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@dawriter

चिरैया” जो मर कर भी उड़ती रही

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

 

“चिरैया” जो मर कर भी उड़ती रही ( एक अलग सी प्रेम कहानी )

भगलू ताऊ ने हुक्के का दम मारते हुए अपना हुकुम बजाया “101 क्या, पूरे 251 मिलेंगे, बस चिरैया बाई को नचवा दो। वो नाचेगी तबै मिलेंगे पैसे। बिना उसके नाचे तो चवन्नी ना मिलेगी”


छन्नो घबराते हुए बोली “ऐसा गजब ना करो ताऊ। चिरैया का बदन बुखार से तप रहा है। चल ना पा रही सही से, ना यकीन हो तो देख लो, मुरझाई सी बैठी है। छोरा हुआ है घर में, बधाई दोगे तो दुआएं देंगे। और क्या फर्क पड़ता है हम में से कोई नाचे तो।”


“पड़ता है छन्नो बहुत फर्क पड़ता है। ऐसा फर्क पड़ता है जैसे पत्तल और सोने की थाली में खाने का पड़ता है। खाना दोनों में एक सा होता है मगर सोने की थाली में खाने के ठाठ अलग है। नाच तो तुम सब लोग लेते हो मगर जो बात चिरैया में है वो तुम सब में कहाँ।”


चिरैया भगवान द्वारा आज तक की गई सभी गलतियों में सबसे बड़ी गलती कही जा सकती है। वो तीखे नैन नक्श, वो सुराही दार गर्दन, वो पतली कमर और ऊपर से दूध में हल्का केसर मिले हुए रंग जैसा रूप किसी भी खूबसूरत लड़की को मात देने के लिए काफ़ी था। मगर भगवान ने उसे उस श्रेणी में डाल दिया था जो ना खुद को औरत कह सकती थी ना मर्द। सजी सजाई डोली में से किन्नर उसे उठा कर ले आए थे ये कह कर की ये उनकी बिरादरी की है उस पर सिर्फ हमारा हक़ है। बहुत रोई चिल्लाई मगर कोई कुछ ना कर पाया । धीरे धीरे वो इस सच को समझ गई की उसकी जगह आम लोगों के बीच नहीं है। और धीरे धीरे बबीता कब चिरैया बन गई उसे खुद पता ना चला। उसका नाच देख कर हल्की खिली हुई सुबह की सुनहरी धूप में फुदकने वाली चिरैया याद आ जाती इसी लिए सब उसे चिरैया बुलाते थे।


“छन्नो दिदिया तुम ना बोलो। इनको चिरैया का नाच देखना है तो चिरैया नाचेगी। अभी इन टांगों में इतना दम बचा हुआ है कि वो बुखार से लड़ कर थिरक सकें।” सब चिरैया की बात सुन कर शांत हो गए और चिरैया ने मंगलू ढोलकिए को ढोलक पर थाप देने का इशारा किया।


“मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियाँ हैं, ज़रा ठहरो सजन मजबूरियाँ हैं” की धुन निकलने लगी और फिर पीली साड़ी के पल्लू को कमर के खोंस कर चिरैया वो नाची की अगर श्रीदेवी जी उसके नाच को देख लेतीं तो शर्मा जातीं कि कोई उनसे भी अच्छा इस गाने की धुन पर कैसे नाच सकता है। ताऊ ने खुश हो कर पाँच सौ एक रूपए दिए चिरैया को।


चिरैया के बहुत से दीवाने थे मगर जो दिवानगी संजय में थी वैसी दिवानगी और किसी में नहीं दिखती थी। हवेली के छोरे को एक किन्नर ने अपने प्रेम जाल में ऐसा फंसाया था कि सतरह साल का संजय हर दम उसी का नाम जपता था। कितनी रातें उसने चिरैया की याद में जाग कर काटी थीं। या तो संजय का प्रेम नादान था या फिर उसे जिस्म की भूख थी जो दूसरी लड़कियों के मुकाबले चिरैया आसानी से मिटा सकती थी। जो भी हो पर ये बात पक्की थी संजय चिरैया के बारे में सोच सोच कर पागल हो गया था।


