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@dawriter

मंथरा

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" अरे बहू " देखो तो जरा कौन आया है! ' आरती को आवाज़ देती हुई उसकी सास कुसुम ने अपनी ननद का स्वागत किया..! "आओ आओ सुषमा दीदी...बड़े दिन बाद आना हुआ ! बताया भी नही ! खबर कर दी होती तो आपको लेने स्टेशन पर बिज्जु चला जाता .." कुसुम ने अधिकार जता कर कहा..।

"अरे अचानक प्लान बन गया, क्यों क्या बिना बताए आऊंगी तो भगा दोगी भाभी !! मन हुआ तो चल दी बहू से सेवा करवाने ...!! अब क्या भाई के घर भी पूछ कर आना होगा? बुआ जी ने व्यंग्य से बोला...

अरे बिल्कुल नहीं दीदी ! मैं तो आपके आराम के लिए बोल रही थी ..! आफिस के लिए तैयार हो रही आरती को थोड़ा अजीब लगा उसने सोचा "उफ़्फ़ इतनी सुबह सुबह ये बुआजी कैसे आ गयीं!! अब तो मुझे लेट हो जाएगा.." खुद को संयमित करते हुए आरती फटाफट बाहर आई, उनके पांव छुए और पानी का गिलास देते हुए बोली " अच्छा हुआ बुआ जी जो आप चली आयीं " ...कुछ दिन तो रुकेंगी न?

" क्यों? तू नहीं चाहती मैं रुकूँ? " कहकर बुआ जी ठठा कर हंस पड़ी...! आरती अचकचा गयी "अरे नही नही बुआ जी आप भी न !! मैं तो बस...! "

"हां हां जानती हूं मज़ाक कर रही थी ...! बुआ जी ने लड्डू मुँह में भरते हुए कहा।

खैर फिर तो हंसी मजाक के दौर चलने लगे। आरती ने जल्दी जल्दी, लंच की तैयारी कर दी और मम्मी जी के पास जा कर बोली '' तो मम्मी जी मैं निकलूं?" उसने आफिस जाने के लिए पूछा ।

"आज कहाँ जाओगी आज ही तो सुषमा बुआ आयी हैं तुम आज छुट्टी ले लो.." सास ने थोड़े आदेशात्मक लहज़े में कहा। मानो वो सुषमा को दिखाना चाहती हो कि ' वो अपनी बहू को कितना दबा के रखती है। '

"जी अच्छा " कहकर आरती अनमने मन से मुड़ी तभी सासु जी ने कहा 'अरे हां ! आज कुछ स्पेशल बना लो लंच में.."..आरती परेशान होकर अपने रूम की ओर बढ़ी।

उधर कुसुम से सुषमा " क्या बात है भाभी ! तुमने तो इसे बिल्कुल अपनी कठपुतली बना के रखा है। मान गए तुम्हे तो और एक अंजू दीदी की बहू है..एक बात नहीं मानती उनकी ! बेचारी अंजू दीदी।"

कुसुम : "क्या मतलब? क्या रोशनी अंजू के साथ सही व्यवहार नहीं करती ?

सुषमा ; "बिल्कुल नहीं!! पांव की जूती बना के रखती है बेचारी को!! मुझे तो दया आती है उनपर। नौकरों के जैसे काम भी करती हैं और बेटे बहू की बाते भी सुनती हैं। वैसे गलती उन्ही की है सिर चढ़ा कर रखा था..बहू को!! पहले कुछ बोलती न थी कि नई बहू को क्या टोकूँ ! और अब उस नयी बहू ने दुर्गति कर दी है। कोई बात मानती ही नहीं, सब अपने मन से करती है। जब नई थी तभी नकेल कसनी थी.. अब कहने से क्या फायदा ? "

कुसुम : "अच्छा !! हे भगवान ! शुक्र है आरती ऐसी नहीं"

सुषमा : " हां पर तुम ज्यादा छूट मत देना उसको वरना भोग लोगी ..! ये आज कल की बहुये ..! और फिर तुम्हारी बहू तो कमाती भी है , कही कल को उसको अपनी कमाई का घमंड हो गया तो ? "

सुषमा को ऐसा कहते देख कुसुम ने चुप होना ही उचित समझा। तभी आरती ने खाने के लिए सबको डाइनिंग टेबल पे बुलाया। किचेन में कुसुम ने आरती से कहा " तुम सबके बाद में खाना आरती "... आरती को थोड़ी आशंका हुई कि मम्मी जी ऐसे क्यो बोल रही हैं पर उसने प्रतिवाद न किया ।

