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@dawriter

कहानी-- नारी अधिकारों के शिकार

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sunilakash by  
sunilakash

कहानी--

"नारी अधिकारों के शिकार"

एक पुराने दोस्त उमेश चड्ढा जी आज सुबह मिल गए। घर में अंदर आने की उन्हें फुर्सत नहीं थी। द्वार के बाहर ही, फुटपाथ पर खड़े होकर हम बात करने लगे।

हालचाल पूछने के बाद, आज के राजनीतिक हालात पर बात चली और धीरे-धीरे वे अपना दुखड़ा सुनाने पर आ गए। कहने लगे, "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" की मुहिम रंग ला रही है, विकास जी।" मेरा नाम विकास है जो उन्हें बहुत पसंद है।

मैंने कहा, "क्यों, सब ठीक तो है ?"

चड्ढा जी बोले, "सत्तर साल के ऊपर की मेरी माँ और मेरी सास, दो वक्त की रोटी के लिए भी तरस रही हैं।"

"क्यों ?" मैने पूछा, "आप तो कई भाई हो, आप की पत्नी भी है। कितनी सज्जन और सुशील हैं। आपके दो भाई और हैं। उनकी बहुएं ?"

एक गहरी साँस लेकर वे बोले, "अजी क्या खाक। ये पढ़ी-लिखी हमारी बहुएं अपने पतियों को काम पर भेजने के बाद पता है, क्या करती हैं ?"

"क्या करती हैं ?"

"नहा-धो कर और सज-धज कर अपनी सेल्फी ले-लेकर अपने फोटो फेसबुक पर डालती हैं और अपने महिला व पुरुष मित्रों के साथ चेटिंग करती हैं दिन भर।"

"अच्छा ?" कई परिवारों में आजकल यही चल रहा है। मुझे उनकी भी समस्या समझ में आ रही थी।

"मां को पूछती भी नहीं। ऐसा ही मैं तब देखता हूँ जब अचानक बिना बताए ससुराल में पहुंच जाता हूँ। मेरी सास जी के भी ऐसे ही हाल चल रहे हैं।"

"ओह ! बात यहाँ तक पहुंच गई ? आपने कुछ किया क्यों नहीं ?"

"क्या कर सकता हूँ ? ये औरतें अब ऐसी हो गई हैं कि अपने पतियों को धमकाती हैं-- सुधर जाओ नहीं तो ठीक करवा दूंगी।"

"क्यों ? डांट-डपट कर रखा करो न। तुम्हारा क्या बिगाड़ लेंगी ?"

"अरे, मत पूछो, विकास जी," चड्ढा जी की सूरत देखने वाली हो गई, "धमकी देती हैं -- किसी न किसी आरोप में जेल करा दूंगी। अक्ल ठिकाने आ जाएगी।"

"ओह !" मेरे मुंह से अनायास निकल गया।

"नारी के लिए आज बड़े कड़े कानून हैं। पुरुषों की कोई नहीं सुनता।"

"क्यों, तुम्हारी माता जी और सास जी नारी नहीं हैं ? उनके कुछ अधिकार नहीं हैं ?"

मैंने मन में सोचा -- इस तरह की एक-दो बातें तो मेरे परिवार में मेरे भाइयों की बहुएं भी कर रही हैं। और भी कुछ घटनाएं शहर में सुनने को मिल जाती है। महिलाओं का स्वभाव बदल तो रहा है। मगर उनके सामने मैं यह बात कहकर क्यों अपनी हेठी कराऊँ। हँसकर मैं बोला, "चुप रहो यार, आजकल ऐसे ही नारी-जागरण हो रहा है।"

"मजाक समझ रहे हो न ?" वह खिसिया कर बोले।

मैने पूछा -- "क्या तुम्हारी माँ और सास किसी के सामने यह बात कह सकती हैं ?"

"ना...ना...।" कहते-कहते वे डर गए, बोले, "डरती हैं कि यदि उनकी बहुओं को पता लग गया, तो दूसरे कई तरीकों से उनका जीना और हराम कर देंगी।"

मैं बोला, "तो बस। नारी ही नारी पर अत्याचार कर रही है। तुम भी चड्ढा जी चुप रहो, तुम्हें क्या पड़ी है ?" मैं यह कह ही रहा था कि अंदर घर में से मेरी पत्नी मधु की आवाज आई, "जरा सुनो, कहाँ हो ?"

