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@dawriter

हम इतने भी पराये नही

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आज सुबह मुझे मॉर्निंग वॉक में थोड़ी देर हो गयी, खैर घर के काम निपटा कर मैं निकली तो मेरी पुरानी पड़ोसन और सहेली विद्या मिल गयी ..विद्या बेहद समझदार और खुश मिजाज युवती थी किन्तु आज वो कुछ परेशान लगी। मैंने उसको देखा तो बहुत खुश हुई वो भी मुझे देख बहुत खुश हुई। हमने बातें आरम्भ की वही पार्क की एक बेंच पर बैठ हमने महीनों की बातें कर डाली। मैंने उसके मायके ससुराल पति व बच्चों सबसे सम्बंधित बातें पूछ डाली..उसने सब बताया पर एक बात थी जब मैंने उसके मायके से जुड़ी बात पूछी तो वो गम्भीर सी हो गयी और उसकी आँखों में आंसू आ गए मैंने पूछा" अरे विद्या क्या हुआ? तुम्हारी आँख में आँसू? सब ठीक तो है अंकल आंटी दोनो ठीक हैं ना? और तुम्हारा भाई? शादी हो गयी उसकी?

"हां शादी हो गयी उसकी ..6 महीने हो गए ..! और मम्मी पापा भी ठीक हैं.. " ये बोलकर वो उठ खड़ी हुई और बोली अच्छा सुरभि अब चलती हूँ..! काफी देर हो गयी।

मैं समझ गयी विद्या मुझसे कुछ छिपा रही है वो मुझसे बताना नही चाहती। इसलिए उठकर जाना चाह रही है .मैंने रोका उसको और कहा " क्यों भाग रही हो विद्या आखिर बात क्या है बताओ मुझे ! क्या अंकल आंटी ठीक नही? और विशाल (विद्या का भाई) कैसा है और हां तुम्हारी भाभी? वो कैसी है? उसके बारे में तुमने कुछ नही बताया.. !

" क्या बताऊँ सुरु ! जैसा सोच रखा था वैसी नही निकली राखी ..! वो सोच में गुम होती गयी

"ओह्ह तो उसका नाम राखी है ! ...मैंने कहा ..क्यों राखी तो किसी साधारण घर की लड़की थी, तुम लोग बोल रही थी कि, वो बेचारी घर सम्हाल लेगी बिना पिता की बेटी है ..! ये वो ही राखी है ना? "

"हां ये वो ही राखी है सुरु ..पर वैसी नही जैसी हमने सोची थी और ऊपर से बेचारी तो एकदम नही समझना उसको ..! क्रोध में विद्या बोली ..

मैं कुछ समझी नही बता न यार ! मुझे चिंता हो रही ..! मैंने चिंतित होते हुए व्यग्रता से कहा

"अभी नही ,शाम को तेरे घर आती हूँ तो बताती हूँ ..! विद्या बोली..। और हम अपनी अपनी राहों पर बढ़ चले।

मैं घर आकर सोचने लगी " विद्या बेचारी कितनी सरल और सुघड़ स्त्री थी, उसकी सास कितनी खुश और पूरा परिवार कितना मानता था उसको ,मायका भी कितना सम्पन्न ,छोटा सा परिवार ..माँ पिता और भाई । बस एक भाभी की कमी थी अब तो वो भी आ गयी..विद्या की मां थोड़ी बीमार रहती थी चलो अब बहू के आ जाने से सहारा हो गया होगा..! पर उसने ऐसा क्यों कहा, क्या उसकी भाभी खराब है? ध्यान नही देती सबका? मैं विचारो में खोई थी तभी विद्या ने मुझे आवाज लगाई... "अरी सुरु क्या सोच रही है तू !

