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@dawriter

पगफेरा

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nidhi510 by  
nidhi510

पगफेरा

आज हर ओर रौशनी थी, सजावट थी लेकिन निर्झर के मन का सूनापन जस का तस! बल्कि आज शोना की विदाई के साथ वह सूनापन जैसे कुछ और ही बढ़ गया। सभी रिश्तेदार और मित्र रात भर की नोक झोंक और विदाई की रुलाई की थकान उतारने अपने अपने कमरों में जा आराम कर रहे थे। कुछ अपना सामान बटोरने में लगे थे। समय से घर पहुँच फिर काम पर जाने की जल्दी जो थी। पर रिश्तेदारों के लिए मिठाई व उपहार बांधती निर्झर के तो सभी काम , सभी कर्तव्य जैसे विदा के साथ ही खत्म हो गए थे। रिश्ते खत्म हो जाते है पर रिश्तेदारी चलती रहती है। निर्झर ने सोचा।

शोना दीदी की विदाई के बाद तो घर बिलकुल ही खाली हो गया बीबीजी! शांतांबाई की आवाज आई।
खाली? निर्झर चौक कर बोली।
हां खाली तो हो ही गया। प्रकट में वह बोली। और दिल बोला कि घर तो कब का ढह चुका और खाली भी विगत कई वर्षों से पड़ा है। ऐसा खालीपन जिसे न मेहमानों का खालीपन भर पाया न दिन भर बजती ढोलक की आवाज !

कब कहाँ कैसे क्यों कितने सवाल थे जो वर्षो से उसके दिलोदिमाग को झंझोरे हुए थे। कितने ही अनुत्तरित प्रश्न थे, कितनी ही अनकही अनसुलझी बाते, कितने ही अव्यक्त भाव। उसे लगता था कि अगर यह सब भाव अंकुश तक पहुच जाए ... सब प्रश्नो के उत्तर मिल जाए तब शायद सब भारीपन दूर हो जाए। सब दूरियां मिट जाए। वैसे भी दूरी थी ही कितनी?? पलंग के दो किनारो जितनी! फिर वर्ष दर वर्ष बीतते चले गए, समय बढ़ता गया पर दूरियां नहीं घटी। घर बड़ा होता गया और दूरियां भी। पलंग के दो किनारो से दो सिरहाने और फिर कब वह दोनों खिसक कर घर के दो किनारो पर पहुच गए ,पता ही न चला।

अंकुश अपने बिज़नेस में डूबता चला गया। नए साथी, नयी चुनोती, नयी सफलताएं मिलती गयी। और निर्झर पीछे बहुत पीछे छूटती चली गयी। उसकी स्थिति समुन्दर में डूबते उस इंसान जैसी हो गयी जिसे तैरना नहीं आता। बचने की आशा में वह कभी जोर जोर से हाथ पैर चलाता है, कभी थक कर खुद को लहरों के हवाले कर देता है।

आज निर्झर कुछ जल्दी ही उठ गयी थी। रोज की तरह अपनी अकेले की चाय बना कर वह लॉन में आ बैठी। यूँ उसे अकेले चाय पीना पसंद नहीं पर कई वर्षों से साथ चाय पीने वाला कोई है भी तो नहीं। माँ के घर तो सुबह का आगाज ही माँ की आवाज से होता था-
निर्झर उठ जा चाय बना रही हूँ।
आजा चाय बन गयी है
उठ भी अब .... ठन्ड़ी हो जायेगी।
पीनी नहीं थी तो बनवाई क्यों थी ?
माँ का बोलना जारी रहता, जब तक की वह बिस्तर छोड़ नहीं देती।

घर का काम करते करते माँ फिर कहती। चाय बना रही हूँ। आधा कप ले ले तू भी! और माँ बेटी साथ आ बैठते। कुछ सलाह मश्वरा घर के पर्दो और नए ख़रीदे साड़ी सूट के बारे में, कुछ प्लानिंग रात के खाने की और कुछ खट्टी मीठी यादो के साथ चाय का आधा कप , पूरे से भी ज्यादा का लुत्फ़ दे जाता।
अंकुश को बार बार चाय पीना पसंद नहीं। बस सुबह की चाय पर वह उधर इधर की जानकारी हासिल करता है पर निर्झर से नहीं, अखबार के माध्यम से। आखिरी बार कब अंकुश और निर्झर साथ बैठे यह तो अब खुद निर्झर को भी याद नहीं।