मेरे लिए आवाज आई है, यह अनुभव करते ही उमेश चड्ढा जी ने तुरत-फुरत विदा ली, "अच्छा विकास जी, नमस्कार। चलता हूँ।" वे चले गए। मैं भी घर में अंदर चला गया।

अंदर पहुँचा तो पत्नी गुस्से में थीं, "देखो, सड़क पर चलते हुए लोगों से बातचीत करना सही नहीं है। कुछ तो समझदारी की बातें सीख लो। इतनी उम्र हो गई है, कब तक तुम्हे समझाया करूंगी।"

"क्यों, इसमें क्या बुरा हो गया ? वे मेरे पुराने दोस्त हैं। तुम्हें उनका घर में आना पसन्द आएगा कि नहीं, इस उलझन में मैंने उन्हें अंदर नहीं बुलाया। सामने पड़ गए, तो बात हो गई। शिष्टाचार भी तो कोई चीज है।"

"अच्छा ठीक है। मुझे दस हज़ार रु. चाहिए। निकालो, मुझे अपने बेटे कुणाल से मिलने चेन्नई जाना है।"

"यह तुम्हें अचानक क्या सूझी ?" मैंने हैरानी से पत्नी का मुख देखा, "कल रात में मेरी बात हुई है ना। पन्द्रह-बीस दिन बाद वह खुद ही आ रहा है।"

"नहीं, वह नहीं आ रहा है। मैं जाऊँगी, उससे मिलने। मेरा बेटा है। तुम तो उससे मिलने न खुद जाओगे, न मुझे जाने दोगे। मैं तो मां हूँ न, मेरा तो अपने बेटे से मिलने का मन करता है।"

"हाँ-हाँ करता है। मन करता है। मेरा भी मन करता है। इसीलिए मैं उसकी खुशामद करता रहता हूँ कि वह आए। वह आएगा तो एक आदमी का खर्च होगा। हम जाएंगे तो दो जनों का प्लेन का खर्च होगा। वहाँ वह हमारे ऊपर अलग से खर्च करेगा। यह बात तुम्हें समझ में नहीं आती ?"

"तुम पैसे के लालची इंसान हो, तुम्हें बेटे से कुछ लगाव ही नहीं है न । पर मैं तो माँ हूँ न?"

"कह तो ऐसे रही हो, जैसे बेटे पर मैंने कुछ खर्च नहीं किया हो। पढ़ाया-लिखाया, तभी तो इंजीनियर बना है। पढ़ाने में कुछ खर्च नहीं होता।" मैं बोला।

"मैंने-मैंने उसे पढ़ाया। मेरा पैसा लगा है उसकी पढ़ाई में। मैं माँ हूँ उसकी।"

"अच्छा ? तुम तो उसका एडमिशन होते ही नौकरी छोड़कर घर बैठ गई थीं ? बस खाली यह माँ का साइनबोर्ड लगाकर घूमती हो। बस..."

"मैंने नौकरी छोड़ी थी, उससे फंड का पैसा मिला था, उससे मैंने उसे पढ़ाया।"

"अरे, छोटी सी पब्लिक स्कूल की नौकरी थी। दो-ढाई लाख रुपया फंड का मिला था। पांच साल वह पढ़ा, दसियों लाख रुपया खर्च हो गया है। दो-ढाई लाख रुपए में इंजीनियरिंग होती है आजकल ? कैसे-कैसे मैंने उसे पढ़ाया और घर का खर्च भी चलाया। फालतू बात करने बैठ गई हो सवेरे-सवेरे।"

"तुम्हारी अक्ल ठिकाने लगा दूँगी। तुम मेरे घर वालों को बुरा-भला कहते रहते हो, यह अपने भाइयों को बताऊंगी तो तुम्हें घर से भी चलता कर देंगे। घरेलू हिंसा करते हो, पुलिस में यह शिकायत करेगा मेरा भाई। अभी मेरी भाभी वकालत शुरू कर रही है। मैं भी मानवाधिकार का ऑनलाइन कोर्स कर रही हूं। सारे नियम-कायदे मुझे समझ में आने लगे हैं।"

कहकर वह मुझे छोड़कर दनदनाती हुई अंदर कमरे में चली गई।

मेरे शब्द मेरे मुंह में रह गए, "घरवालों का जिक्र उठा रही हो, अब मैंने कुछ कहा ? खुद ही मुझे धमका रही हो और रस्सी का सांप बना रही हो ?"

अंदर से कुछ चीज लेकर वह आई और बोलती हुई मेरे पास से निकल कर किचन में चली गई, "तुम्हारे जैसे पति लोग ऐसे कहाँ बाज़ आते हैं ? पता है, मेरी भाभी मुझे प्रधानमंत्री कार्यालय लेकर गई थी। अब मेरी पहुंच कुछ कम नहीं। तुम्हें तो यूं सबक सिखा दूँगी।"

"प्रधानमंत्री कार्यालय ?" मैं हक्का-बक्का रह गया।

"हाँ, स्कूल की नौकरी मैने छोड़ दी तो क्या, अब मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय में अर्जी लगाई है कि मुझे भी सरकारी नौकरी दिलाई जाए। वहाँ से भरोसा दिलाया गया है कि बहुत जल्द ही प्रधानमंत्री कार्यालय आपके (मेरे) लिए एक नौकरी ढूंढ कर देगा।"

