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@dawriter

फिर आओगी?

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rakhi1706 by  
rakhi1706

कहते हैं सूरत नहीं सीरत देखनी चाहिये यह बात कहाँ तक सच है पता नहीं पर मेरे अनुभव से तो लोग पहले सूरत ही देखते हैं। वैवाहिक विज्ञापन को ही लें तो वधू चाहिये गोरी, देखने में सुंदर, पढ़ी-लिखी....। सबसे पहले सूरत बाद में और कुछ।

रूपाली एक छोटे कस्बे में पली-बड़ी अपने माता-पिता की अकेली संतान थी। वह बचपन से ही हँसमुख और समझदार थी। देखने वाले उसे अधिक सुंदर नहीं कहेंगे, पर उसे उपनी माँ का रूपा कहकर पुकारना बहुत अच्छा लगता था। जब कभी उसकी सहेलियाँ उसे उसके रूप रंग को लेकर चिड़ाती तो वो माँ के पास आकर पूछती माँ मैं सुंदर क्यों नहीं हूँ? सब मेरा मजाक बनाते हैं। तब माँ उसे अपने पास बिठाकर बड़े प्यार से समझाती कौन कहता है, तू तो मेरी रूपा है, है ना? यह सुनकर वह सब भूल जाती और फिर हँसकर कहती हाँ। फिर माँ आगे समझाते हुए कहती बेटी रूप से ज्यादा गुणों का महत्व होता है, रूप तो समय के साथ ढल जायेगा पर गुण सदा तुम्हारे साथ रहेंगे और यही तुम्हारी सबसे बड़ी पूँजी हैं। वह समय के साथ बड़ी होती गयी और चाहे घर के काम हों, रिश्ते निभाना हो या फिर समाजसेवा का कोई भी कार्य, सब में वह हमेशा आगे रहती। जो उससे मिलता उसकी तारीफ किये बिना नहीं रह पाता।

हमारे समाज में लड़की के जीवन को पूर्ण संज्ञा विवाह के पश्चात ही मिलती है और इस से रूपाली भी अछूती नहीं रही....उसका विवाह आशीष मेहता के साथ तय हो गया जो एक कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत थे। विवाह के पश्चात शहर आने के कुछ समय में ही उसने धीरे-धीरे यहाँ के परिवेश में अपने आप को ढाल लिया। पति-बच्चों के इर्दगिर्द ही उसकी दिनचर्या घूमने लगी। इसी सब के बीच पति को एवार्ड मिलने की खुशी में उसने पार्टी करने का सोचा और इस बारे में मि. मेहता से बात की। उन्होने भी उसके इस प्रस्ताव पर सहर्ष मोहर लगा दी और यह निश्चित हो गया कि रविवार को पार्टी होगी। रूपाली मेहताजी के साथ मिलकर पार्टी में बुलाये जाने वाले मेहमानों की लिस्ट तैयार करने लगी, अचानक ही मेहताजी बोले, “मिस्टर वर्मा को बुलाना मत भूलना...और शुचि को तो अवश्य ही बुलाना..”...दो पल के लिए रूपाली के चेहरे के रंग ही बदल गये...इतने हक से तो मेहता जी ने उसका भी नाम नहीं लिया आज तक....मेहताजी संभलते हुए बोले...”अरे तुम तो जानती ही हो मिस्टर वर्मा मेरे कितने अच्छे मित्र हैं...!!”...यह कहते हुए वो वहां से चले गये पर रूपाली के मन अब थोड़ा सा खट्टा हो गया था परन्तु बच्चों का उत्साह देख वो फिर मुस्कुरा कर काम में लग गयी।

पार्टी की तैयारी के लिए उसके पास दो ही दिन बाकी थे, उसे लगा समय कम है और काम ज्यादा है कैसे होगा, “सब हो जायेगा, नॉट फिकर बट नवर चिंता”, कहकर अपने आप ही मुस्करा दी जैसे अपने आप को हिम्मत दे रही हो। मेन्यू बनाने से लेकर कौन क्या पहनेगा, कौनसी चीज़ कहां रखी जाएगी, और सजावट कैसे की जाएगी, सब कुछ रूपाली ने अपनी देख रेख में करवाया....दिन खत्म होते होते वो थक कर चूर थी पर उसके चेहरे पर सन्तुष्ट होने के भाव थे...जैसे उसने अपना कर्तव्य भलीभांति पूरा कर दिया हो....

