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@dawriter

चौराहे के दाढ़ी वाले बाबा....( एक प्रेम कहानी काल्पनिक)

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कुछ सालों बाद गली के आखरी कोने वाले घर मे एक परिवार रहने आया था। कहने को तो वो परिवार है लेकिन सिर्फ मां और बेटी ही है।

अभी उनको यहां आये ज्यादा दिन नही हुये इसलिए उनके बारे ने कुछ कह पाना ठीक नही होगा।

उसी गली से निकलकर एक चौराहा लगता है और उस चौराहे पे हमेशा एक दाढ़ी वाले बाबा बैठे रहते थे, वो कौन है और यहां कैसे आये किसी को पता नही था, उम्र अधिक नहीं थी, बेतरतीब बढ़ी डाढ़ी उसे बुजुर्गियत तक ले आई थी, लोग उसे पागल समझते थे।

वो पागल है (या पागल सा है) लेकिन सभी पागलों से अलग, शान्त गंभीर और उदार सा।

उसकी ये उदारता और शांति को देख, समय समय पे उसे लोग उसे खाना-पानी दे जाते थे, छोटे बच्चे भी उसके पास से गुजर जाते कभी प्रणाम करते तो कभी उसे चिढ़ाने की कोशिश, लेकिन वो बच्चों की इन बातों को मुस्करा के टाल देता, ऐसा लगता जैसे वो शान्त और गम्भीर होने के साथ-साथ सुलझा हुआ भी है। शान्त सा था।

शुरु में बच्चे डरते थे, लेकिन उनकी मुस्कान बच्चों को अपने पास खींच लाई। बच्चे भी तो प्यार के भूखें होते हैं, और शायद यही एक चीज बेशुमार थी डाढ़ी वाले बाबा के पास...!

ये बात बच्चों को उनके पास जाकर पता चली.!
और बच्चों के प्रिय होते गए
दाड़ी वाले बाबा...
बच्चों के लिये प्रिय होने का एक और कारण था, बस्ती मे बिजली की समस्या! अकसर वहां जब बिजली चली जाती तो सारे बच्चे चौराहे पे लगे सोलर से चलने वाले लाईट की रोशनी मे आ जाते थे जहाँ ठिकाना होता था, डाढ़ी वाले बाबा का।
वो बच्चों के साथ खेलते, उनकी छोटी छोटी लड़ाई झगड़ो को सुलझाते, उन्हें कहानियाँ सुनाते।
जहाँ बच्चों को एक नया दोस्त मिल गया था, वहीं नया संसार ही मिलने वाला था डाढ़ी वाले बाबा को...!!

अब हर शाम एक क्लास सी सज जाती थी चौराहे पर। जिसमें उन बच्चों के अध्यापक वो दाढ़ी वाले बाबा बन जाते थे, बच्चों के हर मुश्किल से सवाल को वो पल मे सुलझा देते थे। इस क्लास में शिक्षक हाथों में छड़ी के साथ नही, होठों पर मुस्कान लिए आता था।
यही वजह थी की अब बच्चों की क्लास उनके घर मे कम और चौराहे पे ज्यादा लगने लगी थी, अभी हाल मे ही आये परिवार से वो बच्ची भी सभी बच्चों के साथ धीरे धीरे घुलने मिलने लगी थी।
अब तो शाम होते ही चौराहे पे एक स्कूल जैसा मंजर खड़ा हो जाता था।

यहां का अध्यापक और जगह से बिल्‍कुल अलग हैे, उनके हांथ मे छड़ी नही होती थी उसके बदले एक मुस्कान की लकीर रहती थी, जो उनकी क्लास को अनुशासित कर के रखती थी। वेल ग्रुमींग मे न रहकर वो मैले कुचैले कपड़े मे और बड़ी-बड़ी दाढ़ी मे रहता था, लेकिन इस बढ़ी हुई दाढ़ी मे भी उसका चेहरा ऐसा दमकता था जैसे किसी बड़े काॅलेज का प्रोफेसर हो। समय बदलता गया और बच्चों की संख्या बढ़ती गयी। और क्लास अपने नियमित समय पे चलती रही।

आह..! आज इस क्लास मे एक नया मेहमान आयी है... अरे....! ये तो वही है जो अभी कुछ दिन पहले गली के आखरी कमरे मे रहने आयी है, अपनी मां के साथ। एकदम मासूम और शांत सी और जैसे कुछ बातों से छुब्ध हो या फिर ये उस अध्यापक से नाराज हो, या फिर वो अपने नये अध्यापक को देखकर कुछ असहज सी है। डरी हुई सी। उस अजीब से दिखने वाले अध्यापक से। लेकिन वो अध्यापक दिखने मे जितना अजीब था उससे ज्यादा शालीन भी।उसने बहुत जल्द ही उस बच्ची की असहजता दूर कर उसे सहज बना दिया।

