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@dawriter

कैसे मुझे तुम मिल गए

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पहला प्यार मौसम की पहली बारिश जैसा होता है, जिसका सुख ही अलौकिक होता है। इस प्यार के अहसास को शब्दों में बाँधना उतना ही मुश्किल है जितना पानी को चुल्लू में रखे रहना। जितना भी कोशिश करो कुछ न कुछ अहसास छूट ही जाते हैं।

उस दिन मौसम की पहली बारिश हो रही थी, मिट्टी की भीनी खुशबू आ रही थी, जैसे ही जलतरंगों ने स्वरलहरियां छेड़ी , मैं छत पर जाने लगी  उन बूंदों के साथ भीगने के लिए, सम्पूर्ण सृष्टि के संग झूमने के लिए। माँ ने रोका, "मेघा"मत जा बीमार पड़ जाएगी। पर उस उम्र में बीमारी से कौन डरता है। मैं भी भीग रही थी, झूम रही थी अचानक लगा मुझे  कोई देख रहा है, और वो तुम थे घर के पीछे वाले मकान की छत पर। एक पल में ही बारिश का आनंद, , शर्म और डर में परिवर्तित हो गया। मैं तुरन्त नीचे भाग आयी, डर के मारे माँ को कुछ नही बताया। मैं पंडित राम प्रकाश त्रिवेदी की बड़ी बेटी, मेघा....जिसके पिता इलाहाबाद के रसूखदार व्यक्तियों में से एक थे। पापा इतने कड़े स्वभाव के थे कि उनके आते ही हम सब यंत्रवत अपना-अपना कार्य करने लगते थे। हमारे घर किसी भी अनजान लड़के का प्रवेश वर्जित था। आज उस मेघा के हृदय पर एक अजनबी मुस्कान दस्तक दे रही थी।

अब तो आते जाते उस चेहरे का दिखना आदत बन गयी थी। कुछ था उस अनजान चेहरे में, लगता था जैसे बरसों पुरानी पहचान हो। मुझ जैसी लड़की जो हमेशा खुद में खोई रहती थी उस पर पता नहीं तुमने क्या जादू कर दिया था। एक सुहानी शाम , मैं अपने छोटे भाई को छत पर पढ़ा रही थी तभी पत्थर से लिपटा एक कागज का टुकड़ा  मेरी छत पर आया.. देखा तो वो एक पत्र था।

प्रिय मेघा,

हाँ मुझे आपका नाम पता है, बहुत कुछ जानता हूँ आपके बारे में। मैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने अपने मामा जी के घर आया हूँ। उस दिन जब आपको छत पर थिरकते देखा तो लगा, जैसे सृष्टि की सुंदरता और सहजता आपके रूप में झूम रही हो। आपकी निश्छल सुंदरता देख मैं ऐसे खोया जैसे मेरी सदियों की तलाश पूरी हो गयी हो। शुरू से ही पुस्तकें मेरी सबसे अच्छी मित्र रही हैं, लेकिन आपको देखने के बाद उनमे भी मन नहीं लगा पा रहा हूँ। बहुत कोशिश करता हूँ लेकिन आपकी सोच को खुद से विलग नहीं कर पाता। पता नहीं प्रेम का भाव हृदय से उत्पन्न होता है या मस्तिष्क से, इस समय तो मेरा मन और दिमाग सब आपके हो गए हैं। अगर आपको मेरा पत्र लिखना अच्छा न लगा हो तो आप ये पत्र फाड़ दीजियेगा, लेकिन  मैं बस एक बार आपसे मिलना चाहता हूँ। आज से अगले दस दिन तक मैं  कम्पनी बाग के गेट पर  हर शाम  चार बजे  आपकी प्रतीक्षा करूँगा।

....अम्बर...

आज दसवां दिन था, डरते घबराते मैं कम्पनी बाग के गेट पर पहुंची। तुम सामने खड़े थे उसी मनमोहक मुस्कान के साथ, कितना गरिमामयी व्यक्तित्व था तुम्हारा। सम्मोहित सी खड़ी थी मैं , तुम्हारे सामने। डर और घबराहट के चलते मैं काँप रही थी। तब तुमने कहा, बैठो मेघा... आज अपना नाम कुछ ज्यादा ही अच्छा लग रहा था मुझे। तुम कहने लगे, "मेघा मेरे और तुम्हारे परिवार के बीच आर्थिक और सामाजिक विभिन्नताएं हैं, लेकिन मैं तुम्हारे लायक बनने की पूरी कोशिश करूँगा। मैं पहली बार प्रतियोगी परीक्षाएं दे रहा हूँ हो सकता है इस बार सफल न हो पाऊँ लेकिन सफल जरूर होऊँगा। बस तुम मेरी प्रतीक्षा करना। कितनी सरलता से तुमने अपने मन की बातें कह दीं, ऐसा था तुम्हारा प्रेम प्रस्ताव और मैं बस"तुम्हारा तुम्हारा इन्तजार करूँगी"कह कर वापस आ गयी।

