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@dawriter

यही होता प्यार है क्या?

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hema by  
hema

मीना की आँखें किसी ने पीछे से बंद की और पूछा, ‘बताओ कौन?’ मीना ने अपनी उँगलियों से उन हाथों को टटोला पर कोई पहचान मिली नहीं। फिर एक दोस्त ने हँसते हुए कहा, ‘अरे एक अंदाज़ा तो मार।’ मीना की उंगलियाँ उन हाथों को टटोलती हुई कलाईयों तक पहुँच गयी तो आँखें बंद करने वाले ने कहा, ‘वक़्त को आज़ाद कर दिया मैंने।‘ यह सुनकर मीना के दिल की धड़कने बढ़ गयी और उंगलियाँ कांपने लगी। आँखें बंद करने वाले की साँसें भी कुछ देर को लडखडाई और मीना ने अपने हाथ गिरा लिए। आस-पास दोस्त बोले, ‘अरे यार! इतनी जल्दी हार मान ली।‘ ‘हाँ, हारी। मुझे नहीं समझ आ रहा कौन है ?’ एक गहरी साँस छोड़ते हुए मयंक ने मीना की आँखों से अपने हाथ हटा लिए। मीना पलटी और चौंकने का अभिनय करते हुए बोली, ‘आप! यहाँ! दूबे जी! ’ और फिर भरपूर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए मीना ने अपना हाथ मयंक दूबे की ओर बढ़ा दिया। हाथ मिलाते हुए मयंक ने भी ख़ूब अभिनय किया और फिर औपचारिक बातें होने लगी। धीरे-धीरे दोस्त इधर उधर हो गए और मीना एक असहजता महसूस करने लगी। वो मयंक से दूर चली जाना चाहती थी , उसका अभिनय किसी भी पल उसका साथ छोड़ने को अमादा था। आख़िरकार जब वो चलने को हुई तो मयंक ने उसका हाथ पकड़ लिया।

मीना खुद को संभालकर धीरे से पलटी और सयंत ढंग से मुस्कुराकर बोली, ‘कहिये दूबे जी’।

‘तुम जान गयी थी ना कि मैं हूँ।‘

‘नहीं दूबे जी। मैं नहीं पहचान पायी थी।‘

‘फिर तुम्हारे हाथ क्यूँ कांप गए थे? क्यूँ हटा लिए तुमने अपने हाथ? ‘

मीना एक लम्बी साँस छोड़कर मुस्कुराने की कोशिश करने लगी मगर उससे हो नहीं पा रहा था। वो आँखें मिलाकर मयंक से कहना चाहती थी कि मयंक सचमुच मैं नहीं पहचान पाई थी लेकिन उसकी आँखों ने उसका साथ देने से मना कर दिया। वो सिर झुकाए ‘नहीं’ में सिर हिलाने लगी।

मयंक ने भीगी आवाज़ में कहा, ‘मेरा नाम भी नहीं लोगी एक बार।‘

व्यंग से मुस्कुराते हुए मीना ने कहा, ‘दूबे जी, कह तो रही हूँ , यही नाम तो है आपका।‘

‘मयंक, मयंक नाम है मेरा...इसी नाम से बुलाती थी ना मुझे, तुम।‘

‘दूबे जी, तब मुझे ग़लतफ़हमी हो गयी थी कि आप मेरे दोस्त हो इसलिए बेवक़ूफ़ी में कह जाती थी। लेकिन सच्चाई जानने में बाद आपका नाम कैसे लूँ ? कहाँ आप और कहाँ मैं ? आप बहुत बड़े हैं मुझसे हर लिहाज़ में। अब तो दूबे जी ही कह सकती हूँ आपको।‘ बहुत गहरा दर्द रिस रहा था मीना के शब्दों से और उस दर्द की टीस मयंक के दिल में भी उठ रही थी।

‘मैं अब भी आपका दोस्त हूँ, मीना ‘ मयंक ने दर्द को समेटते हुए कहा।

बहुत देर से अभिनय करते करते मीना अब बेक़ाबू हो रही थी। मयंक की यह बात सुनकर वो गुस्से को संभाल नहीं सकी और फट पड़ी, ‘तो क्यूँ किया ऐसा मेरे साथ?’ उसकी आँखों में आँसू भी छलक आये।

मीना की ऐसी दशा देखकर मयंक भी आपे से बाहर हो गया और उसने मीना का चेहरा अपने कांपते हाथों में भर लिया। अपना चेहरा मीना के चेहरे के पास लाकर उखड़ती साँसों को संभालते-संभालते बोला, ’आय एम सॉरी। माफ़ कर दो मीना। मैं मजबूर था।‘ मयंक के हाथों की पकड़ मजबूत होती जा रही थी और मीना के आंसूओं की रफ़्तार। मयंक की गरम साँसें जब तक आंसूओं का एक रेला सुखा सकें तब तक नयी खेप मीना की आँखों से बह जाती। मयंक खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था और मीना किसी तरह मयंक से दूर छिटक जाना चाहती थी लेकिन मीना के हाथ पैर जैसे सुन्न हो गए थे, वो हिल भी नहीं पा रही थी। जिससे दूर होना चाहती थी उसी की छाती पर टिक गयी। न जाने कितनी देर मीना रोती रही और शायद मयंक की भी आँखें गीली थी।

