12
Share




@dawriter

नियति

1 1.71K       

बाबू जी..' बाबू जी ..' आप ठीक तो हैं ना? गरिमा ने परेशान होते हुए कहा..। परीक्षण करते हुए डॉक्टर ने उनकी बहू को सम्बोधित करते हुए कहा, अरे आप परेशान ना हो ..अभी इंजेक्शन दे दिया है धीरे-धीरे नींद आ जाएगी ।

डॉक्टर ने झुकते होते हुए गुप्ता जी को ध्यान से देखा।माथे के पास थोड़ा खून जम गया सा दिख रहा था। और हाथों पैरों में खरोचें थी। 

गरिमा: तो क्या बाबू जी ऐसे ही रहेंगे डॉक्टर साहब ? जब से एक्सीडेंट हुआ है , बिल्कुल सुस्त हैं । ज्यादा खून तो नहीं निकला है ।

डॉक्टर : खून बह न पाने के कारण शायद क्लोटिंग हो गयी है ब्लड की । डॉक्टर विवेक आएं तो इन्हें हॉस्पिटल ले आएं आप लोग ।

गरिमा: दरअसल ...विवेक किसी काम से दिल्ली गए हैं..अभी विवेक भी नहीं थे वो तो वाचमैन ले आया इन्हें । मैं तो भीतर भी न ला पाती अकेली .' विवेक कल तक आएंगे।

डॉक्टर: चेकअप कर लिया है ज्यादा सीरियस तो नहीं है पर 'अभी कुछ दिन तो ऐसे ही रहेंगे ।

गरिमा : किंतु यह ठीक तो हो जाएंगे ना ?"

डॉक्टर: हाँ मैंने आवश्यक दवाइयाँ दे दी है ..यदि कोई इमरजेंसी हो तो अस्पताल जरुर ले आइएगा..' कहकर डॉक्टर ने विदा ली।

मैंने गरिमा को सांत्वना देकर अपने फ्लैट की चाभी उठाई और कहा।

अच्छा गरिमा अब चलती हूँ ,कोई जरूरत हो तो जरूर बताना..' 

उसने शुक्रिया कहकर मुझे विदा दी। गुप्ता जी ,मेरी ही बिल्डिंग में 3rd फ्लोर पर रहते हैं।

बेटा बहू बेटी दामाद व नाती-पोतों से भरा पूरा संपन्न और खुशहाल परिवार है उनका..! वे अपने बेटे -बहू के साथ रहते हैं...बेटी दामाद यही नजदीक ही थोड़ी सी दूरी पर स्थित बिल्डिंग में रहते थे। मैं उम्र में उनकी बड़ी बहु गरिमा के समकक्ष थी मेरी और गरिमा की बहुत बनती थी।

गुप्ता जी के दो बेटे थे ...बड़ा बेटा विवेक और बहू गरिमा.. जो यहां लखनऊ में उनके साथ रहते थे ..वहीं छोटा बेटा विपुल और उसका परिवार और गुप्ता जी की पत्नी गांव में रहा करती थी... विवेक डॉक्टर था और छोटा पुत्र खेती बाड़ी का कार्य देखता था। गुप्ता जी की फैमिली में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था ..तभी अचानक पता चलता है कि गुप्ता अंकल का एक्सीडेंट हो गया है.... यह पता लगते ही मैं तुरंत गरिमा के पास आ गयी थी ...शाम को डॉक्टर विवेक भी आ गए... एक्सीडेंट की बात सुनकर उन्होंने तुरंत फ्लाइट पकड़ ली थी ...और उनकी रिपोर्ट आई पता चला कि, उनकी दिमाग की नस अंदर से क्षतिग्रस्त हो गई है खून जम गया है... क्योंकि खून बाहर नहीं रह सका , इसलिए क्लॉटिंग हो गई। 

जिसके कारण गुप्ता जी के शरीर का एक हिस्सा लकवा ग्रस्त हो गया वह हॉस्पिटल में भर्ती किए गए लगभग 10 दिनों तक उनका इलाज चला।

डॉक्टरों ने कहा अब हालत में सुधार है किंतु आवाज आने में कुछ दिनों का समय लगेगा..किंतु यह ठीक अवश्य हो जाएंगे ..!

