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@dawriter

जूड़े का गुलाब

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" जूड़े का गुलाब"
 
"मयूरी सुनो आज शाम के लिए तुम वो रेशमी जरदोजी की गुलाबी सिल्क वाली साड़ी पहनना ..और हाँ! बालों में एक गुलाब भी लगा लेना ..जब तुम जूड़े पर गुलाब लगाती हो न ' बिल्कुल सोनाली बेंद्रे सी लगती हो..! " चहकते हुए अभिनव ने कहा 
 
"अच्छा ठीक है! पहन लूँगी ..और गुलाब भी लगा लूँगी! आंखों में सुरमा लगाती मयूरी बोली
 
अभिनव को मुस्कुराते हुए देख मयूरी ने आईने में ही देख  हाथ को प्रश्न मुद्रा में घुमा कर इशारों में पूछा..! उसकी सुरमे से सजी आंखों ने प्रश्नवाचक बन कर देखा ..और उसके अप्रतिम सौंदर्य से अभिभूत अभिनव ने मुस्कुरा कर "कुछ नही" के इशारे में सिर हिलाया..मयूरी ने हाथ को माथे से लगा कर हवा में फेंके जाने का इशारा किया..जैसे बोल रही हो .."तुम भी ना ...! " और अभिनव हंसते हुए से कमरे से निकल जाता है ...हॉल में सभी मेहमान आने ही वाले थे ...आज उनकी विवाह की पहली वर्षगांठ जो थी 
 
सुरमई आंखों से मुस्कुराती मयूरी आईने में खुद को देखती हुई अतीत में खो जाती है 
 
********
जब वो दूर के रिश्ते के बड़े ताऊ की बेटी सन्ध्या की शादी में शिरकत करने इंदौर गयी थी और इंदौर में उसकी मुलाकात अभिनव से हुई...! 
 
जब मयूरी पापा के साथ स्टेशन उतरी तो अभिनव ही उन्हें रिसीव करने पहुंचा था...पापा शायद जानते थे कि, अभिनव ताऊ जी के बड़े साले का बेटा था..पर मयूरी को अभिवन अजीब सा लगा ...बढ़ी हुई दाढ़ी और बेतरतीब बाल, काले फ्रेम का चश्मा और उस पर ब्लैक कुर्ता ...इन सबमे सबसे अजीब थी उसकी मूछें ....नत्थू लाल जैसी ..." उसकी तो हंसी ही छूट गयी थी,पर जैसे तैसे उसने खुद को रोक लिया ..!
 
घर पहुंच कर सन्ध्या और मयूरी यूँ मिली जैसे जन्मों के बाद मिली हों...! आते ही मयूरी ने सब सम्हाल लिया..
 
अब वो ही सन्ध्या दीदी की सारी तैयारियां कर रही थी और साज सज्जा से लेकर सामान की पैकिंग तक उसने सम्हाल रखी थी...! साड़ी पिन से लेकर गजरे के फूल तक की डिमांड सब मयूरी से ही करते ...!एक एक कर हल्दी और मेंहदी की रस्में पूरी हो चली... और मयूरी सब काम खुशी से बिना थके निपटाती..
 
अब दूसरे ही दिन शादी थी..रात को मयूरी और सन्ध्या खूब देर तक बतियाती रही ..सन्ध्या अपने होने वाले पति के संग हुई बातों का पूरा वृत्तांत उसे सुना रही थी और अलसायी आंखों में चमक लेकर मयूरी सुन रही थी..तभी किसी की तेज़ आवाज ने उनके कार्यक्रम में विघ्न डाला .." अरे सो जाओ मुर्गियों ...वरना कल आंखों में डार्क सर्कल जो जॉएँगे ..!' ये आवाज अभिनव की थी जो बेचारा उनकी खुसर पुसर में सोने का असफल प्रयास कर रहा था.. और झल्ला कर आखिरकार ढाई बजे रात उनके इस वार्तालाप को बंद करवा पाया था.! 
 