रविवार को वह सुबह से ही यह देखने में व्यस्त हो गयी कि खाने-पीने, साज सज्जा सब की व्यवस्था उसके अनुसार चल रही हैं या नहीं। मेहता जी को अपनी ओर आते देख उसने पार्टी की व्यवस्था ठीक है या नहीं देखने को कहा तो उन्होंने हँसते हुए कह दिया कि अरे भई, इतने साल हो गये, अब तो तुम परफेक्ट हो ही गयी होगी... फोन पर बात करते हुए कमरे में चले गये। रूपाली को समझ तो नहीं आया कि उसे तारीफ समझे या नहीं, पर इतने सालों में बातों को नज़रअंदाज़ करने और अपनी अनुसार समस्या का समाधान निकालने में ज़रूर परफेक्ट हो गयी थी....रूपाली ने रसोई में जाकर खाने-पीने की व्यवसथा देखी फिर लॉन में जाकर एक बार सारी तैयारी का मुआयना किया घड़ी देखी तो 5.30 बज रहे थे उसने सोचा कि अभी समय है तो एक कप गर्मागर्म चाय पीकर थोड़ा फ्रेश हुआ जाये.....

पार्टी का समय शाम 7.30 दिया था। शाम को रूपाली ने सब तैयारी पर एक नजर डाली और अश्वस्त होकर मेहता जी को तैयार होने को कह स्वयं भी तैयार होने चली गयी। सही समय से मेहमान आने शुरू हो गये। रूपाली और मेहता जी लोगों का स्वागत करने में व्यस्त हो गये। रूपाली सबके पास जाकर उनके हाल-चाल जान रही थी व स्नैक्स लेने का आग्रह कर रही थी। सब बातें करने में व्यस्त थे। महिलाओं की बातों का केंद्र रूपाली थी, एक महिला ने रूपाली को देखकर कहा, “देखो तो ज़रा, मिसेज मेहता ने साड़ी कैसी पहनी है, पल्ले पर भला ऐसी पिन कौन लगाता है,” ... दूसरी बोली, “अरे, छोटे घर से हैं न मिसेज मेहता तो...। अब उन्हें क्या पता फैशन किस चिड़िया का नाम है...मि. मेहता तो बहुत हैंडसम हैं और मिसेज मेहता......” यह थी शुचि, मि. मेहता के ‘ख़ास’ मित्र मिस्टर वर्मा की धर्मपत्नी....। रूपाली को अपनी ओर आता देख सब चुप हो गये और बात बदल दी। शुचि ने बनावटी अंदाज़ में कहा, “अरे रूपाली दीदी, आज आप बहुत सुंदर लग रहीं हैं, साड़ी का गुलाबी रंग तो आप....आज तो मेहताजी की नजरें आप पर ही रहेंगी।” रूपाली ‘दीदी’ सुन कर हल्का सा मुस्करा दी, और फिर संयत हो कर बोली, “आप सब ने खाने के लिए तो कुछ लिया ही नहीं..”। शुचि तपाक से बोली, “अरे दीदी, सब कुछ बहुत टेस्टी है.... मुझे भी आप से सीखना है... मुझे सीखायेंगी न आप… जब भी कहेंगी मैं आपके घर सीखने आ जाऊँगी।” फिर बाकी महिलाओं कि तरफ देख कर बोली, “तभी तो मैं सोचूं की मेहता जी जैसे शहर के बाबू हमारी सीधी- साधी दीदी के चक्कर में कैसे आ गए...अब समझ आया...दीदी के हाथ का जादू है....”..रूपाली कुछ जवाब देती उसका फोन आ गया और वो एसक्यूजमी कहकर फोन पर बात करने के लिए वहाँ से चली गयी। पास में खड़ें मि. मेहता महिलाओं के पास आकर उनकी बातों में शामिल हो गये। हँसी मजाक मर्यादा की सीमा लाँघने लगी और यह सब दूर खड़ी रूपाली देख रही थी। यह सब रूपाली के लिए नया नहीं था पर हर बार यह सोच कर नजरंदाज कर देती कि बात बढ़ाने से कोई फायदा नहीं होगा।

