243
Share




@dawriter

चेहरे पर चेहरा

0 1.59K       

अनीता तुरंत कार से उतरी और दौड़ कर घर के अंदर गई-बाबूजी कहाँ हैं? अरे ये क्या हो गया हाय हाय कहकर बिलखने लगी! तभी भाभी पानी का गिलास लेकर आई और कहा पानी पी लें दीदी बाबूजी अभी ठीक हैं।

मुझे पानी नहीं पीना आप लोग बाबूजी का ठीक से ध्यान नहीं रखते हैं, बताईये कैसे गिर गए बाबूजी? अनीता मैं दुकान से आकर राहुल के टीचर से मिलने चला गया था और राहुल भी मेरे साथ गया था। माया रात के खाने की तैयारी में लगी हुई थी, तभी बीच में अपने भाई की बात काटते हुए अनीता बोली - भाभी, बाबूजी को बाथरूम तक छोड़ आती तो क्या हो जाता, बाबूजी का पैर टूटने से बच तो जाता। तुम लोग से बाबूजी की देखभाल नहीं होती तो मुझे कह दो मैं अपने साथ ले जाऊंगी, आखिर मेरे भी पिता हैं-अनीता हर छोटी- मोटी बात पर ऐसे ही धमकी देती।

"पूरी बात तो सुन बाबूजी ने माया से कहा ही नहीं की उन्हें बाथरूम जाना हैं, नहीं तो माया ले ही जाती, हमारे अनुपस्थिति में माया ही तो सब करती हैं - विमल ने कहा।" 

'माया ने बात को संभालते हुए कहा-दीदी अभी नाराज हैं मुझसे, बेटी का दिल ऐसा ही होता हैं, माँ-बाप को थोड़ी भी चोट आए तो बेटी का दिल रो पड़ता हैं। माँ-बाप बेटी के लिए सबसे अनमोल होते हैं, धीरे-धीरे दीदी का गुस्सा शांत हो जाएगा'। कुछ देर बाद अनीता शांत हुई तो भाभी ने खाना लगाया सब खाना खाने के बाद आराम करने चले गये।

"माया मुझे तुमसे एक सलाह लेनी हैं, बाबूजी के श्वास संबंधी बीमारी के लिए डॉक्टर ने कहा हैं कि एक बार किसी बड़े डॉक्टर से बाबूजी को दिखा लो, यहां गाँव के हॉस्पिटल में उतनी सुविधा नहीं हैं तो मैं सोच रहा था कि क्यों न बाबूजी को अनीता के साथ उसके घर भेज दूँ, वो बाबूजी को अच्छे डॉक्टर से दिखा देगी। मेहमान( अगम जी, अनीता के पति) की तो बहुत लोगों से जान-पहचान भी हैं, क्या कहती हो माया-विमल ने कहा।" 

"आप सही कहते हैं, दीदी भी बाबूजी को कितना प्यार करती हैं ना, अपने साथ बाबूजी को ले जाने की बात सुनकर वो तो बहुत खुश होंगी - माया बोली। ठीक ही हैं बाबूजी एक जगह रहते रहते उब भी गये होंगे, नये शहर में, नाती के साथ उनका मन भी बदल जायेगा और उन्हें अच्छा लगेगा। फिर ठीक हैं मैं कल अनीता से बात करता हूँ।"

"सुबह चाय-नाश्ते के साथ विमल ने अनीता के सामने ये बात रखी, बात सुनते ही अनीता ने बहुत सारे बहाने दिए - देखो न भईया इस महीने तो तुम्हारे बहनोई को प्रोफेसरों की चार-पाँच दिनों के लिए होने वाले कॉनफ्रेन्स में जाना हैं, हाँ तो तुम बाबूजी को अगले महीने पहुंचा देना। हम दिखा देगें बाबूजी को अच्छे डॉक्टर से।

