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@dawriter

एक बेटी की व्यथा

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प्यारी निवी

कैसी है? मैं भी न क्या सवाल कर बैठी। जिसके पास इतना प्यार करने वाला घर परिवार हो वो कैसा होता है। ईश्वर तुमको ऐसे ही सदा खुश और स्वस्थ रखे। मेरा प्यार और आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। अपनी शादी पर गजब की खूबसूरत लग रही थी तू, बिल्कुल ऐसी जैसे स्वर्ग से कोई अप्सरा ज़मी पर उतर आई हो। मेरी छोटी सी निवेदिता, ये नाम भी तो मैंने ही तुझको दिया है। मेरी प्यारी सी निवी कब इतनी बड़ी हो गयी की आज वो अपने ससुराल के घर आँगन को महका रही है। कल तक मेरी बांहों की गोद में झूला झूलने वाली आज अपने पिया की बाहों में उनका प्यार पा रही है। हम तो खुशनसीब हैं ही अब एक और परिवार को तुमने अपने सहज प्यार से बांध लिया है।

पता ही नहीं चला कब मेरी अल्हड़ निवी इतनी समझदार हो गयी कि आज वो अपनी प्यारी बुआ से नाराज़ है पर उनको बताए बिना। पहले की तरह क्यूँ नहीं उसने अकड़ के बोला “बुआ मैं नाराज़ हूँ मुझे मनाओ।” क्यूँ निवी, क्यूँ नहीं पूछा ? क्यूँ चुपचाप अपने मन में एक बेवजह की शिकायत को घर दे दिया? बेवजह तो नहीं है तेरी शिकायत वैसे, लेकिन क्या तुझे सच में ऐसा लगता है कि तेरी बुआ तुझसे दूर हो गयी है, या तुझे भूल गयी है। भाभी से पता चला मुझे की मेरी बच्ची मुझसे नाराज़ है। उन्होंने तेरी नाराज़गी की वजह भी बताई। तू जानती है मैं तुझे बड़ा प्यार करती हूँ, तुझे नाराज़ नहीं देख सकती। हम दोनों का रिश्ता बुआ भतीजी से ज्यादा दोस्तों का रहा है। पर आज मेरी दोस्त मुझसे रुठी हुई है, तो मैं उसे नाराज़ कैसे रहने दे सकती हूँ।

तू मुझसे नाराज़ है क्यूंकि मैं तेरी बिदाई पर नहीं थी। मैंने तुझे रो कर बिदा नहीं किया। सब थे वहां और जब तेरी नज़रों ने तेरी बुआ को देखना चाहा तब वो तुझे नहीं मिली। तू अपनी जगह बिलकुल सही है। और तेरा प्यार तुझे नाराज़ होने का हक़ देता है। पर मेरे बच्चा मेरा ऐसा करने का एक कारण था। और मुझे पूरा यकीन है कि जब तू मेरी वजह सुनेगी तो तेरी सारी नाराज़गी दूर हो जायेगी। आज मैं एक बात बताती हूँ तुझको जो मैंने तुझे कभी नहीं बताई। शायद तेरे मेरे बीच कभी ऐसी बात हुई ही नहीं इसलिए तुझे बता नहीं पाई।

तू तो जानती है कि मैं घर में सबसे छोटी हूँ, सबकी लाडली भी रही हूँ। घर में हर रिश्ते से प्यार मिला। मेरी अल्हड़ सी नादानियों को लोग अपने सर आँखों पर रखते कभी कभी तो दीदी और भाई को जलन भी होती पर फिर उनकी भी तो लाडली थी मैं। सबसे अपनी बात मनवाती, जिद करती ,शरारतें करती। भले ही शरारती थी, पर ऐसा नहीं था कि समझ की कच्ची थी। मेरी समझ के भी डंके बजते। नानाके, दादाके सब की चहेती ‘शुभी’ बड़ी हुई। और एक दिन उसकी बिदाई का भी टाइम आ गया।

27 साल पहले जब मेरी शादी हुई थी तब मेरे भी एक दुल्हन से पूरे अरमान थे। सोचा था कि ससुराल और मायका दोनों को साथ ले कर चलूंगी। सबको प्यार दूंगी क्यूंकि मायके में तो वैसे ही इतना प्यार मिला था मुझे। खूब रोई थी मैं अपनी बिदाई पर। पता नहीं क्यूँ!! सोच में पड़ गयी थी की मैं क्यूँ रो रही हूँ। ये मेरा परिवार है और हमेशा मेरा रहेगा। बस एक घर से दूसरे घर तक का पता ही तो बदल रहा है। जब मन करेगा आ जाऊंगी, वो भी हक़ से कौनसा दूर है मायका।