लेकिन नहीं कर पाई तुम्हारा इन्तेजार, पापा को तुम्हारा पत्र मिल गया था। वो हमारे प्यार की पवित्रता को नहीं समझ पाये न ये जान पाए कि तुम कौन हो। माँ के आंसुओं और छोटे भाई बहनों के उदास चेहरे को देख मैंने भी अपनी किस्मत का फैसला पापा के ऊपर छोड़ दिया। तुम्हारे प्यार के रंग को धुल कर मैंने सिंदूर का रंग लगा लिया। तुमसे जुड़े हर पन्ने फाड़ कर अपने जीवन को पुनः लिखना शुरू कर दिया।

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और आज सात सालों बाद तुम फिर मिल गए। मेरे शहर के पुलिस उपाधीक्षक के रूप में। वही मुस्कान, चेहरे पे वही गांभीर्य  और सरलता, पद की गरिमा ने तुम्हारा आत्मविश्वास और बढ़ा दिया था। पापा तुमसे कह रहे थे, जल्दी से जल्दी कुछ करिये सर, उस आदमी ने मेरी बेटी की जिंदगी बर्बाद कर दी।  

जिस आदमी के साथ को, जिस रिश्ते को मैं सालों से अपनी किस्मत समझ निभा रही थी, उस रिश्ते का अंत करने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। मैंने हर दर्द को हर जख्म को सहा लेकिन इस बार उसने मेरी दो साल की मासूम बच्ची को पीटा, उसको और मुझे अलग अलग कमरों में बंद कर दिया, वो रोती रही, मैं गिड़गिड़ाती रही लेकिन वो नहीं पसीजा।

"खत्म हो गया अब सब कुछ, मेरी जिंदगी की धुरी मेरी बेटी वृष्टि ही है, वही मेरा स्पंदन वही मेरी साँसें हैं। "अब मुझे किसी की जरूरत नहीं है।

कानूनी प्रक्रियाओं में तुम्हारा सहयोग देख कर पापा बहुत खुश हैं तुमसे, अक्सर तुम्हारी तारीफ करते हैं, मैं चाहती हूं कि मैं उन्हें बताऊँ पंडित जी ये वही अम्बर है जिसकी हैसियत के बारे जानते ही आपने मेरे प्रेम को पाप बना दिया था। पर नहीं कह पाती हूँ। तुम जब भी मिलते हो तुम्हारी आँखों में मेरा दर्द छलक जाता है, तुम्हें तो मुझसे नफरत करनी चाहिए अम्बर। मत आया करो, मत करो मेरी सहायता, तुम्हारा सामना करना बहुत मुश्किल है मेरे लिए।

एक दिन तुम अचानक अपने परिवार के साथ मेरे घर  आ गए और माँ पापा से मेरा हाथ मांग लिया। वो बहुत खुश थे लेकिन मैं इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थी।

"क्यों आये हो अम्बर फिर से मेरे जीवन में??मत आया करो मेरे सामने, मैं एक परित्यक्ता हूँ जिसके जीवन रूपी शब्दकोश में प्रेम नाम का कोई शब्द नहीं है। तुम बहुत अच्छे हो अम्बर, , तुम्हे दुनिया की सबसे प्यारी लड़की मिलनी चाहिए। मेरा जीवन बस वृष्टि है और किसी की कोई जगह नहीं है मेरी जिंदगी में। "

मेघा, वृष्टि को सिर्फ मेघा नहीं अम्बर की भी जरूरत है, मैं वृष्टि को पिता का प्यार देना चाहता हूँ। मैं तो हमेशा तुम्हारी खुशियों के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता था और तुम इतने साल इतना दर्द अकेले सहती रही, लेकिन अब नहीं मेघा। हम दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं। मुझे मेरी मेघा वापस चाहिए, बारिश में झूमती मेघा, खुशियों को चूमती मेघा। मेरे जीवन में तो तुम्हारी जगह कोई भर ही नहीं सकता मेघा, , , तुम न मिलती तो वो हमेशा ही रिक्त रहती। मुझे पूर्ण कर दो मेघा, मेरी बन जाओ।

आज फिर मौसम की पहली बरसात हो रही है, वृष्टि और अम्बर आँगन में खेल रहे हैं। कभी सोचा नहीं था अम्बर तुम मुझे इस तरह मिल जाओगे। तभी वृष्टि ने मुझे भी बारिश में खींच लिया और वर्षों बाद मैं गुनगुना रही हूँ..............

"कैसे मुझे तुम मिल गए, किस्मत पे आये न यकीं"

दोस्तों आपको मेरी कहानी कैसी लगी। अपने विचार मुझे जरूर लिखियेगा।



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