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@dawriter

प्रतिस्थापन

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कृपया पढ़ने से पहले हम आपको यह सूचित करना चाहते हैं कि इस रचना में कुछ शब्द आपको असहज महसूस कर सकते हैं

सुबह आठ बजे घर के हॉल में टीशर्ट–लोअर पहनें सोफे पर बैठा उम्र में छत्तीस(36) साल का चिराग काम की फाइलें चैक करके ऑफ़िस–बैग में रख रहा है.

घर के खुले दरवाजे पर आकर बुर्का पहनें उम्र में उनचालिस(39) साल की शाज़िया चेहरे से नकाब हटाकर बोली—“चिराग साहब.”

शाज़िया को देखकर चिराग खड़ा होकर दरवाजें के पास आता है.

शाज़िया ने सलाम करते हुए कहा—“आदाब.”

चिराग—“आदाब, आपकी तारीफ़ ?”

शाज़िया—“चिराग साहब, मेरा नाम शाज़िया है. मेरा घर उजड़ने से बचा लो.”

चिराग—“मैं कुछ समझा नहीं. साफ़–साफ़ बताओ, क्या बात है ?”

शाज़िया—“आपकी बीवी ने मेरे शौहर को फँसा रखा है. शादीशुदा और एक बेटी की माँ होते हुए भी मेरा घर तबाह करने पर तुली है, बेशर्म कहीं की. उससे कहो, मेरे शौहर का पीछा छोड़ दें.”

चिराग ने बिगड़कर कहा—“क्या बकवास कर रही हो ? कौन हो तुम ? और कहाँ से आई हो ?”

शाज़िया—“मैं बकवास नहीं कर रही हूँ, चिराग साहब. अपनी बीवी पूछो, शादाब के साथ उसका क्या रिश्ता है ? गैर मर्द से मजे लुटने का बहुत शौक चढ़ा है उसे. आपको पता नहीं है, आपकी पीठ–पीछे आपकी बीवी मेरे शौहर के साथ हमबिस्तर होकर अपनी हवस मिटाती है. पहले तो ये दोनों घर से बाहर मिलते थे, लेकिन अब तो आपकी गैर–मौजूदगी में अपने जिस्म की आग बुझाने के लिए उसे यहीं घर पर बुला लेती है. चार–चार रातें मेरा शौहर यहाँ इस घर में इस बदचलन औरत के पास पड़ा रहता है.”

चिराग ने सख्ती से कहा—“तुम जानती हो, तुम क्या कह रही हो ?”

शाज़िया—“जी हाँ, मैं अच्छी तरह जानती हूँ, मैं क्या कह रही हूँ. अब आप भी जान लो, उस बदजात औरत की करतूत.”

शाज़िया एक–एक करके वो सब चिराग के सामने उगल देती है, जितना शाज़िया को मालूम है. चिराग गुस्से से शाजिया को “दो कौड़ी की नीच औरत” बोलकर खरी–खोटी बातें सुनाने के बाद दरवाजें से ही भगा देता है और वापस आकर सोफे पर बैठकर फाइलें चैक करके ऑफ़िस–बैग में रखने लगता है.

कुछ देर बाद ऊपर रसोई से निकलकर हाथों में दो चाय के कप लिए नाईटी पहनें उम्र में पैंत्तीस(35) साल की निकिता सीढ़िया उतरती हुई नीचे आकर एक कप चिराग को देकर सोफे पर बैठ गई.

चिराग ने चाय पीते हुए शाज़िया के घर आने से लेकर शाज़िया को भगाने तक का सारा किस्सा निकिता को बताकर कहा—“फालतू लोग! पता नहीं कहाँ–कहाँ से आ जाते है.”

निकिता पहले तो घबराकर सहम गई, लेकिन यह देखकर निकिता को तसल्ली हुई कि शाज़िया की बातों पर चिराग को तनिक भी विश्वास नहीं है.

रोज की तरह सुबह नौ बजे चिराग के ऑफ़िस जाने के बाद निकिता अपनी गलती पर अफ़सोस करके सोचती है कि चिराग को मुझ पर कितना विश्वास है. शाज़िया से सब कुछ सुनने के बाद भी चिराग ने मुझसे एक सवाल तक नहीं किया और मैनें शादाब के प्यार में चिराग को धोखा दिया.

दोपहर को निकिता के मोबाइल पर शादाब का कॉल आता है.

निकिता के कॉल रिसींव करते ही उम्र में इकतालिस(41) साल के शादाब ने गुस्से से आगबबूला होकर कहा—“तुम्हारे हैसबेंड ने शाज़िया की इतनी बैईज्जती कैसे की ? खुद की बीवी तो सम्भाल नहीं पाया और मेरी बीवी को जलील करता है, हरामी. वो जानता नहीं है, मैं कौन हूँ ?”

निकिता भड़ककर गुस्से से बोली—“अपनी जुबान सम्भालो, शादाब! ये बताओ, तुम्हारी बीवी की हिम्मत कैसे हुई, मेरे घर आने की ? सम्भाल तो वो भी तुम्हें नहीं पाई. तुम होते कौन हो, मेरे हैसबेंड के बारे में ऐसे बोलने वाले ? और किसी गलतफ़हमी में मत रहना. तुम्हारा दिमाग मैं भी ठीक करवा सकती हूँ.”

शादाब—“वाह…बड़ी जल्दी हैसबेंड की याद आई. जब रंडियों की तरह मुझसे मरवा रही थी(यह वाक्य पढ़कर आपको बुरा लगा होगा, इसलिए मैं क्षमाप्राथी हूँ, लेकिन यह सच्चाई है. आमतौर पर पुरुषों द्वारा महिलाओं के लिए इससे भी अत्यधिक गन्दे शब्द और गन्दे वाक्य बोले जाते है. मैं केवल यह बताना चाहता हूँ कि ऐसी बातें बोलने वाले अच्छे घरों की महिलाओं के सामने ऐसी बातें गलत इरादों में कामयाब होने के बाद बोलते है. पुनः क्षमा सहित सादर विनती), तब कहाँ था, तुम्हारा हैसबेंड ?”

निकिता—“तो पहले शाज़िया कहाँ मर गई थी, जो तुम हर वक्त मेरे केबिन के आस–पास मंडराकर अपनी गन्दी नजरों से मुझे घूरते थे ?”

खुद को सही और दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश में झगड़ते हुए शादाब और निकिता के बीच जबरदस्त बहस चलती है, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलने के बाद शादाब से “तेरी ----- में खुजली हो रही थी, तू मुझसे अपनी ----- फड़वाना(सोलह साल के नाबालिक लड़के ऐसी गालियाँ सुनकर ही लड़कियों के गुप्त–अंगों में लोहे की रॉड डालकर लड़कियों को चीरकर फाड़ते है. क्योंकि रोज–रोज गन्दी गालियाँ सुनने के कारण दिमाग भी गन्दा हो जाता है.) चाहती थी.” ढेर सारी गन्दी–गन्दी गालियाँ सुनकर निकिता ने कॉल काट दिया. निकिता अपनी आँखों से पछतावे के आँशू बहाती हुई फूट–फूटकर रोने लगती है.

रात को चिराग रोज की तरह घर आता है. चिराग और उम्र में नौ(9) साल की आन्या के साथ खाना खाकर निकिता रसोई का काम निपटाने के बाद आन्या को दुध पिलाकर अपने बैडरूम में आती है. बैड पर बैठा चिराग गहरी सोच में है.

चिराग के बराबर बैठकर निकिता ने कहा—“कहाँ खोए हो ?”

चिराग—“मैं सोच रहा हूँ, आज सुबह उस औरत ने तुम्हारे बारे में जो मुझे बताया. अगर वहीं सब मेरे बारे में किसी ने तुम्हें बताया होता, तो मैं फौरन उसके पास जाकर उसका गला पकड़कर कहता. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, मेरी वाईफ़ को मेरे बारे में इतना घटिया और गन्दा झूठ बोलने की. नैचूरल है. ऐसे घटिया और गन्दे इल्ज़ाम के कारण हमारा तेरह(13) साल का प्यार और दस(10) साल की हैप्पी मैरिड लाइफ़ सब कुछ खतम हो सकता है.”

निकिता के चेहरे पर चिन्ता की रेखाएँ उभर गई.

निकिता की तरफ़ देखकर चिराग ने कहा—“अब तुम्हें क्या हुआ ?”

निकिता ने खुद को संभालकर कहा—“तुम मुझ पर शक कर रहे हो ?”

चिराग—“बिल्कुल नहीं! मैं शक नहीं, यकिन कर रहा हूँ. उस औरत पर. अगर वो झूठी होती, तो तुम तिलमिला जाती. मैं तुम्हें रोकता तब भी तुम जाकर उससे कहती, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, मेरे ऊपर इतना घटिया और गन्दा इल्ज़ाम लगाने की ? तुम्हारे हैसबेंड को उस पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन उसने तुम्हारा घर उजाड़ने की कोशिश की है. तुम्हारे मन में ये नहीं आया, उसको तमाचे मारूँ, उसका मुँह नोंच लूँ ?”

निकिता—“अरे, तुम भी कैसी बातें करते हो ? उसके बदचलन कहने से मैं बदचलन हो जाऊँगी क्या ? इन बेहूदा लोगों के मुँह लगकर अपना मुँह खराब करने का क्या मतलब ? ऐसे लोगों को दूसरों पर झूठे इल्ज़ाम लगाने के सिवा और काम ही क्या है ?”

चिराग ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही है. आज ऑफ़िस जाकर मैं यहीं सब सोच रहा था. जब मुझे कुछ समझ नहीं आया, तो मैनें अपने पास जॉब करने वाली अलीशा और पल्लवी को केबिन में बुलाकर तुम्हारा नाम लिए बिना सब कुछ बताकर मैनें उनसे पूछा, कोई अन्जान औरत तुम्हारे पति को तुम्हारे बारे में ऐसा बोलती, तो तुम दोनों क्या करती ? दोनों ने जवाब अलग–अलग दिया, लेकिन दिया गुस्से वाला ही. झूठा इल्ज़ाम सुनकर सबको गुस्सा आता है. वो दोनों बहुत इंटेलीजेन्ट है, समझ गई, सर(बॉस) किसी उलझन में है. मैनें तुम्हारे ऑफ़िस का एडरेस देकर उन दोनों से कहा, इस कम्पनी में कुछ महिने पहले निकिता और शादाब नौकरी करते थे. तुम दोनों मेरे पास जॉब करती हो, किसी को ये बताए बिना पता करके आओ. निकिता और शादाब को नौकरी से क्यों हटाया था ?”

निकिता के चेहरे पर घबराहट और बैचेनी के भाव आते है.

चिराग ने गंभीर होकर आगे कहा—“शाम तक उन दोनों ने सब मालूम करके मुझे बताया, एक–दूसरे के चक्कर में नौकरी पर ध्यान नहीं देने के कारण शादाब को नौकरी से निकाल दिया और तुमने स्टाफ के लोगों की बातों से तंग आकर खुद नौकरी छोड़ दी.”

निकिता को तगड़ा झटका लगा और वो थर–थर काँपने लगती है.

चिराग ने आगे कहा—“कुछ बातें तुम्हारे ऑफ़िस के लोगों से पता चल गई और कुछ बातें अपने आप सामने आ गई. रमजान के महिने में शादाब के साथ तुमने रोजे भी रखे थे. बहुत धार्मिक बन गई हो, शादाब के प्यार में. सुबह उस औरत ने जो कुछ भी कहा, वो सब एकदम सच है. ट्रबल शूटर निकिता! ट्रबल शूट करते–करते खुद ही शूट हो गई.”

निकिता काँपती हुई कुछ बोलने लगी, लेकिन चिराग ने निकिता को बोलने से रोककर कहा—“मुझे माफ़ कर दो, उसने मुझे बातों के जाल में फँसा लिया, मैं अपनी फिलिंग्स पर कंट्रोल नहीं कर पाई, मैं बहक गई थी, मैं प्यार में अंधी हो गई थी, मैं तुम्हारी गुनहगार हूँ, प्लीज हो सकें, तो मुझे माफ़ कर दो या तुम जो सज़ा देना चाहो, मुझे मंजूर है. यहीं सब कहना है ना ?”

निकिता फूट–फूटकर रोने लगती है.