"चलो बढ़िया है। हमारे नए प्रधानमंत्री के आने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की सक्रियता बढ़ी है।"

"तुम्हारे जैसे लोगों का तो अभी इलाज होगा जो औरतों को पैरों की जूती समझते हैं।"

"अरे, मैंने ऐसा क्या कहा ?" मैं हैरान था, "बेकार सुबह-सुबह बात का बतंगड़ बना रही हो। जल्दी टिफिन दो, मुझे ऑफिस को देर हो जाएगी। "

"टिफिन ? आज टिफिन नहीं मिलेगा। वहीं ऑफिस की कैंटीन से लेकर खा लेना।"

"मगर ऐसा क्यों ? ये तुम इतनी देर से किचन में हो। खाना बना तो रही हो।"

"ये तुम्हारे लिए नहीं हैं। मेरे एक रिश्ते के भाई की पत्नी अमेरिका से कुछ दिनों के लिए इंडिया आई हुई है। उसे मैंने अपने घर खाने पर बुलाया है। उसके लिए थोड़ा-बहुत अभी बना कर रख रही हूं, थोड़ा कुछ उसके आने पर बना लूंगी।"

मैं समझ गया, अब आगे कुछ बोला तो खैर नहीं थी। मैं अब चुपचाप ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा।

* * *

आज यह नौबत आ गई है कि बात-बेबात झगड़ा करने लगती है मधु। कैसी होती जा रही है ? ऑफिस जाते हुए मैं सोचता जा रहा था। कितनी खूबसूरत जिंदगी थी हमारी ! और अब कैसी हो गई है। प्यार के रंगों में रंगा एक आदर्श जोड़ा थे कभी हम। और आज...? ओफ...।

एक पुरानी याद सहसा मेरी आंखों में उतर आई।

शाम को बाहर घूमने निकले थे। छोटा बेटा विपुल नहीं था, तब केवल यह बड़ा लड़का गोद में था, कुणाल। इसी को पीठ पर लटकाए मैं पलौथी मारे बैठा था। मेरे घुटने से लगकर अधलेटी सी पत्नी बैठी थी। उसका एक गाल मेरे घुटनों को छू रहा था। नन्हे कुणाल के नरमो-नाजुक हाथ मेरे गले को छूते हुए मेरे सीने तक जा रहे थे। दोनों तरफ से प्यार और स्नेह की गर्मी से मैं पिघल रहा था और स्वयं को दुनिया का सौभाग्यशाली इंसान समझ रहा था।

सुधा बोली, "हम सदा ऐसे ही प्यार से रहेंगे न विकास? ये हमारा बेटा, ये हमारा घर संसार..."

"हाँ सुधी...भगवान करे, हमारे परिवार की इन खुशियों को किसी की नजर न लगे।"

तभी किसी चीज से ठोकर लगी और मैं अतीत की यादों से एक झटके से बाहर निकल आया। देखा, तो सामने सड़क पर एक ईंट का टुकड़ा पड़ा था।

मैं उससे बचकर आगे बढ़ गया। मन फिर सोचने लगा -- वह भी क्या दिन थे ? कभी पत्नी को स्कूल छोड़ने जाते वक्त की याद...कभी दोनों बच्चों और पत्नी के साथ पिक्चर जाने की याद...स्कूटर पर सवार दोनों बच्चे, मीठी और तुतलाती जबान में बात करते कभी कुणाल की यादें, कभी विपुल की यादें। यादों का एक पूरा संसार था और आज मैं तन्हा था। मधु की अलग दुनिया है, कुणाल की एक अलग दुनिया है, और छोटे विपुल का क्या ? वह तो अभी पढ़ ही रहा है। कौन जानता है वह क्या सपने देख रहा है ?

अब मगर किसी की नजर तो लग गई थी हमारे परिवार को। मन पूछता है मुझसे ये सवाल कि अब साथ-साथ रहते हुए भी, क्या उनके बिना जीने की आदत डाल पाओगे ? मधु की बेतुकी आदतों की वजह से मेरी माता जी साथ नहीं रहीं कभी। कभी-कभार आती भी हैं तो एक-दो दिन डरते-डरते रहती हैंं और चली जाई हैं। जबकि मधु की मम्मी हर 3-4 महीने में आ जाती हैं, और 15-20 दिन रहकर जाती हैं। इतना होने पर भी मधु मेरी माता जी से असंतुष्ट रहती है और मुझे व मेरी माता जी को कोसती रहती है।

सहसा मुझे उमेश चड्ढा जी की सवेरे वाली बात याद आ गई। मैं भुक्तभोगी था, इसीलिए उनकी बात से सहमत था। मगर मजाक में टाल रहा था। बात तो उनकी सही थी। वे और मैं, नारी अधिकारों के नए शिकार हैं।

BY: --सुनील आकाश



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