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@dawriter

बेटे की चाह में तड़पता मातृत्व

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माधवी, 40 साल की हो गयी है। एक संयुक्त परिवार की छोटी बहू, ख़ूबसूरती और बुद्धिमानी की सटीक मिसाल। प्यार और ममता उसकी पहचान। दिन हो या रात बस उसका घर परिवार, नाते रिश्तेदार ही होते थे उसके हर लम्हे, हर पहलु, हर बात का मुद्दा। हस्ती खिलखिलाती, मिलनसार माधवी सबकी चहेती थी। सब उसे मान सम्मान देते। बच्चो की सबसे प्यारी चाची और मामी है वो। बच्चों के साथ बच्ची बन जाती।

पर! कहीं ना कहीं उसके भीतर एक शांत तूफ़ान था। एक गहरा दर्द। जिसे वह जितना दबाने की कोशिश करती उतनी ही वह उसे भीतर से तोड़ता जाता। घर में प्यार और सौहार्द बनाये रखने के लिए उसने खुद को मार दिया था। अपनी खुशियों अपने दुखों को दबा दिया था। अपनी चाहतों को छोड़ दिया था। क्यूँ ? क्यूंकि यह परिवार उसकी एक कमी के बावजूद उसे अपनाये हुए था। वो कमी जिसका जिम्मेदार वो खुद को मान बैठी थी।

जी, उसकी एक कमी माँ न बन पाना। 14साल हो गए हैं उसकी शादी को लकिन उसकी गोद अभी भी सूनी है। जी, बस एक यह ही सुख उसके नसीब में नहीं आया। न जाने कितनी मन्नत, कितनी चौखट, कितनी दरों ओ दिवारो पर उसने सर झुकाया होगा। हर मंदिर, हर दरगाह का दरवाज़ा खटखटा चुकी थी वो। पर कुछ नहीं हुआ। बड़े से बड़े डॉक्टर से चेकउप करवा लिया था पर…...।

माधवी जब शादी करके चड्ढा परिवार की बहु बनी तो खुद को बहुत खुश नसीब माना उसने। एक भरा पूरा परिवार था वो। सास ससुर , दो जेठानियाँ, एक ननद ,तीन छोटे छोटे बच्चे( बड़ी जेठानी का बेटा(3साल),दूसरी जेठानी की बेटी(1 साल) और ननद का बेटा(6महीने))। घर हर वक़्त किलकारियों से गूँजता रहता। सबसे छोटी बहू होने के कारण उसे सबसे भरपूर प्यार मिला। और उसने भी उस प्यार का जवाब प्यार से ही दिया। घर के रंग ढंग में खुद को ढाल लिया और जल्द ही सबकी चहेती भी बन गयी। पति का प्यार तो उसकी सबसे बड़ी पूँजी था। दिन कैसे प्यार और हँसी ख़ुशी से बीत रहे थे, उसे पता ही न चलता।

धीरे धीरे एक साल बीत गया। अब सब उन दोनों को किसी न किसी बहाने बच्चे के लिए टोकने लगे। उन दोनों ने भी इस बारे में आपस में बात की और तय किया कि अब उसको भी सोचना चाहिए अपने परिवार को बढ़ाने का। और फिर करीब 6 महीने बाद उन्हें खुशखबरी मिली। पूरा परिवार मानो जैसे इसी दिन का इंतज़ार कर रहा हो। सबने माधवी को सख्त हिदायत दी की अब उसे अपना खास ध्यान रखना होगा

क्यूकि ढेड़ साल भी हो गया था तो माधवी की सास ने उसके चुरा उतारा की रसम रखी। खूब धूमधाम से रस्म हुई। माधवी की माँ ने न जाने कितनी ही बार अपनी बेटी की बलाए ली।दिन पर दिन कट रहे थे। 4 महिने बीत गए। सब ठीक चल रहा था कि एक दिन सुबह उठते के साथ ही उसे कुछ अजीब सा महसूस हुआ और फिर …..।

डॉक्टर ने बताया कि उसका गर्भपात हो गया है। उसका तो जैसे सपना टूट गया हो। डॉक्टर ने कुछ हिदायतें दी और सब ठीक हो जाएगा कि तसल्ली। कुछ दिन तो उदासी में बीते पर घर के लोगो ने उसे संभाल लिया। बच्चों ने अपनी चाची/मामी को फिर प्यार और अपनेपन से भर दिया। सब नार्मल होने लगा। कुछ महीने बाद माधवी और उसके पति ने फिर से फैमिली प्लंनिंग की सोची। महीने बीते साल बीते माधवी ने डॉक्टर की भी सलाह ली। डॉक्टर ने सब चेक-उप के बाद उसे कहा “ सब ठीक है, खुद को टाइम दो। शायद अभी टाइम नहीं आया।”