क्योंकि विवेक खुद डॉक्टर था अतः वे अस्पताल से घर आ वापस आ गए थे..। घर में अब तो लोगों का आना जाना होने लगा था सभी उन्हें देखने के लिए और सहानुभूति जताने के लिए आते थे ...इस क्रम में मैंने भी सोचा कि मुझे भी जरुर जाना चाहिए ..।

तो मैं भी शाम के वक्त उनके घर गई अभी मैंने प्रवेश ही किया था कि मुझे कुछ आवाजें सुनाई पड़ी जो शायद विवेक का स्वर था.. 'आपको माँ से मिलना चाहिए बाबूजी ..उन्हें भी तो आपकी फिक्र रहती है। 

बाबूजी की गूँ-गूँ की आवाज आ रही थी संभवत: वह अपनी पत्नी से मिलने से इंकार कर रहे थे..सिर हिला कर मना करने की कोशिश भी कर रहे थे।

वह शुरू से उनको ना मिलने की जिद करे बैठे हुए थे और उनका बेटा उनसे अनुग्रह कर रहा था ... ' पत्नी है वह आपकी ! उम्र भर क्या नहीं किया उन्होंने आपके लिए ? और आप ने क्या दिया उन्हें! हमेशा तिरस्कृत किया ...एक पत्नी का सम्मान तक भी नहीं पा सकी हैं आप से, कम से कम...यहां तो बुला लीजिए सेवा करनी चाहती हैं आपकी। आप को न सही किंतु उन्हें तो आपकी फिक्र है..!!' इसके बाद मैंने आवाज करते हुए द्वार पर दस्तक दी। घर के भीतर प्रवेश करने के पूर्व,उन्हें संभलने का मौका देने हेतु...( सभी चुप हो गए) 

गरिमा ने मुझे भीतर आने को कहा : 'अरे काव्या तुम! आओ आओ 'भीतर आओ ..! 

देखिए बाबूजी आप से मिलने कौन आया है ?

मैंने भी बाबूजी को देखकर प्रणाम किया। हाल चाल पूछा । मुझे देख विवेक भी दूसरे कमरे में चले गए , मुख पर बनावटी हंसी का आवरण गरिमा और विवेक दोनों के चेहरों की उलझनों को ढँक पाने में असमर्थ था।

मैं महसूस कर रही थी कि मेरे आने से पूर्व स्थिति काफी तनावपूर्ण थी..! काफी लोग उसके घर आ चुके हैं बाबू जी से मिलने.. रिश्तेदार ,बहने ,गरिमा के मायके और ससुराल पक्ष के बहुत से लोग, जिनमें से कुछ को तो मैं पहचानती तक नहीं थी ...फिर औपचारिकताएं पूर्ण करके मैं अपने घर आ गई! किंतु एक प्रश्न मुझे कचोटने लगा कि ,गुप्ता अंकल अपनी पत्नी को यहाँ नहीं आने देना चाहते । वो भी इस हालत में तो और जरूरत है देख रेख की ..।

कोई ना कोई बात तो अवश्य है ।

शाम को गरिमा मेरे घर आयी मुझसे जूस निकालने वाली हाथ की मशीन लेने के लिए । मैंने गरिमा से बातों ही बातों में पूरा वाक्या पूछा ..उसने पहले तो बताने से टालमटोल किया किंतु मैंने उसे विश्वास में लेकर कहा कि ...बताओ मुझे गरिमा !आखिर बात क्या है ?बाबूजी माँ से मिलना क्यों नहीं चाहते ?उस दिन तुम्हारे घर आने के समय जब तुम्हारी और विवेक की बातें हो रही थी.. बाबू जी को तुम लोग समझा रहे थे तो दरवाजे की ओट से मैंने सब कुछ सुन लिया था गरिमा ने विस्मय भरी निगाहों से मुझे देखा।

मैंने कहा :हाँ बताओ मुझे ..मैं रात भर सोचती रही कि आखिर क्या बात है ?बाबूजी माँ को क्यों नहीं बुलाना चाहते.. पहले भी मेरे दिमाग में यह बात आती थी कि बाबूजी यहाँ और माँ गांव में ? 