चिराग—“रो क्यों रही हो ? जो होना था, वो तो हो गया. रोने से कुछ भी बदलने वाला नहीं है. ये सब तुम्हें पहले सोचना चाहिए था. अगर तुम्हें मुझसे कोई शिकायत थी, तुम्हारे मन में कोई बात थी, तो तुम मुझे बोल सकती थी. तुम्हारी हर बात मैं हमेशा सुनता हूँ, फिर भी तुमने मुझे धोखा देना ही ठीक समझा. चलो, ये भी सही है. अब रोना बन्द करो और सो जाओ. कल बात करेंगे, इस बारे में.”

चिराग लेटकर करवट बदलकर सो जाता है और निकिता सारी रात जागकर चुपचाप सिसक–सिसककर शादाब से सुनी गन्दी–गन्दी गालियाँ याद करके अपने अन्जाम की कल्पना करती हुई गुजारती है.

सुबह आईने के सामने बाल बनाते चिराग के पास आकर चिराग के पैर पकड़कर रोती हुई निकिता गिड़गिड़ा–गिड़गिड़ाकर माफ़ी मांगती है.

निकिता को कंधों से पकड़कर खड़ी करके चिराग ने आँशू पोंछते हुए कहा—“रो क्यों रही हो ? मैनें कहा तो था, अब रोने से कुछ भी बदलने वाला नहीं है. प्यार होना था, हो गया. तुमने प्यार किया है, कोई क्राइम नहीं किया.”

निकिता रोना बन्द करके बोली—“लेकिन मैनें तुम्हें.”

निकिता की बात काटकर चिराग ने कहा—“तुमने मेरे साथ कुछ नहीं किया. मैं ही तुम्हारी इच्छाओं और जरूरतों का ध्यान नहीं रख पाया. अब तुम्हें घर में वो सब मिल जाता, तो वो सब पाने के लिए तुम किसी ओर के पास क्यों जाती ?”

चिराग की बातें सुनकर निकिता को कुछ समझ नहीं आया और आश्चर्य से चिराग की तरफ़ देखती है.

निकिता को असमंजस में देखकर चिराग ने कहा—“तुम घबराओ मत, मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूँगा. मैनें जो गलतियाँ की है, अब उन गलतियों को सुधारूँगा और तुम्हें तुम्हारा प्यार दिलवाऊँगा. लाओ, मुझे शादाब का नम्बर दो.”

निकिता—“कल मेरा शादाब के साथ.”

निकिता की बात पूरी होने से पहले चिराग ने कहा—“झगड़ा हो गया ?”

निकिता—“हाँ.”

चिराग—“कोई बात नहीं, प्यार में झगड़े तो होते ही रहते है.”

निकिता—“लेकिन कल.”

निकिता की बात काटकर चिराग बोला—“तुम नम्बर दो, मैं बात करता हूँ उससे.”

निकिता—“लेकिन मुझे उससे बात नहीं करनी अब.”

चिराग—“ये भी सही है. मुझसे छुपकर उसके साथ इंजॉय तो खूब किया. अब मैं तुम दोनों को मिलाने की बात कर रहा हूँ, तो बात नहीं करनी.”

निकिता—“तुम क्यों चाहते हो, मुझे और उसे मिलाना ? मैं तुम्हारी वाईफ़.”

निकिता की बात काटकर चिराग बोला—“नहीं हो. दिल से तुम शादाब की हो.”

निकिता—“नहीं, वो मेरी भूल थी और उसके लिए मैं तुमसे माफ़ी मांगती हूँ.”

चिराग—“माफ़ी वाली कोई बात ही नहीं है. तुम्हें प्यार हुआ और अब तुम्हारा प्यार तुम्हें दिलाकर मैं तुम्हें खुशियाँ देना चाहता हूँ.”

निकिता—“लेकिन मेरी खुशियाँ शादाब के साथ नहीं है. कल मैनें उसका असली रंग देख लिया.”

चिराग—“ऐसा क्या हुआ कल ?”

निकिता से निकिता की शादाब के साथ फोन पर हुई सारी बातें सुनकर चिराग प्यार से निकिता को समझाता है कि आदमी गुस्से में गाली–गलौच करते हुए ऐसा बोल देता है. तुम दिल छोटा मत करो. अब मैं उससे बात करता हूँ, वो फिर से पहले जैसा हो जाएँगा. चिराग के प्यार से गुजारिश करने पर निकिता बेबस होकर अपने मोबाइल में शादाब का नम्बर निकालकर चिराग को बताती है. चिराग अपने मोबाइल से कॉल लगाकर मोबाइल कान से लगाता है.

कॉल रिसींव होने पर चिराग ने कहा—“अस्सलाम अलेकुम, शादाब भाई.”

दूसरी तरफ़ कॉल पर शादाब ने कहा—“वालेकुम अस्सलाम, भाईजान. माफ़ करना, मैनें आपको पहचाना नहीं.”

चिराग—“सबसे पहले तो कल आपकी बेगम शाज़िया को मैनें बैईज्जत किया, उसके लिए माफ़ी चाहूँगा. मैं चिराग बोल रहा हूँ.”

शादाब—“ओह…बड़ी जल्दी एहसास हुआ, अपनी गलती का.”

चिराग—“हाँ. गलतियों को जितना जल्दी सुधार लिया जाएँ, उतना ठीक रहता है. कुछ और गलतियों को सुधारने के लिए आपसे मिलना है, इसलिए मैनें कॉल किया.”

शादाब पहले तो मिलने से साफ़ मना कर देता है, लेकिन चिराग के सौम्य ढंग से बात करके गुजारिश करने पर शाम को मिलने का बोलता है.

कॉल कटने के बाद चिराग ने निकिता से कहा—“अब चिन्ता मत करो, बहुत ही जल्द शादाब तुम्हारा होगा.”

निकिता के लिए यह अजीबो–गरीब परिस्थिति हो गई. निकिता के दिमाग में चिराग से ऐसी प्रतिक्रिया मिलने की कल्पना तक नहीं थी. निकिता कल तक चिराग और अपनी नौ साल की बेटी को छोड़कर शादाब के साथ भागने के लिए तैयार थी, लेकिन कल शादाब से गन्दी–गन्दी गालियाँ सुनकर निकिता को समझ आया कि शादाब के लिए निकिता सिर्फ सेक्स करके अपने शरीर से जबरदस्त मजे देने वाली मस्त चीज़ है. निकिता को शादाब से नफ़रत हो गई है और चिराग ने निकिता को शादाब के पास भेजने का फैसला कर लिया है, लेकिन धोखा देने के बाद निकिता किस मुँह से चिराग को कहें कि मैं शादाब के साथ नहीं, तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ. अब निकिता को अपनी गलती पर बहुत ज्यादा पछतावा होता है.

शाम को शादाब से मिलकर चिराग प्यार से समझाकर गुजारिश करते हुए शादाब को निकिता से शादी करने के लिए कहता है. शादाब अपनी शादीशुदा जिन्दगी, चोदह(14) साल की बेटी और नौ(9) साल के बेटे का बाप होने की दुहाई देकर साफ़–साफ़ मना करके चला जाता है.

चिराग ने कहा—“ये भी सही है. निकिता के साथ सेक्स करके शरीर के मजे लेते टाइम प्यार था. अब शादी की बात आते ही शादीशुदा और दो बच्चों का बाप हो गया.”

चिराग कई बार शादाब से मिलकर इस्लाम में चार शादी की इज़ाजत और धर्मेन्द्र–हेमा मालिनी जैसे कई उदाहरण देकर शादाब को निकिता से शादी करने के लिए समझाता है, लेकिन चिराग द्वारा शादाब को समझाने की हर कोशिश नाकाम होती है.

रात को बैडरूम में चिराग बैड पर लेटी हुई निकिता के पास बैठा शादाब को निकिता से शादी करने के लिए मनाने की तरकीब सोच रहा है.

निकिता ने बैठकर कहा—“तुम मेरी ये गलती माफ़ नहीं कर सकते ?”

निकिता की तरफ़ देखकर चिराग ने कहा—“ये भी सही है. तुम बार–बार अपने प्यार को गलती क्यों कह रही हो ? इतनी बार तुम्हें समझा चुका हूँ, फिर भी ? रही बात शादाब और तुम्हारे उस एक झगड़े की, तो आदमी गुस्से में गालियाँ निकाल देता है. और गालियाँ हर कोई निकालता है. कुछ मेरे जैसे इक्का–दुक्का लोग नहीं निकालते, इसका मतलब ये थोड़े ही है, दुनिया में कोई गाली नहीं निकालता.”

निकिता—“लेकिन उसके दिल में अब मेरे लिए पहले जैसी फिलिंग्स नहीं है.”

चिराग—“अरे, उस दिन वो गुस्से में था. तुम उसकी गुस्से में कहीं हुई बातों को दिल से लगा बैठी हो. उस एक दिन को छोड़कर उसके साथ बिताए बाकी दिनों को याद करके देखो, तुम्हें क्या महसुस होता है ?”

निकिता के मुँह फेरने पर चिराग ने शादाब के लिए निकिता के जज़्बातों को जगाने की कोशिश करते हुए कहा—“हम अभी एक–दूसरे के साथ है, लेकिन हमारे मन में एक–दूसरे के लिए कोई फिलिंग नहीं है. जरा सोचकर देखो, अगर इस वक्त मेरी जगह तुम्हारे साथ शादाब होता, तो शादाब के साथ तुम्हारी रात कितनी हसींन होती ? तुम्हारे दबे हुए अरमान जागते, तुम्हारे जज़्बात मचलते, तुम्हारा रोम–रोम खुशी से खिल जाता. उस एहसास को महसुस करके, अपने दिल से पूछो, तुम्हें किसकी जरूरत है ?”

जज़्बाती आवाज़ में चिराग की बातें सुनकर निकिता के दिल में शादाब के लिए भावनाएँ उमड़ने लगती है. निकिता पर अपनी बातों का असर होता देखकर चिराग और ज्यादा जज़्बाती आवाज़ में भावनात्मक बातें बोलकर निकिता को शादाब की जरूरत महसुस करवाने में कामयाब हुआ.

चिराग बचपन से ही अपने इरादों का पक्का है. एक बार जो सोच लिया, वो करके छोड़ता है. अपनी इसी आदत के कारण चिराग एक बार फिर शादाब से मिलता है.

चिराग ने शादाब से कहा—“देखो शादाब! मैं निकिता से बहुत प्यार करता हूँ और उसकी खुशी तुम्हारे साथ है. आज तुम खुद बताओ, मैं ऐसा क्या करूँ ? जो तुम उसे अपनी बना सको ?”

शादाब—“भाई, तुम उससे प्यार करते हो, तो उसकी शादी मुझसे करवाने पर क्यों तुले हो ? उस गलती के लिए निकिता को माफ़ कर दो और उसके साथ खुश रहो. दुनिया में कहीं सुना है, किसी बीवी से प्यार करने वाले शौहर ने अपनी बीवी की शादी बीवी के आशिक से करवाई हो ?”

चिराग—“ये भी सही है. खुद को मेरी बीवी का आशिक मानते हो, लेकिन शादी से इन्कार करते हो.”

शादाब—“चिराग साहब, मैं अपने बीवी–बच्चों से बहुत प्यार करता हूँ और मेरा यकिन मानो, निकिता के लिए तुम्हारा प्यार देखकर अब मुझे अपने किए पर बहुत अफ़सोस है.”

चिराग—“तुम्हें अफ़सोस करने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है. तुमने तो निकिता की जरूरत को समझकर निकिता को खुशी दी है. और अब मैं चाहता हूँ, निकिता की खुशी के लिए तुम उसे अपनी बना लो.”

शादाब—“नहीं, भाई. मुझे माफ़ करना. ये नहीं हो सकता. निकिता सिर्फ मुझे अच्छी लगी थी, इसलिए मैनें उसे प्रपोज कर दिया. और प्रपोज करने के बाद भी मैनें उसके साथ कोई जबरदस्ती नहीं की. वो खुद अपनी मरजी से मेरे पास आई थी. मैनें निकिता से शादी के बारे में कभी नहीं सोचा. इस जमाने में एक बीवी संभलती नहीं है और तुम दो रखने के लिए कह रहे हो.”

चिराग—“अरे, तुम एक क्या ? तुम तो चार भी संभाल सकते हो. संभाल तो मेरे जैसे नहीं पाते. अब मुझे ही देख लो. मेरे पास सब कुछ है, लेकिन निकिता की असली जरूरत तुमसे पूरी हुई.”