दूसरे दिन आरती ने सबको चाय नाश्ता देकर आफिस की तैयारी की। कुसुम ने कहा - वो सब सम्भाल लेगी। दिन भर आफिस में थकने के बाद शाम को आरती जैसे ही घर पहुंची पूरा घर फैला हुआ था। आरती को लगा आज मम्मी जी ने कुछ समेटा नहीं? किचेन में गयी तो बर्तन जूठे पड़े थे ,शायद महरी नहीं आई थी। उसने जल्दी से कपड़े बदले और जुट गई साफ सफाई में ..जल्दी से चाय चढ़ाकर वो मम्मी जी और बुआजी को देने गयी। उसे देखकर सुषमा और कुसुम चुप हो गयीं जाने क्या बातें कर रही थी। उसे थोड़ा अटपटा लगा.. बात बदलने के लिए उसने पूछा "मम्मी जी डिनर में क्या बनाऊं ? "

कुसुम ने थोड़ी बेरुखी से कहा "जो भी तुम्हारा और विजय का मन करे।" आरती को मम्मी जी का व्यवहार कुछ बदला सा लगा। उसने विचार को मन से झटक रात के खाने की तैयारी करने की सोची।

खाना पीना देर रात तक चला बातों ही बातों में उसने कुसुम से पूछा "मम्मी जी आज महरी नहीं आई थी क्या? " कुसुम ने बमक कर कहा " हां नहीं आई थी! तो क्या बर्तन भी मांज देती ! " सुषमा ने खखार कर गला साफ किया ...! विजय ने चौक कर माँ की ओर देखा ! आरती को बहुत बुरा लगा उसने सोचा भी नहीं था कि मम्मी जी ऐसे जवाब देंगी। वो भी बुआ जी के सामने? उसका ये मतलब नहीं था ..आखिर मम्मी जी को हुआ क्या है? सुबह तक तो ठीक थीं।

उस रात आरती को ठीक से नींद न आई। विजय ने उससे कहा हो सकता है तुमसे कोई गलती हुई हो। वो सोचती रही की उससे क्या गलती हुई है मम्मी जी तो ऐसे बर्ताव कभी नहीं करती थी। दूसरे दिन आरती ने सारे काम निपटाए और फिर जब जाने लगी ..कुसुम ने उसकी ओर देखा तक नहीं। ऑफिस में आरती का मन बहुत परेशान था। उसने फ़ोन करके विजय को सारी बातें बताई, उसने कहा तुम सबके लिए गिफ्ट्स ले के आना आज " आरती ने सोचा चलो ठीक है हो सकता है मम्मी जी खुश हो जाएं।

घर पहुंची तो कुसुम और सुषमा चाय पी रही थी ..बुआ जी ने आरती से कहा "आ गयी बेटा! लो चाय पी लो थक गई होगी" बड़ी देर लगा दी आज." आरती हतप्रभ रह गयी थोड़ा हिचकते हुए बोली " अरे बुआ जी आप ने चाय क्यों बनाई ? मैं बस आप सबके लिए कुछ तोहफे लेने मार्केट चली गयी थी इसलिए देर हो गयी"

सुषमा ने लोभी आंखों से देखा और कहा "अरे वाह बेटा तू तो बड़ी अच्छी है...सच है भाभी! कमाने वाली बहु के बड़े फायदे हैं वैसे ! " और अपना पैकेट लेकर चल दी। इधर कुसुम ने आरती को कमरे में आने का इशारा किया।

कमरे में कुसुम ने आरती को ,डांटते हुए कहा " इस सबकी क्या जरूरत थी? मुझसे एक बार पूछ लेती मुझसे! तुम कमाती हो ये दिखाना चाहती हो सबको !! अपने मन की नहीं हो तुम !! और कल सुषमा दीदी के सामने तुम मुझसे बर्तन न धुलने का कारण पूछ रही थी ? नौकर नहीं हूँ मैं तुम्हारी " नौकरी करती हो इसका ये मतलब नहीं है कि तुम मुझे ऑर्डर दोगी..!

आरती अवाक रह गयी उसने जो बातें कभी सपने में भी नही सोची थी वो उसकी सास के मुंह से सुना उसने..! वो रोते हुए अपने कमरे में चली गयी। शाम को विजय आया उसने देखा मां कमरे में लेटी है और आरती भी ..बुआ ने पानी व चाय दिया। विजय परेशान हो उठा कि "लगता है बात बढ़ गयी" वो पहले माँ के पास गया । इधर बुआजी आरती के पास गयी और उसके कान भरने लगी।

"मुझे बहुत बुरा लगा बेटी ..कुसुम ने इस तरह तेरे साथ व्यवहार किया । वो तो मुझसे भी दिन भर तेरी बुराई कर रही थी कि "दिन भर महारानी घर मे नहीं रहती सारा काम मुझे करना पड़ता है। " मैंने उसे समझाया भी की तो क्या हुआ कमाती है तो क्या तुम उसके लिए इतना भी नहीं कर सकती ,और फिर दिन भर घर मे क्या आराम करोगी, हाथ पांव चलाने से अच्छा ही रहता है...मैने बहुत समझाया पर वो मेरी एक न मानी ! आज तुझे लेट हुआ तो बोल रही थी मत बनाओ चाय " महारानी जी आएंगी तो खुद बना लेंगी लेकिन मैंने सोचा थकी हारी बेचारी आएगी तो काम मे जुट जाएगी इसलिए बना दी..." बुआजी के मुंह से ये सब बातें सुनकर आरती रोने लगी कि "बुआजी बेचारी कितनी अच्छी हैं.." कितना ख्याल रखती हैं मेरा!