प्रेम का फल किसी भी वृक्ष की शाख पर फलने लगता है। भले ही प्रेम खुद में सबसे मीठा फल हो मगर उसे नीम की टहनी पर फलने से भी कोई गुरेज़ नहीं होता । फिर भले ही वो इंट पत्थर मार कर टहनी से अलग क्यों ना कर दिया जाए । मगर ये प्रेम तो एक ऐसी डाली पर जा फला था जो समाज की नज़र में घोर पाप था । मगर प्रेम पर ज़ोर किसका चला है जो संजय का चलता । संजय ने फैसला कर लिया कि वो ये बात चिरैया से जा कर कह देगा । यही सोच कर अगली सुबह किन्नरों की बस्ती में जा पहुंचा । चिरैया नाले पर बैठी खुद में ही गुम सी हो कर बेपरवाही से बीड़ी के दम खींच रही थी ।


“मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ ।” एक तो अंजानी सी आवाज़ ऊपर से ये नए किस्म का मज़ाक सुन कर चिरैया बिना पीछे मुड़े ही ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी और हंसती गई। जब उसकी हंसी रूकी तब उसने पीछे मुड़ कर देखा, सामने एक सोलह साल का गबरू जवान खड़ा था जिसी मूंछों के बाल भी रेशमी धागों से नर्म से थे। उसे देख कर चिरैया की हंसी और तेज हो गई।


“लौंडे घर जा, तेरी अम्मा ढूंढ रही होगी तुझे ।” चिरैया ने लापरवाही से कहा
“मेरी बात का जवाब दे।”


“पगला गया है क्या ? जानता है हम लोग किन्नर हैं। समाज के पास अपनी खुशी में हमें नचवाने के सिवा और कोई काम नहीं है। हम बस मनोरंजन करने और घृणा भरी नज़रों से देखे जाने के लिए बने हैं। तू नासमझ है इसीलिए ऐसी बात सोच बैठा। ” इतना कह कर चिरैया वहाँ से चली गई। इधर संजय वहीं डटा रहा। दोपहर से शाम और शाम से रात हो गई मगर वो वहाँ से हिला नहीं। उसके चाचा उसे ढूंढते हुए वहाँ आए और उसे ले गए। मगर ये सिलसिया बंद ना हुआ, संजय का रोज़ का यही काम था कि वो आता और चिरैया की झुग्गी के बाहर बैठ जाता और तब तक ना हिलता जब तक कोई घर से बुलाने ना आता। महीना बीता गया था इसी क्रम में। चिरैया ये सब देखती रहती मगर संजय से कुछ कह नहीं पाती। ना जाने क्यों पर सालों बाद उसने अपने मन में कहीं मर कर दफ़न हो चुकी खुशी में हल्की सी हलचल महसूस की थी। बहुत से उच्चकों ने उसके लिए छिछोरापन्न दिखाया था मगर अपने लिए इस तरह की दीवानगी उसने किसी में नहीं देखी थी। चिरैया अपनी खुशी को फिर से ज़िंदा करने के मोह में आकर अपना मन बदलने लगा और एक शाम उसने संजय से जाकर इशारों में कह दिया कि उसे उसका प्रेम मंज़ूर है। संजय की ज़िदगी में यह दिन अब तक का सबसे खुशी भरा दिन था। उस दिन के बाद दोनों रोज़ मिलते खूब सारी बातें करते। प्रेम का फल धीरे धीरे पक कर मीठा होने लगा था मगर इस बात से अंजान था की जिस वृक्ष पर वह फल रहा है उसकी कड़वाहट उसे सड़ा देगी । मगर था तो प्रेम ही जब तक नासमझी ना करता सच्चा कैसे कहलाता । दोनों के मिलने जुलने की भनक सबको धीरे धीरे लगने लगी, बस फिर क्या था संजय के घर वालों ने संजय को घर से दूर भेजने का मन बना लिया।


संजय बहुत रोया, बहुत गिड़गिड़ाया मगर किसी ने उसकी एक ना सुनी। शहर जाने से एक दिन पहले संजय अपना सामान बांध कर घर से भाग निकला और पहुंच गया चिरैया के यहाँ। चिरैया बेरंग सी हुई उसी नाले के पास बैठी थी। संजय ने जाते ही कहा “चिरैया चलो हम यहाँ से दूर चले चलते हैं, जहाँ हमें कोई ना जानता हो।”


“संजय बाबू सबसे भाग लेंगे मगर खुद से और इस सच से कैसे भागेंगे की मैं वो हूँ जिससे प्रेम और फिर घर बसाने की इजाज़त समाज कभी नहीं देता। मैं उस बंजर धरती के समान हूँ जहाँ बस कंकड़ पत्थर होते हैं, सरसों के पीले फूल नहीं खिला करते। दूसरी बात नाचना गाना मेरा धर्म है मैं अपने धर्म को नही छोड़ सकती। अच्छा होगा आप चले जाओ और ज़िंदगी में आगे बढ़ो। आज के बाद आप मुझसे मिलने की कोशिश मत करना। ” संजय में बचपना था, ज़िद्दी था।