जिंदगी के पिछले 20 वर्ष निर्झर ने अंकुश के बिना ही चाय पीने, सोने घूमने, खाना खाने की आदत अपनाने में ही तो निकाले! पर क्या जाने ये दिल क्या ठाने बैठा है की अंकुश के अलगाव ,उसकी विरक्ति से ही निर्झर की साँसे थमने लगती है। और शायद बहुत पहले ही थम गयी होती अगर शोना की जिम्मेदारी न निर्झर पर होती। जब शोना अपने छोटे छोटे हाथो से उसका सिर दबाती या दिन भर से भूखी निर्झर को अपने हाथ से खाना खिलाती तो वह शोना को सीने से लगा लेती। शोना कहती - माँ रो नहीं , नहीं तो मैं भी रो दूंगी। और निर्झर अपने आंसू रोक लेती। फिर उससे चिपक कर रोते रोते सो जाती और वह ग्लानि में डूबी कितनी ही देर तक तकिया भिगोती रहती की क्या उसकी छोटी सी राजकुमारी इतना मानसिक बोझ उठा पाएगी। और इन सब बातो से बेखबर अंकुश !
अपने आप और अपने ख्यालो से जूझती निर्झर हमेशा इस उलझन में पड़ी रहती की अंकुश बेपरवाह है उसके लिए या सच में बेखबर ? ऐसा तो नहीं की कुछ शब्दों के फासले उसका बसा बनाया घर उजाड़ दे। ऐसा न हो की जब सब खत्म हो जाए तब अंकुश बोले की निर्झर एक बार मुझसे कहा तो होता। और फिर इसी एक बार न कह पाने के डर से कितनी ही बार निर्झर ने अपने मन के दर को ,दर्द को अंकुश को बताया होंगा। कितनी ही बार अंकुश ने सब सही कर देने का वादा किया होंगा और फिर कितनी ही बार निर्झर ठगी गयी होंगी।निर्झर अपना तन मन सब अर्पण करती गयी .... अंकुश की हर पसंद नापसंद अपनाती गयी ... अपने हर कदम पर उसकी स्वीकृति की मोहर का इंतज़ार करती गयी। वह चाहती थी की अंकुश भी हर विषय में उसकी राय ले पर वह कहता यह छोटे मुद्दे है इन पर क्या इतना विचार करना। और निर्झर कभी समझ ही नहीं पाई की सच में ही वह विषय इतने गौण थे की निर्झर को बताना जरूरी नहीं था या निर्झर ही अंकुश की जिंदगी में गौण थी।

निर्झर अंदर कमरे में चली आई। सामने लगे शीशे पर नज़र पड़ी तो हैरान रह गयी। वह पास आ गयी और खुद को निहारने लगी। सोचने लगी की अंकुश सच कहता है अब वाकई मैं उसके लायक नहीं रही। शादी के इन 25 सालों में जैसे 45 सालों की जिंदगी जी ली थी उसने। निर्झर तो कब की झर चुकी थी। बची थी तो बस एक बेबसी ... निशब्द .... निस्तब्ध। उर्वशी क्या हमेशा ही अंकुश के लायक बनी रहेगी ? या हर निर्झर को दरकिनार कर अंकुश एक नई उर्वशी तलाशता रहेगा ?

निर्झर बेढाल हो कुर्सी पर बैठ गयी। आँखों से आंसू झलक गए। सामने पलंग पर उसका सूटकेस रखा है। सभी सामान है उसमें..... कपड़े... सर्टिफिकेट.... पासपोर्ट। नहीं है तो बस गंतव्य! इसी गंतव्य की तलाश में साल दर साल बीत गए और वह अभी भी उसी शून्य से बहार नहीं आ पाई है। और वह गंतव्य मिल भी जाए तो क्या वह जा पाएगी। पहले भी निर्झर शोना के बालमन पे पड़ने वाले बुरे प्रभाव को सोच सब सहती रही और आज उसकी विदा के बाद भी, जब शोना दूर अंजान लोगों को अपना बनाने में प्रयासरत होंगी तब भी क्या निर्झर ऐसा कुछ कर सकती है जिसके कारण शोना को उपहास का पात्र बनना पड़े।
निर्झर और शोना की साँसे जैसे आपास में जुड़ सी गयी है।निर्झर सांस नहीं लगी तो दम मानो शोना का भी घुटेगा। इसी कारण निर्झर इतने सालों से न जी पा रही है न इस जीवन से मुक्त हो पा रही है।

दरवाजे पर हुई दस्तक से सयंत हो निर्झर ने अपने आंसू पोंछे। शोना आई होंगी पगफेरे के लिए, निर्झर ने सोचा। शोना के सामने वह कमजोर नहीं पड़ सकती।दरवाजा खोला तो सामने शोना और शलभ खड़े थे ! कितनी खूबसूरत जोड़ी है। भगवान् सदा सलामत रखे। निर्झर ने नजर उतारी , रोकते रोकते भी आंसू कोरो से झलक ही गए। शोना और शलभ ने झुक कर पैर छुए। शोना कमरे में आ गयी। सूटकेस की चेन बंद कर दी। चलो माँआपकी भी दूसरी विदा का समय हो गया। शलभ ने सूटकेस उठाते हुए कहा। शोना ने कस कर निर्झर का हाथ थाम लिया और बाहर ले आई। निर्झर ने पीछे मुड़ कर घर को देखा। बॉलकनी में खड़े अंकुश से नज़रें मिली। निर्झर ने आंसू पोंछे और कार में बैठ गयी।

Dr Nidhi Agarwal

Image Source : lifegate



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