अब वो बच्ची बाकी बच्चों की तरह ही नियमित समय से चौराहे के उस गोलाकार चबूतरे पे आ जाती थी और मन लगा के पढ़ाई करती थी। ये बच्ची सभी बच्चों से छोटी थी इसलिए वो सबको बहुत प्रिय थी और उस दाढ़ी वाले बाबा को भी।

समय बीतता गया वो क्लास अपने नियमित समय पे चारो तरफ दौड़ रही अशान्त गाड़ियों के बीच भी शान्त और सुचारु रूप से चलती रही।
आज कुछ स्पेशल था...!
बस्ती के सब बच्चे एक साथ आये और दाढ़ी वाले बाबा को खिंच के पास वाले नाई की दुकान पे ले गये और बड़ी मिन्नत के बाद बाबा अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी को निकलने के लिये राजी हो गये थे। वही दाढ़ी जो उनकी पहचान बन गयी थी उसे इतनी आसानी से कोई कैसे भेट चढ़ा देता, लेकिन बच्चों के सामने तो भगवान भी लाचार हो जाते है। फिर भी बाबा तो एक इन्सान थे। वैसे वो मना भी कैसे कर पाते आज उनके क्लास की सबसे प्यारी बच्ची का जन्मदिन जो था।

दाढ़ी बनती जा रही थी और उसके मन मे एक धुंधली सी परछाई मे उसकी यादें फिर उसके सामने उभर रही थी, कुछ बातें जो वो कब का भूल चुका था वो, धूप के आ जाने के बाद छंटते कोहरे के जैसा जा रहा था कुछ यादें.... बहुत दिन बाद जब उसकी बढ़ी हुई मैली, कुचैली और लम्बी दाढ़ी बनी तो उसमें से उभर कर आया एक चेहरा चांद सा चेहरा।
खुद का चेहरा देख वो कुछ पल मुस्कुराया, फिर पता नही क्या सोच उसके आंखों मे कुछ अश्क उतर आया।

शायद उसने अपने चेहरे मे किसी और का अक्श पाया। शायद वो कोहरा अब छटने पे आया था, उसका अतीत जैसे उसके सामने बाइस्कोप लगाये उसे ही उसकी पुरानी फिल्म दिखा रहा हो और वो उन्हीं यादों मे खोया जा रहा था तभी पीछे से आवाज आयी, बाबा चलो अभी आपको नहाना भी है।

आवाज सुनते ही उसके सामने चल रहे उसके अतीत का बाइस्कोप पल मे ही गायब हो गया और उसके अतीत की यादें दूर क्षितिज मे कहीं
गायब सी हो गयी। उसे सब याद था फिर भी भुलाये बैठा था। वहां से उठकर वो सीधा चौराहे के पास वाले नल पे गया और नहा धोकर बच्चों के द्वारा किये गये गिफ्ट के कपड़े पहने वो तैयार होकर एक गाड़ी के शीशे मे जब खुद को देखा तो उसके अतीत का एक पन्ना फिर से फड़फडाया और कुछ फिर से उसके सामने चलचित्र सा उभर आया।

शहर से पहली बार उसने संध्या को ये बताने के लिये फोन किया था कि उसका प्रमोशन हो गया है और वो कुछ दिनों की छुट्टी लेकर गांव आ रहा है, उसके बाद किसी भी तरीके से वो उसके पापा से संध्या का हाथ मांग लेगा। फोन किसी और ने उठाया था और बोला, सब संध्या की सगाई मे व्यस्त है आप बाद मे फोन कर लेना....... इतना कहके फोन कट गया और वो...... वो कुछ और सोच पाता की तभी पीछे से बच्चों की आवाज आयी, बाबा अब चलो केक काटने का समय हो गया है।

कुछ बच्चे बाबा का हाथ पकड़कर सीधा गली के आखरी मकान की तरफ निकल दिये, कुछ कदम चलने के बाद सब उस गली के आखरी दरवाजे पर थे। जिसमें वो मां-बेटी रहते है। नन्हीं परी माँ का हाथ पकड़ कर उसे बाहर लेकर आई मिलाने अपने बाबा से, दाढ़ी तो अब रही नही ना...!
माँ ये है हमारे बाबा...!
दाढ़ी वाले बाबा की नजर संध्या की तरफ उठी तो ठहर सी गई संध्या भी...!!

क्रमशः



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