गरिमा : दरअसल बाबू जी और माँ का विवाह मजबूरी में हुआ था माँ की शादी पहले बाबू जी के जेष्ठ भ्राता से तय हुई थी एवं तिलक चढ़ चुका था किंतु एक दिन गाड़ी से जाते वक्त एक्सीडेंट में उनकी अचानक मौत हो गई और फिर ऐसी उत्पन्न परिस्थितियों के कारण उनके पिताजी ने माँ का विवाह हमारे बाबूजी से तय कर दिया। माँ के पिताजी ने उनके जीवन को बर्बाद होने से बचाने की दुहाई देकर उनका विवाह ,बाबू जी से करवाने को कहा तो दादा जी राजी हो गए..!और दूसरी बात ये की बाबूजी उस वक़्त विवाह योग्य थे एवं मां से उम्र में बडे भी थे । फलतः शादी हो गयी ।किंतु दोनों की जोड़ी बिल्कुल बेमेल थी बाबूजी उस वक्त के पढ़े-लिखे सुदर्शन युवा थे, पढ़े-लिखे थे। लेखा अधिकारी के पद पर चयनित हुए, प्रतिभाशाली युवक भी थे एवं माँ मुश्किल से कक्षा पांच पास थी वह भी जैसे-तैसे... जहाँ बाबूजी सुसंगठित शरीर, गौर वर्ण ऊंचे कद की अच्छी डील डौल वाले सुदर्शन पुरुष.. वही माँ दबी छुपी ,दब्बू किस्म की,और सांवले वर्ण की साधारण नैन नक्श की युवती थी.. ऊपर से बोलती भी न थी ,हालांकि बाबूजी ने इस विवाह का विरोध भरसक किया ,किंतु उनकी एक न चली ।

पत्नी के रूप में वह एक योग्य और अपने समकक्ष की स्त्री चाहते थे, किंतु होनी को कौन बदल सकता है फलत: विवाह किसी भांति हो गया.. आरंभिक 4-5 वर्षों तक तो दोनों ने ठीक से कभी बात भी नहीं की। किंतु ऐसा कब तक चलता ..जीवन इतना बड़ा..! धीरे-धीरे बाबू जी के पिताजी और माँ चल बसे.. ले देकर घर में 2 प्राणी..कब तक बैर रहता ..! किन्ही दुर्बल क्षणों में रात्रि के अंधकार में और यौवन के अतिरेक ..में मात्र शारीरिक तृप्ति की आकांक्षा हेतु.. शायद उनके शरीर मिल गए ..किंतु मन तो आज तक अतृप्त हैं । माँ को संतान का सुख तो मिला किंतु पत्नी के आत्म सम्मान एवं पति के प्रेम का सुख उन्हें कभी नहीं प्राप्त हो सका ..किंतु इसी को उन्होंने अपनी 'नियति' ..मान लिया है ..इसी को पति का प्रेम मानकर वे आज तक जी रही है । बच्चों के बड़े होने और पालन पोषण में फिर वे ऐसी जुटी की मन से मन की थाह कभी मिल भी न पाई, घर गृहस्थी की चक्की में कभी वक्त न मिला कि, वे प्रतिकार करतीं ,आखिर भारतीय स्त्री पति में परमेश्वर ढूंढती है,सो मांजी ने भी परमेश्वर से कभी कोई प्रश्न पूछने की धृष्टता नहीं की। फिर जब मैं इस घर में बहू बनकर आई तो मेरा और विवेक का बोलना ,हंसना ,खिलखिलाना ,मान मनुहार करना ..सदैव मां को इस बात का स्मरण करा देता कि उन्हें कभी यह सब नहीं मिला है.. और यह मां और बाबू जी के झगड़े का कारण बनने लगा.. फिर जब विवेक शहर में आए ,तो बाबू जी हमारे साथ यहां शहर आ गए..। और माँ आज भी वही है ..न बाबूजी मिलने जाते हैं न उन्हें बुलाने देते हैं..।

यह सब कुछ सुन कर मुझे भाग्य की इस विडंबना पर अत्यंत क्रोध आया कि आखिर दोष किसका है मां का या बाबूजी का ? संभवत: दोष किसी का ही नहीं था..दोष उन परिस्थितियों का था..जिनमे वे एक दूसरे के लिए चुने गए थे..! शायद यही नियति थी..!!" उसी क्षण मैंने यह कहानी लिखनी आरंभ की क्योंकि मेरा मन उस स्त्री के लिए विह्वल था जिसने आज तक पति के प्रेम के स्थान पर मात्र शारीरिक भावावेशो को ही महसूस किया था और स्वाभाविक प्रेम को न पाकर पति के रूखे व्यवहार को ही उन्होंने अपनी नियति मान लिया ..पति के स्पर्श में प्रेम को टटोलने की कोशिश की !

