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@dawriter

पराया धन

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पराया धन

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शीला लगभग पन्द्रह वर्षोंं से देखती आ रही हैं अपने पड़ोस में रहनेवाली दीपा भाभी को। उसे याद है जब वह नयी-नयी आयी थी शादी के बाद रहने तो उस समय दीपा भाभी के दोनों बच्चे आठ साल और दस साल के थे लगभग दो साल के अन्तर में थे ..बेटी बड़ी और बेटा छोटा।

दीपा अपने दोनों बच्चों से प्यार करती थी पर अपने बेटे को कुछ ज्यादा प्यार करती थी। उनकी सास भी अपने पोते से कुछ ज्यादा ही प्यार करती थी। दीपा भाभी सांवली सुन्दर और छोटी कदकाथी की थी पर उनके बच्चों की लम्बाई अच्छी थी। एक बार की बात है जब शीला दीपा भाभी के घर पर बैठी थी दोनो बच्चे स्कूल से आए थे तो दीपा ने रोहिणी से कहा खाना खा लो और बेटे को लाकर दे दिया। रोहिणी ने अपना खाना खाकर प्लेट रख दिया तो उसकी दादी ने कहा दिखता नहीं है तुम्हे .. भाई का प्लेट वही पड़ा हैं रख दूं। वो गुस्से में बोली मैं भी तो स्कूल से आयी हूँ फिर भाई की प्लेट को भी रख दिया।

ये उनके रोज की कहानी थी क्योंकि उनका मानना था कि बेटी तो पराया धन होती है अगर काम सीखेंगी तो आगे मुश्किल नहीं होगी पर उनकी इस सोच ने उसे अभी से पराया बना दिया था। दीपा कहने लगी माँ जी सारा दिन इसके पीछे लगी रहती हैं अगर मैं माँ जी के विरोध बोलूं तो रोहिणी उनकी इज्जत करना बंद कर देगी इसपर शीला ने कहा पर भाभी आपने भी तो रोहिणी को खाना नहीं डाला और रोहित को खाना डाला तो दीपा ने कहा कि लड़की है अभी से काम सीख लेंगी तो आगे दिक्कत नहीं आएगी। शीला ने कहा कौन सी दिक्कत वो अभी से अपने घर में पराये जैसा व्यवहार देखेगी तो उसे पराये कैसे अपने लगेंगे।

ये कहकर शीला वहां से चली गयी उस दिन उसका मन बहुत बैचेन था कि कैसे हमारे घर की बेटिया अपने घर में ही पराये जैसा जीवन जीती है सिर्फ शादी और दूसरे घर जाने के नाम से ही अपने बेटे और बेटियों में फर्क किया जाता हैं। शीला और दीपा का घर अगल-बगल मे होने से शीला को खिड़की से सबकुछ दिखता भी था और सुनता भी था। किसी दिन अगर कामवाली नहीं आती तो रोहिणी सारा दिन अपनी माँ के साथ घर के काम में उसका हाथ बटाती थी और वही रोहित बाहर खेलता था। ये सब देखकर शीला को बहुत गुस्सा आता था उसने कितनी बार समझाया पर दीपा ने कभी ध्यान नहीं दिया। पहले तो सास का नाम ले लेती पर उसकी सास के गुजरने के बाद भी वही हाल रहा। वो बच्ची इसके बावजूद अपनी कक्षा में प्रथम आती थी देखते ही देखते कुछ सालों में रोहिणी ने अच्छी पढ़ाई कर ली और वो नौकरी कर अपने पैरो पर खड़ी होना चाहती थी पर उसकी शादी कर दी गयी पर उसे ससुराल अच्छा मिला और उनलोगो ने उसे नौकरी कर आगे बढ़ने दिया।

वही दीपा की बहू भी आ गयी थी पर उसके आने के बाद रोहित कुछ बदल गया था वो हर समय अपनी पत्नी का साथ देता था। और कोई भी काम अपनी पत्नी को करने नहीं देता और एक दिन तो उसने साफ़ मना कर दिया और साफ साफ कह दिया कि उसकी पत्नी उसके साथ रहना नहीं चाहती वो कहती हैं या तो मां के साथ रहो या मेरे। उसके पिता भी अब न रहे थे और दीपा से भी ज्यादा काम नहीं होता था। रोहिणी दूसरे शहर में रहती थी अचानक किसी काम से उसे आना पड़ा तो उसने सोचा क्यूँ न घर पर बिना बताए जाए। उसने वहां देखा कि उसके भाई भाभी उसकी माँ को रखने को तैयार नहीं हैं। तो तुरंत उसने फैसला लिया कि वो अपनी माँं को अपने साथ रखेगी। जिस माँ ने उसे हमेशा पराया घन समझा वही उसे अपने साथ ले जाने को तैयार है और वो बेटा जिसके लिए उसने जान दिया वहीं उसके साथ रहने को तैयार नहीं हैं। दीपा अचानक अपनी बेटी के सामने हाथ जोड़कर कहा कि मुझे माफ़ कर दो मैंने हमेशा तुम्हे पराया धन समझा। उसकी आँखें पाश्चाताप के आँसू थे जो थम नहीं रहे थे। शीला के आँखें भी भर आयी थी वो मन ही मन कह रही थी कब हम अपनी बेटियों को पराया धन समझना बंद करेगें। तभी अचानक रोहित बाहर आया और कहा देखा माँ जिसे तुमने जिन्दगी भर पराया समझा वही तुम्हे आज ले जाने को तैयार है। माँ इस घुटन में मैं कब से जी रहा था पर मैं कभी विरोध न कर सका। रोहित रोहिणी को और माँ को घर के अंदर ले गया और खुशख़बरी दी कि हमारे घर एक और पराया धन आने वाली हैं। दीपा ने कहा नहीं बेटिया पराया धन नहीं होती।

सोनी केडिया



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