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@dawriter

“दूर के ढोल सुहावने होते हैं” (सच है क्या?)

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नवम्बर की एक सर्दीली शाम है। अँधेरा होने को है मगर पड़ोस से आई दूबे आंटी के जाने की कोई गुंजाईश नही थी और गुंजाईश भी तब हो जब मम्मी जी की बातें खत्म हो। चाय-नाश्ते का बर्तन समेटती नुपुर यही सोच रही थी। वैसे तो उसे मम्मी जी की इस पड़ोसन सखी से कोई परेशानी नही थी, परेशानी थी तो मम्मी जी के अहमदाबाद टॉपिक से।

हाँ, अहमदाबाद में नुपुर के छोटे देवर-देवरानी रहते हैं और उसके यहाँ जब भी कोई आता है मम्मी जी अपने छोटे बेटे-बहु की तारीफें करना शुरू हो जाती हैं। उनके कहने का अंदाज भी कुछ ऐसा होता की नुपुर हर्ट हो जाती और अनचाहे ही उसे थोड़ी सी जलन होने लगती मगर यहाँ भी वह अपने गम्भीर स्वभाव से अपने मनोभावों को छुपा लेती और बड़ी बहु के कर्तव्य को निभाती रहती।

देवर की शादी को पाँच साल हो गए थे। कभी एक बार एक हफ्ते के लिए मम्मी जी दिल्ली गयी तब से आज तक वहाँ की हर बात अनगिनत बार दुहराती रहती कि किस तरह दोनों ने डॉक्टर को दिखाया, फल दूध का ख्याल रखा, चश्मे का नंबर चेक कराया आदि। बेटे-बहु के करने का इतनी चर्चा क्यूँ वो भी दूसरे बेटे-बहु के सामने नुपुर के मन में प्रश्न आता ?

आज शाम को देवर का फ़ोन आया था। मार्च में उनकी बिटिया का बर्थडे है, मम्मी और पापा को बुलाया था। उसी समय से तो मम्मी जी अहमदाबाद की बातें करते नही थक रही है। फ़ोन तो कभी महीने – दो महीनों में एक आध बार ही आते मगर मम्मी जी हर शाम पापा जी के पास बैठ उन्हें याद करती रहती। बड़े बेटे का जो परिवार और दो बच्चे यहाँ रहते ना तो वो उनकी कभी बातें करती ना ही कभी नुपुर के घर के कामों में हेल्प करती उल्टा कमियाँ ही निकलती रहती।

मगर नुपुर धैर्य के साथ पूरे घर की जिम्मेदारियां उठा रही थी।

मम्मी जी की अनवरत बातों का सिलसिला थमा। दूबे आंटी जब तक गयी, सात बज चुके थे। शाम का दीपक लगा नुपूर खाने की तैयारी में लग गयी थी। मयंक और कार्तिक पढ़ने बैठ गए थे। पापा जी व रोहन आने वाले थे नुपुर के हाथ की स्पीड बढ़ गयी थी। रात को किचन समेटते ग्यारह बज गये थे। अपने रूम की तरफ जा ही रही थी कि मम्मी जी की आवाज़ आई। साबूदाने भिगो देना कल पापड़ बना लेंगें। नुपुर समझ गयी थी कि अब तो तीन महीने तक किसी न किसी चीज़ की तैयारी उसे करवानी है। इस बीच बच्चों के फाइनल एग्जाम्स की भी तैयारी नही करवा सकेगी।

दिन बीतते है कभी पापड़ अचार, कभी कचरी मुरब्बे, तिल के लड्डू, मठरी बनते बनाते अब बस तीन चार दिन बचे थे अहमदबाद जाने की मम्मी जी लगभग सारी तैयारियां कर चुकी थीं । नुपुर उस शाम मम्मी जी की साड़ियां प्रेस कर रही थी। देवर का फ़ोन आया था मम्मी जी की आवाज़ नही आ रही थी।

बाद में अचानक कमरे में जा कर सो गई। दीपक लगा कर नूपुर चाय का कप ले उनके पास गई लाइट ऑन किया तो वे बोलीं बहु हम लोग अहमदबाद नही जा रहे उन लोगों का कहीं और का प्रोग्राम बना है मगर कहा है कि तीन महीने बाद फिर रिजर्वेशन करा देंगे... हाँ जाना तो लाइट बंद कर देना। रात में खाने की मेज पर सब चुप थे। क्यूँ माँ ऋषभ कहाँ जा रहा है? रोहन ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा था। “हाँ बेटा उस समय अहमदाबाद में गर्मी शुरू हो जाती है इसीलिए वे लोग किसी hill station पर बर्थडे प्लान कर रहें है मगर फिर तीन महीने बाद मुझे बुला रहे है” धीमी आवाज़ में मम्मी जी ने कहा था।

किचन समेटती नुपुर सोच रही थी ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ काश मम्मी जी को यह कहावत समझ में आ जाती।

Image Source: asianews



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