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@dawriter

एक अदद गुलदोपहरी का फूल

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“अमलतास सी..
खूबसूरत..
सूरत नहीं मेरी…
न गुलाब सी सुगंध..
मैं तो जंगली फूल हूँ..
एक अदद गुलदोपहरी का...
उग गया जो बस यूँ ही..
कहीं भी…
बिन सींचे...
बिन पाले…
न ममता किसी की ...
न प्रारब्ध कोई उसका..
बस..
उगना..
बढना…
फ़ैलते जाना…
फिर एक दिन…
मिट जाना…
हमेशा के लिए...
इस संघर्ष में...”

मैं हमेशा की तरह ऑफिस में बैठा, खाली समय में फेसबुक ब्राउज़िंग कर रहा था. अचानक इस अनजान सी कविता की पंक्तियों ने मुझे आकर्षित किया. और मुझे पता ही नहीं चला कि धीरे-धीरे मैंने उस प्रोफाइल की कितनी पोस्ट, कितनी कहानियों को आत्मसात कर लिया. एक भी कविता ऐसी नहीं थी जिसने मुझे कहीं न कहीं से स्पर्श न किया हो….कई कवितायेँ तो ऐसी थी कि मैं विस्मित रह गया. घड़ी की सूइयों पर नज़र डाली तो पता चला कि लगभग चालीस मिनट से मैं माधुरी की टाइम लाइन में डूबा रहा था. लघु कथाएं भी जिन्दगी की जिजीविषा के ताने-बानों पर बुनी आपकी और हमारी ही स्मृतियाँ-सी थी, जिन्हें जज्बातों की स्याही में किसी ने जैसे पन्नों पर बस उकेर भर दिया हो.

“क्या मुस्कुराहट काफी नहीं…? इन गमों के निर्झर प्रवाह के लिए...इसलिए… मुस्कुरा रही हूँ मैं...नदी की तरह..”

यह एक पोस्ट थी माधुरी की, जिस पर मैंने ब्राउज़र को बंद करते समय अपनी टिप्पणी यूँ की :

कुछ तो जरूर होगा....
जो दे सके अभिव्यक्ति,
तुम्हारी अनकही बातों को,
बदल सके उनको,
एक नज़रिये में,
किन्हीं आयामों में,
ताकि,
सुकूं मिल सके,
इस बेचैन दिल को,
और भाव बह सकें,
अविरल,
नैसर्गिक,
नदी के पानी की तरह !

और मैं उसकी कविताओं की गहराइयों को समझने की कोशिश करते हुए, फिर से अपने उसी उबाऊ काम में अनमने ढंग से व्यस्त हो गया, जो मेरी पिछले कई सालों की दिनचर्या का हिस्सा रही थी. फेसबुक पर बने रहना वैसे भी सरकारी नौकरी के साथ और सरकारी समय में वर्जित है, पर यह भी उतना ही सही है कि इन वर्जनाओं को तोड़ने में ऐसे ही आनंद की अनुभूति होती है जितना बचपन में पड़ोसी के पेड़ से चोरी-छिपे अधपके जामुन या अमरुद तोड़कर खाने की !

लगभग दो घंटे बाद जब अगली बार मैंने फेसबुक के नॉटीफिकेशंस चेक किये तो उनमे माधुरी के लाइक के साथ एक स्माइली का चिन्ह भी मौजूद था.

