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@dawriter

किस्मत से मिले हो तुम

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निरुपमा जल्दी में थी। आज कालेज के फंक्शन में जल्दी पहुँचना था। मगर 8 तो यही बज गया कालेज का फंक्शन 10 बजे शुरू होने वाला था। 40 वर्षीय निरुपमा बहुत ही सादगी से जीने वाली महिला थी।

कभी भी किसी पर निर्भर नही रहना चाहती थी। अत्यंत पढ़ी लिखी थी। परिवार में था ही कौन!
सिर्फ एक बूढ़ी विधवा माँ। सिर्फ 10 साल की थी निरुपमा। जब उसके पिता का स्वर्गवास हुआ। माँ की हर तकलीफ समझती थी। और समझती क्यूँ नहीं। बचपन से लेकर आज 40 वर्ष की उम्र ने उसको हर तजुर्बा दे दिया था।

'अब स्टेज पर आ रहे हैं हमारे कालेज के ट्रस्टी मिस्टर प्रभाकर शर्मा जी' हमारे कालेज के लिये इनका योगदान बहुत सराहनीय है। सुमन की इस अनाउंसमेंट ने निरुपमा को कुछ अचंभित कर दिया।
' क्या फिर से किस्मत हमे आमने सामने ले आयी ' यही सोच रही थी निरुपमा।
'ओज तेज आज भी वही था प्रभाकर के चेहरे पर। बस नहीं बदला था तो वह उसका उसका अधूरा से सवाल जब उसने आज से 10 साल पहले पूछा था। कि क्या वो उसके साथ विदेश में रहेगी सब कुछ छोड़कर। मगर माँ को साथ नहीं ले जाना है। बस उस दिन के बाद से उसने प्रभाकर को पलट कर भी नही देखा। आंखों में कुछ पुरानी बातों की टीस दिखी उसको प्रभाकर की आंखों में।आज भी उसने किसी और से शादी नहीं की थी। दोनो की ये अनकही मोहब्बत ने आज भी बांध रखा था दोनो को।

मगर बस एक शर्त जिसने दोनो को कभी मिलने नहीं दिया। वो उसकी माँ को अपने साथ नहीं ले जायेगा विदेश। उस दिन के बाद निरुपमा ने अपनी मोहब्बत का बलिदान तो दे दिया।मगर उन 10 सालों में खुद भी आगे नहीं बढ़ सकी। किस्मत का खेल ही था।कि जिस कॉलेज में वो पढ़ा रही थी। उसका ट्रस्टी प्रभाकर ही था।
'सुनो !कुछ जानी पहचानी सी आवाज थी।
पलटकर देखा तो प्रभाकर सामने था।
'आज भी नाराज हो मुझसे'।
प्लीज़ माफ कर दो। उस दिन एक ज़िद ने मुझे मेरी नीरू से दूर कर दिया। मुझे ज़िन्दगी के बाकी पल तुम्हारे साथ गुजारने है।
क्या मिसेज प्रभाकर निरुपमा शर्मा बनोगी।
घुटनो के बल जमीन में बैठ कर निरुपमा को प्रपोज़ किया। जैसे आज से 15 साल पहले किया था।
खुशी के आंसुओं की बारिश हो रही थी।और दोनो गले लगकर रो रहे थे।

'उपासना पांडेय'(आकांक्षा)
हरदोई (उत्तर प्रदेश)



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