शादाब—“चिराग साहब, हम दोनों प्यार में बहक गए थे, वो एक जरूरत पूरी होने से जिन्दगी नहीं चलती. शादी के बाद घर चलाने के लिए रुपयों की जरूरत भी पड़ती है और मुझे अभी तक दूसरी नौकरी तक नहीं मिली है. शाज़िया पहले ही मेरा सर खाती रहती है. निकिता से शादी करके दो–दो को कैसे संभालूँगा ?”

चिराग—“अगर मैं तुम्हें एक अच्छी नौकरी दिलवा दूँ, तो सम्भल जाएँगी दो बीवियाँ ?”

शादाब कुछ बोलने लगता है.

शादाब को बोलने से रोककर चिराग ने कहा—“और नौकरी के साथ मेरे कहने पर एक फ्लेट भी मिल जाएँगा.”

शादाब सोच में पड़ जाता है.

शादाब पर असर होता देखकर चिराग ने कहा—“फिर भी कुछ कमी रह गई, तो शादी के बाद तुम्हें और निकिता को दस लाख रुपये भी दूँगा. उससे बाकी कमियाँ पूरी कर लेना.”

शादाब को चुपचाप सोच में डूबा देखकर चिराग ने कहा—“कुछ बोलो तो सही. मेरे लिए प्यार का मतलब निकिता की खुशी है. शादी के बाद भी जब कभी मेरी जरूरत हो, बेझिझक मेरे पास आ जाना.”

शादाब ने कहा—“चिराग साहब, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है. शाज़िया.”

शादाब की बात पूरी होने से पहले चिराग ने कहा—“बीस लाख दे दूँगा. पाँच लाख शाज़िया को दे देना. पन्द्रह लाख तुम्हारे और निकिता के लिए. और कुछ ?”

शादाब कुछ बोल नहीं पा रहा है.

शादाब को कमजोर पड़ता देखकर चिराग ने संजीदा आवाज़ में कहा—“सोच क्या रहे हो, शादाब ? निकिता से तुम्हें वो सुख मिलता है, जिसके लिए तुम शाज़िया जैसी हसींन और दिलकश बीवी के होते हुए भी तरस रहे थे. याद करो, उन पलों को, जो तुमने निकिता के साथ बिताए है. निकिता से शादी के बाद तुम फिर से उन लम्हों में जी सकोगें. नौकरी के साथ मिले फ्लेट में तुम निकिता के साथ अकेले रह सकते हो. सोचो शादाब, निकिता का मदहोश कर देने वाला हुस्न सिर्फ तुम्हारा होगा. निकिता के खूबसूरत बदन के शबाब का नशा सिर्फ तुम्हारे लिए. तुम और निकिता बिना किसी रोक–टोक के एक–दूसरे से प्यार करोगें. तुम फिर से प्यार को महसुस करने लगोगे. बच्चों को तो शाज़िया संभाल लेगी. और बीस क्या, पूरे पच्चीस लाख ही दे दूँगा. अकरम, शबनम और शाज़िया की जिन्दगी भी बेहत्तर हो जाएँगी. बच्चे खुश, शाज़िया खुश, निकिता का साथ. सब कुछ होगा तुम्हारे पास. तुम्हारी जिन्दगी कितनी खुशनुमा हो जाएँगी.”

शादाब को निकिता से शादी के लिए तैयार होता देखकर चिराग बेहद संजीदा आवाज में बात करते हुए पच्चीस लाख मिलने के बाद निकिता के साथ सेक्स की इंजॉयमेन्ट से भरपूर खूबसूरत जिन्दगी के सपने दिखाकर शादाब को ख्यालों की दुनिया में भेज देता है.

शादाब ने मन में सोचा कि निकिता जैसी गर्म औरत को बीवी बनाने में कोई बुराई तो नहीं है. और यहाँ तो निकिता के साथ–साथ नौकरी, फ्लेट और पच्चीस लाख रुपये भी मिल रहे है. सौदा बुरा नहीं है. लड़कियाँ और औरतें तो बहुत मिली, लेकिन ऐसी पहली बार मिली है. ये हिन्दू भी गजब होते है. हिन्दू औरतें जबरदस्त मजे देती है और हिन्दू मर्द इनके मजे लेने के लिए लाखों रुपये देते है. सुभान अल्लाह…औरतों को तो हिन्दू धर्म में ही पैदा होना चाहिए. मुसलमानों के पास आकर मुसलमान तो ये अपने आप बन जाती है. सच ही कहा है किसी ने, ऊपरवाला जब देता है, तो छप्पर फाड़कर देता है.

विशेष विनती:— इस तरह की बातें हिन्दू भी मुसलमानों के लिए बोलते और सोचते है, इसलिए आहत होने की जगह अपने आस–पास इस तरह की बातें बोलने और ऐसी सोच रखने वालों से सावधान रहना चाहिए. यह बात सभी कट्टरवादी लोगों के लिए है. अतः कहानी में मुस्लिम पात्र होने के कारण इसे मुस्लिम विरोधी न समझा जाएँ. इस काल्पनिक प्रकरण को आप बुरी सोच का विरोध समझ सकते है.

शादाब ने कहा—“चिराग साहब, तुम्हारा प्यार देखकर आज मुझे सच्चे दिल से बहुत शर्मिन्दगी महसुस हो रही है.”

चिराग—“शादाब…जो होता है, अच्छे के लिए होता है. तुम बस निकिता को हमेशा खुश रखना. उसे कभी कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.”

शादाब—“मैं वादा करता हूँ, चिराग साहब. मैं हमेशा निकिता को खुश रखूँगा. उसे मेरे पास कभी कोई तकलीफ़ नहीं होगी.”

चिराग—“बहुत–बहुत शुक्रिया.”

शादाब—“अरे, क्यों शर्मिन्दा करते हो ? चिराग साहब! शुक्रिया तो मुझे तुम्हारा करना चाहिए. अच्छा, भाई. मैं चलता हूँ.”

शादाब के उठकर जाने के बाद चिराग ने अपने चेहरे पर जीत की मुस्कान लिए घर आकर निकिता से कहा—“कॉन्ग्राचुलेशन, शादाब तुमसे शादी करने के लिए मान गया है.”

निकिता अब तक शादाब और चिराग को लेकर असमंजस में थी, लेकिन अभी चिराग के मुँह से “शादाब शादी के लिए मान गया है.” सुनते ही अचानक अन्दर ही अन्दर एक अजीब सी खुशी महसुस करके निकिता के चेहरे पर मुस्कान आती है.

रात के समय शादाब के घर में शाज़िया ने कोहराम मचा रखा है.

शादाब ने बहुत समझाया कि ये सब मैं सिर्फ तुम्हारे और अपने दोनों बच्चों के लिए ही कर रहा हूँ. निकिता तो बस टाइमपास है, निकिता को वहाँ फ्लेट में छोड़ दूँगा. एक बार पैसे आ जाएँ, फिर निकिता से कोई मतलब नहीं रखूँगा.

शाज़िया गुस्से से आगबबूला होकर चीखती हुई “मुझे और मेरे बच्चों को हराम की दौलत नहीं चाहिए.” बोलकर शादाब पर बरस पड़ती है. शादाब की किसी भी बात का शाज़िया पर कोई असर नहीं हुआ. शादाब समझा–बुझाकर शाज़िया को अपने कमरे में लाया और दरवाजा बन्द करके शाज़िया को बैड पर बिठाकर पच्चीस लाख के सपने दिखाने लगता है. जैसे चिराग ने शादाब को दिखाए थे.

शाज़िया ने भड़ककर कहा—“और कितना गिरोगे तुम, शादाब. पहले लड़कियों और औरतों के चक्कर में अपना ईमान भूल गए. और अब दौलत के चक्कर में अपना ईमान भूल रहे हो. अल्लाह से डर शादाब, अल्लाह से डर. याद रख, जब उसकी लाठी चलती है, तो आवाज़ नहीं होती, लेकिन मार ऐसी पड़ती है, जो सहन नहीं होती.”

शादाब के लाख समझाने पर भी जब शाज़िया टस से मस नहीं हुई, तो शादाब ने खड़े होकर चिल्लाते हुए कहा—“निकिता से शादी तो मैं जरूर करूँगा. चाहे इसके लिए तुझे छोड़ना पड़ जाएँ. मैं तेरी इन किताबी बातों के चक्कर में लाखों की दौलत को ठोकर नहीं मार सकता. अब आगे, तेरी मरजी है.”

शादाब दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर चला गया और शाज़िया “हाए अल्लाह, ये कैसा शौहर दिया है, मुझे. ये जिस्म की आग बुझाने गैर औरतों के पास जाता है. मैनें दिल पर पत्थर रखकर सहन कर लिया, लेकिन अब ये दौलत के लिए मुझे छोड़ने की बात कर रहा है. या अल्लाह…ये मुझसे सहन नहीं होता.” बोलती हुई फूट–फूटकर रोने लगती है. अकरम और शबनम कमरे में आकर शाज़िया को चुप करवाने की कोशिश करते है, लेकिन शाज़िया को बुरी तरह रोते देखकर “अम्मी–अम्मी” बोलते हुए शाज़िया से लिपटकर खुद भी रोने लगते है.

चिराग कोर्ट में अपने और निकिता के आपसी सहमती से तलाक लेने की याचिका दायर करता है. कोर्ट से घर आते हुए चिराग से अलग होने का एहसास करके निकिता कुछ अजीब सा महसुस करती है.

घर आने के बाद रात को बैडरूम में निकिता के डोलते इरादों को भाँपकर चिराग ने जज़्बाती आवाज़ में कहा—“प्यार का मतलब बंधन नहीं होता. मैं तुम्हें खुश देखना चाहता हूँ. तुमसे अलग होने के बाद भी मैं एक अच्छा दोस्त बनकर हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा, लेकिन मेरे पास तुम्हें वहीं अकेलापन, वहीं तन्हाई, वहीं कमी, वहीं घूटन सहन करनी पड़ेगी, जो तुम्हें उदास करती है. याद करो, उन पलों को, जो तुमने शादाब के साथ बिताए है. जिन पलों में तुम्हें वो एहसास मिले, जिनके लिए तुम तड़पती थी. वो लम्हें, जिनमें तुम्हारे दिल के सारे अरमान निकलते है. शादाब का वो साथ, जिसमें तुम्हारी हर जरूरत पूरी होती है. प्यार का वो एहसास, जो तुम्हें शादाब के साथ महसुस होता है. अब वो सब तुम्हें हमेशा के लिए मिल जाएँगा. सोचो निकिता, शादाब हमेशा के लिए सिर्फ तुम्हारा होगा.”

निकिता देर रात तक चिराग की जज़्बाती आवाज़ में शादाब की याद दिलाने वाली भावनात्मक बातें सुनकर शादाब को अपना बनाने के लिए मचल उठती है और शादाब के साथ भरपूर इंजॉयमेन्ट से सेक्स की जरूरत पूरी होने वाली जिन्दगी की कल्पना करती हुई सो गई.

तलाक प्रक्रिया शुरू होने के बाद अक्सर चिराग से अलग होने के ख्याल से निकिता डगमगाने लगती है. चिराग अपनी जज़्बाती बातों से हर बार परिस्थिति संभाल तो लेता है, लेकिन हर दूसरे–तीसरे दिन निकिता को हिचकोले खाती देखकर शादाब को दो कमरों वाले एक फ्लेट के साथ नई नौकरी दिलवाकर निकिता से मिलने की खुली छुट दे देता है. निकिता और शादाब की जबरदस्त जिस्मानी रिश्तों वाली मुलाकातें एक बार फिर शुरू होती है. इस बार किसी तरह का डर नहीं होने के कारण दोनों खुलकर पहले से भी ज्यादा इंजॉय करते है. निकिता के दिल से खुद को पूरी तरह मिटाकर शादाब और निकिता को एक–दूसरे के करीब करने की यह तरकीब कामयाब होती देखकर निकिता को भी शादाब के साथ नौकरी दिलवाकर चिराग उन दोनों को फ्लेट में साथ रहने की इज़ाजत देकर निकिता और शादाब के साथ–साथ प्यार के पक्षधर लोगों की नजरों में बेमिसाल इन्सान बन जाता है.