"अरे आ गयी विद्या ! मैं तेरे ही बारे में सोच रही थी..और देख तू आ गयी मेरे पास " दोनो सखियाँ गले लग प्रसन्नता व्यक्त करने लगी।

और बता ..सुबह तू कुछ बताते बताते रुक गयी थी..कि राखी को सीधी मत समझना ..पूरी बात बता यार! मुझे बहुत चिंता हो रही थी।

अब विद्या ने बोलना शुरू किया.." हां जब हम राखी को ब्याह के लाये थे तब तो उसकी बड़ी बहन ने कहा था हमारी बहन गाय है पर ये गाय तो इतनी अजीब निकली ..! उस वक़्त लगा बिना बाप की बेटी है ऊपर से इतने साधारण घर की है घर को सम्हाल लेगी..! पर इसने तो आते ही रंग बदल लिए..! जब विशाल इससे मिलने गया था तो उसने साफ साफ कहा था राखी से कि, वो ये शादी अपने माता पिता के अच्छे देखभाल करने की वजह से कर रहा..वरना अभी वो शादी के मूड में नही था..!तो राखी ने कहा.." मैं भी चाहती थी जहाँ मेरी शादी हो वहां सास ससुर हो क्योंकि, मेरे पिता भी नही हैं और आपके मम्मी पापा मेरे भी मम्मी पापा हुए..!"

विशाल को अच्छा लगा..और सबने कहा ,विद्या की शादी हो गयी ..वो ससुराल चली गयी..तो अब घर में खाना बनाना, साफ सफाई करने के लिए विशाल को ही रहना पड़ता और चलो मेड कितना करेगी दिन भर में 10 बार पापा और मम्मी को देखने के लिए तो नही आएगी.इस वजह से विशाल को आफिस जाने में भी दिक्कत होती थी.. वो बार बार आफिस से कैसे आएगा? तो उसने कहा कि ठीक है राखी विशाल की तुलना में नैन नक्श में कोई खास न थी..विशाल को ज्यादा पसंद भी नही थी पर उसने ये सोच कर इस शादी के लिए हां की ..कि चलो ये कम से कम माँ पिताजी की सेवा तो करेगी..! कोई और होगी तो हो सकता है किसी को कुछ न समझे..! और अब तो वो राखी से मिलकर और अधिक सन्तुष्ट था ।

मगर शादी के बाद .. उसने अपना रंग बदल लिया .. वो सो के ही 9 - 10 बजे उठती है...हर समय बीमार रहने का बहाना करती है आये दिन कभी सिर दर्द कभी हाथ कभी पेेेट ...माँ को ही खाना बनाना है सफाई करनी है इतनी दििक्कत है कि क्या कहूँ ..! बूढ़े पापा सुबह 5 बजे के उठे ..बैठे रहते हैं ..बिना कुछ खाये चक्कर आते हैं उनको..! मम्मी की हालत ठीक नही घुटनो के दर्द के कारण ज्यादा चल नही पाती ..फिर भी घिसट घिसट कर काम करती हैं ..चाय बनाना , झाड़ू पोछा भी करती हैं ..! विशाल ने पहले तो खूब ध्यान दिया अब उसको भी पता नही क्या घुट्टी पिला दी है उसने .. कुछ भी कहो तो राखी की ही तरफदारी करता है..! जब वो आफिस चला जाता है ..ये महारानी रूम से बाहर नही आती..! सारे नौकर चाकर छुड़ा दिए हैं बोलती है कि, विशाल की कमाई बर्बाद हो रही..! जबकि घर पापा की पेंशन से चलता है ...खुद बीमार होने का प्रोपोगंडा करती है.. ताकि माँ काम करें।

माँ विशाल से कहती नही? मैंने पूछा

कहा था एक बार पापा ने तो विशाल ने कहा .." एक तो बेचारी दिन भर काम करती हैं ऊपर से आप उसी की बुराई कर रहे हैं। "

वो झूठ बोलती है विशाल से बहुत ज्यादा. कहती सुबह उठ कर चाय देकर फिर लेट जाती हूँ . बीमार जो हूँ. विशाल सोचता है चाय राखी देकर आयी है. वो कुछ पूछता नही और मम्मी पापा कुछ बोलते नही. माँ उससे डरती हैं जाने क्यों? कुछ कहती भी नही.