बहुत रोया ऐसे रोया जैसे बच्चा अपना कोई सबसे प्यारा खिलौना टूटने पर रोता है। मगर चिरैया ने अपना मन पत्थर कर लिया था। संजय को वापिस घर लौटना पड़ा और फिर अगले दिन वो पढ़ने घर से दूर भेज दिया गया।


साल, दो साल, दस साल बीत गए थे इतने सालों में संजय वापस गांव नहीं आया था। अब शायद ना उसमें वो बचपना बचा था और ना ही वो प्रेम। संजय एम बी ए कर चुका था और अब अपने ही पास के गांव वाली पेपर मिल में मैनेजर बन कर लौटा था। घर के लोग भी पिछली बातों को भुला चुके थे । संजय भी अपनी ज़िंदगी और नौकरी में व्यस्त हो चुका था।


एक दिन संजय फैक्ट्री में था तब चपरासी ने आकर बताया की आपसे चिरैया नाम से कोई मिलने आया है जिसका कहना है कि आप उसे अच्छे से जानते हैं । चिरैया का नाम सुनते संजय दस साल पीछे चला गया था मगर अब उस प्रेम की जगह एक अलग सी घबराहट ने ले ली थी। घबराहट होती भी कैसे ना, संजय अब फैक्ट्री का मैनेजर था, गाँव में उसकी इज्ज़त थी, कुछ दिनों में उसका ब्याह होने वाला था, भला कोई क्या सोचेगा जब सबको पता चलेगा कि वो एक किन्नर से प्यार करता था। मर अब तो चिरैया सामने आ खड़ी हो गई थी, संजय भला कब तक पीछा छुड़ाता वो अपने अतीत से। उसने सोचा कि जाएगा और चिरैया को कुछ पैसे दे कर समझा बुझा देगा कि वो फिर से ना आया करे उस से मिलने। यही सोच कर संजय ने अपना मन पक्का किया और चिरैया से मिलने चला गया। चिरैया सामने थी मुरझाई सी, जिसके परों ने अब उड़ने की क्षमता खो दी थी, भरी पूरी चिरैया अब बस हड्डियों की मुट्ठी भर रह गयी थी।


इन्सान अपने किसी भी रिश्ते को ले कर भले ही कितना भी निष्ठुर क्यों ना हो जाए मगर उसके अन्दर से वो प्रेम का अंश कभी नहीं मरता, उस सूखे हुए बीज को बस स्नेह के एक बूंद की तलाश होती है और यह बूंद मिलते ही प्रेम फिर से अंकुरित हो जाता है फिर निष्ठुरता भले ही कितनी भी कठोर हो प्रेम के फल को दोबारा फलने से नहीं रोक सकती। संजय के सूखे प्रेम के बीज पर भी वो प्रेम की बूंद पड़ गई थी जब उसने चिरैया के मुरझाए चेहरे को देखा। उसे देखते ही संजय को लगा कि शायद उसकी यह हालत मेरी वजह से ही है। उधर चिरैया संजय को जैसे देख रही थी उसे देख कर कोई भी कह सकता था कि सुदामा जी ने भगवन कृष्ण को वर्षो बाद अपने सामने देख कर ऐसे ही निहारा होगा।


आंसुओं को सम्भालते हुए चिरैया बोली “अब आप जाइये संजय, बस आपको देखने की लालसा थी वो मैंने देख लिया उसके सिवा आपसे मिलने का कोई और मकसद नहीं था मेरा। आप अपनी ज़िन्दगी में खूब कामयाब हों हमेशा खुश रहें यही कामना है मेरी। संजय बाबु, कहते हैं एक किन्नर की दिल से निकली दुआ और बदुआ दोनों बहुत जल्दी असर करती हैं। जब आप मुझसे दूर हुए थे ना तब मैं खुद के लिए चिंतित नहीं थी क्योंकि मुझे तो आदत है सहने की, मुझे तो चिंता थी आपकी क्योंकि आप अबोध थे, डर लगता था खुद को कोई नुकसान ना पहुंचा लें, इसीलिए आपको खुद से दूर किया था और दूर करते हुए ये मन से दुआ मांगी थी की भगवन मेरे हिस्से की ज़िन्दगी और खुशियाँ सब आपको दे दे और आपको हमेशा खुश रखे । ” संजय कुछ बोलता इस से पहले चिरैया वहां से रोते हुए भाग गई। संजय समझ ही नहीं पाया कि इस वक़्त वो क्या करे। बस मौन सा हो गया और ये सोचने लगा कि यहाँ गलती किसकी थी।