मेरी अगली कविता पर माधुरी का लाइक ४२ अन्य लाइक्स में से एक था. लेकिन इतना जरूर समझ में आ गया था कि वह अब मुझे फॉलो कर रही थी, और मैं उसकी कविताओं के लिए उत्सुक रहता था. पर दिक्कत एक थी. वह बहुत कम लिखती थी. बमुश्किल हफ्ते में एक बार. जम्मू के किसी वीमेन पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में वह मनोविज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर थी, यह उसकी प्रोफाइल को खंगालने पर पता चला. उसकी प्रोफाइल और इन्फो में केवल उसका स्टेटस--

“नदी हूँ मैं, बहती हूँ, नैसर्गिक रूप से, रुकना नहीं है, अभी मुझे!”,

लिखा था, और विवाहित भी लिखा था. परन्तु, उसके सारे फोटोज में केवल ८ साल के बेटे अनुज तथा १४ साल की बेटी तृष्णा के कुछ पिकनिक के चित्रों के अलावा कुछ नहीं था. मैं जितना उसे जानने की कोशिश करता वह उतना ही रहस्यमय हो जाती.

एक बात और, मैं उसका फेसबुक मित्र नहीं था, उसने मुझे रिक्वेस्ट भेजी नहीं थी, और मैं उसे भेज नहीं सकता था, क्यूंकि वह सेटिंग डिसेबल्ड थी. राहत की बात यह थी कि उसे मैसेंजर पर सन्देश भेजा जा सकता था. यह उसके ऊपर था कि वह उन्हें पढ़े, जवाब दे, न दे, ट्रैश कर दे या फिर आपको ब्लाक ही कर दे. अक्सर महिलायें ऐसा करती हैं, कुछ अनचाहे से, और फिजूल संदेशों से स्वयं को तनावमुक्त रखने के लिए.

समय बीत रहा था, आज शायद पांचवा दिन था, पर न माधुरी की कोई नई पोस्ट आई और न मेरी किसी पोस्ट पर उसका लाइक या स्माइली. फुर्सत भी थी आज. मैंने आराम से माधुरी की प्रोफाइल को देखना शुरू किया. उसकी पोस्ट का एक-एक शब्द उसकी रचना को जीवंत करता मिलता था. एक जगह उसने लिखा,

“Dont Take Me for Granted…..Dear….Sunday…!”,

दूसरी पोस्ट में सिर्फ,

“सिर्फ बारिश...जो छू लेती है मन मेरा..

झमाझम और... रिमझिम बारिश्श्श्श्श्..... !

बरस रही है...तुम्हारी याद भी ज्यूँ कतरा-कतरा.....☺..”

लिखा था, और ढेर सारे प्रसन्नता के स्माइली. जैसे-जैसे मैं फेसबुक के उसके पन्ने पलटता गया यह दोनों स्टेटस अक्सर, बार-बार सामने आने लगे. हर रविवार जैसे कुछ कहना-कुछ छिपाना चाहता हो, और हर बारिश में जैसे माधुरी का मन नैसर्गिक रूप से बहने को तैयार हो, उसी नदी की तरह जिसे वह अपना आदर्श माने बैठी है.

एक कविता आज पोस्ट की माधुरी ने, रात के लगभग ११ बजे होंगे, उनींदेपन के बावजूद मैं चौंक कर उठ बैठा, लेकिन वह सिर्फ दो लाइन थी,

”बूँद बूँद खो गई हैं कहीं आज ....

इन बारिशों की भी ख़ता क्या है ....”

बस. लाइक के अलावा क्या करना था, पर फिर भी मैंने लिखा,

“बूँद-बूँद में गुम हुई,

नदी कहलाई,

नदियों ने राह बनाई,

समुन्दर सा बन पाई,

वो नन्हीं बूँदें ..

कुछ तुझ में हैं समाई,

कुछ मुझको भायी…!”

और आज, अप्रत्याशित् रूप से लाइक, स्माइली के साथ मैसेंजर में खटखटाहट हुई. मेरे हृदय की स्पंदन तेज़ हो गई, भय सा व्याप्त हुआ कि शायद कुछ ज्यादा हो गया. दो लाइन की पोस्ट पर सात लाइन का कमेंट, और वह भी बिना मित्रता के--- बहुत नाइंसाफी है ना ! पर ऐसा कुछ भी नहीं था. माधुरी ने अभिवादन के बाद लिखा था कि,

“क्या कहूं, मैं तो सोचती ही रह गई, और आपने मेरी पंक्तियों को न केवल पूरा कर दिया, ….अपितु उन्हें नया आयाम भी दे दिया. आभार, आपका.”,

मैंने माधुरी को धन्यवाद दिया और उनसे उनकी नई रचनाओं के बारे में जानकारी लेने की कोशिश करता, तब तक वह “बाय” बोल कर ऑफलाइन हो गई!