दूसरे दिन सुबह शादी का दिन था, फूलों की सजावट से लेकर, बारातियों के सत्कार तक सब कुछ अभिनव ने सम्हाल रखा था... सन्ध्या के भाई न होने के कारण सब कुछ अभिनव ही कर रहा था.. इधर मयूरी भी सन्ध्या के व्यक्तिगत कार्य कर रही थी ..कुल मिला कर वो सन्ध्या के लिए इस समय एकमात्र अवलम्ब थी..
 
धीरे धीरे पूरा दिन बीत रहा था,और बीतते दिन के साथ साथ मयूरी और अभिनव का वक़्त भी....कभी कुछ लेने के लिए अभिनव से मयूरी की झड़प होती तो कभी किसी चीज़ की व्यवस्था को लेकर,मयूरी अभिनव की बात काट देती..मयूरी तो अनभिज्ञ थी किन्तु अभिनव मयूरी की ओर खिंचता जा रहा था, शाम होते होते जैसे अभिनव बदहवास होने लगा.. उसका मन किसी चीज़ में नही लग रहा था ..बारात आने में कुछ ही समय शेष था मयूरी ..सन्ध्या की साज सज्जा में लगी थी ...कमरे का दरवाजा ठीक वहीं खुलता था जहां आंगन में मंडप सजाया था, घर के भीतर ही विवाह होना था ..सन्ध्या के घर की बनावट यूँ थी जैसे, फिल्मों में हवेली होती है, बड़ा सा आंगन उसके बगल खम्भों वाले बरामदे और उससे लगे कमरे ...मुख्य द्वार के ठीक बगल से सीढियां और फिर ऊपर वही बरामदे और उनसे लगे कमरे....! और घर के बाहरी गेट के अंदर बड़ा सा दालान... जहां पर जयमाला की रस्म व खाने पीने का प्रबंध था..! 
 
मयूरी ने बेतरतीब जूड़े को लपेट कर अपने ब्लैक सूट पर गोल्डन दुपट्टा ले रखा था... कई बार वह बीच बीच मे कमरे से निकल कर,बाहर आती और कुछ जरूरी सामान ले कर पुनः कमरे में जाती... मंडप के एक एक खम्भे से लगा हुआ अभिनव वहीं बैठा उसको आता जाता देख रहा था और मन ही मन उधेड़बुन में खोया हुआ था.. कि कैसे मयूरी से अपने दिल का हाल कहे...!" ....बारात की स्वागत की पूरी तैयारी कर और फूल मालाओं, इत्र के छोटे बक्सों,और लगभग हर प्रकार की तैयारी से वो निश्चिंत था....सो सुकून से अपने दिल की गहराई में उलझा हुआ था... इतने में मयूरी पुनः बाहर आई,ताजे फूलों के गजरे फ्रिज से निकालने, और सामने जमीन पर बैठे बदहवास से अभिनव को देखकर ठिठक गयी... उसे नजर भर देखा....और अजीब आंखें बना कर कमरे में चली गयी..! 
 
अभिनव को जैसे हिम्मत मिल गयी वह सहसा उठ खड़ा हुआ ....और सन्ध्या दीदी के कमरे के पास आया,धड़कते दिल से उसने दरवाजा खटखटाया.. उसे पता था कि द्वार तो मयूरी ही खोलेगी ...मयूरी ने खोला और झांक कर बोली .." क्या है ...? 
....क 'कुछ नही ....तुम लोग तैयार नही हुई अभी तक ? " वो गला खखारकर बोला
"कौन तैयार नही है..? दी' तैयार हो चुकी हैं ..और तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे बारात आ गयी हो ...! आंखें नचा कर मयूरी बोली 
"हां हां बस आने ही वाली है बारात..जल्दी करो तुम लोग " अभिनव ये बोलकर खुद भी तैयार होने चला गया
 
और सोचने लगा कि क्या पहनें, मयूरी तो बिल्कुल परी लग रही थी ब्लैक कलर में ... क्यों न वो मयूरी की मैचिंग कलर पहने,ब्लैक शर्ट.. कम से कम इसी बहाने वो नोटिस करेगी..! 
 