वैसे तो रूपाली सबसे बस औपचारिक रूप से से ही बात करती थी, पर आज वो खुद ही शुचि के पास गयी और बोली, “शुचि, तुम घर आने के लिए कह रहीं थीं न, तो कल ही आ जाओ ना, मैं तुम्हारा इंतजार करूँगी।” यह कह कर रूपाली बाकी मेहमानों की आवाभगत करने के लिए चली गयी। पार्टी खत्म होने के बाद, रूपाली कपड़े बदलकर चुपचाप लेट तो गयी पर वह पार्टी मे हुई बातें उसके दिमाग में अभी भी चल रही थी। वैसे तो हर बार उसका मन माँ की दी सीख “बेटी रूप से ज्यादा गुणों का... ये तुम्हारी पूँजी हैं।” को याद करके शांत हो जाता था, पर आज ऐसा नहीं हुआ। आज उसे खुद का पढ़ा एक वाक्य याद आ रहा था, “अपना मूल्य स्थापित करने के लिए पहला कदम खुद को ही उठाना पड़ता है।“ इसी को सोचते सोचते कब उसकी आँख लग गयी पता ही नहीं चला।
सुबह उठकर फिर वह अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गयी। मेहताजी के ऑफिस जाने के बाद वह बैठी ही थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी, जाकर देखा तो दरवाजे पर शुचि थी। इससे पहले रूपाली कुछ कहती, शुचि साड़ी का पल्लू घुमाते हुए अन्दर आते हुए बोली, “अरे दीदी, मेहता जी ऑफिस चले गए क्या? मुझे लगा उनसे भी मुलाकात हो जाएगी!” रूपाली चेहरे पर हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, “कोई बात नहीं शुचि, आज मुझसे ही बात कर लो....मेहता जी से तो तुम बात करती ही हो।” यह सुनकर शुचि ने अचकचाकर बोली, “अरे दीदी मैं तो ऐसे ही पूछ रही थी..आई तो आपसे ही मिलने हूँ...”। रूपाली ने बात बदलते हुए शुचि से बैठने के लिए कहा और नौकर को कुछ नाश्ता व ठंडा लाने के लिए कहा। इधर उधर की बात करते करते पार्टी का जिक्र हुआ। रूपाली बोली,“वैसे कल पार्टी में मिसेज छाबड़ा सबके सामने कैसे कह रहीं थी कि उनके पति दिन में चार-चार गोलियाँ लेते हैं, अब यह भी कोई शोऑफ करने की बात है...आप ही बताइये हम तो कभी किसी के सामने नहीं कहते की मेहताजी दिन में 6-6 गोलियाँ खाते हैं। हम छोटी जगह से हैं पर इतना तो हम भी जानते हैं कि किस से कितनी बात करनी है और सबके सामने क्या कहना और करना चाहिए। हम सही कह रहे हैं न....” शुचि कुछ कहती उस से पहले ही रूपाली कहने लगी, “मेहता जी को कब्ज की शिकायत रहती है... डॉक्टर उनसे घूमने व व्यायाम करने को कहते हैं तो वे डॉक्टर को ही वेबकूफ कहते हैं”। शुचि बीच में ही बोल पड़ी, “मेहताजी को देखकर तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगता... वे तो एकदम चुस्त, तंदरूस्त ,मजाकिया स्वभाव के हैं। वे तो एक मुलाकात में ही सब को अपना बना लेते हैं”....

