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@dawriter

पुनर्जीवन

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खुद को आईने में देख कर डर गई थी दिशा।सूनी माँग, सूना माथा,सूनी कलाइयाँ तब तक नजर पैर पर पड़ी,बिछिया बिना सूनी उंगलियाँ।वैधव्य की सफेदी ने जीवन का हर रंग छीन लिया था।

कहाँ हो व्योम??जगा दो मुझे इस बुरे ख्वाब से।मेरा दिल बैठ रहा है,साँसे नहीं आ रही हैं।मेरे इस सपने को तोड़ कर मुझे अपनी बाहों में भर लो।व्योम....व्योम...कहाँ हो तुम!!

चुप हो जा बेटा अब व्योम नहीं आएगा।निर्मोही था वो तुझे इस जीवन की मंझधार में छोड़ गया।देख अपने बेटे को देख,,पाँच दिन से तुझे बिलखता देख सहमा हुआ है।उठ अब तुझे ही इसके माँ-बाप दोनों का फर्ज पूरा करना है।

समेट लिया दिशा ने"दिवु"को अपनी बाहों में,,दिशा और व्योम के प्रेम का अंश उसका पाँच साल का बेटा "दिव्यांश"।फफक पड़ी फिर से ...कैसे पालूँगी तुझे अकेले।ओह!"व्योम क्यों चले गए तुम"।सूनी रातों में व्योम के कपड़े पहन घण्टों सिसकने वाली दिशा,हर आहट पर उसका इन्तेजार करती थी।कभी उसे तारों में खोजती,कभी परछाइयों में।सोचती थी कि व्योम की आत्मा उसके आस-पास है।अक्सर अकेले में उससे बातें करती।पर धीरे-धीरे वो जान गई कि अब व्योम कभी नहीं आएगा।उसकी जिंदगी फिर से चलने लगी।वही सुबह थी,वही शाम थी बस चाय के कप की अदला बदली करने वाला,उसकी थके पैरों की उंगलियाँ खींचने वाला,अपनी बाहों में भरकर उसके बालों में उंगलियां फेरने वाला व्योम चला गया था।आँखें तो हर वक़्त भीगी रहती थीं लेकिन अब बिखरने का समय नहीं था दिशा के पास।दिशा को उसने दिवु की माँ के खोल में समेट लिया था।30 साल की दिशा समाज के लिए मजबूती और धैर्य की एक मिसाल बन गयी थी।

आज दिवु का आई आई टी प्रवेश परीक्षा का रिजल्ट आ गया था।बधाइयों के फोन उठाते-उठाते उसकी नजर व्योम की मुस्कुराती तस्वीर पर  ठहर गयी,जैसे कह रहे हों,"मेरी दिशु तूने तो जंग का पूरा मैदान साफ कर लिया"।

आज दिवु जा रहा था,अपने लक्ष्य अपने सपने को पूरा करने के लिए।उसका मुम्बई आई आई टी में पढ़ने का सपना पूरा हो गया। इस दुनिया की रंगीनियों को देखने,इसकी कड़वाहटों को चखने पहली बार दिशा के बिना कहीं जा रहा था।आज फिर बिखर रही थी दिशा।आँसू उसके पलकों का बांध तोड़ उसके चेहरे पर बिखर रहे थे।व्योम की परछाईं के रूप में दिवु अब तक उसके साथ था,अब कैसे जियेगी वो??

मैसेंजर की तरफ से सूचना आयी हेलो, दिशा कैसी हो?अरे!अम्बर...उसके स्कूल का दोस्त तो नहीं!!अम्बर वर्मा ..ये तो कोई स्मार्ट सा आदमी है।अम्बर तो मोटा से बच्चा था।मैसेंजर पर फिर से मैसेज आया,''दिशा,आप हरिद्वार में पढ़ी हैं"??       हां,,"तू अम्बर है "??                 "याद आ गया तुमको" "हां कैसा है तू"?

"अच्छा हूँ।" अब तो बहुत अच्छा हूँ।तुम्हे कितने दिनों से फेस बुक पर खोज रहा था,तुम आज मिली हो।तुम कोटा में हो??