पर फिर भी आंसू निकले और खूब निकले शायद दूसरों को देख कर भी निकल रहे थे। पर वो क्यूँ रो रहे थे!? मैं तो हमेशा उनकी बेटी रहूंगी।वो ऐसे क्यूँ रो रहे हैं जैसे मेरा उनसे कोई रिश्ता छुटे जा रहा हो। कुछ नहीं बदलेगा, सब वैसा ही रहेगा। मैं गलत थी और ये बात मुझे समय बीतते बीतते समझ आने लगी की उनके आँसूंओ का क्या राज़ था।

मैं ससुराल से ज्यादा अपने मायके से आहत हुई थी। शुरु के एक दो साल तो सब ठीक रहा लेकिन फिर लगने लगा की लोग मुझे भूलने लगे हैं। तुझे वो मेरे चिंटू मामा याद हैं, उनके बेटे की शादी तय हुई माँ ने बताया तो मैं भी बड़ी खुश हुई। अपनी तरफ से तैयारी करने लगी क्यूंकि मेरे मायके की शादी थी मेरा जाना बनता था। मैं कार्ड का इंतज़ार करती रही, वो आगरा रहते थे तो कार्ड ससुराल वालों के हिसाब से जरुरी था। निमंत्रण उनको भेजना जरूरी था। पर कार्ड नहीं पंहुचा मैंने सोचा कोई न नहीं कूरियर मैं खो गया होगा। माँ को बता दिया की माँ उन तक खबर पंहुचा देगी और मैं फ़ोन का इंतज़ार करने लगी। शादी के दिन भी नज़दीक आ गए। घर से सब जाने लगे। मुझे लगा माँ वहां जा कर बोलेगी तो फ़ोन आ जायेगा। मैंने अपनी तरफ से तैयारी पूरी रखी। पर कोई फ़ोन नहीं आया।

मन उदास हो गया। टूट गया। फिर एक दिन घर के एक फंक्शन में मैंने उनसे शिकायत की तो उन्होंने बहाना बना दिया मैंने भी यकीन कर लिया पर कुछ दिन बाद माँ ने मुझे एक साड़ी दी की मामा मामी ने भाई की शादी की साड़ी भेजी है। मुझे बड़ा गुस्सा आया। यहाँ से पराये पन का अंश आने लगा था मुझमे। क्या मैं एक साडी के लिए वहां जान चाहती थी। नहीं मुझे तो मेरे मायके का चाव था। मैं मन मसोड के रह गयी ,लेकिन फिर अब मैं ये महसूस कर रही थी की घर की सब ही बेटियों के साथ कभी न कभी ऐसा कुछ हो रहा था। माँ पापा ने ही भाई की सगाई पर ताऊजी की बेटियों को इस लिए नहीं बुलाया की बेटियां आएँगी तो उनको खाली हाथ तो नहीं भेजा जायेगा। शादी पर बुला लेंगे। जबकि दोनों दीदी घर से ज्यादा दूर नहीं रहती थी। मैंने महसूस किया कि अब मेरी वो अल्हड नादानियाँ जिन पर पहले सबको प्यार आता था वो अब मेरी जिद बन गयी थी। मेरी जिस जिद को पहले मेरा हक़ बोला जाता था उसे अब मेरा लालच बोला जाने लगा। चाचाजी के बेटे की शादी पर मेरे नेक मांगने की जिद को मेरे ससुराल की संपन्नता से जोड़ा गया। मेरी जिन शिकायतों को पहले मेरा प्यार माना जाता था अब वो मेरी नासमझी बन गयी थी। सब कुछ बदल गया था। राखी का रिश्ता अब सिमट के चिंटू भैया(तेरे पापा) तक आ गया था।

क्या बेटियों को अपने मायके से किसी जमीन जायदात या मंहगे उपहारों की गरज होती है?

क्या बेटियों को शादी करते ही अपने मायके के रिश्तों पे हक़ छोड़ देना चाहिए?

क्या बेटियों को मान देने का मतलब सिर्फ महंगे उपहार, या चंद रुपये या उनके ससुराल वालों की ख़ुशी के लिए रिश्ते निभाने तक ही सीमित होता है?

क्या इसी लिए बेटी को पैदा नहीं किया जाता और अगर कर भी दिया जाता है तो उसको बिदा कर दूर क्यूँ कर दिया जाता है?

क्या इसीलिए लड़कियां बोझ लगती हैं?