खैर, अगले महीने विमल ने बाबूजी को अनीता के घर पहुंचा दिया और रात की गाड़ी से वापस अपने गांव चला गया। बाबूजी का जितना ध्यान माया रखती, अनीता नहीं रख पा रही थी। दो -चार दिन तो पति-पत्नी ने बहुत ध्यान रखने का दिखावा किया, लेकिन धीरे-धीरे जोश ठंडा पड़ गया। अब अनीता को बाबूजी बोझ लगने लगे, उसे किट्टी पार्टी जाने में , घूमने-फिरने में, बाबूजी के कारण परेशानी होने लगी। बाबूजी को अकेले छोड़कर नहीं जा सकती थी। अगले दिन बाबूजी को डॉक्टर से दिखाने ले गए, डॉक्टर ने कुछ टेस्ट लिखा। वो सब कराने में अच्छे - पैसे खर्च हो गये, अब तो अनीता और उसका पति नाक सिकुड़ने लगे।

अनीता बात-बात पर हुए खर्चे को बाबूजी को सुनाने से पीछे नहीं हटती और कहती देखा बाबूजी आपके दामाद कितने अच्छे हैं, भईया - भाभी से नहीं हो पाता। जबकि कई बार कभी जमीन खरीदने के नाम पर, तो कभी कार खरीदने के नाम पर अनीता बाबूजी से काफी पैसे लूट चुकी थी। बाबूजी को आए पन्द्रह दिन से ऊपर हो गए थे, जो सुकून बाबूजी को वहां मिलता था, यहां नहीं मिल पा रहा था, घर वापस जाने की इच्छा उन्होंने विमल को जताई, लेकिन एक जाँच कराना अभी भी बाकी था। इसलिए विमल कहता, जो बाकी का जाँच बचा हैं उसे हो जाने दीजिए फिर मैं आपको लेने आ जाऊंगा। 

'देखो अनीता तुम्हारे बाबूजी के इलाज में जितना भी खर्चा हुआ हैं उसे वापस लेना तुम्हारी जिम्मेदारी हैं - अगम ने कहा'। तभी अनीता बोली तुम घबराओ मत मैं सूद समेत सब वापस ले लूंगी। अब जब भी अनीता अपनी भाभी से बात करती तो उन्हें किसी न किसी बहाने पैसों के बारे में एक बार तो जरुर सुना देती थी। खैर जो टेस्ट(जाँच) बाकी था वो हो गया।

आज अनीता और अगम बहुत खुश थे क्योंकि बाबूजी आज जा रहे थे। विमल भईया कल रात ही आ गए थे। दोनों जाने के लिए तैयार हो गये थे तभी बाबूजी ने नाती को शगुन के पैसे दिए और अनीता और अगम को अपने पास बुलाया और कहा- ये ले अनीता तेरे पैसे जो तुझे सूद समेत चाहिए थे, गिन ले। सूद मिलाकर पूरे दस हजार हैं और सुन तू जो हर बात पर माया को नीचा दिखाती है ना वो तुझसे लाख गुना अच्छी हैं तू पन्द्रह दिन में मेरी सेवा करके थक गई जबकि माया जबसे शादी करके आई हैं तब से उसने मेरी सेवा में कोई कमी नहीं की। काश माया मेरी अपनी बेटी होती!

इतना सुन अनीता और उसके पति की आँखें शर्म से झुक गई। आज उसका असली चेहरा जो सबके सामने आ गया था, आज उसकी सारी चालाकियाँ धरी की धरी रह गई थी। बाबूजी एक सुकून के साथ वापस जा रहे थे, क्योंकि उनकी बहू अनीता जैसी नहीं हैं|

दोस्तों आज की दुनिया दिखावे की दुनिया हैं, अपने भी अपने हैं की नहीं इसकी भी गारंटी नहीं हैं, नि:स्वार्थ प्यार को जताने की जरूरत नहीं होती। पसंद आए तो लाइक और शेयर करीये।

मेरे आगे की कहानियों को पढने के लिए मुझे फाँलो करना ना भूलें😊



Vote Add to library

COMMENT