निकिता और शादाब प्रकरण को जानने वाले लोगों के लिए चिराग चर्चा का प्रमुख विषय है. कुछ लोगों के हिसाब से चिराग सच्चा प्रेमी है. कुछ लोगों के हिसाब से निकिता जैसी पत्नी के साथ रहना मुश्किल है, इसलिए चिराग ऐसा कर रहा है. कुछ लोग चिराग को धोखा देने के कारण निकिता और शादाब को या दोनों में से एक को कोसते है. कुछ लोगों के हिसाब से चिराग शाज़िया की जिन्दगी बर्बाद कर रहा है. कुछ कट्टरवादियों ने पूरा मामला समझे बिना लव–जिहाद का ढोल बजाना भी शुरू कर दिया है और ठरकी लोगों के हिसाब से तो सारे पुरुषों को चिराग जैसा बन जाना चाहिए.

चिराग की उम्र में नौ(9) साल की बेटी आन्या को स्कूल में सेक्स की समझ रखने वाले कुछ शरारती बच्चे निकिता के बारे में गन्दी बातें बोलते है. आन्या घर आकर रात को खाने के बाद चिराग से उन बातों के मतलब पूछती है. चिराग ऐसी बातें बोलने वालों से दूर रहकर पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहता है, लेकिन आन्या जिद करती हुई उन बातों के मतलब पूछ–पूछकर निकिता के बारे में पूछती है कि मम्मी कहाँ चली गई ? मम्मी क्यों चली गई ? मम्मी हमारे साथ क्यों नहीं रहती ? मम्मी कब आएँगी ? आन्या के सवालों से परेशान होकर चिराग गुस्से में आकर आन्या को बुरी तरह डांट देता है.

आन्या ने कहा—“आप बहुत बुरे हो. आने दो मम्मी को, मैं भी आपको छोड़कर मम्मी के साथ चली जाऊँगी.”

चिराग गुस्से से बेकाबू होकर आन्या के गालों पर एक के बाद एक चार चांटे जड़कर आन्या के गालों को लाल कर देता है. आन्या रोती–रोती भागकर अपने कमरे में चली गई.

गुस्सा ठंडा होने के बाद चिराग अफ़सोस करते हुए सोचता है कि माँ ऐसी निकल गई तो इसमें बेटी की क्या गलती ? निकिता का गुस्सा बच्ची पर क्यों निकाल रहा हूँ.

चिराग उठकर आन्या के कमरे में आता है. रोती हुई आन्या सहमकर चुप हो गई और डर से थर–थर काँपती हुई सिसकती–सिसकती दुबक कर बैठ गई.

आन्या के पास बैठकर चिराग ने कहा—“एम सॉरी.”

थर–थर काँपती हुई आन्या की आँखों से आँशू बहने लगते है.

चिराग ने कहा—“अरे, रोओ मत. देखो(अपने कान पकड़कर) मैं अपने कान पकड़कर तुमसे माफ़ी मांगता हूँ. प्लीज, मुझे माफ़ कर दो.”

आन्या रोती हुई बोली—“मुझे बहुत डर लग रहा है. आप मुझे मार तो नहीं दोगे ना. अब तो मम्मी भी घर पर नहीं है, मुझे बचाने के लिए.”

आन्या का हाथ पकड़कर चिराग ने आन्या को अपने पास बिठाना चाहा, लेकिन आन्या डरकर पीछे हो गई.

चिराग ने कहा—“डरो मत. मैं परेशान हूँ, इसलिए गुस्से में मैनें तुम्हें थप्पड़ मार दिये, वरना मैं तो तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, तुम्हारी मम्मी से भी ज्यादा.”

रोते–रोते आन्या ने कहा—“नहीं, मुझसे सिर्फ मम्मी प्यार करती है. मुझे आपके साथ नहीं रहना, मुझे मम्मी के पास जाना है.”

आन्या के आशूँ पोंछते हुए चिराग ने कहा—“मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ. देखो, अपनी गलती के लिए मैं सॉरी भी बोल रहा हूँ.”

चिराग से दूर होकर आन्या रोती हुई बोली—“मुझे मम्मी के पास भेज दो. मुझे आपके साथ नहीं रहना. आप मुझे अच्छे नहीं लगते, आप बहुत बुरे हो.”

चिराग—“अब कैसे समझाऊँ इसे ? मैनें कहा ना, अब नहीं मारूँगा. एम सॉरी.”

रोती हुई आन्या बोली—“आप हर बार मुझे मारने के बाद यहीं बोलते हो. मम्मी के बारे में कुछ बताते भी नहीं. मुझे मम्मी के पास जाना है. आपके साथ नहीं रहना.”

चिराग—“मैं प्रोमिस करता हूँ, अब नहीं मारूँगा.”

रोती हुई आन्या बोली—“नहीं, आप कभी अपना प्रोमिस पूरा नहीं करते. जब से मम्मी गई है, आप रोज मुझे डांटते हो. आपने मुझे रंडी का मतलब भी नहीं बताया. मेरे फ्रैंड ने कहा था, तेरी मम्मी से पूछना, वो तुझे जरूर बताएँगी. आप रंडी का मतलब भी नहीं बताते और मम्मी को भी नहीं बुलाते.”

चिराग की आँखों से आँशू बहते देखकर आन्या बोलती–बोलती रूककर रोना बन्द कर देती है.

आन्या ने अपने आशूँ पोंछकर कुछ देर बाद कहा—“एम सॉरी, पापा. इट्स ओके.”

चिराग रोने लगता है.

कुछ देर चुपचाप चिराग को रोता हुआ देखने के बाद आन्या ने चिराग के पास आकर कहा—“रोओ मत पापा. मैनें आपको माफ़ कर दिया. प्लीज, पापा. मत रोओ. एम सॉरी, पापा. अब मैं कुछ नहीं पूछूँगी. आप बुरे भी नहीं हो. आप बहुत अच्छे हो.”

आन्या को सीने से लगाकर चिराग फूट–फूटकर रोने लगता है. चिराग को बुरी तरह बिलख–बिलखकर रोता देखकर आन्या भी रोने लगती है. आन्या को लगता है कि चिराग उसके कारण रो रहा है. चिराग खुद को संभालकर आन्या को चुप करवाकर सुला देता है और खुद सारी रात जागकर अपनी गलती तलाश करने की कोशिश करता है.

सुबह आन्या के साथ स्कूल आकर प्रिंसिपल के ऑफ़िस में कुछ टीचर्स के साथ झगड़ा करके चिराग गर्म होकर धमकी देता है कि मेरी बच्ची को कुछ लड़के कहते है, तू रंडी की औलाद है, इसलिए तू भी रंडी है. तेरी माँ मरवाती है, तू भी मरवा लें. अभी ये बातें कर रहे है, कल को ब्लात्कार करेंगे. जब स्कूल खोलकर बैठे हो, तो स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों पर ध्यान भी दिया करो. आपके स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे ऐसी घटिया बातें करते है और आप लोगों को कुछ पता ही नहीं है. अगर दूबारा मेरी बच्ची के साथ ऐसी कोई बात हुई, तो ये स्कूल बन्द करवा दूँगा.

प्रिंसिपल ने समझा–बुझाकर उन गन्दी बातें करने वाले बच्चों के खिलाफ़ एक्शन लेने और दुबारा ऐसा नहीं होने का आश्वासन देकर चिराग को शांत किया. चिराग स्कूल से निकलकर अपने ऑफ़िस चला जाता है.

चिराग तो अपने सामने बोलने वालों को कठोरता से जवाब देता है, लेकिन चिराग का शादाब और निकिता को एक साथ रहने की इजाज़त देना शाज़िया और शाज़िया के बच्चों के लिए मुसीबत का कारण बन गया है. शादाब जानता है कि अगर उसने निकिता को खुश नहीं रखा, तो चिराग से उसे एक रुपया भी नहीं मिलेगा. नौकरी और फ्लेट जाएँगा, वो अलग. इसलिए शादाब का सारा ध्यान अब निकिता को खुश रखकर पच्चीस लाख पाने में है. निकिता भी अब किसी कीमत पर शादाब को खोना नहीं चाहती, इसलिए रात को अपने शरीर का भरपूर सुख देकर दिन में शादाब के साथ नौकरी करती हुई हर वक्त शादाब के साथ ही रहती है. शाज़िया के पास शादाब हफ्ते में दो या तीन बार सिर्फ दो–चार घंटे के लिए ही आता है, वो दो–चार घंटे भी शाज़िया और शादाब के झगड़े में ही पूरे होते है. शाज़िया और शाज़िया के बच्चों को अक्सर लोगों की बातें सुननी पड़ती है. चिराग की तरह शाज़िया भी लोगों को कठोरता से जवाब देती है, लेकिन औरतों के सामने लोगों को धर्म–मज़हब और समाज के नियम–कायदें कुछ ज्यादा ही याद आते है. मुस्लिम समाज के लोग कहते है कि सारी गलती शाज़िया की ही है. शाज़िया ने अपने शौहर को इज्जत नहीं दी और शौहर की परेशानियाँ समझने की जगह शौहर से झगड़े करती है, इसलिए शादाब अपना गम बाँटने के लिए दूसरी औरत के पास चला गया. वरना इतनी खूबसूरत बीवी के होते हुए शादाब को दूसरी औरत के पास जाने की क्या जरूरत थी ? हिन्दू समाज के लोग कहते है कि शादाब ने हिन्दू औरत को फँसाया, इसलिए शाज़िया ने उसे रोकना मुनासिब नहीं समझा और लोगों को दिखाने के लिए दुःखी होने का नाटक करती है.

शाज़िया गंभीर मुद्रा में अपने सर पर हाथ रखकर पंलग पर बैठी है. घर के दरवाजे से घबराया हुए शबनम और अकरम “अम्मी–अम्मी” बोलते हुए घर में दाखिल होते है.

शाज़िया खड़ी होकर कमरे से बाहर आकर बोली—“क्या हुआ ?”

डरा हुआ अकरम बोला—“अम्मी, शबनम आपा को स्कूल के पास.”

अकरम की बात काटकर शाज़िया घबराकर बोली—“क्या हुआ शबनम को ?”

शबनम और अकरम रोते–रोते बताते है कि दो लड़कों ने रास्ता रोककर शबनम का हाथ पकड़ लिया और गन्दी–गन्दी बातें बोलकर बदतमीजी करने लगे. अकरम के “छोड़ दो, मेरी आपा को.” बोलकर शबनम को छुड़ाने की कोशिश करने पर अकरम को थप्पड़ मार दिए. शबनम और अकरम जैसे–तैसे भागकर आए है. शाज़िया गुस्से से आगबबूला होकर शबनम का हाथ पकड़कर “चल बता मुझे, कौन है वो लड़के ?” बोलकर घर से निकलकर शबनम और अकरम के साथ स्कूल के पास आती है. दोनों जवाँन लड़के अभी तक वहीं खड़े है.

शबनम का हाथ छोड़कर शाज़िया दोनों लड़कों के पास आकर दोनों लड़कों को एक–एक जोरदार तमाचे जड़कर गुस्से से उबलती हुई बोली—“हरामजादों! रास्ता रोककर मेरी बच्ची को जलील करने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी ? मेरे मासूम बच्चे को मारते हुए शर्म नहीं आई तुम लोगों को ? तुम्हारे घर से तुमको यहीं सीख मिली है ?”

दोनों लड़कों पर शाज़िया को बुरी तरह चिल्लाती देखकर कुछ लोग वहाँ आकर शादाब द्वारा हिन्दू औरत को प्यार के जाल में फँसाने के कारण शाज़िया को जलील करते है.

शाज़िया चीख–चीखकर बोली—“तो उस हिन्दू औरत की अक्ल पर पत्थर पड़े थे, जो पति और बेटी के होते हुए वो मेरे शौहर की बातों में आ गई ? वो छोटी बच्ची है, जो उसे सही–गलत और अच्छे–बुरे का फर्क नहीं पता ? अपने गिरेबाँन में झाँककर देखो, तुम लोग कितने दुध के धुले हुए हो ? बोल तो सब ऐसे रहे है, मानो खुद हमेशा औरतों की इज्जत में कसीदे पढ़ते है. हिन्दू–मुस्लिम की आड़ लेकर अपने नापाक़ मंसूबों को सही साबित करने की कोशिश मत करो.”