“अब यह तो मेहताजी की खूबी है.....हम से अच्छा उन्हें कौन जान सकता है।“ यह रूपाली थी। “वैसे इनके घर में सभी ऐसे ही हैं ,घर की मुर्गी दाल बराबर....लडकियाँ तो मीठी-मीठी बातों के झाँसे में जल्दी आ भी जाती हैं। हम छोटे घर से जरूर हैं पर हम सब समझते हैं इस लिए हम किसी को घास नहीं डालते।“

इस बीच शंकर नाश्ता ले आया। रूपाली ने जैसे ही शुचि के सामने पकौड़े की प्लेट रखी पहले तो शुचि ने यह कह कर टाल दिया कि इतना ऑयली वो नहीं खाती, मुझे अधिक तला-भूना खाकर अपनी फिगर नहीं बिगाड़नी है… मैं बहनजी टाइप नहीं बनना चाहती। पर फिर यह कह कि दीदी अब आप इतना कह रही हैं तो चख लेती हूँ, उसने एक पकौड़ा खट्टी चटनी से लगा कर ले लिया।

चटकारे लेते हुए शुचि बोली, “दीदी, चटनी तो बड़ी मजेदार है! क्या क्या डाला है इसमें?”। रूपाली बड़े मजे से बोली, “चटनी बनाने में क्या है.... हरी धनिया, पुदीना, हरी मिर्च, नमक और खटाई... सब को एक साथ पीस लो..पर हाँ यह सब अपने घर का हो तभी ऐसा स्वाद आता है। मैंने तो ये सब घर पर ही उगाया हुआ है.....देखा ही होगा तुमने। जो भी घर का बेकार सामान होता है उसे बाहर मिट्टी में डाल देते हैं, उसे क्या कहते हैं किचन गार्डन में, फिर जैविकखाद बन जाती है।”

आगे बताते हुए रूपाली बोली, “अरे तुम्हे राजू के बारे में बताती हूँ....हमारे यहाँ नौकर था...वह यह सब कुछ बहुत ही बढ़िया बनाता था। उसके हाथ का बना खाती तो पेट भर जाता पर मन नहीं भरता।” शुचि ने पूछा, “ कहाँ है फिर ये मास्टरशेफ राजू, उससे बनाना सीख लेती हूँ कुछ।” रूपाली ने जैसे उसकी बात को अनसुना सा कर दिया,”हम उसे ऋषिकेश से लाये थे। मेहताजी तो उसके बनाये खाने के दीवाने हो गये थे। कुछ ही दिनों में वह घर के साथ–साथ मेहताजी के साथ ऑफिस जाने लगा, वहाँ छोटे मोटे काम कर देता तो उसे ऑफिस से भी कुछ पैसे मिल जाते। फिर शाम को आकर घर के काम भी करता था। उसके रहते मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई।”

रूपाली ने आगे बताते हुए कहा, “राजू कुछ दिन की छुट्टी लेकर शादी करने गाँव गया था। कुछ दिन बाद वह अपनी पत्नी को लेकर वापस आया। उसकी पत्नी बहुत सुंदर थी, रंग तो दूध की तरह सफेद। राजू पहले ही की तरह काम करने लगा।“ शुचि बोली, “ और उसकी पत्नी क्या करती थी?”।

“वह हमारे यहाँ काम नहीं करती थी, राजू कहता था की हमारे घर की औरतें बाहर किसी के यहाँ काम नहीं करती इसलिए वह अपने कमरे पर ही रहती। राजू अब पहले से ज्यादा खुश दिखता था, आखिर शादी हुई थी। सब कुछ ठीक चल रहा था। एक रात उसके कमरे से जोर-जोर से बोलने की आवाज आ रही थी। हमने सोचा नई-नई शादी हुई है, अब नोकझोंक तो चलती ही रहती हैं, हो गयी होगी किसी बात को लेकर दोनों में कहा सुनी!......अगले दिन राजू काम करने आया तो ठीक लग रहा था तो हमने भी उससे कुछ नहीं पूछा। पर धीरे-धीरे ये आवाजें अकसर आने लगीं। राजू भी कुछ खोया खोया सा रहने लगा…वह बोलता तो पहले से ही कम था पर अब तो एक बात को कई-कई बार पूछो तो जवाब देता। उसकी आँखों को देखकर ऐसा लगता कुछ ऐसा है जिसने इसके मन पर गहरा असर किया है। कोई बात थी जो उसके मन को परेशान कर रही थी या अंदर ही अंदर कचोट रही थी। एक दिन मेहता जी ने राजू से पूछा भी कि राजू कोई परेशानी है तो बताओ ऐसे चुप-चुप क्यों रहते हो घर मे तो सब सही है ना,पैसे की जरूरत है.. जो भी है खुलकर बताओ। उसने कहा नहीं सब ठीक है। नीचे नजरे किये हुए ही बोला, बस पत्नी को गाँव लेकर जाना है। मेहताजी हँसते हुए बोले तो ये बात है पत्नी मायके जाने की जिद्द किये बैठी है...उन्होंने राजू को कुछ पैसे दिये और जाने के लिए कह दिया। वह दो दिन बाद अपनी पत्नी को लेकर गाँव चला गया और जाते हुए जल्दी वापस आने को कह गया।

