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@dawriter

अलगाव का दर्द

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कार के वाइपर से उसके ग्लास पर पड़ रही बारिश की बूँदों को हटा रही थी। ये बारिश मुझे सिर्फ दर्द ही देती है। दर्द की परिणति में बहते आँसुओं को न कोई देखने वाला है न कोई पोंछने वाला है। एफ एम पर पुराने गाने चल रहे थे और मेरे दिमाग में पुरानी स्मृतियाँ।

उस दिन भी तो बहुत तेज बारिश हो रही थी, कॉलेज के गेट पर खड़ी मैं पापा के आने का इन्तजार कर रही थी। पापा का फोन आया, "बेटा ऑफिस में एक जरूरी काम आ गया है। तुम ऑटो पकड़ कर घर आ जाओ। "

इतनी बारिश में ऑटो कैसे लूँ, थोड़ा दूर आगे बढ़ी, दो ऑटो वालों से बात की लेकिन उनका चेहरा और देखने का ढंग देख कर डर गई। तब तक तुम आ गए।

"हेलो, शिवानी। "

"ओ हाई!"

"कोई मदद करूँ तुम्हारी?"

"नहीं घर जाने के लिये ऑटो ले रही थी। "

"चलो मैं तुम्हें घर छोड़ दूँ। "

"नहीं मैं चली जाऊँगी। "

"डरो मत शिवानी, हम एक ही कॉलेज में पढ़ते हैं। इतना तो तुम मुझे जानती ही हो कि मुझ पर विश्वास कर सको। " कर लिया विश्वास, बैठ गयी तुम्हारी बाइक पर, एक छोटे से सफर के साथ ने हमें एक दूसरे के नजदीक ला दिया। दोस्ती कब प्यार में बदली पता ही नहीं चला। उम्र के उस दौर में जब हम आकर्षण को ही प्रेम समझ बैठते हैं, मैं खुद को राधा समझने लगी थी, जिसे उसके कृष्ण के सिवा कुछ नहीं चाहिए था। तुम मुझसे तीन साल सीनियर थे, जब तुमने लॉ कम्पलीट की तो मैंने तुमसे कहा,"आदित्य, अब हम शादी कर लेते हैं। "

तुम कहने लगे,"अभी इतनी जल्दी, अभी कर लूँगा तो तुम्हारे शौक कैसे पूरे करूँगा। "

"पर मेरे तो सारे शौक तुमसे ही जुड़े हैं। जो मिलेगा, उसी में खुश रहेंगे हम दोनों। "

हमारे रिश्ते से घर पर भी किसी को कोई एतराज नहीं था और बन गयी मैं तुम्हारी जीवन संगिनी। जीवन के सबसे खूबसूरत पल थे वो, इतने मधुर कि उनकी स्मृतियाँ आज मन को कसैला कर दे रही हैं।

तुम अपने काम से खुश नहीं थे, जीवन में कुछ अलग करना चाहते थे। मेरे लिए तुम्हारे सपनों को पूरा करने से बढ़कर कोई और चाहत नहीं थी। मेरे लॉ का कोर्स पूरा होने वाला था। मैंने तुम्हें नौकरी छोड़कर, यू पी एस सी की तैयारी करने दिल्ली भेज दिया।

ये फैसला लेना मेरे लिए इतना आसान नहीं था, आदि - तुम्हारी माँ मुझे बिल्कुल पसंद नहीं करतीं हैं, ये तो मैं पहले दिन ही जान गई थी फिर भी उनकी साजिशों और प्रपंचों को दिल से नहीं लगाती थी। मेरे जीवन में तुम्हारा होना ही सबसे बड़ी खुशी थी। तुम्हारा सपना पूरा न होने तक हम बच्चे नहीं चाहते थे, यह बात उन्हें पता होने के बावजूद वो हर रोज मेरी मातृत्व क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाती थीं, फिर भी मैं तुम्हें कुछ भी बताकर, तुम्हारे लक्ष्य से भटकाना नहीं चाहती थी।

दो साल बीत चुके थे, तुम अपने सपनों को पूरा करने की जद्दोज़हद में लगे थे और मैं एक-एक दिन तुम्हारे सपने के पूरे होने के इन्तजार में गुजार रही थी। मेरे लिए स्थितियाँ बद से बदतर होती जा रही थीं। तुमसे शादी मैंने अपनी पसंद से की थी तो मायके से भी किसी सहयोग की उम्मीद नहीं करती थी और एक दिन मेरा इन्तजार पूरा हो गया। तुम्हारा चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए हो गया था। खुशी के मारे रोऊँ या हँसु, कुछ समझ नहीं आ रहा था। पटना के हर अखबार में तुम छाए हुए थे, मेरी सहेलियां मुझे बधाई दे रही थीं। सब कह रहे थे, शिवानी की तपस्या सफल हो गयी।