शाज़िया और लोगों के बीच तीखी बहस होती है, लेकिन शाज़िया के सामने बस नहीं चलने के कारण लोग अशब्द बोलते है.

शाज़िया गुस्से से उबलकर चीखती हुई बोली—“लगाओ, हाथ मुझे या मेरे बच्चों को. देखती हूँ, कौन हिम्मत करता है ? मर जाऊँगी या मार दूँगी ? आओ आगे.”

शाज़िया को शेरनी की तरह दहाड़ती हुई देखकर सब लोग “अरे, छोड़ों यार! ये तो बैशर्म लोग है. कोई शर्म–हया तो है नहीं इनमें. चलो रे चलो. इसके मुँह लग के क्यों अपनी जुबाँन खराब करना ?” बोलते हुए अपने–अपने घर चले गए.

शबनम और अकरम को लेकर शाज़िया घर वापस आई और अकरम से पीने के लिए पानी मंगाकर सर पर हाथ रखकर कुर्सी पर बैठती है. शबनम कमरे में चली गई. अकरम के पानी लाने पर पानी पीकर शाज़िया कॉल करके चिराग को घर बुलाती है. डेढ़ घंटे बाद चिराग की गाड़ी शाज़िया के घर के सामने आकर रूकती है.

गाड़ी से निकलकर घर में प्रवेश करते ही सर पर हाथ रखकर कुर्सी पर बैठी शाज़िया ने खड़ी होकर कहा—“आओ, चिराग साहब आओ. तुमने जो तमाशा शुरू किया है, देख लो उसका नतीजा. तुम्हारे कलेजे में ठंड पड़ जाएँगी.”

चिराग—“क्या हुआ ?”

शाज़िया—“होना क्या है, चिराग साहब ? दाद देती हूँ, तुम्हारी. शादाब को सबक सिखाने का बहुत अच्छा तरीका निकाला है, तुमने. दो प्यार करने वालों को मिलाकर लोगों की नज़र में महान भी बन गए और अपनी बीवी छीनने वाले के बीवी–बच्चों को लोगों से जलील करवाकर अपना बदला भी ले रहे हो.”

शबनम और अकरम कमरे के दरवाजे पर आकर खड़े होते है.

चिराग—“हुआ क्या है, वो बताओ ?”

शाज़िया चीखकर बोली—“क्या करोगे जानकर ?”

शबनम की तरफ़ आकर शबनम का हाथ पकड़कर शबनम को चिराग की तरफ़ धकेलकर शाज़िया ने कहा—“लो, इसका बाप जो तुम्हारी बीवी के साथ करता है, तुम इसके साथ कर लो. फिर भी दिल ना भरे, तो मेरे साथ कर लेना, लेकिन इस तरह हमें तड़पा–तड़पाकर मत मारो.”

शबनम को पकड़कर संभालते हुए चिराग ने कहा—“तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है.”

शबनम की तरफ़ देखकर चिराग बोला—“तुम बताओ, क्या बात है ?”

शबनम के बोलने से पहले शाज़िया चिल्लाती हुई चिराग को बातें सुनाती है. चिराग चिल्लाकर शाज़िया को चुप रहने के लिए बोलकर शबनम से सारी बात सुनने के बाद शबनम का हाथ पकड़कर “चलो, मेरे साथ.” बोलकर बाहर जाने लगता है.

शाज़िया ने चिल्लाकर कहा—“कहाँ ले जा रहे हो, इसे ?”

शाज़िया की तरफ़ देखकर चिराग चिल्लाकर “खा नहीं जाऊँगा इसे. अभी आ रहा हूँ.” बोलकर बाहर आकर शबनम को गाड़ी में बिठाकर अपने साथ लेकर पुलिस के साथ उन लड़कों के घर आया और दोनों लड़कों को गिरफ्तार करवाकर चिराग ने पुलिस से कहा—“मार–मारकर चमड़ी उधेड़ दो इनकी. और अगर कोई इनकी जमानत करवाने आए, तो मुझे इन्फोर्म करना.”

कुछ लोगों ने कहा—“वाह…चिराग साहब! जिस आदमी ने आपकी पत्नी को प्यार के चक्कर में फँसाकर आपका घर उजाड़ दिया. आप उसी आदमी के बीवी–बच्चों के लिए इन लड़कों को अरेस्ट करवा रहे हो. कहीं बीवियों की अदला–बदली का सौदा तो नहीं हुआ ?”

चिराग ने कहा—“ये भी सही है. तुम लोगों से मुझे यहीं उम्मीद थी. या तो किसी बहाने से औरतों को कुचलोगे, या फिर ऐसी घटिया बातें सोचोगे. क्या चाहते हो तुम लोग ? मैं उस आदमी की गलती का गुस्सा उसकी बैकसूर बीवी और उसके मासूम बच्चों पर निकालूँ ? या धर्म का झंडा लेकर हिन्दू–मुस्लिम करूँ ? तुम लोगों ने बिना वजह शाज़िया को इतना बैईज्जत किया, शर्म नहीं आई तुम लोगों को ? अगर उसकी बैईज्जती का बदला तुम लोगों के परिवार से लिया जाता, तो कैसा लगता तुम लोगों को ? सज़ा उसी को दो, जिसकी गलती है, वरना नफ़रत की आग फैलेगी और उस आग में जलेगें सिर्फ बैकसूर और मासूम.”

सभी लोगों को तीखे और कड़वे जवाब देने के बाद चिराग “अगर आज के बाद किसी ने शाज़िया और शाज़िया के बच्चों को परेशान किया, तो अच्छा नहीं होगा.” बोलकर शबनम को लेकर चिराग वापस घर आता है.

अकरम को सीने से लगाए बैठी शाज़िया अकरम को छोड़कर खड़ी होती है.

चिराग ने शाज़िया से कहा—“अब चिन्ता मत करो, उन लड़कों को अरेस्ट करवा दिया है. ऐसी कोई प्रोब्लम हो, तो मुझे बता दिया करो. तुम परेशान मत हुआ करो.”

शाज़िया ने शबनम और अकरम से कहा—“तुम दोनों अपने कमरे में जाओ.”

शबनम और अकरम के कमरे में जाने के बाद शाज़िया ने चिराग से कहा—“किस–किस को अरेस्ट करवाओगे, चिराग साहब ? ये अब रोज का किस्सा है. ये है हिन्दू घर उजाड़ने वाले मुल्ले की बीवी, ये है हिन्दू औरत को शिकार बनाने वाले मुल्ले की बेटी. इन लोगों के साथ भी वहीं करो, जो ये हमारे साथ करते है.”

चिराग—“अरे, लोगों को बस बहाना चाहिए लड़कियों और औरतों को कुचलने का. तुम्हारे आस–पास तो ज्यादातर मुस्लिम घर ही है. तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है.”

शाज़िया—“वाह…चिराग साहब. तुम्हारा भी जवाब नहीं है. तुम्हारे हिसाब से ये आस–पास के मुस्लिम घर हमारी बड़ी ईज्जत करते है.”

चिराग—“मेरा वो मतलब नहीं है.”

शाज़िया ने चिल्लाकर कहा—“और क्या मतलब है तुम्हारा ? जैसे तुम्हारी बीवी तुम्हारी पीठ पीछे अय्याशी करती थी. मैं भी वहीं करना शुरू कर दूँ, किसी आस–पास वाले के साथ ? इस दुनिया में हर मर्द मौका ढूंढता है, औरत से अपनी हवस मिटाने का. मर्द ये नहीं देखता, औरत किस धर्म की है ? मर्द सिर्फ ये देखता है, शिकार कौनसी औरत बन सकती है ? यहाँ सबको पता है, शाज़िया का शौहर गैर औरत के चक्कर में शाज़िया को भूल चुका है. हर मर्द इस बात का फायदा उठाने की फिराक़ में बैठा है. और ये सब सिर्फ तुम्हारे कारण है, चिराग साहब. सिर्फ तुम्हारे कारण.”

चिराग—“ये भी सही है. मैनें कहा था, तुम्हारे शौहर को निकिता के पीछे पड़ने के लिए. मैं ही कह रहा हूँ, तुम्हारे आस–पास वालों को तुम्हें शिकार बनाने के लिए.”

शाज़िया चीखकर बोली—“हाँ–हाँ, तुम. तुमने ही निकिता और शादाब को साथ रहने के लिए बोलकर शादाब को मुझसे दूर कर दिया.”

चिराग ने चिल्लाकर कहा—“चिल्लाना मुझे भी आता है. शादाब इतना ही तुम्हारे पास था, तो उसने प्यार के नाम पर इंजॉय करवाने के लिए निकिता को क्यों कहा ? क्यों नहीं रोक पाई तुम उसे ?”

शाज़िया चिल्लाकर बोली—“शादाब कहता, बिल्डिंग से कूद जा, तो कूद जाती निकिता. तुमने क्यों नहीं संभाला अपनी बीवी को ?”

चिराग ने चीखकर कहा—“अरे, तो तुम संभाल लेती शादाब को. किस काम का तुम्हारा ये खूबसूरत शरीर ? जब इससे तुम्हारा पति ही खुश नहीं हुआ.”

शाज़िया चीखकर बोली—“तो तुम कैसे मर्द हो ? जिससे तुम्हारी बीवी की जरूरत पूरी नहीं हुई.

अपने साथी को सही और दूसरे के साथी को गलत साबित करने की कोशिश में शाज़िया और चिराग चीखते–चिल्लाते हुए एक–दूसरे को एक–दूसरे की गलतियाँ और कमियाँ गिनवा–गिनवाकर बुरी तरह झगड़ते है. दोनों को इस बात का होश ही नहीं है कि कमरे में खिड़की के पास खड़े शबनम और अकरम उनको झगड़ते देखकर अपनी आँखों से आँशू बहा रहे है. अकरम और शबनम की आँखों से बहते आँशूओं पर नजर पड़ते ही शाज़िया के साथ झगड़ता हुआ चिराग चुप हो गया. चिराग की नजरें खिड़की की तरफ़ देखकर शाज़िया भी अपने बच्चों को रोता देखकर चुप हो गई. चिराग सर झूकाए मुड़कर बाहर जाकर अपनी गाड़ी में बैठकर चला जाता है.

रात को बिस्तर पर लेटी शाज़िया अपनी गलतियाँ और कमियाँ तलाशने की कोशिश करती हुई बैचेन होकर बार–बार करवट बदलती है. शाज़िया की आँखों से आँशू बहने लगते है. शाज़िया अपने आँशू पोंछकर शादाब को कॉल लगाती है.

निकिता के साथ इंजॉय करने में बिजी शादाब ने निकिता से अलग होकर कॉल रिसींव करके कहा—“शर्म–हया भूल गई क्या ? जो इस वक्त कॉल कर दिया. कॉल करने से पहले सोच तो लेती, मैं कहाँ हूँ और किसके साथ हूँ ?”

शाज़िया—“वाह…शादाब. अपने शौहर को फोन भी वक्त देखकर करूँ ? मुझे तुमसे ये कहना है, या तो मेरे साथ आकर रहो, वरना अपने बच्चों को भी अपने पास ले जाओ.”

शादाब—“लगता है, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. अभी कॉल काट. मैं कल घर आकर तुमसे बात करता हूँ.”

शादाब का कॉल कटने के बाद शाज़िया सारी रात जागकर बिस्तर में पड़ी–पड़ी आँशू बहाती हुई करवट बदलती रहती है.

सुबह शबनम और अकरम के स्कूल जाने के बाद शादाब ने घर आकर गुस्से से आग बबूला होकर शाज़िया पर बरसते हुए कहा—“तुम्हारी अक्ल मारी गई है क्या ? चिराग मुझे पच्चीस लाख किस बात के दे रहा है ? निकिता को खुश रखने के लिए. और तुम कह रही हो, मैं बच्चों को वहाँ ले जाऊँ. मेरा साथ नहीं दे सकती, तो कम से कम मुसीबत भी मत बन.”

शाज़िया ने रोते–रोते कहा—“ये तुम्हें क्या हो गया है, शादाब ? हम थोड़े में गुजारा कर लेगें. तुम प्लीज घर वापस आ जाओ. हमें नहीं चाहिए, चिराग की दिलवाई नौकरी और दौलत. मैं भी जॉब करूँगी, घर का सारा खर्च मैं संभाल लूँगी. तुम बस उस निकिता को छोड़कर घर वापस आ जाओ.”

