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@dawriter

माँ की पदवी

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"हां हां जा रही हूं मैं ..! नहीं रहना अब आपके घर .." सुरुचि सुबकते हुए बोली..!
 
" शौक से जाओ.. तुम्हारे साथ शादी करके जीवन की सबसे बड़ी गलती हो गई..! जाओ अपने घर वहां कोई नहीं होगा टोकने वाला तुम्हे ..! " झल्लाते हुए प्रखर ने कहा
 
"न ये घर मेरा है न वो घर ..! " वहां नहीं जाउंगी लौट कर ..! 
 
"तो ? कहाँ जाओगी ..? मेरी बेइज़्ज़ती करवाने ? तुम्हे तो बस कोई कुछ बोले न ! " अरे गलती सबसे होती है यदि माँ ने कुछ कह दिया तो इसमें इतना नाराज होने की क्या जरूरत थी ..? हां क्योंकि वो तुम्हारी माँ नहीं मेरी माँ हैं इसलिए तुम्हे बर्दाश्त नहीं हुआ..! जाना चाहती हो न ! चलो रिक्शा बुला दूँ  तुरंत जाओ..!
 
.." अब गलत बोल रहे हैं भैया आप..! कमरे में प्रवेश करती वृन्दा बोल पड़ी
 
" भाभी की कोई गलती नहीं थी ..माँ ने कुछ ज्यादा ही बोल दिया उन्हें ..आज देखा है मैंने ! भेजना ही चाहते हो न ! तो ठीक है ..भाभी अकेली कहीं नही जाएँगी ..तो हम दोनों ही साथ मे जाएंगी ..माँ तो इन्हें बेटी समान कहती हैं ..और भाभी ने भी माँ की पदवी का सम्मान रखा है..! तुम्ही बताओ भैया .? अगर गलती मेरी होती तो क्या मुझे भी इतना बोलती कि, तुम्हारे माँ बाप ने क्या सिखाया ..? क्या वो इनकी माँ नहीं ? अरे प्रेम से जो गलती थी, वो बता कर..इनकी ससुराल वाली माँ बन जाती..! 
 
"अरे ये क्या बोल रही छोरी ? मैने क्या गलत किया इसके साथ ..? बेटे के सामने पोल खुलते देख बौखला कर मां ने पूछा 
 
" चुप रहो माँ ..! मैं समझ गयी हूं ..आने वाले दिनों में मुझे भी कोई यूँ ही परेशान करेगा ससुराल में मां की पदवी पर बैठ कर ..! " 
 
वृन्दा की बात सुन कर माँ निशब्द होकर ..ग्लानि से शांत सी पड़ गयी और प्रखर वृन्दा की बात सुन कर उसे देखता रह गया ..सुरुचि सुबकती हुई वृन्दा के कंधे पर सिर रख कर रोने लगी ..! कमरे में सूर्य की खुशनुमा किरण रोशनदान से छन कर आ रही थी
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