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@dawriter

यह कैसा बधावा? ज़रूरत या दिखावा!

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तुम सुन रही हो न माँ,कानो से मोबाइल लगाये हुए भी मिसेज़ अग्रवाल को बेटी मोनिका की आवाज़ बहुत दूर से आती हुई लग रही थी। हां हा! बोल बेटा माँ की परेशानी से जानबूझकर अनजान बनती हुई मोनिका बोले जा रही थी हाँ माँ- गोद भराई के दिन तुम सब टाइम पर आ जाना और हां पूरी तैयारी हो गयी है न मम्मी जी बड़ी दी और सोना दी की साड़ी एक सी होनी चाहिए तुझे तो पता है वो सिल्क ही पहनती हैं घर के बाकी जेंट्स के लिए 1000 कैश ठीक है पर पापा जी के लिए सूट ले लेना माँ। हां बेटा डूबती आवाज मे बोल पायी थी मिसेज अग्रवाल अब तक तो बेटी की आवाज भी उदास हो गयी थी,बस इस बार माँ लवी के जन्म के समय आपने इतना अच्छा किया था इन सभी की उम्मीदें इस बार भी लगी है और फिर देवरानी के घर से भी बधावा अच्छा आता है न माँ, ठीक है मोनी पापा को दवा देनी है मैं जरा रुक के कॉल करती हूं मोबाइल रख कर मिसेज अग्रवाल सोफ़े पर ही लेट गईं चेहरे पर चिंता की गहरी रेखाएं साफ़ दिख रही थी। मिस्टर अग्रवाल शहर के मशहूर गारमेंट्स बिज़नेस मैन हैं। तीन बेटियों और दो बेटों का भरा पूरा परिवार है उनका। तीनों बेटियो और एक बेटे की शादी हो चुकी है।

अग्रवाल जी ने बच्चों की शादियों में दिल खोल कर ख़र्च किया था। सभी बेटिया अपने अपने घरों में खुशहाल जीवन जी रही हैं। मगर पिछले कुछ वर्षों से अग्रवाल जी किडनी की प्रॉब्लम से पीड़ित थे जिससे उनका शरीर तो कमज़ोर हुआ ही था बिज़नेस में भी काफ़ी नुकसान हो रहा था, क्योंकि बेटों में अभी बिज़नेस की पूरी पकड़ नही थी। मोनिका अग्रवाल जी के दूसरे नंबर की बेटी है और अभी प्रेग्नेंट है। अगले हफ़्ते उसकी गोदभराई की रस्म होने वाले थी। मोनिका को घर की सारी परेशानियों की जानकारी थी मगर फिर भी ससुराल में सास ननद व् जेठानी के सामने मायके को ऊँचा दिखाने के लिए वो समय मिलते ही माँ को हिदायतें देने लगती क्योंकि उसे डर था कि माँ ने आर्थिक परेशानियों के चलते ‘बधावे’ में कही कुछ कमी कर दिया तो। इधर मिसेज़ अग्रवाल की चिंता बढ़ गयी थी पर थी तो माँ ही किसी तरह बेटे से कहकर पूरी तैयारी कर वाली इस कारण उन्हें कई बार बेटों की डांट बहु की झिड़क और पति की बेरुखी का सामना करना पड़ा।

नियत समय पर सभी लोग मोनिका के ससुराल पहुँच गए। रिश्तेदारों और मेहमानों की भीड़ से हॉल भरा हुआ था।मोनिका को मायके वाले से ज़्यादा बधावे के सामान की प्रतीक्षा थी। सभी ने मायके से आये सामान को एक नज़र देखा और खाने पीने में लग गए। इस बार मोनिका की माँ ने बहुत दिक्कत उठा कर बेटी की ससुराल में उसका मान रखने के लिए सारी तैयारियां की थीं। मगर यहाँ तो किसी ने उन सामानों को एक मिनट से ज़्यादा भी नही देखा। बहुत से सामान तो पैक ही रह गए। इस व्यस्तता के युग में शायद ही कोई याद रखता हो की फलां के मायके से क्या क्या आया था और क्या नही। दूसरी बात यह है कि अगर हम सारी ज़िन्दगी अपनी जेठानी देवरानी या ननद के आगे मायके से आये हुए सामान के बल पर ऊँचा दिखने की कोशिश करेंगे तो हमेशा परेशान रहेंगे। आप अपने ससुराल में अपने काम व्यवहार और निर्णयों से ऊपर बने रहे।

बाबुल का घर जो आपके बचपन की यादों का खूबसूरत का आईना है उसे अपने ज़बरदस्ती और फ़िज़ूल की डिमांड से धुंधला न बनाएं। वहाँ की मज़बूरियों को भी समझें खुद मजबूरी न बने।। क्या आप मेरी बातों से सहमत हैं? आज बस इतना ही।

रागिनी श्रीवास्तवा



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