मैं एक बार घर गयी थी तो उसकी दिनचर्या देख के मुझसे रहा न गया मैंने पापा से कहा..तो उन्होंने मुझे कुछ भी बोलने को मना कर दिया ..फिर भी मैंने राखी को व्यंग बोला लेकिन वो बहुत शातिर है बोलती है मम्मी जी खुद ही करती हैं दीदी सारा काम ..मैं तो कहती हूं जाने दीजिए ..छोड़ दीजिए जब मेरी हिम्मत होगी तो मैं कर लूँगी । मैं भी सब समझती हूं कि, वो ये सब विशाल को सुना के बोल रही थी । पर माँ ने इशारों से मुझे चुप करा दिया ! ...कि तू कुछ मत बोल मैं ठीक हूं तू बस अपने घर जा ,सुखी रह..! " ...........अब तू ही बता किस तरह सुखी रहूं ..? क्या करूँ? मैंने पापा से कहा आप दोनों मेरे साथ चलिए ..! यहां मत रहिये ...मैं इतनी दुर्दशा नही देख सकती आप लोगों की ..! पर पापा ने मना कर दिया कि, कैसे चलें हम दोनों वहां? तेरे सास ससुर सब हैं ..तेरे घर मे हम दोनों की वजह से कहीं कोई परेशानी आ गयी तब? किसी ने एतराज किया कि, बेटी के घर का खा रहे हैं ..न बेटी हम यहीं ठीक है जितना जीवन बचा है यहीं गुज़ार लेंगे ! इसके आगे कुछ था ही नही बोलने को..!

पर मैं विशाल से बेहद नाराज हूं कि, वो साथ रहकर अपने माता पिता के दर्द को नही समझ पा रहा? इतना अंधा हो गया है? इसलिए मेरा मन भी नही होता घर जाने का ..! उसको मेरा आना भी तो अखरता होगा ! बोल सुरु इस तरह की परिस्थिति में कैसे खुश रहूं?

मैं इसकी बात सुनकर दंग रह गयी और दुखी भी हुई ! कि ये क्या हो रहा है यार ...संताने इतनी संवेदना हीन हो गयीं हैं...एक पुत्री को जो दिख रहा है वो एक पुत्र और बहू को क्यों नही दिख रहा..! और वो बेटी जो अपने ससुराल में एक आदर्श बहू है ..वो इतनी मज़बूर है कि, वो अपने पुत्री धर्म को नही निभा पा रही ! मैंने विद्या से कहा .." सुन तुझे कुछ करना ही होगा ..तू इस तरह से चुपचाप नही बैठ सकती ..! और या तो तू राखी की पोल खोल या फिर मम्मी पापा को यहां ले आ!

"पर कहीं विशाल ने कुछ कहा तो? कि अब तुम परायी हो तुम्हे क्या हक है बीच मे बोलने का? तो? तो मैं क्या करूँगी?

" तुझे ये क्यों लगता है कि, अब तू परायी हो गयी तुझे हक नही उस घर के बीच बोलने का ! वो मम्मी पापा हैं तेरे अगर भाई ये भूल गया है तो बहन उसको इसका भान करवा सकती हैं और यदि भाई अपनी बीवी को तब भी सही मानता है तो ऐसे भाई को छोड़ देना ही बेहतर है उन्हें यहां ले आ और भाई भाभी को छोड़ दे ...यूँ घुट घुट के क्यो रहना? क्या हमें जन्म नही दिया हमारे माता पिता ने? क्या हम बेटियों की उनके प्रति कोई जिम्मेदारी नही है?

मेरी बातें सुनकर विद्या कुछ आश्वस्त सी हुई ..! और बोली तू ठीक कह रही है सुरु ! मैं ही खुद को पराया मान बैठी थी ..! पर नही अब मैं अपनी मम्मी और पापा को और नही झेलने दूंगी ये सब ! आज ही घर पर सबसे बात करके मैं मम्मी पापा को यहां बुलाने का बंदोबस्त करती हूं, जब सब कहेंगे तो पापा मम्मी मान जाएँगे| तूने सच मे मेरी आँखों से पर्दा हटा दिया ..मेरे पति और मैं मिलकर कुछ हल निकाल ही लेंगे। अच्छा अब चलती हूं सुरु ! बहुत सारा काम बाकी है ! "

उसकी बातें सुनकर मैं भी बहुत संतुष्ट हुई कि, चलो कम से कम विद्या के दिल का बोझ तो कम हुआ..! और उसे छोड़ते वक़्त मैं सोचने लगी कि सच ही तो है हम बेटियां इतनी भी परायी नही कि अपने जन्म दाता की दुर्दशा के खिलाफ दो शब्द न बोल सकें ! और उन्हें बुढ़ापे में सहारा देने के बारे में पहल न करें ! क्यो दोस्तों? क्या आप मुझसे सहमत हैं अपने विचार मुझसे साझा करना न भूलियेगा ..!

-कविता जयंत श्रीवास्तव



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