रहो यह घर तुम्हारा है ..! कुछ इच्छा हो तो कहो! उस दिन मेरे सब्र का बांध टूट पड़ा... ' मैंने खुद को ध्यान से देखा कैसी हो गई थी मैं ?आंखों के नीचे काले घेरे.. होठों पर पपड़ी... हाथ के नाखूनों में सूखा जमा हुआ आटा... और निष्प्राण सूखा चेहरा .... जैसे वर्षों से बीमार हूं मैं!! लगा कि कैसे हो चुकी हूं मैं? अभी तो मेरे विवाह के 1 वर्ष भी नहीं बीते और जिंदगी नरक हो गई है" मैं फूट फूट कर रो पड़ी ..घूमकर मैं अपने पति के सीने से लग पड़ी ..!और मेरे मन का गुबार आंसुओं के साथ ,शब्दों के रूप में फूट पड़ा...

मैंने कहा: मैं आपके घर के लायक नहीं हूं आपकी मां के हिसाब से मेरे भीतर कोई गुण नहीं है और मैं बिल्कुल बेकार हूं मैं कुछ भी करती हूं उनको पसंद नहीं आता। मुझे हमेशा कमी ही है मैं हर काम में भी निपुण नहीं ...! मैं कुछ भी नहीं कर सकती अपने मन से ..! आप ही बताइए ! कैसे खुश रहूं? मैं, यह मेरा घर नहीं है ..'सिर्फ आपकी माता जी का घर है..! यह सुनकर वह बोले: रो लो ...रो लो..! तुम जी भर के...! तुमने मुझे यह सब पहले क्यों नहीं बताया ..पूरे 8 महीने से तुम इतना कुछ झेल रही हो! पहले मैं नहीं बोलता था मुझे लगता था कि तुम धीरे धीरे संभाल लोगी खुद को.. मुझे लगता था कि कोई वजह नहीं है तर्क करने की.. किंतु अब ऐसा लगता है कि मुझे बात करनी ही होगी..!" एक संकल्प ले कर उन्होंने अपने चेहरे से दूर रोशनदान की ओर देखते हुए कहा ..: "मैं मां से बात करुंगा" फिर वे कमरे से निकल गए उन्होंने मां से सब कुछ कहा ...सब कुछ ...! और मैं चुपचाप अपने कमरे में बैठी ...दोनों मां और बेटे के बीच की तर्क वितर्क को सुन रही थी। कभी वह मुझे' मां बेटे के बीच आग लगाने वाला' कहती तो कभी कहती थी:' चुगली कर रही है मेरी'! तो मेरे पति ने हर बात का प्रतिवाद किया कि: " किस से करेगी वह ये सब बातें? मैं उसका पति हूं मन की बात वो मुझसे नहीं करेगी तो किस से करेगी? अपनी सोच को बदलो! इस आधुनिक समय में कोई इन बातों से चलेगा तो कैसे चलेगा ? क्या कहना चाहती हो तुम ?किस बात से उसके किस कृत्य से लक्ष्मी रूठ जाएंगी? मां ने कहा :मैं चाहती हूं सब मेरी बहू को संस्कारी कहें" उन्होंने कहा: वह हँसेगी बोलेगी ,अपने मन का करेगी, खाएगी ,घूमेगी ,फ्री हो के रहेगी ...तो क्या संस्कारहीन हो जाएगी ? मैं सुन रही थी....

देख रही थी ...अपने जीवन साथी के उस रूप को जो आज से पहले मैंने कभी नहीं देखा था.. मुझे अपने विवाह के फेरों के समय के वचन याद आ गए और आंख में आंसू ... चेहरे पर मुस्कुराहट और दिल पर सुकून भी था ..कि जब मेरा हाथ थाम कर उन्होंने कहा था कि ,'हर मोड़, हर परिस्थिति में ,मैं तुम्हारा साथ दूंगा.. तुम्हारी रक्षा करूंगा ..वह वचन निभाया मेरे पति ने ...मेरे कान में सिर्फ उनके ये शब्द गूंज रहे थे कि ,.." घर की लक्ष्मी खुश रहेगी तो लक्ष्मी माता सदा खुश रहेंगी"

कविता जयन्त श्रीवास्तव....

Image Source : dmpederson



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