अब तुम कुछ बदल गए थे, जो आदि मुझे बाहों में भरकर पूरी-पूरी रात अपने सपनों के बारे में बताया करता था। जिसे मेरे चेहरे की उदासी तुरन्त दिख जाती थी, जो हर बार, बस कुछ दिन और शिवू फिर तुम्हारी जिंदगी को खुशियों से भर दूँगा के वादे किया करता था, तुम वो आदि नहीं रहे थे। अब तुम मिस्टर आदित्य प्रताप सिंह हो गए थे। घर आकर भी तुम घण्टों माँ के कमरे में बैठे रहे। अपने हर साक्षात्कार में तुमने अपनी प्रेरणा उन्हीं को बताया।

तुम्हारी पोस्टिंग होने पर मैंने भी तुम्हारे साथ रहने की इच्छा जाहिर की पर तुम सबने मना कर दिया। शायद तुम्हारी माँ ने मना कर दिया था। मैं तुम्हारे बिना नहीं रहना चाहती थी। अकेलापन मुझसे बर्दास्त नहीं हो रहा था।

एक दिन बिन बताए ही मैं तुम्हारे पास आ गयी। वहाँ जाकर ये पता चला कि तुमने अपने शादीशुदा होने के बारे में किसी को नहीं बताया था। मेरे वहाँ पहुँचने से भी तुम खुश नहीं थे। लेकिन क्यों?? यह मैं नहीं समझ पा रही थी। मेरे जाने के एक हफ्ते बाद ही तुम्हारी माँ वहाँ आ गईं,फिर से जिल्लत और उपेक्षा का सिलसिला शुरू हो गया मेरे साथ। अब ताने अलग हो गए थे, मेरे कलक्टर बेटे को करोङों मिल रहे हैं पर हमारी फूटी किस्मत में यही बाँझ लिखी थी। मैंने तुमसे परिवार शुरू करने को कहा तो तुमने फिर मना कर दिया। तुम्हारा व्यवहार भी मेरे साथ दिन प्रति दिन बदलता जा रहा था। लड़ाई-झगड़े बढ़ते जा रहे थे। एक दिन तुम्हारी माँ के तानों से परेशान होकर मैंने हमें उनसे अलग रहने को कहा तो तुमने मुझ पर हाथ उठा दिया।

एक-एक कर के मेरे प्यार और विश्वास की परतें टूट रही थीं। तुम वो नहीं थे जिसे मैंने प्यार किया था, जिसके सपनों के लिए मैंने अपना समय, अपनी कमाई सब लगा दी। तुम्हारे जुल्म बढ़ते जा थे और मेरी सहन शक्ति बढ़ रही थी। हर रात इस उम्मीद में सोती  थी कि कल सब ठीक हो जाएगा। तुम मुझे सामाजिक समारोहों में भी साथ ले कर नहीं जाते थे। फिर पता चला माँ तुम्हारी दूसरी शादी की तैयारियाँ कर रही हैं।

मैं रोते-रोते तुम्हारे पास गई थी, आदित्य माँ हम लोगों को अलग करना चाहती हैं। उन्हें रोक लो आदि, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊँगी। हम एक दूसरे को बहुत प्यार करते हैं आदि, हम तो सात जन्मों के लिए एक दूसरे के हो चुके हैं। मुझे खुद से दूर मत करो आदि, मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए, मैं माँ के खिलाफ, तुमसे कुछ नहीं कहूँगी। बस मुझे खुद से अलग मत करो।  

"देखो शिवानी आज मैं भी तुमसे एक बात साफ-साफ कहना चाहता हूँ कि, अब मैं तुमसे कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता, हमारा रिश्ता हमसे कम उम्र में हुई एक भूल है। तलाक के कागज तैयार हैं, बस तुम उस पर साइन कर दो। "

मैं तुम्हारे पैर पर गिर गयी थी,"ऐसे मत कहो आदि, तुम तो मुझे अपने जीवन का चाँद कहते थे, हमारा प्यार कोई कम उम्र का आकर्षण नहीं था, बालिग थे हम दोनों। मुझे इस तरह मत छोड़ो। "

बाद में पता चला, तुम्हारी शादी किसी मंत्री की बेटी से ठीक हो गयी है। तुम्हारे और मंत्री जी के रुतबे के आगे मेरे परिवार ने भी तुम्हारे खिलाफ कोई लड़ाई न लड़ने की सलाह दी।

आज पाँच साल हो गए तुम्हें मुझसे अलग हुए। हर रोज तुम्हें भूलने की कोशिश करती हूँ। ये यकीन करने की कोशिश करती हूँ कि तुमने मुझसे कभी प्यार किया ही नहीं था। हर आता जाता इंसान मुझे ऐसे देखता है जैसे मैंने कोई पाप किया हो। कभी-कभी  लगता है कि मुझमें ही तो कोई कमी तो नहीं थी। तुमने मुझसे मेरा आत्मविश्वास, मेरा वजूद सब छीन लिया आदि और मैं तुमसे नफरत भी नहीं कर पा रही हूँ। आज एक सहेली ने तुम्हारी बेटी के जन्मदिन के जलसे की फ़ोटो दिखाई। वो कह रही थी देख,"कितना खुश है वो धोखेबाज़, अब तू भी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ और मैं तुम्हारी बेटी को अपलक निहार रही थी, बहुत प्यारी है वो, भगवान उसे हमेशा खुश रखें, उसे जीवन में किसी से धोखा न मिले।



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