या फिर उस पुरुष के विषय में सोचने लगी जिसके सपनों की उड़ान भरने वाले पंखों को ,समय के कुचक्र ने काट के रख दिया..उसकी जीवन प्रत्याशाओं की कली को मसल कर रख दिया ।

जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण उक्ति कि जो होता है अच्छे के लिए होता है की क्या प्रासंगिकता है?ईश्वर इस तरह क्यों लोगों की उम्मीदों को अधूरा छोड़ देता है? आखिर क्या मर्जी है ईश्वर की ?यदि जो होता है अच्छे के लिए होता है तो आखिर इस के पीछे क्या अच्छाई हो सकती है। दो ज़िंदगियाँ आजीवन खुशी से वंचित थी जिसमे अच्छा क्या था..!! 

काश ऐसी अधूरी जिंदगी को जीवन जीने का मौका मिल सकता किंतु संभवतः इसे ही नियति कहते हैं.. जहाँ बाबू जी अपने इस निर्णय को लेकर अटल है कि नहीं' उन्हें मां को शहर नहीं बुलाना ..! वही पत्नी आज भी तरस रही है पति के इस प्रकार के संकट भरे दिनों में की सेवा करने के लिए..वो अकेली अपने वैवाहिक जीवन के लिए प्रतिबद्ध है..! क्या कोई पुरुष इतना कठोर हो सकता है ?? 

जीवन में सिर्फ उतना ही मिलता है जितना हमारे भाग्य में हैं और जो ईश्वर द्वारा लिख दिया गया है! जीवन के इस पड़ाव पर जबकि वह स्वयं पक्षाघात झेल रहे हैं एवं इस अवस्था में जो आदमी और पैरों से लाचार है उसे एक झलक देखने को तरस रही है उसकी पत्नी..! इतने पर भी मां के हृदय में अपने पति को सकुशल देखने की इच्छा है किंतु क्या बाबूजी हर बार की तरह इस बार अपनी पत्नी के प्रेम की उपेक्षा कर पाएंगे ? ......अभी मैंने इन विचारों के साथ अपनी लेखनी में खोई हुई थी कि अचानक मेरे फोन की घंटी बजी ..

मैंने फोन उठाया.. उधर से गरिमा चहकती हुई सी बोल रही थी.. 'काव्या ..! बाबू जी ने मां को बुलाने के लिए हाँ कह दी ..! और विवेक ने विपुल से कहकर मां को यहां लाने का इंतजाम भी कर लिया है ..! पता है , माँ ने खुश होकर बाबूजी को बोला : हम आइत है कल..बिपुल के संगे..! आप के हाथन पैरण की मालिश करबे तो ,नीक हुई जइहौ..!! और बाबूजी कल रात फ़ोन पर माँ की आवाज़ सुनकर ..

फूट फूटकर रोये। ..अच्छी खबर है ना' मैने सोचा तुझे बता दूं..! "

निःसंदेह यह खबर बेहद अच्छी थी..! जिसे सुन कर मेरे मन में एक अजीब की प्रसन्नता भर गई ..आंखों में खुशी की नमी भी आई कि , चलो कम से कम जीवन के उत्तरार्ध में ही सही, खुशियों का सूरज..मां के जीवन मे रोशनी तो ले आएगा..वो जीवन भर से अपने परमेश्वर की सेवा करने का सपना तो सच हो सकेगा .. कम से कम जीवन के इस पड़ाव पर तो बाबूजी ने महसूस किया कि ,जाने अनजाने अपनी अर्धांगिनी संग अन्याय कर रहे है वो..! जो हुआ उसमे उस अभागी की क्या गलती..! नियति का लेख ,आजीवन सुहागन बन कर भी उसके रीतेपन को मिटा न सका..!

.. ' शायद सच ही कहा है किसी ने ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं और जल्दी से मैंने भी अपनी लेखनी को विराम दिया..यह लिख कर कि, ऊपरवाले की लेखनी के आगे हम सब नतमस्तक है, जिस निराशा को नियति मान बैठे थे, सच मे तो उसकी कलम ने कुछ और ही लिख रखा था...!! और प्रफुल्ल मन से मैं भी गरिमा के साथ मिलकर माँ जी के स्वागत की तैयारी करने चल पड़ी।

-कविता जयन्त श्रीवास्तव



Vote Add to library

COMMENT