शादाब ने भड़ककर गुस्से से कहा—“तुम मुझे नाकारा साबित करना चाहती हो. जॉब करके, घर का खर्च संभालकर लोगों को ये दिखाना चाहती हो, शादाब अपने बीवी–बच्चों को संभाल नहीं सकता. शादाब औरत की कमाई पर जीता है.”

शाज़िया ने सख्ती से कहा—“जी तो तुम अब भी औरत की कमाई पर ही रहे हो, शादाब. फ्लेट और नौकरी चिराग ने औरत के कारण ही तुम्हें दिलवाई है.”

शादाब और शाज़िया के बीच बहुत झगड़ा हुआ. शाज़िया कभी रोकर, कभी गुस्से से शादाब को समझाने की बहुत कोशिश करती है, लेकिन शादाब पर शाज़िया की बातों का कोई असर नहीं हुआ. शाज़िया घर का दरवाजा बन्द करके शादाब को कमरे में लाकर शादाब को चुम–चुमकर शादाब से लिपटने लगती है.

खुद से अलग करके शाज़िया को धकेलकर शादाब ने कहा—“पागल हो गई है, क्या ? ये क्या कर रही है ?”

शाज़िया बैचेनी से बोली—“यहीं सब करके उस बदजात औरत ने तुम्हें मुझसे छिना है ना ? तुम एक बार मुझे मौका दो, मैं भी वो सब कर सकती हूँ, जो वो करती है.”

शादाब ने गुस्से से कहा—“तू अपनी शर्म–हया भूलकर बैशर्म हो रही है.”

शाज़िया ने चीखकर कहा—“तो तुमने कौनसी शर्म–हया याद रखी है ? निकिता को उसके खूबसूरत बदन के कारण ही तुमने प्रपोज किया था ना ?”

शाज़िया अपनी कुर्ती उतारकर बोली—“देखो मुझे. और बताओ, मुझमें क्या कमी है ? तुम्हारी ऐसी कौनसी जरूरत है, जो मुझसे पूरी नहीं होती ? जिस्म की भूख मिटाने के चक्कर में तुम अपने बच्चों को भी भूल गए.”

शादाब ने गुस्से से कहा—“मैं ये सब अपने बच्चों की बेहतर जिन्दगी के लिए ही कर रहा हूँ, लेकिन तू सिर्फ खुद के बारे में सोचती है. यहीं कमी है, तुझमें, खुदगर्ज औरत.”

शाज़िया गुस्से से बोली—“अपने बीवी–बच्चों को लोगों से जलील करवाकर तुम उनकी जिन्दगी बेहतर कर रहे हो ? मुझे खुदगर्ज कहने से पहले अपने गिरेबाँन में झाँककर देखो.”

शाज़िया के साथ झगड़कर शाज़िया को जलील करके शादाब दरवाजा खोलकर चला गया. शाज़िया अपनी कुर्ती पहनकर रोने लगती है.

कुछ देर बाद चिराग घर में आकर गुस्से से बोला—“शाज़िया.”

शाज़िया कमरे से बाहर आती है.

चिराग—“शाज़िया, वॉट इज़ दिस ? मैं इतनी मुश्किल से शादाब और निकिता को एक–दूसरे के करीब लाया हूँ और तुम शादाब को ब्लैकमेल करके निकिता से दूर होने के लिए कह रही हो.”

शाज़िया—“मुझसे अब सहन नहीं होता, चिराग साहब. अपने शौहर को किसी गैर औरत के साथ देखकर औरत के दिल पर क्या गुजरती है ? ये तुम नहीं समझोगे. मैं घूट–घूटकर जी रही हूँ. मर जाने को दिल करता है, मेरा.”

चिराग ने नरम होकर कहा—“मैं सब समझता हूँ, शाज़िया. मैं भी उसी तकलीफ़ से गुजर रहा हूँ, जो तुम सहन कर रही हो, लेकिन प्लीज! जब तक मेरा और निकिता का डिवॉर्स नहीं होता, खुद पर काबू रखो. उन दोनों को एक–दूसरे में खोया रहने दो, ताकि वो कुछ और सोच ही ना सकें. तुम्हें कोई प्रोब्लम हो, तो तुम मुझे बताया करो. तुम्हारे एक कॉल करते ही मैं आ जाऊँगा.”

शाज़िया—“तुम्हारे लिए ये सब बहुत आसान है, चिराग साहब. तुम्हें बीवी के कारण लोगों की बातें नहीं सुननी पड़ती, लेकिन मुझे शौहर के कारण सुननी पड़ती है. तुम मर्द हो, चिराग साहब.”

चिराग ने चिल्लाकर कहा—“तो मर्द पत्थर के बने होते है. मर्द को चोट नहीं लगती ? मर्द को दर्द नहीं होता ? मर्द टूटता नहीं ? मर्द को दुःख नहीं होता ? अपनी पत्नी को किसी पराये पुरुष से सेक्स की भूख मिटाते देखना, बहुत आसान है मर्द के लिए ? सारे मर्द तुम्हारे शादाब जैसे नहीं होते, शाज़िया. मैं भी हर रोज मर–मरकर जी रहा हूँ. जैसे लोग तुम्हारे बारे में बातें करते है, वैसे मेरे बारे में भी बातें करते है. रोज मेरी बच्ची मुझसे निकिता के बारे में पूछती है. उस मासूम को कैसे संभालता हूँ, ये मैं ही जानता हूँ. शबनम की तरह आन्या को भी लोग गन्दी–गन्दी बातें बोलते है, अपनी बच्ची के बारे में ऐसी बातें सुनकर तुम्हारी तरह मेरे सीने में भी आग लग जाती है. सारी–सारी रात जागकर मैं यहीं सोचता हूँ, मेरी और मेरी बच्ची की गलती क्या है ? हर वक्त मुझे नपुंसक होने का एहसास होता है, जो अपनी वाईफ़ की जरूरत पूरी नहीं कर पाया.”

शाज़िया की आँखों में आँशू आते है.

चिराग ने शांत होकर कहा—“शाज़िया, आँशू मत बहाओ. रोने से कुछ भी बदलने वाला नहीं है. बस दो महिने की बात और है. निकिता से डिवॉर्स होते ही मैं तुम्हें अपने पास जॉब दे दूँगा. फिर तुम्हें किसी के सहारे की जरूरत ही नहीं होगी.”

शाज़िया रोती हुई बोली—“जिन्दगी में दौलत सब कुछ नहीं है, चिराग साहब. मैनें तुम्हें निकिता को शादाब से दूर करने के लिए कहा था, लेकिन तुमने शादाब को ही मुझसे दूर कर दिया.”

चिराग—“क्या पहले शादाब तुम्हारे पास था ?”

शाज़िया के पास चिराग के इस सवाल का कोई जवाब नहीं है. चिराग मुड़कर वापस चला जाता है.

रात को बिस्तर पर लेटी शाज़िया सोच रही है कि शादाब मेरे पास क्यों नहीं था ? शाज़िया को अपने औरत होने पर शक होने लगता है. शाज़िया उठकर आईने के सामने आकर खड़ी होती है और गौर से खुद को देखती हुई एक–एक करके अपने सारे कपड़े निकालकर सोचती है कि आखिर क्या कमी है मेरे अन्दर, जो मैं अपने शौहर को खुश नहीं कर पाई ? मर्द को औरत से जो चाहिए, वो सब कुछ है मेरे पास. खूबसूरत आँखें, गोरे गाल, गुलाबी होंठ, लम्बे बाल, खूबसूरत गोरा बदन, मेरा हर अंग मर्द की हर जरूरत पूरी कर सकता है. फिर शादाब कौनसी जरूरत पूरी करने के लिए गैर औरतों के पास गया ? क्या मैं बिस्तर पर मर्द का साथ नहीं निभा सकती ? ये निकिता कैसे खुश करती है शादाब को ? उसके पास ऐसा क्या है, जो शादाब उस पर ठहर गया ? शायद चिराग की दौलत ? नहीं, चिराग ने तो सब कुछ जानने के बाद पच्चीस लाख का लालच देकर शादाब को निकिता से शादी के लिए मनाया है, लेकिन शादाब तो दौलत का ऑफर मिलने से पहले ही निकिता के लिए मुझे धोखा दे रहा था. निकिता से पहले भी उसने गैर औरतों से जिस्मानी रिश्ते बनाए है. अब मुझे खुद को परखना होगा. मुझ में ऐसा क्या नहीं है, जो मर्द को खुश करने के लिए औरत में होना चाहिए ?

शाज़िया बैड पर आकर बैठी और मोबाइल उठाकर चिराग को कॉल लगाती है. शाज़िया की तरह चिराग भी बैड पर बैठा आँशू बहाकर खुद में कमियाँ ढूंढ रहा है. चिराग कॉल रिसींव करता है.

शाज़िया ने कठोर आवाज़ में कहा—“चिराग साहब, मुझे एक गुनाह करना है. क्या तुम उस गुनाह में मेरे हिस्सेदार बनोगें ?”

चिराग ने बहुत गंभीर आवाज़ में कहा—“वो गुनाह मैं भी करना चाहता हूँ, कोई हिस्सेदार ही ढूंढ रहा था.”

शाज़िया और चिराग मिलने की जगह तय करके कॉल काटते है.

अगले दिन चिराग ने अलीशा और पल्लवी को केबिन में बुलाकर कहा—“मैं एक पर्सनल काम से बाहर जा रहा हूँ. तुम दोनों दो–तीन दिन के लिए रात को आन्या के पास रूक सकती हो ?”

अलीशा और पल्लवी दूसरे शहरों की है. दोनों चिराग के पास नौकरी करती है और किराए के रूम में साथ ही रहती है. चिराग का अपने स्टाफ के साथ व्यवहार बहुत अच्छा है और निकिता से मिले धोखे के कारण सबको चिराग से हमदर्दी भी है, इसलिए दोनों आन्या के पास रात को रूकने के लिए तैयार हो गई.

शाम के समय शाज़िया ने शबनम और अकरम को समझाया कि तुम दोनों घर में ही रहना, कहीं बाहर मत जाना. और कोई मेरे बारे में पूछे तो बोल देना, अम्मी दरगाह गई है, देर से आएँगी. अंधेरा होने के बाद दरवाजा बन्द कर लेना और रात को जल्दी सो जाना. मैं सुबह आऊँगी.

शबनम और अकरम ने शादाब के कारण शाज़िया को हमेशा खून के आँशू रोते देखा है, इसलिए दोनों अपने अब्बू को पसन्द नहीं करते और अपनी अम्मी के बहुत ज्यादा करीब है.

शबनम और अकरम ने शाज़िया से कोई सवाल नहीं किया. शाज़िया घर से निकलकर चिराग की बताई जगह पर आई. चिराग गाड़ी लेकर आया और शाज़िया को रिसींव करके ऐसी जगह लाता है, जहाँ दोनों को कोई नहीं जानता. शाज़िया और चिराग कमरे में आए और चिराग दरवाजा बन्द कर दिया.

शाज़िया और चिराग आमने–सामने खड़े होकर मुँह से कुछ बोले बिना सिर्फ एक–दूसरे को घूर रहे है. दोनों के दिल में प्यार और जज़्बात की जगह निकिता और शादाब से मिले धोखे का दर्द भरा हुआ है. दोनों यह जानना चाहते है कि आखिर किस कमी के कारण निकिता और शादाब ने धोखे का जख़्म दिया ? चिराग अपनी शर्ट–बनियान निकालकर फेंकता है और शाज़िया अपनी कुर्ती–ब्रा निकालकर फेंकती है. दोनों एक–दूसरे को कसकर पकड़ते हुए एक–दूसरे से लिपटकर एक–दूसरे को मसलते हुए बैड पर आकर एक–दूसरे के बाकी कपड़े निकालकर एक–दूसरे पर टूट पड़ते है. दोनों अपने दिल में निकिता और शादाब के लिए भरा हुआ सारा गुस्सा एक–दूसरे पर उतरने लगते है. एक–दूसरे को मसल–मसलकर बुरी तरह निचोड़ने के बाद भी दोनों का गुस्सा कम नहीं हुआ. दोनों एक–दूसरे के मुँह से “अब बस करो” सुनना चाहते है, लेकिन दोनों में से कोई भी यह कहने को तैयार नहीं है. दोनों थककर चूर होने के बाद भी सुस्ता–सुस्ताकर निकिता और शादाब से मिले धोखे के जख़्म का बदला एक–दूसरे को दर्द देकर एक–दूसरे से लेते है. सारी रात एक–दूसरे में उलझकर खुद को एक–दूसरे पर जमकर आजमाने के कारण दोनों थकान से पस्त होकर एक–दूसरे से लिपटकर ढेर होते है.

