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@dawriter

बहू हूँ कोई गुलाम नहीं

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संजना की शादी सुमित से तय हो गई, संजना अपनी शादी को लेकर बहुत उत्साहित थी। अपनी शादी की खबर देने के लिए संजना ने अपनी खास सहेली सपना के यहां फोन लगाया फोन सपना के पति ने उठाया क्या मैं सपना से बात कर सकती हूं, सपना यहां नहीं रहती कह तुरंत सपना के पति ने फोन काट दिया।

फोन कटने के बाद भी संजना ने कई बार फोन लगाया पर कोई भी बात न हुई, संजना सोच में पड़ गई कि आखिर, सपना के पति ने ऐसा क्यूं कहा कि सपना यहां नहीं रहती।

इसी उलझन में संजना ने सपना के मायके फोन किया अब फोन सपना ने उठाया, संजना हैरान होते हुए बोली तू मायके कब आई, वापसी कब की है ससुराल की, तूने मुझे बताया भी नहीं कि तू आई हुई है वो तो तेरे ससुराल फोन लगाने पर जीजू ने कहा सपना यहां नहीं रहती पर यार जीजू ने सपना मायके गई है कि जगह ऐसा क्यूं कहा, अरे संजना एक साथ इतने सवाल थोड़ी सांस तो ले लो, बात बदलते हुए सपना पूछती है पहले तू यह बता तूने मुझे कैसे याद किया, यार सपना मेरी शादी तय हो गई। मै तो तुझे यही बताने के लिए काल किया पर यार तू बात मत टाल मुझे आखिर बता तो सही आखिर जीजू ने ऐसा क्यूं कहा, संजना मै तुम्हे यह सब फोन पर नहीं बता सकती, कल मिलते हैं फिर बात करते हैं।

निश्चित जगह और समय पर संजना पहुंच गई और सपना भी, संजना सपना को देखकर हैरान हो जाती है, यार सपना यह क्या हाल बना लिया तूने कितनी कमजोर हो गई हो और तुम्हारे चेहरे का नूर भी कहा खो गया।

संजना बस मेरी सोच ने ही मेरा ऐसा हाल किया है, तू तो जानती है कि मैं रिश्तों को कितनी अहमियत देती थी, प्यार सम्मान, रिश्ते बस यहीं तो मेरी दुनिया थी इसी को पाने की चाहत में जो करना पड़ा करती गई, हर मोड़ पर अपनी खुशियों का, इच्छाओं का त्याग करती गई वह सब का नतीजा यह हुआ कि मैंने खुद को ही खो दिया।

ऐसा भी क्या हुआ सपना जरा साफ़-साफ समझा पहेलियां मत डाल।

संजना तुझे तो पता है कि मैं अपनी शादी को लेकर कितना खुश थी कि इतना अच्छा परिवार मुझे मिल रहा है, न जाने कितने ही सपने मैंने सजाए थे, पर शादी होने के बाद मेरा वास्तविकता से परिचय हुआ कि बहू होना बहुत मुश्किल है।

बहू बन अपनी सारी खुशियां, फैसले सब तुम्हारे ससुराल वालों के हाथ है, एक कदम भी तुम अपनी मर्जी से नहीं चल सकती ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ संजना।

मेरे ससुराल में सब फैसले मेरी सास ही लेती है, परिवार के सब सदस्यों को वह अपनी ही मनमर्जी से चलाती है, जो सांस की बात न माने उस सदस्य को खुब खरी खोटी सुननी पड़ती है चाहे वह सही हो।

शादी के दूसरे दिन से ही जैसे मेरी सास कहती वह सब मैं करती रहती, फिर मैंने कब क्या पहनना है क्या खाना है, कहा जाना है, कितना बोलना है, कितना हंसना है सब सांस ही तय करती। शुरू में तो मैं सब मान रही थी पर धीरे धीरे मुझे इन सबसे घुटन होने लगी, तो मैंने अपनी सांस से अपने मन का करने के लिए पूछा तो वह हर बार यही कहती की तुम इस घर की बहू हो जो हम कहेंगे वहीं करना पड़ेगा।

जब मैंने अपने पति से इस बारे में बात की तो उनका जवाब था कि अगर इस घर में रहना है तो मां की हर बात माननी पड़ेगी, जैसा भी मां कहेगी वह सब तुम्हें करना होगा चाहे तुम खुश हो या दुखी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता बस मां की हर बात पूरी होनी चाहिए।

पूरा परिवार ही मुझे सास की हर सही -गलत बात को मानने के लिए बहू हो तुम कह दबाव डालता रहता, जो मैं न सह सकीं और उस घर को छोड़ आई।

बहू हूँ कोई गुलाम नहीं जो सब ससुराल वालों की इच्छा अनुसार सब कार्य करूँ अपने लिए भी कोई फैसले न ले सकूं। तो संजना यार मैंने उस घर को छोड़ना ही सही समझा।

पर सपना अब तुम क्या करोगी, यार संजना अब मैं अपनी पढ़ाई और नौकरी कर खुद को आत्मनिर्भर बनाऊंगी, इस में मम्मी-पापा भी मेरे साथ हैं उन्होंने मेरा साथ दे मुझे नये आत्म विश्वास से भर दिया है, सही है सपना मेरी शुभकामनाएं तेरे साथ हैं,चल संजना अब मैं घर चलती हूं बहुत देर हो रही है, ठीक है सपना पर तू मेरी शादी में जरूर आना कह दोनों सहेलियां अपने घर की तरफ रूख करती हैं।

सच में आज भी हमारे समाज में बहू को गुलाम ही समझा जाता है, हर एक बहू से सम्बंधित फैसले ससुराल वाले ही लेते हैं, खुद से बहू कुछ नहीं कर सकती अगर कभी कोई फैसला बहू स्वयं लें लिया तो मानो अपराध हो गया। आप मेरे साथ कितना सहमत हैं इस से सम्बंधित अपने अमूल्य विचार जरूर दें।

आपकों क्या लगता है कि सपना ने जो किया सही किया क्या। इस बारे में भी बताए।

इस कहानी में एक रूप दिखाया है ससुराल का जो अधिकतर हमे अपने समाज में देखने को मिलता है कहानी का अगला भाग और ससुराल का दूसरा रूप जो बहुत कम देखने को मिलता है वह जल्द ही लाउंगी।

आपका धन्यवाद लेख पढ़ने के लिए।



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