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@dawriter

गुलामी नही सम्मान है ये प्यार

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मेरा बेटा अब मेरा नही रहा,अपनी बीवी का गुलाम बन गया है। हर समय अपनी बीवी की सुनना,उसका ध्यान रखना जैसे वो कोई पहली ऒरत हो जिसने बच्चा पैदा किया हो...पता नही क्या जादू कर रखा है।

सीढ़ियों से नीचे उतरते समय जैसे ही प्रिया के कानों में सास द्वारा कामवाली‌ के साथ की जाने वाली उसके प्रति अपशब्द पड़े वह दंग सी रह गयी थी। सोचती‌‌ थी कि शादी को‌ दस साल बीत चुके है इन दस सालों में खुद को सम्पूर्ण रूप से इस घर के प्रति समर्पित कर दिया केवल यह सोचकर कि अब यही उसका अपना घर है। बातें तो हर घर में होती रहती है‌ हर बात को नजरअंदाज करके हमेशा ससुराल में अपने हर रिश्ते को खुशी व निस्वार्थ भाव से निभाने की माता पिता द्वारा दी गयी अच्छी सीख लेकर आयी थी प्रिया ।।।। अच्छी बुरी यादों के साथ समय कब बीत गया पता ही नही चला,अभी कुछ ही दिन पहले सी- सेक्शन से प्रिया ने अपनी दूसरी बेटी को जन्म दिया। शरीर कमजोर होने की वजह से गर्भावस्था में पहले दिन से ही तबीयत काफी खराब रहने लग गयी थी। आखिरकार दोनों बच्चों में उम्र का गैप भी थोड़ा ज्यादा जो था जिसके रहते कुछ समस्याएं तो उत्पन होनी ही थी। बस सही डाक्टरी सलाह से मानो समय निकल पाया था।

डाक्टर की सलाह के साथ साथ उसका हौसला बढ़ाने में व इस समय होने वाले मूड स्विंगस में उसको समझने में सबसे बड़ा सपोर्ट दे रहे थे उसके पति विकास...डाक्टर की हर विजीट पर विकास का ऑफिस से घर आकर प्रिया को लेकर जाना फिर वापिस ऑफिस जाना मुश्किल तो जरूर होता लेकिन अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए वो इस मुश्किल से भी लड़ जाते,क्योकि वह जानते थे कि उनके अलावा कोई नही जो यह सब काम करे, सासू माँ पिछले पाँच सालों से बीमारी से जो जूझ रही थी,ना ही कोई नन्द जो घर संभाल पाए। जैसे तैसे करके प्रिया की सिजेरियन डिलिवरी हो गयी व फूल सी बच्ची को लेकर घर आ गयी ,विकास पूरी तरह प्रिया की देखरेख में लग गया कयोंकि वह जानता था कि अगर प्रिया की रिकवरी ठीक होगी तभी बच्ची का ध्यान सही प्रकार से रखा जाएगा। लेकिन अफसोस की बात है कि जब पति अपनी पत्नी के लिए कुछ करता है तो उसे जिम्मेदारी नही गुलामी का नाम दे दिया जाता है। आज चाहे हम‌ जितनी मरजी अपनी सोच को ऊँचा व प्रभावशाली बना ले सच तो यह है कि आज भी हमारे घरों में जब एक पति अपनी पत्नी के लिए जरा सा कुछ अच्छा करना चाहे या फिर उसकी घर के कामों के प्रति मदद करना चाहे तो सबसे ज्यादा दिक्कत उसी घर में रहने वाले सदस्य यानि कि सासू माँ को होती है। वो भूल जाती है कि वो खुद भी एक ऒरत है कयोंकि वह इस रिश्ते को केवल एक ही नजर से देखती है जोकि है सास बहु का रिश्ता ।।। उन्हे जरा गवारा नही होता कि उनका बेटा अपनी पत्नी के लिए कोई मदद का कदम उठाए व इस उठाए हुए कदम को वह गुलामी नाम से पुकारने में जरा संकोच नही करती।। 

प्रिय सासू माँ, क्यों आपके मन में हमारे यही विचार उथल पुथल करते रहते है कि बीवी के आते ही उनके बेटे की लगाम बीवी कस लेती है… क्यों आप हमेशा यह ताना रूपी तीर चलाते हो कि बेटा अपनी बीवी से डरता है तभी उसके सारे काम‌ करता है।। इन सब बातॊं का क्या मतलब रहता है खासकर तब जब पति पत्नी की आपसी समझौता सही हो, हर बार हर चीज गुलामी नही होती इससे बढकर और भी बहुत सुन्दर शब्द है जोकि इस रिश्ते की खूबसूरती बयान करते है वह प्यार व सम्मान । जब एक दूसरे से प्यार होता है तभी एक दूसरे की दॆखभाल,जरूरतों व इस रिश्ते के बीच के सम्मान का ध्यान रखा जाता है।।। ऎसॆ समय में अगर पति ही अपनी पत्नी का साथ न दे तो किसी और से अपेक्षा रखना बेकार है क्योकि ससुराल वालों के लिए तो बहु एक बाहर से आयी हुई कामवाली बाई होती है लेकिन एक पति के लिए उसकी जीवन संगिनी होने के साथ साथ उसके बच्चों की माँ होती हैं,अगर वही सही नही रहेगी तो घर के साथ साथ बच्चों को कौन संभालेगा??

एक बात जोकि हमेशा मन में खटकती रहती है कि खुद पिछले पाँच सालों से बीमारी के कारण आप कोई भी काम‌ करने में असमर्थ है जिसके रहते ससुर जी को आपकी सम्पूर्ण देखभाल करनी पड़ती है‌ तो इस देखभाल को उनकी जिम्मेदारी का नाम दिया गया ,लेकिन वही जिम्मेदारियां जब बेटा बहु के प्रति निभाये तो उसे गुलामी या फिर बीवी की चमचागिरी का नाम क्यों दिया जाता‌ है?? सामने से कुछ दिखाना व पीठ पीछे मन में अपनी ही बहु के प्रति ईर्ष्या रखने से रिश्ते कभी मजबूत नही बनते,, वो भी उस बहु के प्रति जिसने सदैव ससुराल को अपना घर समझ कर व ससुराल ‌के हर सदस्य को अपने बाकी रिश्तों से जयादा प्राथमिकता दी फिर भी जब उसी बहु को जरूरत पड़ी तब केवल उसके पति के साथ देने के अलावा कोई और कदम आगे नही बढे क्योकि वो केवल अपने पति की जिम्मेदारी है वो अलग बात है कि वो अपने शरीर को ससुराल के सभी सदस्यों के हर काम को पूरा करने के लिए निचोडती ही क्यों न रहे आखिरकार बहु जो‌ है काम तो करना ही पडेगा।।।  

खैर शायद कुछ शिकायतें कभी खत्म नही होती,लेकिन एक बात जरूर कहना चाहूँगी कि दर्द सभी को होता है,व किसी भी रिश्ते के प्रति किसी भी प्रकार की टिप्पणी करना उचित नही होता,खासकर इस खुबसूरत रिश्ते को गुलामी का नाम मत दीजिये क्योकि यह प्यार व सम्मान की नींव पर टिकता है। 

धन्यवाद 



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