चिराग ने कहा—“अब तो बताओ शाज़िया, क्या मैं निकिता की जरूरत पूरी नहीं कर सकता था ?”

शाज़िया ने कहा—“मुझे नहीं पता, चिराग साहब. मैं तुमसे जानना चाहती हूँ, मैं शादाब को खुश क्यों नहीं पाई ?”

दोनों के पास एक–दूसरे के सवाल का कोई जवाब नहीं है. अपने–अपने सवाल का जवाब पाने के लिए दोनों रोज रात को मिलते है और सुबह होने तक एक–दूसरे से कई बार यहीं सवाल करते है. अलीशा और पल्लवी को कॉल करके “कुछ वक्त और लगेगा.” बोलकर चिराग घर और ऑफ़िस से दूर ही रहता है.

इस दौरान दो बार शादाब अपने घर आता है. हमेशा की तरह शाज़िया और शादाब में निकिता को लेकर झगड़ा होता है. शबनम और अकरम के साथ शादाब की थोड़ी–बहुत बात होती है, लेकिन शबनम और अकरम ने शादाब को शक भी नहीं होने दिया कि अम्मी सारी रात घर से बाहर रहती है.

शाज़िया और चिराग एक–दूसरे के साथ लगातार आठवीं रात बिताने के बाद सुबह अपने–अपने कपड़े पहनते है.

चिराग ने दरवाजे की तरफ़ जाती शाज़िया से कहा—“एम सॉरी, शाज़िया.”

शाज़िया ने मुड़कर कहा—“किसलिए ?”

चिराग—“मैं निकिता और शादाब का गुस्सा तुम पर निकाल रहा था.”

शाज़िया ने पास आकर मुस्कुराते हुए कहा—“प्लीज़, सॉरी मत कहो. मैं भी तुम्हारे साथ यहीं कर रही थी. पता नहीं कैसे मैं इतनी बेरहम हो गई ? तुम्हारी कोई गलती नहीं, फिर भी इन आठ रातों में मैनें क्या हाल कर दिया तुम्हारा.”

चिराग ने मुस्कुराते हुए कहा—“कोई बात नहीं. जिन्दगी में कई बार ऐसा हो जाता है, जिसकी उम्मीद भी नहीं होती. वैसे तुम्हारा गुस्सा कम हुआ या नहीं ?”

शाज़िया—“नहीं. और तुम्हारा ?”

चिराग—“नहीं. और शायद कभी होगा भी नहीं. मैं निकिता से बहुत प्यार करता हूँ और उसका दिया हुआ जख़्म किसी बेकसूर पर गुस्सा निकालने से तो बिल्कुल नहीं भरेगा.”

शाज़िया—“मैनें भी शादाब को दिलो–जान से चाहा है. उसका दिया दर्द किसी ओर को तकलीफ़ देकर हरगिज़ कम नहीं होगा.”

चिराग—“ये भी सही है. आज शाम को तुम मत आना. मैं भी घर जा रहा हूँ.”

शाज़िया—“मतलब, मैं सच में किसी मर्द को खुश नहीं कर सकती.”

चिराग ने मुस्कुराते हुए कहा—“ये भी सही है. मैं भी तो किसी औरत की जरूरत पूरी नहीं कर सकता.”

शाज़िया ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म………वैसे निकिता ने तुम्हें कभी बताया नहीं, तुम किस बहुत अच्छा करते हो. एक बार तुम्हारे होंठों से होंठ लगने के बाद होंठ अलग करने को मन ही नहीं करता ?”

चिराग ने मुस्कुराकर कहा—“और तुम्हें शादाब ने नहीं बताया, तुम हग बहुत अच्छा करती हो. इतना कसकर गले लगाती हो, तुम्हारी बाहों से आज़ाद होने को मन ही नहीं करता ?”

शाज़िया ने हँसकर कहा—“क्यों मजाक उड़ा रहे हो, चिराग साहब ? अगर ऐसा होता, तो शादाब मुझे धोखा देकर गैर औरतों के पास क्यों जाता ?”

चिराग ने हँसकर कहा—“तुम क्या कर रही हो ? अगर ऐसा होता, तो निकिता मुझे धोखा देकर अपनी जरूरत तुम्हारे शौहर से क्यों पूरी करती ?”

शाज़िया खिलखिलाकर हँसने के बाद बोली—“प्लीज, डॉन्ट माइंड. बुरा मत मानना, निकिता को सेक्स की नहीं, नये मर्द की जरूरत थी.”

चिराग खुलकर हँसते हुए बोला—“नहीं–नहीं, बुरा क्या मानना. ये तो सच है, उन दोनों को ही सेक्स की नहीं. नये सेक्स पार्टनर की जरूरत थी.”

शाज़िया और चिराग कई महिने बाद दिल से मुस्कुराकर खुलकर हँसते है. दोनों को एक–दूसरे से अपने–अपने सवाल का जवाब मिल गया और इस जवाब के साथ–साथ दोनों के दिल भी मिल गए. आमतौर पर पहले आकर्षण या प्यार होता है, फिर सेक्स होता है. लेकिन शाज़िया और चिराग के बीच पहले सेक्स हुआ, फिर प्यार हुआ.

शाज़िया और चिराग ने एक–दूसरे से मिलना बन्द कर दिया. अगर शाज़िया या शाज़िया के बच्चों को कोई काम या कोई प्रोब्लम हो, तब भी चिराग खुद आने की जगह अपने पास नौकरी करने वाले किसी लड़के को भेजता है. शाज़िया और चिराग दिन में एक या दो बार सिर्फ फोन पर ही बात करते है. शादाब और निकिता को किसी तरह का कोई शक ना हो, इसलिए चिराग के कहने पर शाज़िया पहले की तरह शादाब को परेशान करती रहती है. शाज़िया और चिराग अब खुश रहने लगे है.

छः महिने की अवधि पूरी होने के बाद चिराग और निकिता का आपसी सहमती से तलाक होता है. निकिता के मन में चिराग से अलग होने का कोई अफ़सोस नहीं है.

अगले दिन शाज़िया ने शादाब से तलाक मांग लिया. शाज़िया और शादाब के बीच बहुत झगड़ा हुआ और शादाब ने शाज़िया को तलाक देने से साफ़ मना कर दिया, लेकिन शादाब के गैर औरत से जिस्मानी रिश्तों के आधार पर शाज़िया आसानी से तलाक लेने में कामयाब होकर शबनम और अकरम को लेकर शादाब के घर से चली गई.

निकिता फिर से शादाब के बच्चे की माँ बनने वाली है. शादाब ने सोचा कि चलो, अब चिराग से पच्चीस लाख लेकर निकिता के साथ एक नई जिन्दगी शुरू करूँगा, लेकिन सोचा हुआ सब कुछ कहाँ होता है. निकिता और शादाब का रोड़ क्रॉस करते समय एक्सीडेंट हो गया. एक्सीडेंट में शादाब और निकिता अपाहिज हो गए और निकिता का मिस–केरिज हो गया.

पुलिस ने छानबीन करके पता लगाया कि जिस गाड़ी से एक्सीडेंट हुआ है. उसका नम्बर गलत था, लेकिन गाड़ी और गाड़ी के ड्राईवर या मालिक के बारे में कुछ पता नहीं चलता है.

शादाब और निकिता हॉस्पीटल से डिस्चार्ज होकर फ्लेट में आते है. अगले दिन दोनों को नौकरी से हटाकर फ्लेट खाली करवा लिया जाता है. शादाब और निकिता ने चिराग से बात की, लेकिन चिराग ने कहा, “मैं सिर्फ रिक्वेस्ट कर सकता हूँ. मेरी रिक्वेस्ट मानना या नहीं मानना ? ये उनकी मरजी पर डिपेन्ड करता है.”

शादाब और निकिता निराश होकर शादाब के घर आते है, लेकिन यहाँ भी घर के दरवाजे की सीढ़ियों पर उम्र में पच्चीस(25) साल की एक औरत को एक छोटे बच्चे को गोद में खिलाते देखकर शादाब हैरान होता है.

शादाब ने पूछा—“तुम कौन हो ? और ये घर कैसे खुला हुआ है ?”

औरत ने बताया कि पाँच दिन पहले ये घर हमने खरीदा है और चार दिन पहले रहना शुरू किया है.

शादाब गुस्से से आग–बबूला होकर “कैसे खरीद लिया ? किससे खरीद लिया ? ये घर तो मेरा है ?” बोलकर औरत पर बरस पड़ता है. औरत फोन करके अपने शौहर को बुलाती है और शादाब आस–पास के लोगों को बुलाकर लाता है. औरत का शौहर घर आकर सभी को कुछ कागजात दिखाता है. कागजों में शादाब यह घर शाज़िया के नाम कर चुका है और शाज़िया यह घर करीम खान की पत्नी सोफिया को बेच चुकी है.

शादाब को कुछ समझ नहीं आता कि यह अचानक क्या हो गया ? कहाँ तो निकिता और चिराग का तलाक होने के बाद निकिता से शादी करके पच्चीस लाख मिलने वाले थे, लेकिन निकिता के साथ शादी करने से पहले शाज़िया ने तलाक मांगकर उलझा दिया. बीवी–बच्चे गए. निकिता मेरे बच्चे की माँ बनने वाली थी, लेकिन एक्सीडेंट में निकिता का मिस–केरिज हो गया और हम दोनों अपाहिज हो गए. हॉस्पीटल से घर आए, तो अचानक नौकरी से निकालकर फ्लेट खाली करवा लिया. आज घर आया, तो नकली कागजात बनाकर शाज़िया मेरा घर बेच चुकी है. ये सब इत्तेफ़ाक है या कोई जान–बुझकर कर रहा है ?

शादाब अपने दिमाग में उठी उलझनें निकिता को बताता है.

निकिता ने कहा—“तुम्हारा मतलब है, ये सब चिराग ने किया है ?”

शादाब—“उसके इलावा और कौन कर सकता है ? चलो उसके घर.”

निकिता—“रूको, इस वक्त वो ऑफ़िस में होगा और रात को आठ बजे के आस–पास घर आएँगा. अभी जाने का कोई फायदा नहीं है. कल सुबह चलेंगे.”

शादाब—“अरे, लेकिन आज रात को कहाँ रहेंगे ?”

निकिता और शादाब अपने कुछ पहचान वालों को फोन करके मदद मांगते है, लेकिन सबने कोई ना कोई बहाना बनाकर फोन काट दिया. शादाब के पास जो रुपये थे, वो भी एक्सीडेन्ट होने के बाद खुद के इलाज में खर्च हो गए. निकिता के पास कुछ रुपये बाकी है, जिससे दोनों रात को एक होटल में रूककर अगली सुबह चिराग के घर जाते है.

चिराग के घर में शबनम, आन्या और अकरम को साथ–साथ खेलते हुए देखकर शादाब का शक लगभग यकिन में बदल गया. निकिता और शादाब अन्दर आकर जोर–जोर से “चिराग! चिराग!” बोलते है. शबनम, आन्या और अकरम खेलना बन्द करके निकिता और शादाब की तरफ़ देखते है. शबनम और अकरम को तो पहले से ही शादाब पसन्द नहीं है, लेकिन अब निकिता भी आन्या के दिल से उतर चुकी है. निकिता ने आन्या को अपने पास बुलाया, लेकिन आन्या “आपने पापा को चिट किया. आप बहुत गन्दी हो. मुझे आपके पास नहीं आना.” बोलकर दूर खड़ी रहती है.

ऊपर किचन से निकलकर शाज़िया ने कहा—“ये कौन सुबह–सुबह घर आकर बदतमीजी से चिल्ला रहे है ?(शादाब और निकिता को देखकर) अरे, आप लोग आए है. चिराग साहब! बाहर आओ, देखो, हमारे घर कौन आए है ?”

कमरे से निकलकर चिराग बोला—“कौन है ? (शादाब और निकिता को देखकर) अरे, प्यार करने वाले. तुम भी कमाल करती हो, प्यार करने वाले हमारे घर आए है और तुम यहीं खड़ी है. वैलकम करो, इनका”

चिराग और शाज़िया सीढ़िया उतरते हुए नीचे आने लगते है.