शुचि का पूरा ध्यान अब रूपाली पर था। शुचि को देख रूपाली बोली, “अरे मैं भी तुम्हे क्या बताने लगी, छोड़ो,...” शुचि रूपाली का हाथ पकड़ते हुए बोली नहीं नहीं दीदी आगे बताओ ना....! रूपाली बोली, “अगर तुम कहती हो तो सुनो, उसे गाँव गये एक महीने से ज्यादा हो गया था पर वहाँ से उसने न तो फोन ही किया न ही किसी के हाथ खबर ही भेजी कि वह कब आयेगा। अब हमें लगा की वह नहीं आयेगा लेकिन एक दिन अचानक राजू वापस आ गया....मेहताजी ऑफिस जाने के लिए तैयार हो ही रहे थे उसे आया देखकर सब खुश हुए। वह भी ठीक लग रहा था। पर वो अकेला ही आया था….उससे पूछा तो दो मिनट तो चुप रहा फिर धीरे से बोला, दीदी उसे गुजरे तो 20 दिन हो गये। मैं उसकी तरफ देखने लगी, मेरे पूछने पर कि कैसे मर गयी, जब यहाँ से गयी थी तो बिल्कुल ठीक थी न फिर अचानक...वह कुछ नहीं बोला। पर मेरे मन में उसकी अचानक मृत्यु को लेकर अनेक प्रश्न उठ रहे थे...कहीं राजू की पत्नी का किसी और के साथ संबंध तो नहीं था..। अब हम तो छोटे शहर के हैं...ऐसी बातें तो सुनते ही रहते हैं....पर फिर भी हमने विचारों को अपने दिमाग से निकालने की कोशिश की। हम हैं तो छोटे घर से पर यह अच्छी तरह समझते हैं कि आदमी स्वयं कुछ भी करे पर औरत की बेवफाई सहन नहीं कर सकता।

अब शुचि के चेहरे के रंग बदल रहे थे। रूपाली गंभीर होते हुए आगे बोली, “अगले दिन सुबह मैं अपने किचन गार्डन में सब्जी देख रही थी, तभी राजू मेरे पास आया और एक छोटा सा थैला दिखाकर बोला दीदी मैं आपके लिए गाँव से अच्छी मिट्टी लेकर आया हूं। मैंने कहा तू ही डाल दे...जब वह उस मिट्टी को क्यारी में डाल रहा था तो वह कुछ साथ साथ बोल भी रहा था पर हमें कुछ समझ नहीं आया। पर उसके चेहरे के आ रहे भावों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसको धोखा दिया हो और वह उससे बदला लेने के बाद कह रहा हो देख जहाँ तूने मुझे धोखा दिया वही तुझे मैंने मिट्टी में मिला दिया। सच तो नहीं पता चला पर कुछ दिन बाद उसने बताया उसे अपने गाँव के पास ही नौकरी मिल गयी है, और वह जाना चाहता है तो हमने भी यह सोचकर अपने घर वालों के पास रहेगा उसे नहीं रोका और वह वापस अपने गाँव चला गया।“

शुची का अब मेहताजी के यहाँ आने का उत्साह ठंडा हो गया था। वह अचानक ही घर जाने के लिए उठ खड़ी हुई तो रूपाली ने कहा, “रूको मैं तुम्हारे लिए कुछ पकौड़े व खट्टी चटनी पैक करके लाती हूँ....” पर शुची बिना रूके दरवाजे की ओर चल दी। शुचि ने मुड़कर देखा तो रूपाली अपने किचन गार्डन के पास खड़ी हाथ हिलाते हुए बोल रही थी, “शुचि, फिर आओगी?”



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