अब अभिनव ने एक पुरानी शर्ट निकाली उसे ही व्यवस्थित कर पहन लिया...! इतने में बारात आने का शोर उठा और उसके नाम की पुकार भी .. वो जल्दी से बाहर निकला और बारात के स्वागत में जुट गया ...
 
द्वारचार की रस्म होने लगी पंडित जी मंत्रोच्चारण कर रहे थे ऊपर की बालकनी से सन्ध्या दी को मुह में रखी सुपारी फेंकने की रस्म जो कि, दूल्हे को देखकर की जाती है उसके लिए ले जाने के उपक्रम में उसकी निगाह मयूरी पर पड़ी...और वो हतप्रभ रह गया उसने जरदोजी कढ़ाई की गुलाबी रंग की खिलती हुई सिल्क की साड़ी पहन रखी थी ...!  अभिनव की आंखें खुली की खुली रह गयी...! और अपनी ब्लैक शर्ट देखकर अब उसको रोना आने लगा कि, क्या करे वो अब? 
 
उसको लगा था कि वो एक रंग के कपड़े पहन के उसको इज़हारे मोहब्बत करेगा ..पर यहां तो मामला उल्टा हो गया ...! खैर वो मन मसोस कर रह गया..! और मयूरी मन ही मन उसकी इस दशा पर मुस्कुरा रही थी... फिर कुछ ही देर में पूजा सम्पन्न हुई एवम जयमाला की रस्म आरम्भ होने को थी .... सन्ध्या दी की सखियों का एक झुंड उन्हें घेर कर स्टेज के तरफ लाने लगा मयूरी जयमाला के ट्रे को थामे हुए थी ..किसी सखी ने आरती का थाल थाम रखा था तो किसी ने सन्ध्या दी के लहँगे को सम्हाल रखा था ताकि वे आराम से चल सकें..! अभिनव की आंखें मयूरी पर से हट ही नही रही थीं.... किन्तु इन सबमे उसे ये आभास ही नही हुआ कि, बगल खड़े मयूरी के पिता उस की आंखों में मयूरी के लिए आकर्षण देख रहे थे जयमाल सम्पन्न हुआ और पुष्पवर्षा व आशीर्वाद समारोह भी..
 
धीरे धीरे विवाह की रस्में आरम्भ होने लगी और अब मंडप में वर वधू बैठ गए थे, अभिनव की आंखें किसी को ढूंढ रही थीं पर वो तो उसे कहीं नही दिखाई दे रही थी... अभिनव व्यग्र हो उठा सारा घर छान मारा और अंत मे सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर की ओर चला...देखा तो मयूरी खुले आसमान के नीचे जुल्फें बिखेर कर बैठी हुई है... 
अभिनव ने आवाज दी..." मयूरी जी ..!"
"हां, आप यहाँ ..? 
" हां आप नीचे दिखाई नही पड़ी तो मैं यूँ ही ढूंढने आ गया ..!" 
"ओह्ह ...यूँ ही ...! मुझे लगा आप जानबूझ कर ऊपर आये हैं .." 
"जी ? अभिनव हैरान 
" जी हाँ ...सुबह से देख रही हूँ जनाब कुछ बदले बदले से हैं .. कल तक तो ऐसे नही थे आप... कोई बात है क्या ? 
 "न नही तो मैं कहाँ बदला हूं,आप गलत समझ रही हैं ..! अभिनव ने बात बदलनी चाही 
"पक्का ? कोई बात नही है ? मयूरी ने कहा 
" जी पक्का! कोई बात नही है ..' अब नीचे चलें ..सब ढूंढ रहे होंगे ..! 
"ठीक है चलिए ..वैसे मुझे कुछ और लगा था ..' मयूरी कुछ खोई हुई सी लगी
अभिनव ने माहौल को हल्का बनाते हुए कहा .." लगता है फिल्में बहुत देखती हैं आप...! 
 