शादाब ने चिल्लाकर कहा—“चिराग! क्या है ये सब ?”

चिराग ने तीनों बच्चों से कहा—“तुम्हें इनसे कुछ बात करनी है, तो कर सकते हो.”

तीनों ने शादाब और निकिता के साथ कोई बात करने से मना कर दिया.

चिराग—“फिर ऊपर जाओ.”

शबनम, आन्या और अकरम के जाने के बाद चिराग ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, तो शादाब! इसे रिप्लेसमेन्ट कहते है. ख़राब चीजें निकालकर, उनकी जगह अच्छी चीजें लाना. निकिता खराब हो गई, तो उसकी जगह शाज़िया आ गई. शादाब खराब हो गया, तो उसकी जगह चिराग आ गया.”

निकिता ने गुस्से से कहा—“तुम्हें यहीं करना था, तो इतना ड्रामा क्यों किया ?”

चिराग ने हँसकर कहा—“मैं क्या करता ? हमारे देश का कानून ही ऐसा है. मेरे पास तुम दोनों के कारनामों का कोई सबूत नहीं था. तुम दोनों एक ही जगह नौकरी करते थे, इसलिए तुम दोनों बहुत आसानी से साबित कर देते, कि हमने तुम दोनों की नॉर्मल दोस्ती का गलत मतलब निकाला है. अगर मैं ये टेढ़ा रास्ता नहीं अपनाता, तो कई सालों तक केस चलता. केस में मेरी हार लगभग तय थी. निकिता को प्रोपर्टी में से हिस्सा देना पड़ता और मैं इस गन्दी औरत को बिना कुछ दिए जल्दी से जल्दी इसे अपनी जिन्दगी से बाहर फेंकना चाहता था.”

शादाब ने चिल्लाकर कहा—“तुम्हें धोखा इसने दिया था. मेरी जिन्दगी क्यों तबाह की ?”

शाज़िया ने सख्ती से कहा—“अपनी तबाह जिन्दगी तुम्हें बहुत जल्दी नज़र आई, शादाब. कभी सोचा है, तुम्हारी वजह से चिराग साहब और मासूम आन्या की क्या हालत हुई है ? चिराग साहब ने रो–रोकर मुझसे कहा था, मैनें तो कभी किसी का बुरा नहीं किया, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? पहले तो मैनें इनको बहुत समझाया, लेकिन इनकी हालत मुझसे देखी नहीं गई. मैनें फैसला कर लिया, निकिता से अलग होने में चिराग साहब का साथ मैं जरूर दूँगी.”

शादाब ने चिल्लाकर कहा—“जब तुम इसके साथ मिली हुई थी, तो छाती पीट–पीटकर हाय अल्लाह… मेरा शौहर, या अल्लाह…मेरा शौहर किसलिए करती थी ?”

शाज़िया हँसकर कहा—”आज तुम्हें तड़पते हुए देखकर बहुत अच्छा बहुत लग रहा है. मुझे चिराग साहब ने कहा था, मैं बिल्कुल वैसे ही रहूँ, जैसे पहले थी. तुम्हें निकिता के साथ देखकर एक बार मैं डगमगाई जरूर थी, लेकिन उस डगमगाहट के कारण हम दोनों करीब आ गए और इंशाअल्लाह! अब ता–उम्र साथ रहेगें.”

निकिता ने गुस्से से कहा—“मैनें तुमसे रो–रोकर गिड़गिड़ा–गिड़गिड़ाकर अपनी गलती की माफ़ी मांगी थी. मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी, तुम इस अपना प्यार दिखाओगें.”

चिराग ने सख़्ती से कहा—“मैं तुमसे प्यार करता था, इसलिए तुमने माफ़ी नहीं मांगी. तुम्हें पता चल गया था, शादाब के लिए तुम सिर्फ सेक्स करके अपने शरीर से मजे करवाने वाली एक मस्त चीज़ हो, इसलिए तुमने माफ़ी मांगी थी. अगर तुम्हें अपनी गलती पर पछतावा और शर्मिन्दगी होती, तो तुम तभी माफ़ी मांग लेती, जब मैनें शाज़िया के तुम पर लगाए इल्ज़ाम के बारे में तुम्हें बताया था. अगर तुम्हें मेरे प्यार की परवाह होती, तो जब इस गन्दे आदमी ने पहली बार तुम्हें बुरी नज़र से देखा, उसी वक्त तुम इसके मुँह पर तमाचा मार देती. अगर तुम मुझसे बोर हो गई थी, तो मुझसे अलग हो जाती. मुझसे अलग होकर तुम जिसको मरजी सेक्स इंजॉय करवाती. मुझे उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन तुमने इस नीच आदमी को अपने शरीर से मजे देने के लिए मुझे धोखा दिया. तुम्हारी वजह से मेरी बच्ची को गन्दी बातें सुननी पड़ी. ये गलती नहीं, ये गन्दा काम है और ऐसे गन्दे काम करने वाली गन्दी औरत के लिए मेरे पास कोई माफ़ी नहीं है.”

शादाब ने चीखकर कहा—“अरे, तो हमारी इतनी बुरी हालत क्यों की ?”

चिराग को बोलने से पहले शाज़िया ने मुस्कुराकर कहा—“ये नेक सलाह मैनें दी थी, शादाब. क्योंकि तुम्हारे जैसा सेक्स का भूखा जानवर बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. इसलिए मैनें चिराग साहब से कहा, इस घटिया आदमी की ऐसी हालत करो, कि ये बदला लेने के लायक ही ना रहें. और मेरी नजर में बड़े गुनहगार तुम हो. निकिता तुम्हारे पीछे नहीं पड़ी थी, तुम निकिता के पीछे पड़े थे. तुमने एक शादीशुदा औरत को ऐसी बात कहीं ही क्यों ? अगर तुम शादीशुदा नहीं होते, तब भी एक शादीशुदा औरत को प्यार के नाम पर जिस्मानी रिश्ते बनाने के लिए कहना गलत है. तुम तो खुद शादीशुदा थे, फिर भी तुमने अपनी सेक्स की भूख मिटाने के चक्कर में चिराग साहब और आन्या की परवाह करना तो दूर रहा, अपने बीवी–बच्चों तक की परवाह नहीं की. तुम्हारी तो जितनी बुरी हालत हो, कम है.”

निकिता ने चीखकर कहा—“जानवर तो तुम दोनों बन गए हो, शाज़िया.”

निकिता के गाल पर चिराग ने एक जोरदार चांटा जड़ दिया. निकिता फर्श पर जाकर गिरती है.

चिराग ने कठोरता से कहा—“हमें जानवर बनने पर मजबुर तुम दोनों ने ही किया है. शाज़िया को लगता था, ये शादाब को खुश नहीं कर सकती, इसलिए ये औरत नहीं है. मुझे लगता था, मैं निकिता की जरूरत पूरी नहीं कर पाया, इसलिए मैं आदमी नहीं हूँ. आन्या को दूसरे बच्चे रंडी कहने लगे थे. शबनम को लोग कहते थे, तेरा बाप मजे करता है, तू भी दूसरों को मजे करवाया कर. अकरम को लोग बोलते थे, तेरा बाप मजे लेता है, तेरी अम्मी को भी दूसरों को मजे देने के लिए बोल. हमारा मन करता था, सुसाइड करके मर जाएँ. ये सब हमने कैसे सहन किया, हम ही जानते है.”

शाज़िया ने गुस्से से कहा—“और जानवर हम नहीं, तुम दोनों हो. तुम दोनों ने जो किया, ऐसा जानवर करते है. मेल(नर) जानवर किसी भी फिमेल(मादा) जानवर को चाटने लगते है और फिमेल जानवर किसी भी मेल जानवर के साथ सेक्स कर लेती है. जो लोग ईमानदारी से अपनी शादी निभा नहीं सकते, उन लोगों को शादी करनी ही नहीं चाहिए. अनमेरिड रहो और किसी को धोखे का दर्द दिए बिना आराम से पार्टनर बदल–बदलकर सेक्स इंजॉय करो.”

चिराग ने सख्त आवाज़ में कहा—“इसमें इनकी गलती नहीं है, शाज़िया. ये दुनिया ही गन्दी है. अलीशा और पल्लवी ने मुझे बताया था, इनके ऑफ़िस में लगभग सभी को इन दोनों की करतूत मालूम थी, लेकिन उन सबके हिसाब से शादाब और निकिता की जिन्दगी में कुछ कमी थी, कुछ खालीपन था, कुछ जरूरतें थी. निकिता की जरूरत चिराग पूरी नहीं कर पाया और शादाब की जरूरत शाज़िया पूरी नहीं कर पाई, इसलिए शादाब और निकिता वो कमी एक–दूसरे के साथ पूरी करते है, वो खालीपन एक–दूसरे के साथ भरते है, वो जरूरतें एक–दूसरे के साथ पूरी करते है. शादाब और निकिता की कोई गलती नहीं है. सारी गलती निकिता के पति और शादाब की बीवी की है. एक ने तो मेरे सामने ही बोला था, सारी गलती निकिता के पति की है. वो निकिता की सेक्स की जरूरत पूरी नहीं कर पाया. एक भी माई के लाल ने ये नहीं कहा, निकिता को सेक्स की जरूरत पूरी करने के लिए अपने पति से कहना चाहिए था. जब शादी की है, तो अपने लाइफ़–पार्टनर को अपने खालीपन और अपनी जरूरतों के बारे में क्यों नहीं बताया ? एक बार आकर मुझसे कहती तो सही, मैं सेक्स के लिए तड़प रही हूँ, मेरी सेक्स की जरूरत पूरी करो. अगर कहने के बाद भी मैं सेक्स की जरूरत पूरी नहीं करता, तब जाती किसी और के पास. लेकिन इन दोनों को सेक्स की नहीं, नये सेक्स पार्टनर की जरूरत थी, इसलिए इन दोनों ने हम दोनों को धोखा दिया. और लोगों के हिसाब से सेक्स की भूख मिटाने के लिए धोखा देना प्यार है.”

चिराग और शाज़िया अपने–अपने गुस्से की भड़ास निकालकर निकिता और शादाब को बुरी तरह बैईज्जत करके घर से बाहर निकाल देते है.

घर से कुछ दूर आकर शादाब ने भड़ककर निकिता पर बरसते हुए कहा—“ये सब तुम्हारी वजह से हुआ है. मैनें बहुत बार तुम्हें समझाया था, शाज़िया मेरा मोबाइल चैक करती है. जब तक मैं कॉल या मैसेज ना करूँ, तब तक तुम मुझे कॉल या मैसेज मत करना. लेकिन तुमने किए और शाज़िया को सब पता चल गया. वो पहुँच गई तुम्हारे हैसबेंड के पास. और तुम्हारा हैसबेंड कमीनेपन में शाज़िया से भी दो कदम आगे निकला. साले हरामी ने पच्चीस लाख और तुम्हारे जिस्म के सपने दिखा–दिखाकर पागल कर दिया.”

निकिता ने गुस्से उबलकर कहा—“और मुझ पर शाज़िया और चिराग ने फूल नहीं बरसाए है. ये सब तुम्हें तब सोचना चाहिए था, जब तुमने मुझे घूरना शुरू किया था. वहीं से शुरू हुआ था, ये सब.”

खुद को सही और दूसरे को गलत साबित करने के लिए निकिता और शादाब के बीच एक बार फिर जबरदस्त बहस होती है, लेकिन इस बार भी नतीजा नहीं निकला, कि कौन सही है और कौन गलत है ?

कुछ दिनों तक साथ–साथ यहाँ–वहाँ भटकने के बाद अपाहिज शादाब एक मस्जिद में रहने लगता है और अपाहिज निकिता को निकिता का भाई माफ़ करके अपने घर ले जाता है. कहीं निकिता और शादाब बदला लेने के लिए शाज़िया और बच्चों को कोई नुकसान ना पहुँचा दें, चिराग इस डर से निकिता और शादाब के ऊपर नजर रखता है, लेकिन कई महिनों तक ऐसी कोई संभावना नज़र नहीं आने पर शाज़िया और तीनों बच्चों के साथ चिराग खुशहाल जिन्दगी में खो जाता है.

समाप्त

लेख़क— वर्मन गढ़वाल



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