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@dawriter

कितना मुश्किल है मां बनना - I

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कृतिका और दीपक की अंरेज कम लव मैरिज ज्यादा थी, सरकारी ऑफिसर दीपक और साफ्टवेयर कंपनी में टीम लीड कृतिका की सगाई के पहले हुई। पहली मुलाकात ने ही दोनो के मन में प्रेम का बीज रोपित कर दिया था। सगाई में ऊंगली में मुंदरी पहनने के साथ ही कृतिका ने उस उँगली को पकड़ कर ही अब आगे का जीवन चलना है सोच लिया था।  सगाई से शादी के बीच दोनो प्रेम रंग में रंग गए थे, दीपक के सम्मान और समय देने का रंग कृतिका पे था  तो दीपक कृतिका के समझदारी के रंग में रंगा हुआ था और दोनो के परिवार दमाद की सरकारी नौकरी और बहू के साफ्टवेयर के रंग में।

हर नयी शादी में उम्मीदो की एक लंबी लिस्ट होती है,पति की उम्मीद, पत्नी सुंदर साड़ी पहन,पूरे मेकअप में, करिश्मा कपूर की तरह हम साथ साथ है फिल्म जैसे सुबह सुबह अपने पति को नीदं से जगाए, तो पत्नी की उम्मीद होती है कि दिया और बाती के सूरज की तरह हर पति अपनी पत्नी के लिए कुछ भी कर गुजरे,परिवार की अलग, भले सास खुद ललिता पवार जैसी छवि रखती  हो पर बहू तुलसी जैसी ही चाहिए और बेचारे लड़की वाले क्या चाहते है बस इतना कि खुशी खुशी कर दो विदा रानी बेटी राज करेगी. पर ऐसा होता है क्या?  

कृतिका भी हाथो में मेहंदी का रंग लिए,थोड़ा संकोच,थोडी़ खुशी,ढेर सारा बड़ों का आशीर्वाद और उम्मीदो की एक लंबी लिस्ट लिए ससुराल में आई । दीपक के रुप में कृतिका को ऐसा महसूस हो रहा था कि उसके जीवन को एक नया माँझी मिल गया है। एक नया जीवन नयी जिम्मेदारियों के साथ कृतिका का इंतजार कर रहा था। दीपक का लाईफ स्टाईल तो कुछ भी नही बदला पर कृतिका पर दोहरी जिम्मेदारी थी, कैरियर को बचाए रखने के लिए उसे बहुत जद्दोजहद करनी थी।

शादी की कुछ छुट्टियों के बाद ऑफिस और घर का मैराथन एक साथ शुरु हो गया। किचन के स्वाद से लेकर साफ्टवेयर के बडे़ से बडे़ पोजेक्ट को निपटाने तक के सभी कामो में कृतिका निपुण थी। और स्वाभिमान का गहना पहने हुए, वो नही चाहती थी कि कोई भी उस पर ऊँगली उठाये कि वो जॉब के कारण घर पे ध्यान नही देती। इसलिए सुबह पाँच बजे उठकर ,नहाकर चाय सभी को कमरे में दे कर आती, नाशता बना कर टेबल पर लगा देती और टिफिन पैक कर के 9 बजे ऑफिस के लिए निकल जाती। 

सास हमेशा कहती तू मत परेशान हो मैं कर लूँगी पर कृतिका कहती "आपने आज तक किया ही है अब और नही".  शाम को ऑफिस से आने के बाद, सास रात का खाना बनाने जाती, तो तुरंत किचन में पहुंच जाती, “आप आराम करें, मैं खाना बना लेती हूं.” खाना बना कर सबको परोसती। पर इस पूरी रूटिन में वो बहुत थक जाती। और एक नयी नवेली शादी की और भी बहुत सी इच्छायें होती है। दीपक का कहना था कि काम के लिए तो मेड है खाना बनाने के लिए भी अंरेज कर लो। पर कृतिका को लगता कि नयी नवेली किसी बाहर वाले से खाना बनाने की बात करेगी तो बुरा लगेगा ये सोचकर कह देती मैं कर लूँगी। 

दीपक "मन की ताकत से सब कुछ नही होता और इंसान कमाता क्यों है जीवन को सरल करने के लिए ऐसा रुटीन हमेशा के लिए सही नही है।" दिन,दो दिन...हफ्ते बीतते हुए एक महीना बीत गया। पास पड़ोस वाले सभी दीपक की माँ से कहते तुम तो भाग्यशाली हो कि तुम्हें कमाऊ बहू मिली उस पे वो इतना घर का काम भी करती है। बाई के साथ बैक बैलेंस फ्री. पर माँ जवाब देती मेरा बेटा सरकारी ऑफिसर है ,उसकी मर्जी है तो कर रही है नौकरी,हमे उसकी नौकरी से कोई लेना देना नही.रही बात काम की तो वो तो अपने घर है करना ही होगा.

लगभग एक महीने बाद कृतिका ऑफिस से घर आई और अपनी सास से बोली माँ एक गुड न्यूज है.

सास ने कहा सच में?

कितना मुश्किल है मां बनना - II



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