अचानक मीना को कुछ होश आया और वो झटके से मयंक से अलग हो गयी। आंसू पोछते हुए बोली, ‘दूबे जी, क्यूँ खेलते हो ऐसा खेल? आप खिलाड़ी हो और मैं अनाड़ी की तरह हर बार उलझ जाती हूँ इस खेल में। क्यूँ करते हो मेरे साथ ऐसा? ऐसी क्या दुश्मनी है मुझसे? मर मैं सकती नहीं और जीने आप नहीं देते हो।‘

हमेशा हँसने वाली, मीठी बातें करने वाली मीना के मुँह से ऐसी ज़हर बुझी बातें सुनकर मयंक तड़प उठा और पूरी तरह बेक़ाबू हो गया। उसने मीना के विरोध के बावज़ूद जबरन उसकी कमर अपने हाथों से पकड़कर उसे अपने क़रीब खींच लिया। सोचने समझने की ताक़त ख़तम हो चुकी हो जैसे, ऐसे पागलों की तरह उसने मीना के चेहरे को चूमकर कहा, ‘आय लव यू’ और कहता ही चला गया न जाने कितनी बार। मीना भी इस अचानक हुए घटनाक्रम में अपनी सुध-बुध खो बैठी और सारा विरोध छोड़कर मयंक को महसूस करती रही। मयंक उसकी बंद आँखों में, उसके कानो में और उसके रोम-रोम में घुमड़ रहा था और मीना सूखे पत्ते सी मयंक की इस आँधी में आत्मसमर्पण कर रही थी।

‘‘एक बार मेरा नाम ले लो मीना, मैं तरस रहा हूँ। एक बार तो अपने मयंक का नाम ले लो।‘ मयंक ने लगभग रोते हुए कहा तो मीना के होंठ बिना मीना से पूछे बोल उठे, ‘मयंक, मयंक, मयंक......’ मीना के हाथ मयंक को टटोल रहे थे। फिर एक बार झटका लगा मीना को और पूरी ताक़त से मयंक को खुद से दूर करके अपने हाथों में अपना चेहरा छुपाये खुद को सँभालने लगी वो। मयंक को तेज झटका लगा और ऐसा दर्द हुआ जैसे किसी ने दो हिस्सों में चीर दिया उसे। खून में उसका पूरा बदन, उसके कपडे तर हो रहे थे, उसकी चीखें उसे बहरा कर रही थी। उसने घबराकर चारों ओर नज़रें घुमाई लेकिन बाकी सब लोग ऐसे सामान्य थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं। वो हाँफते हुए मीना को देखने लगा जो अब तक खुद को संभाल चुकी थी।

मीना ने संयत होकर कहा, ‘मयंक, भूल जाओ। अपनी दुनिया में आग मत लगाओ।‘

‘तो तुम शादी कर लो ना मीना। कब तक अकेली रहोगी? सालों हो गए उस बात को। प्लीज़ मूव ऑन मीना।‘ मयंक ने बिलखते हुए कहा।

मीना जी भर कर हंसी इस बात पर फिर मयंक की आँखों में आँखें डालकर बोली, ‘मेरी शादी हो चुकी मयंक। सालों पहले तुमने मुझे छोड़ दिया लेकिन मेरे पास जो मयंक छूट गया था मैंने उससे शादी कर ली। वो मेरा है। उसे मुझसे कोई नहीं छीन सकता, तुम भी नहीं। जानते हो मयंक, मेरा वाला मयंक मजबूर नहीं है, वो तो मस्त हवा सा, सुहाने सावन सा, गुनगुनाती धूप सा, ठंडी चांदनी सा है और वो हर पल मेरे साथ रहता है। वो मुझे कभी अकेली नहीं छोड़ता। मैं खुश हूँ मयंक। मैं संतुष्ट हूँ। मेरी चिंता मत करो। अपनी पत्नी की चिंता करो। अपने परिवार की चिंता करो।‘ कहते कहते मीना खुद में एक ताक़त को महसूस कर रही थी और मयंक ने देखा मीना का चेहरा चमकने लगा।

‘मीना क्या तुम मुझे माफ़ कर सकोगी?’ मयंक ने गिडगिडाते हुए पूछा।

‘मयंक! कैसी बातें कर रहे हो तुम? माफ़ी? मयंक आज मैं जो कुछ भी हूँ तुम्हारी वजह से हूँ। तुम तो मेरे गुरु हो। तुम्हारे दर्द ने मुझे सिखाया है खून को स्याही बनाकर कागज़ पर बहा देना। बिना आँसू, बिना सिसके रो देना और फिर उसे काल्पनिक कहानी कहकर लोगों से बाँट लेना। मेरा दर्द बाँटने वाले ढेरो पाठक हैं। मैं अकेली नहीं मयंक। मुझे तुमसे कोई शिक़ायत नहीं। मैं तो हर पल दुआ करती हूँ ‘तुम जहाँ रहो, खुश रहो’। मैं तुम्हारा जितना भी शुक्रिया करूँ कम है मेरे दोस्त। लेकिन हाँ, मेरी कहानियों में खुद को मत ढूँढना, मायूस होगे। मेरी कहानियों में वो मयंक है जो सिर्फ़ मेरा है और तुमसे बहुत अलग है। ‘



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