सुनकर मयूरी हंस पड़ी और दोनों ही नीचे आ गए ...! 
इधर विवाह संपन्न हो चुका था विदाई भी होने वाली थी..आंखों ही आंखों में अभिनव ने मयूरी को मानो न कह कर भी सब कुछ कह दिया हो ..! और इधर मयूरी को अभिनव की ये अदा भा गयी कि, उसने मयूरी के अकेलेपन का नाज़ायज़ फायदा न उठाया ..वो चाहता तो रात को उसका हाथ थाम कर उससे प्यार का इज़हार कर सकता था..! सन्ध्या विदा हो गयी और अब अभिनव इतना थक चुका था कि वो सोने चला गया ...! और उठा लगभग 4 बजे शाम को ...जब उसकी माँ ने उसे उठाया ये कहकर कि, "बेटा जा मयूरी व उसके पिता को स्टेशन छोड़ने जाना है ...! "
 
अभिनव की तो जैसे नींद ही उड़ गयी ...वह झट से उठा और हुलिया ठीक कर नीचे पहुंचा ..! आंगन में उसके पिता व मयूरी के पिता गले मिल रहे व एक दूसरे से विदा ले रहे थे ...और आंगन में सारी पैकिंग किये मयूरी खड़ी थी ...और तभी उसने झुक कर उसकी माँ के पांव छुए ...अभिनव को पहले तो कुछ समझ न आया ..फिर  बाद में उसकी मां ने कहा "जा बेटी,आज ये तुझे भेजने जा रहा,पर जल्दी ही इस पागल को तुझे विदा कराने भेजूंगी ...! मयूरी शर्मा कर उनके सीने से लग गयी ...! 
अभिनव को अपनी किस्मत पर यकीन नही हो रहा था कि, ये कब और कैसे हो गया ..? वो समान उठा कर गाड़ी में रख रहा था सभी आपस मे बात कर रहे थे कि, मयूरी ने उसके पास आकर कहा ...
 
" हैरान हो ? कि ये कैसे हो गया ..कल से जो मुझे लग रहा था वो मेरे पिताजी को भी लग रहा था ...समझे आप! 
पर हां मिस्टर कल आपने छत पर जो भी कहा था सच था या ....? सचमुच ही कोई बात नही थी ..? 
 
अभिनव ने कुछ शरारत से कहा ...दरअसल बात तो थी ...आपको गुलाबी साड़ी के साथ अपने जूड़े में एक गुलाब भी लगाना था ..." 
"ओह्ह तो ये बात बोलनी थी आपको ..मयूरी ने तुनक कर कहा ...! 
"नही कल रात मैंने छत पर झूठ कहा था ...कि कोई बात नही है ...पर बात तो थी.. और वो जो बात थी .. वो ये थी कि,...कि बात सिर्फ एक दिन की नही है मैं तो आपके साथ, सात फेरों के बंधन में बंध कर सात जन्मों तक मैं आपके जूड़े में गुलाब लगाना चाहता था..बोलिये तैयार हैं आप ....!  कुछ शरारत से अभिनव ने कहा और मयूरी शर्मा कर गाड़ी में बैठ गयी ...! रास्ते भर दोनो आँखों ही आँखों मे बाते करते रहे.. और समय आने पर जन्म जन्मांतर के लिए एक दूसरे के हो गए
 
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सब कुछ सोचती मुस्कुराती मयूरी आईने में अपने बीते हुए एक वर्ष की यादें ताजा करती खोई हुई थी.....कि अभिनव की आवाज उसे अतीत से वर्तमान में ले आयी....! 
"मयूरी तैयार हो गयी तुम ? क्या कर रही हो सारे गेस्ट आ गए हैं ...अभिनव कमरे में आते हुए बोला 
 
" हां हो गयी हूं तैयार पर ...ये गुलाब बोल रहा था कि ये तो आपके हाथों ही जूड़े में सजेगा सात जन्मों का वादा जो है ..." मयूरी थोड़ी शोखी से बोली...
 
"अच्छा जी! तो पहले क्यों नही कहा " ...कहकर अभिनव ने मयूरी की जुल्फों में गुलाब को सजाते हुए आईने में एक दूसरे की छवि को निहारा और मानो उनकी इस प्रेमपूर्ण परछाई को देख आईना स्वयं ही धुंधला हो उठा ..!
           
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