साल पर साल बीते जा रहे थे। हालाँकि माधवी घर के और बच्चों पर अपनी ममता लुटाती और बच्चे भी उस पर जान छिड़कते। अब तक माधवी अपने मन को मना चुकी थी। पर कहीं न कहीं उसके अंदर की ममता उसकी चाह को मारने नहीं देती। अब तो देखते देखते 10 साल बीत गए। अब तक ऐसा कुछ नहीं बचा था जो उनकी कोशिश में शामिल न हो। मन्नत से लेकर दुआओं तक, चेकउप से लेकर आई वी एफ तक सब कुछ आजमाया जा चुका था। कोई उससे खुल कर नहीं कहता लेकिन अब कही न कहीं परिवार भी …...। पर फिर भी ये उसका परिवार है। जब उन्होंने उसकी कमी के साथ उसे अपनाया है तो उसको भी कुछ तो बर्दाश्त करना होगा।

एक दिन माधवी को उसकी एक दोस्त से पता चला की वो दूसरी बार भी एक बेटी की माँ बनेगी, उसने टेस्ट करवाया है। पर उसके पति चाहते हैं कि वो गर्भपात कर ले, पर वो ऐसा नहीं चाहती वो इस बच्ची को जन्म देना चाहती है। शाम को माधवी ने अपबे पति को ये बात बताई, और अपने मन का ख्याल भी। “ सुनो अगर हम उसकी इस बच्ची को गोद ले लें तो?” “ नहीं” “ क्यूँ नहीं , इससे हमें बच्चा मिल जायेगा और मेरी दोस्त की गर्भपात न करने की इच्छा भी पूरी हो जायेगी।”

“ नहीं हम ये बच्चा गोद नहीं ले सकते।” “ क्यूँ ?” “ क्यूंकि मुझे एक बेटा चाहिए।” “बेटा!!” “हाँ , बेटा। इतने साल बाद किसी बच्चे के माँ बाप बने और वो भी एक लड़की के।”

माधवी अपने पति के इस जवाब से हैरान थी। उसने अपने पति का यह रूप कभी नहीं देखा था। उनकी इस सोच से तो वो परिचित ही नहीं थी। उसके पति भी बेटा और बेटी की सोच में उलझे हुए हैं यह तो वो जानती ही नहीं थी क्यूंकि घर के बच्चों में उन्होंने कभी यह फर्क किया ही नहीं उन्हें घर के लड़के और लड़की दोनों बराबर प्यारे थ। घर में एक ही बेटी थी जो सबकी लाडली थी। सब जान छिड़कते थे उस पर। और माधवी के पति तो उसके सबसे प्यारे चाचू थे फिर आज ये लड़का लड़की की बात कहाँ से आ गयी।

कुछ और साल बीत गए अब तो माधवी ने हार ही मान ली थी। अक्सर वो बच्चा गोद लेने की बात करती तो…..। एक दिन हिम्मत कर उसने परिवार के बड़ों के सामने भी यही बात रखी तो सबने उसके पति की बात का समर्थन किया। पर वो सबसे एक बात पूछ रही थी की जिस तरह हम लड़का चाहते हैं उसी तरह और लोगों की भी तो सोच होगी तो कोई क्यूँ हमे अपना लड़का गोद देगा। और लड़का और लड़की से क्या फर्क पड़ना है। हमे तो अपने लिए संतान चाहिए न की वारिस। बहस हुई कुछ लोगों की सोच बदली और उसका समर्थन किया तो कुछ अपनी बाद पर टिके रहे।

आज 15 साल बाद माधवी की गोद भरी है….पूरा परिवार खुश है। क्यूंकि परिवार को उसका वारिस मिल गया है। जी, सरोगेसी के जरिये आज माधवी की गोद में एक प्यारा सा राजकुमार है। वो खुश है और अपनी पूरी ममता उस पर लुटा रही है। उसके लिए तो माँ बनना ऐसा है जैसे किसी ने उसकी गोद में चाँद उतार दिया हो। बरसों की ख्वाहिश अब पूरी हो गयी है। पर हाँ एक बात की उसने मन में ठान ली थी की अपने बच्चे को पालने में वो लड़का लड़की के फेर में नहीं पड़ेगी। उसका सिर्फ एक मकसद है अब अपने बच्चे को पढ़ा लिखा कर एक बेहतरीन इंसान बनाना जो इस समाज के दोगुले चेहरे को तोड़ सके। आज उसकी गोद जरूर भर गयी है , पर वो आज भी उस भेदभाव से नाराज़ है जिसकी वजह से उसकी गोद इतने साल सूनी रही।



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