मैं फिर निराश हो गया. नींद उड़ गई थी. कोई व्यवधान भी नहीं था, न सवेरे उठने की शीघ्रता, क्यूंकि कल शनिवार था, और मेरे ऑफिस का वीकली ऑफ. आज मैंने तय कर लिया था कि माधुरी के विषय में जानकर ही रहूँगा. उसका इतना अच्छा लेखन है, फिर वह इतना सहमी-सहमी सी क्यूँ रहती है, क्यूँ नहीं अपनी अभिव्यक्ति को व्यापक रूप देती.

जैसे जैसे मैंने देखना शुरू किया, एक-से-एक बेहतरीन रचनाएं सामने आती गई. हर तरह के प्रयोग थे माधुरी की रचनाओं में, मगर साल-दर-साल या यूँ कहिये कि हर पोस्ट के साथ उसकी कविताओं का ओज, और पैनापन भोतरा होता जा रहा था... लगता था जैसे उसका कहीं कुछ खो गया हो, या फिर कोई नासूर सा हो, जो समय के साथ-साथ रिस रहा हो.

मेरी उलझनें बढती जा रही थी. दीवार घडी रात के १.३५ बजे का समय दर्शा रही थी, नींद पहले ही उड़ चुकी थी, ऐसा लग रहा था, बस भोर होने को है. मैंने लैपटॉप को यूँ ही खुला छोड़ा और अपने लिए चाय बनाने किचन में आ गया.

चाय बनाते समय भी माधुरी की कविताओं, उसके संत्रास के पन्ने मुझे बार-बार दिखते रहे. फिर से मैंने देखना शुरू किया, और जो स्टेटस सामने था, वह कुछ यूँ था,

“सिर्फ ख़ामोशी, और फिर थोड़ी सी तन्हाई .....

यह भी किसी की ज़रूरत का सामान हो सकती है.. बेशक..कभी कभी......

….गहरी शान्ति का मन है….”

...इसके बाद लगभग चार महीने का खालीपन था माधुरी के अपने पन्नों पर, जो यूँ तो उसके किन्हीं अपने, और बेहद अपने अहसासों से रंगे हुए थे अभी तक, कुछ अदद कविताओं में.

धीरे-धीरे मैं समझ पा रहा था. उसकी रहस्यमय जिन्दगी के एकाकीपन की परतें खुलती जा रही थी, पर वह सब मेरी कल्पना या विशुद्ध अनुमान मात्र था, मैं गलत भी हो सकता था. मेरा यह यकीन इसलिए भी था कि जब माधुरी की वापसी हुई तो उसकी पहली पोस्ट थी,

“….लौट रहा है दिल में फिर तन्हाइयों का मौसम..

मेरे इंतज़ार .... और तेरी बे-परवाहियों का मौसम........”

और फिर यह पोस्ट मुकम्मल करती सी दिखती थी माधुरी की जिन्दगी की असलियत को,

“कभी-कभी , मेरे दिल में भी..
कुछ ख्यालों के बसेरे होते हैं…
मेरी तन्हाइयों में...
जो मेरे करीब होते हैं..
बस वह कुछ…
तन्हा से लम्हे होते हैं...
सोचती हूँ…
क्या कुछ स्मृतियाँ...
वो गुजरे हुए पल…
वो सिमटी--सी बातें…
सहमी--सी रातें...
क्या रहना जरूरी है उनका…
यूँ ही सदा...
और सन्डे…
क्या जरूरी है…
उसका आना भी..
बिन बुलाये मेहमान सा…”

