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@dawriter

एक_इश्क_ऐसा_भी

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shashank25 by  
shashank25

"वहाँ सरहद पर गोलियाँ चलती हैं चाय नहीं।और वैसे भी हम फ़ौजियों को लेट नाइट चैटिंग करने की छूट नहीं होती।"

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जब हर रिश्तों से छुटकारा चाहता हूँ जब खुद को खुद में उलझाना चाहता हूँ तो घर के पिछवाड़े में बनाए इस छोटे से गार्डेन में रक्खे बास की बल्लियो से बने सोफे में जा बैठता हूँ। जहाँ दूध मोंगरा की कुछ पिली पड़ चुकी पत्तियाँ टूट कर अपने साथ कुछ अधूरे सपने लिये जमीन पर गिरती है, जहाँ बेर की सौन्धी सी महक मंदार के खुश्बू से मिल कर रुह में अलग ही एहसास पैदा करती है जहाँ तुम याद आती हो !... - इतना कहते और गहरी साँस लेते हुए विदर्भ बैठ गया सोफे पर।।

ओह्ह तुम इसे यूँ ही सजा कर आज भी रखे हो ...कमाल है मेजर साब !... - बेर के पेड़ को निहारते हुए इतना कह कर रुक गयी बृंदा।।

अरे आओ आओ बड़े दिनों बाद तो आई हो देखो ये लिली अब बड़ी हो गयी है और अमलताश ने अपना रुख बेर की तरफ़ कर लिया जैसे उन दिनों तुम अपना रुख बदली थी और मैं लिली की तरह अकेला रह गया था !... - विदर्भ कप में चाय और शुगर फ्री की दो गोलियाँ डालते हुए कहा।।

तुम आज भी बड़ी प्यारी चाय बनाते हो मेजर साहेब !... - चाय की चुश्की के साथ आंखों के कोने में आये खारेपन को छुपाती हुई बृंदा बोली।।

अब वो बात नहीं पर तुम कह रही तो शायद ठीक ही बनी होगी। वहाँ सरहद पर गोलियाँ चलती हैं चाय नहीं। खैर अक्सर तुम ही तो कहती थी कि धिमी आंच में बनी चाय और धीरे बने रिश्तों की मिठास ही कुछ और होती है। काश उन दिनों खुद इस बात को मान लेती वकील साहिबा !... - सवालिया भरी नजरों से विदर्भ ने कहा।।

तुम मुझे ही कटघरे में खड़ा कर रहे हो पर हाँ शायद उस वक़्त मैं जल्दबाज़ी कर गयी !... - बेर की टहनी से छन कर आती धूप को देखते हुए बृंदा बोली।।

नहीं नहीं ! शायद वक़्त थोड़ी जल्दबाज़ी में निकलने लगा था उन दिनों और जानती हो ये समाज गर्म चाय जैसा है और हमारा प्यार नर्म बिस्किट जिसे कितनी देर इस समाज रूपी गर्म चाय में डुबाना होता है ये हम समझ नहीं पाये और प्यार पिघल गया। वैसे भी हम फ़ौजियों को लेट नाइट चैटिंग करने की छूट नहीं होती। एक वक़्त बाद तुम बोर हो जाती !... - विदर्भ ने अपनी टोपी बृंदा को पहनाते हुए कहा।।

मेजर साब ये इतनी बड़ी बड़ी फिलाॅसफी कब से सीखने लगे तुम ...और हाँ तुम्हारी हर बात सच है बस वो बोर होने वाली नहीं। जानते हो मैं आज भी उन हर एक गली जिसपे कभी साथ जाते थे, वो सारे खत जो कभी हमने लिखे थे, वो आधा दिल वाला लाॅकेट का एक टुकड़ा जो मेरे बक्से में है, वो डायरी जिसके हर पन्ने में तुम चली हर एक गोली और ली हर एक साँस का हिसाब लिखते जिसके आखरी में तुमने वादियों पे ढलते आफ़ताब की लालिमा और बचे खाली जगहों पर हमारे इश्क को लिखा है इन सबको रोज सहेजते हुए प्यार करती हूँ। हाँ तुम्हारा इंतज़ार नहीं करती अब और तुमसे प्यार भी नहीं करती !... - लट से आँखों को छुपाते हुए अमलताश के पौधे का रुख वापस लिली के तरफ़ मोड़ते हुए बृंदा एक साँस में कह गयी।।

तुम आज भी सच नहीं छुपा पाती देखो ये कत्थई भिंगी आँखें कह रही है कि तुम आज भी मुझसे सदीद वाली मुहब्बत करती हो !... - विदर्भ ने बृंदा के कांधे पर हाथ रखते हुए हौले से कहा।।

वायरलेस बज उठता है उधर से कोई कहता है कि मेजर साब छुट्टी कैन्सिल होती है हीरा नगर सेक्टर जम्मु पर फ़िर सीज़ फ़ायर का उल्लंघन हुआ है तत्काल निकले।

बहुत देर तक बृंदा के आँखों का खारा पानी विदर्भ के बाँये हिस्से में लगे मेडल को भिंगोता है और बृंदा अपने दाँयें हाथ की पहली उँगली से उसके नेम प्लेट को खुरचती हुई चुमती है। अमलताश लिली से जा मिलता है, दूध मोंगरा की पत्तियाँ हवा से उड़ कर सोफे पे जा बिखरती है, पेड़ से बेर जमीन पर गिरते है और आफ़ताब टहनियों पर उलझ कर थोड़ा मद्धिम सा हो रुक जाता है इस खूबसूरत पल को देखने के लिये।

वहीं आकाशवाणी की "हेलो फरमाईश" में बजता है -
"पास आइये की हम नहीं आएँगे बार-बार..
बाहें गले में डाल के हम रो ले ज़ार-ज़ार..
आंखों से फिर ये प्यार की बरसात हो ना हो..
शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो ना हो....।।"

#पंडित

 



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