अरे अभी 1 महीने पहले तो मैंने प्रोफाइल बनाई है।हां कोटा में ही हूँ।तुम कहाँ हो??   "मैं दिल्ली रहता हूँ"

दिशा और अम्बर बचपन के दोस्त थे।दिशा के पिता की पोस्टिंग तब हरिद्वार में थी।वो दोनों एक ही कैंपस में रहते थे।कक्षा 3 से कक्षा 7 तक दोनों साथ ही पढ़े थे।फिर दिशा के पिता का तबादला आगरा हो गया।

आज बरसों बाद दो दोस्त मिले थे मैसेंजर पर।मार्क जुकरबर्ग ने जाने ऐसे कितने दोस्तों को एक दूसरे से मिलवा दिया था।एक दूसरे को  हाल बताते-पूछते 2 घण्टे बीत गए थे।दिवु के फ़ोन से दिशा का ध्यान घड़ी पर गया।शुभ रात्रि बोलकर दोनों ने एक दूसरे से विदाई ले ली।

अम्बर की शादी के 10 साल बाद ही उसकी पत्नी का देहांत हो गया।एक बेटी है उसकी,नैनीताल के होस्टल में रहती है।अम्बर और उसके बचपन के किस्सों को याद करते-करते जाने कब आंख लग गयी।बातों को सिलसिला शुरू हुआ तो फिर होता ही रहा।अम्बर दिशा से मिलना चाहता था लेकिन अकेले रहने के चलते दिशा ने मना कर दिया।इधर कुछ दिनों से दिशा अपने अंदर आये बदलावों को महसूस कर रही थी।वो अब खुश रहने लगी थी।व्योम के जाने के बाद से वो जिस खालीपन से जूझ रही थी वो भरता जा रहा था।अपनी सारी परेशानियाँ,सारी बातें वो अम्बर के साथ बाँट लेती थी।

एक दिन अम्बर बिना बताए ही कोटा आ गया।दिशा की घबराहट देख कर कहने लगा,"तुम तो ऐसे घबरा रही हो जैसे हम कोई 18-19 के लड़के लड़की हों।दिशा जीवन के इस पड़ाव में क्या हम एक दूसरे का साथ नहीं दे सकते।"

दिशा कुछ समझ नहीं पा रही थी,तब तक अम्बर ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया,,"बोलो दिशा,मेरा साथ दोगी।"दिशा ने अपना हाथ खींचते हुए बोला,"नहीं अम्बर मैं व्योम को धोखा नहीं दे सकती।अपनी पूरी जिंदगी उनका साथ निभाने की कसमें खाई थीं मैंने... और दिवु,वो क्या सोचेगा।पांच साल की उम्र में ही बहुत समझदार हो गया था वो।दूसरे बच्चों की तरह कभी परेशान नहीं किया उसने।इस उम्र में मैं किसी और के साथ...तुम बस मेरे दोस्त हो अम्बर,गलती  मेरी ही है। मैं ही अपने खालीपन को दूर करने के लिए तुम पर निर्भर हो गई थी।"

दिशा,व्योम अब इस दुनिया में नहीं हैं।तुम उन्हें धोखा नहीं दे रही हो।दिवु कल अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाएगा।उसका भविष्य,उसका परिवार तुम्हारे साथ नहीं होगा।मुझे भी तुम्हारी बहुत जरूरत है दिशा।हमदोनो एक दूसरे के साथ यह जिंदगी आराम से काट लेंगे।

दिशा नहीं मानी,अम्बर दिल्ली चला गया।उनकी बातें कम हो गयी थीं।दिवु को एम आई टी की स्कॉलरशिप मिली थी।कुछ दिनों बाद वो भी विदेश चला गया।दिशा और अम्बर की बातचीत सिमट गई थी।दिशा खुद ही अम्बर को खुद से दूर कर रही थी।कभी उसका मन उस पर हावी हो जाता तो कभी व्योम और दिवु का प्यार।उलझनों के चक्रव्यूह में घिरी दिशा,मानसिक अवसाद का शिकार होती जा रही थी।स्कूल से लौट कर अपने घर के सब काम निपटाने वाली दिशा,सुबह-शाम योगा करने वाली दिशा,घण्टों सोई रहती थी।अम्बर उसे फ़ोन करता तो उठाती भी नहीं थी।दो दिन तक उसने दिवु का फोन भी नहीं उठाया तो उसने घबराकर अपने मामा को फ़ोन किया।विवेक(दिशा का भाई)ने भी उसे फ़ोन मिलाया।लगातार 10 बार फ़ोन करने के बाद दिशा ने फोन उठाया।""कहाँ थी दीदी??फोन क्यों नहीं उठा रही थी??ठीक तो हो??