खैर समय पहले किसके लिए रुका है जो इन दोनों के लिए रुकता, समय अपनी गति से बढ़ता रहा। कुछ ही दिनों में संजय की शादी तय हो गई। संजय को लगा कि उसे चिरैया से मिल कर चिरैया को शादी में आने का न्यौता देना चाहिए और वो ये न्यौता उसे एक किन्नर के रूप में आकर गाने बजने के लिए नहीं बल्कि एक दोस्त के नाते उसकी ख़ुशी में सम्मिलित होने के लिए होगा। हाँ लोग हसेंगे मजाक करेंगे मगर उसे फ़र्क नहीं पड़ता। यह सोच कर संजय अपनी शादी का कार्ड और मिठाई ले कर चिरैया के यहाँ पहुंचा। मगर वहाँ का माजरा ही अलग था। बहुत बड़ी भीड़ ने चिरैया की झोंपड़ी को घेर रखा था। संजय बाबू भीड़ को चीरते आगे बढ़े तो देखा कि चिरैया निष्प्राण पड़ी हुई थी। संजय बाबू कुछ वक़्त के लिए अपने होश ही खो बैठे। संजय बाबू वहीं एक कोने में बैठ गए और एक टक चिरैया के मृत शारीर को देखते रहे। उनके सामने पुरानी सब बातें एक एक कर के घुमने लगीं।


अब चिरैया को जलने ले जा रहे थे। चिरैया जो कभी उड़ा करती थी आज वह चार कन्धों पर थी। जिसको नाचता देखने के लिए लोग मुंहमांगी रकम देते थे वो चिरैया आज शांत थी। इधर संजय बाबू हाँथ में अपनी शादी का कार्ड और मिठाई का डिब्बा लिए उसके जलते शरीर को देख रहे थे। धीरे धीरे लोग चिरैया को जलता छोड़ वहां से जाने लगे। तब संजय बाबू उसकी चिता के पास गए और कार्ड और मिठाई चिता को अर्पित करते हुए हाथ जोड़ कर बोले “चिरैया मैं भले ही नादान था तब, मगर मेरा प्रेम हमेशा समझदार ही रहा और शायद इसी समझदार प्रेम ने तुम्हे मुझमे हमेशा जिंदा रखा। अफ़सोस बस इतना ये है कि मेरे इसी प्रेम ने तुम्हारी जान ले ली। ” इतना कह कर संजय बाबु भीगी आँखों और प्रयाश्चित से भरे मन के साथ वापिस लौट आये।


कुछ दिनों बाद संजय बाबू की शादी हो गई। लाख कोशिशों के बाद भी वो चिरैया को भुला नहीं पा रहे थे और ना ही खुद को माफ़ कर पा रहे थे। जब भी उदास होते छत पर चले आते और घंटों तक असमान की तरफ़ देखते रहते। जब जब वो छत पर आते एक छोटी सी चिड़िया ठीक उनके सामने वाले पेड़ पर आकर बैठ जाती, यह चिड़िया बाकि चिड़ियों से बहुत अलग सी लगती थी संजय बाबू को जैसे कुछ कहना चाहती हो। वो जब जब उदास हो कर छत पर आते वो चिड़िया अपने करतब दिखा कर उनको मुस्कुराने पर मजबूर कर देती। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। अब तो ऐसा लगने लगा था कि जैसे वो चिड़िया खुद चिरैया ही है, जिसने कहा भी था कि वो कभी संजय बाबू को उदास नहीं देख सकती। देह छोड़ने के बाद भी वो बहाने से संजय बाबू को मुस्कराहट दे ही जाती थी।


शायद यही प्रेम होता है जो सीमाओं से बंधनों से रीती रिवाजों और नियमों से बेपरवाह हो कर बस अपनी मौज में बहना जानता है। यही वो प्रेम था जिसने चिरैया को मरणोपरांत भी नए पंख दे दिए ऊँचा असमान दे दिया और दे दी इजाज़त अपने महबूब को मुस्कराहट बाँटने की।

धीरज झा



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