इन सवालों ने मेरे दिल में ना जाने कितनी दफा वार किया। एक बेटी अपने मायके किसी लालच में नहीं बल्कि उन लमहों को जीने जाती है जिनमें उसका बचपन,यौवन, नादानियां, अपनों का प्यार और भी न जाने कितनी कहानियों कैद हुई होती हैं। मायका उसके लिए दिखावा करने का नहीं बल्कि उसकी ख़ुशी को जीने का सहारा होता है। पर जब वही मायके वाले उससे पराया सा व्यवहार करें तो क्या करे वो बेचारी। ये बिदाई उसी परायेपन की सूचक है, इसलिए तो उसकी बिदाई पर लोग रो कर उसको अपने प्यार का प्रमाण देते हैं।

कुछ लोग बेटियों को बोझ समझ पैदा ही नहीं होने देते और कुछ बिदाई का सहारा ले उनको खुद से अलग कर देते हैं।

इतना कुछ देखा सुना इतने सालों में। मुझे शिकायत रही की लोग रस्मो से ही नहीं दिल से भी बेटी की बिदाई कर देते हैं।

तुझे याद है, जब तू ऑस्ट्रेलिया गयी थी एमबीए करने तब सब कितने सहज रहे। सबने उसे तेरे भविष्य के लिए सही मान अपने मन को मना लिया था। तब कोई क्यूँ नहीं रोया? तब भी तो 24 घंटे का साथ छूट रहा था। तब भी तो तू कभी कभी ही घर आती थी। तभी तो भैया भाभी , मैं , दीदी सब तुझ पर प्यार बरसते, तुझसे लड़ते, तुझे समझाते, तुझे डांटते। क्यूँ? क्यंकि तब तक वो तुझ पर अपना हक समझते थे। लेकिन मुझे ये समझ नहीं आया कि तेरी शादी से क्या बदल गया। ये भी तो तेरा घर से दूर पढ़ने जाने जैसा ही है। अब भी तो 24 घंटे की तेरी बकरबकर ही तो कम होगी। बाकि तो सब पहले जैसा ही है। तू पहले भी इस घर की बेटी थी और अब भी है। बस ! इतनी सी ही तो बात है।

मेरा दिल पहले ही एक फैसला ले चुका था कि अगर मेरी बेटी हुई तो मैं उसकी बिदाई कभी नहीं करुँगी। मेरे बेटी बोझ नहीं मेरा मान सम्मान होगी। मैं इस प्रथा को बंद करुँगी। वैसे भी पहले के लोगो का अपनी बेटियों की बिदाई करने का कारण कुछ और होता था। पहले बेटियो की शादी दूर दूर होती I जहाँ आने जाने में ही महीनों लग जाते थे। अगर पास के गांव में भी शादी हो तब भी दो चार दिन का सफर तो होता ही था। इसीलिए बेटियां जल्दी जल्दी मायके नहीं आ पाती थी। पर अब तो ऐसा कुछ नहीं है आप विदेश से भी ज्यादा से ज्यादा 24 घंटे में आ जा सकते हो। आज कि बेटियां आत्मनिर्भर भी हैं जो अपने फैसले और अपना सफर तय करने में सक्षम हैं।

तू मेरी पहली बेटी है। मेरे बच्चा! मैं कैसे तुझको बिदाई देती। नहीं कर सकती मैं तुझको अपने से अलग। आज भी तेरा तेरी बुआ और उसके घर पर पहले जैसा ही अधिकार है। तू जब चाहे , जो चाहे अपनी बुआ से कह बोल सकती है।

तेरा तेरे भाई बहन दोनों से पहले जैसा रिश्ता रहेगा। तू आज भी अपनी बुआ के घर आकर अपनी नादानियों और अल्हड़पन को जी सकती है। तेरी बुआ तुझे बस प्यार का उपहार देगी हर बार जितनी बार तू आएगी। तेरी बुआ आज भी तुझे उसी हक़ से बुलायेगी “ निवी घर में पूजा है तू एक दिन पहले आजा बड़े सारे काम करने हैं।” न तेरा न मेरा हम दोनों का एक दूसरे पर हक़ खत्म नहीं हुआ है। तू शीना और अतुल की बड़ी बहन और मेरी पहली बच्ची है। तेरे बिना मेरा जीवन सुना है।फिर मैं कैसे दे देती तुझको बिदाई।

नहीं मेरे दिल और घर कहीं से भी नहीं मिलेगी तुझको बिदाई, तू चाहे तो भी। तुझे नाराज़ होना है तो हो जा, पर मैं अपनी निवी को । और हाँ आगे से ये बिदाई की बाद अपने मन में भी नहीं लाना न तुझे न शिनी की और ना ही आरती और मीता को मुझसे बिदाई मिलेगी। मेरे दिल और मेरे घर पर तुम सबका एक सा अधिकार रहेगा। तुम सबको अपने मेरे साथ रिश्ते से वो निराशा कभी नहीं मिलेगी जो कभी मैं महसूस कर चुकी हूँ।

अब तो तेरी नाराज़गी दूर हो गयी होगी न तो बता कब आ रही है मिलने और पेरिस से मेरे लिए क्या गिफ्ट लेके आयी है।(हाहाहा) आजा मिल कर चलते हैं सोहन लाल की चाट खाने तेरे बिना चाट का मज़ा नहीं आता। शिनी भी तुझको याद कर रही है। ।

सदा खुश रह मेरे बच्चे।

तुझसे मिलने के इंतज़ार में

तेरी शीतू बुआ



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