अभी बुआ जी उसके कान भर ही रही थी जो बोल रही थी वो कुछ और और कुसुम से कुछ और ही बोलती ! असल मे सच्चाई तो कुछ और ही थी। तभी विजय ने कमरे में प्रवेश किया। दोनो हाथों से ताली बजाते हुए बोला " वाह बुआ वाह! क्या आग लगाई तुमने !! माँ से कहती हो कि तुम क्यों काम करोगी तुम क्या कोई नौकरानी हो वो महारानी तो निकल लेती हैं सुबह सुबह " और आरती से ये कह रही हो कि, तुम कमा के दे रही हो तो क्या वो इतना भी नहीं कर सकती .." क्या बढ़िया मंथरा गिरी की है तुमने ! सास बहू के बीच क्या आग लगाई तुमने !! शर्म आनी चाहिए तुम्हे ऐसे करते हुए ! तुमने इन दोनों के इतने दिनों के रिश्ते में खटास पैदा कर दी। मैं तो तुम्हे पहले से जानता था जिस दिन से तुम आयी हो माँ के कान भर रही हो और आज आरती को भी भड़काने लगी ".... माँ तो खैर तुम्हे जानते समझते हुए भी भड़क गई..पर आरती को पहले ही अलर्ट कर देना चाहिए था मुझे..! सुधर जाओ बुआ वरना कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं बचोगी कौन बुलाना चाहेगा ऐसी मंथरा को..."

और बुआ बस यही बोलती रह गयी.. "अरे बेटा मैं तो यूँ ही बहू को समझा रही थी..की हम सबको उसकी चिंता है..। भाभी को कुछ भी नही भड़काया मैंने ' ..है ना भाभी ! बोलो न विजय से ये गलत समझ रहा है। "

"ये बिल्कुल सही समझ रहा है सुषमा दीदी !! कुसुम ने गुस्से से कहा " मेरी ही अकल पर पत्थर पड़े थे जो तुम जैसी कुटनी के चक्कर मे आ गयी.." आरती बेटा माफ कर दो मुझे ! इस मंथरा के चक्कर मे मैने तुझे बहुत बुरा भला कहा..! " अरे नहीं मम्मी जी बल्कि मुझे तो खुद विश्वास नहीं हो रहा था कि आप का व्यवहार अचानक कैसे बदल गया ..आज दोपहर को जब मैंने 'इनसे' फ़ोन पे बात की तो इन्होंने इस बात का भांडा फोड़ने का प्लान बनाया ! जो कि, किसी को नहीं बताना था..और अगर आज ये प्लान ना होता तो ये बुआ जी को आपके बारे में बुरा भला बोलते हुए कभी आपको नहीं दिखा पाते..! आप मुझसे इस कदर भड़की हुई थी कि, जब तक आप ये सब खुद से न देखती और सुनती, तब तक कुछ भी विश्वास करती...!!

ओह्ह मेरे बच्चों तुमने तो आज मेरी आँखें ही खोल दी। तीनो अभी मिल ही जुल रहे थे कि , बड़बड़ाती हुई बुआजी अपना बैग उठाये ...पांव पटकती हुई चिल्ला रही थी कि ' हाये हाये कैसा जमाना आ गया है ! बड़े बुजुर्गों की तो कोई इज़्ज़त ही नहीं है..! मैं अब एक पल नहीं रुकूँगी बस जा रही हूं..!

विजय आरती और कुसुम तीनो एक दूसरे को देखकर हंसे कुसुम को आरती और विजय पर गर्व हुआ कि उसके बच्चे इतने समझदार और नेक हैं वरना घरों में ऐसी मंथरायें ही झगड़ों का कारण बन जाती हैं ...तभी विजय ने जोर से आवाज़ लगा कर कहा " पैदल जाएगी या ऑटो बुला दूं बुआ जी..!! " और कमरे में फिर से वही कहकहों की आवाज़ गूंज उठी।

आप सबको कहानी कैसी लगी अवश्य बताइएगा। क्या आपके आस पास ऐसी मंथरा नही है यदि है तो लाइक और कमेंट करने में देर न करें।

- कविता जयन्त श्रीवास्तव..

Image Source: charanamrit



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