"हां विवेक,ठीक हूँ।मोबाइल साइलेंट पर था।

"दीदी आपने दिवु का फोन भी नहीं उठाया।बहुत परेशान है वो।"

बात कर लूँगी उससे।कह कर फोन रख दिया।बस फोन पर ये सुनकर कि मैं जिंदा हूँ।सब खुश हो जाते हैं।मैं भी तो बस दिवु के लिए जिंदा हूँ।कुछ सालों बाद उसे भी मेरी कोई जरूरत नहीं रह जायेगी।अचानक उसकी नजर व्योम की मुस्कुराती तस्वीर पर जाती है।मानसिक आवेगों के आवेश में चीख पड़ती है वो,"कहाँ हो व्योम??आ जाओ मैं अब अकेली नहीं जी सकती।मुझे ही अपने पास बुला लो व्योम।"

उसकी नींद दरवाजे पर लगातार हो रही आवाज से टूटी।सामने अम्बर था।"कैसी हो दिशा?फोन क्यों नहीं उठा रही थी?भावनाओं के अतिरेक में कुछ नहीं बोल पा रही थी वो,बस अम्बर के सीने से लग गयी।जाने कितने देर,वो बस रोती रही।अम्बर ने उसे अपने सीने से लगाये रखा।रो लो दिशा,मन हल्का हो जाएगा।उसके बालों में उंगलियाँ फेरता रहा।आंसुओं से भीगी आंखों को और गालों को चूमता रहा।दिशा ने कोई विरोध नहीं किया आज सालों बाद वो खुद को जी रही थी।सालों की घुटन,अकेलापन सब भूल कर वो अपने और अम्बर के दिल की धड़कनों को सुन रही थी।

सुबह काम वाली के घण्टी बजाने पर दिशा ने सोते हुए अम्बर को खुद से अलग किया।अम्बर को देख कामवाली की सवालिया नजर को उसने अपनी खामोशी से अनदेखा कर दिया।अभी तो उसे बहुत से सवालों के जवाब देने हैं।पर अब वो इन सवालों से नहीं घबड़ायेगी।व्योम ने उसके साथ जीवन के पाँच साल बिताये थे लेकिन उसने उसकी यादों के साथ 18 साल बिता दिए।हर रात सोचती थी कि बस एक बार व्योम दिख जाए कहीं।अक्सर रात को सोचती थी कि करवट बदलूँ और व्योम बैठे हों अपनी सारी परेशानियाँ उनके साथ बाँट लूँ फिर व्योम चले जायें।ससुराल और मायके के रिश्ते अपनी-अपनी जिम्मेदारियों और परेशानियों में ही परेशान थे किसी के पास उसकी बातें सुनने की भी फुर्सत नहीं थी ।अट्ठारह साल सबकी परवाह करती रही।वैधव्य का अभिशाप झेलती रही।

लेकिन अब नहीं,पहले सोचती थी कि दिवु के सहारे अपनी जिंदगी काट लेगी।पर दिवु के बाहर जाने के बाद उसे अहसास हुआ कि दिवु में खुद का सहारा खोज कर वो उसे बांध नहीं सकती,उसकी मंजिल कहीं और है।कल को उसका अपना परिवार होगा कहीं दिशा का खालीपन उसे दिवु को खोने की असुरक्षा से न भर दे और अम्बर उसे भी तो मेरी जरूरत है।इस उम्र में हम दोनों का फिर से मिलना सिर्फ एक संयोग तो नहीं हो सकता।

मैं दूँगी सबके जवाब दूँगी।मैंने व्योम को धोखा नहीं दिया है,वो मेरे मन में ईश्वर की तरह बसे हुए हैं लेकिन अब मैं भी अपनी जिंदगी जीना चाहती हूँ।हँसना चाहती हूँ, खिलखिलाना चाहती हूँ।किसी के कंधे पर सिर रखकर रोना चाहती हूँ।मुझे भी हक़ है जीने का।मुझे हक़ है।

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