“कहते हैं अगर दिन भर खाली रहो तो कुछ न कुछ खुराफात सूझती है… पर मुझे क्यूँ नहीं ऐसे खुराफाती अहसास महसूस होते. मैं तो खाली भी हूँ...तन्हा भी… बच्चे भी अपने नाना-नानी के घर हैं… पर इन किताबों का, अपनी सहेजी हुई डायरिओं का क्या करूं… मैं जब भी कमरे में आती हूँ… वह बेवक्त भी मुझसे बातें करने..और कभी-कभी लड़ने को आमादा हो जाती हैं.. बिल्कुल अनुज और तृष्णा की तरह.... कभी खिलखिला भी लेती हैं...वक्त...बेवक्त ! आजकल खाली हूँ .. खाली-खाली वक्त को मारा करती हूँ .. और ये खाली वक्त .. मुझे मारा करता है … सच .. व्यस्त रहना बड़ा अच्छा होता है ... काम पर काम...

व्यस्तता की तेज़ धारा में ... काफी कुछ बह जाता है .....मन के बहुत से उलझे भंवर भी डूब जाते हैं ...सब निर्मल… वरना तो यह पानी... यूँ ही ठहरा रहता है... और सोच के धरातल पर… न चाहते हुए भी... निराशा ....और नकारात्मकता की परतें मन में जमती चली जाती हैं...”

फिर माधुरी ने पोस्ट की अपनी वह लाइनें जो काफी समय बाद फेसबुक के लिए प्रस्तुत हुई थी..


“...वह कुछ बातें...

बेरंग लम्हों का…

बिखरना-सिमटना...

गवाह हूँ मैं भी ...

उसकी बातों की…

कुछ मासूमियत का..

चिराग़-सा जलता है इक…

दूर कहीं किसी…

शायद मंदिर या मस्जिद…

या गुरूद्वारे…

किसी चर्च के अहाते से...

नन्ही-सी जिद है

... ख्वाब को जी लेने की..

मुझमें कोई बार-बार गिरता

..कभी सम्हल रहा है…

और मजबूर करता है…

इस जिन्दगी के लिए...”


माधुरी के फेसबुक के व्यतित्व से एक बात और झलकती थी कि वह मीनाकुमारी की बहुत बड़ी प्रशंसक थी. हर दो चार पोस्ट के बाद मीनाकुमारी के कोट्स का मिलना जैसे लाजिम था. एक जगह माधुरी ने मीनाकुमारी की पसंदीदा लाइन लिखीं,

“सुबह से शाम तक दूसरों के लिए कुछ करना है...

जिसमें खुद का कोई नक्श नहीं,,,,

रंग उस पैकर-ए-तस्वीर में भरना है....”

...बहुत दिन हो गए थे. माधुरी ने फेसबुक से अपना नाता लगभग तोड़ रखा था. न कोई पोस्ट, न लाइक न कोई स्टेटस...जिन्दगी यूँ ही चल रही थी. अचानक एक दिन मैसेंजर पर प्रकट हुई…”Nice profile pic”, के कमेंट के साथ. ...मैं चौंका, क्यूंकि प्रोफाइल पर मैंने अपनी पिक्चर ही हटा दी थी और एक अनजाने हाथ तथा पेन के क्लोज अप को इस्तेमाल किया था. फिर भी, मैंने उसका आभार अदा किया. मैंने सीधे पूछा कि कोई पोस्ट क्यूँ नहीं आ रही आपकी, तो एक सपाट जवाब…”जिन्दगी की तन्हाईयाँ इतनी भी खुशगवार नहीं कि फेसबुक पर सब उड़ेल दिया जाए!”. “पर एकाकीपन भी तो कुछ अच्छा नहीं न?”, मैंने भी तत्काल जवाब दिया. “आप खुशनसीब हैं...आपकी कवितायें खूबसूरत हैं..आपके भावों से आपका व्यक्तित्व झलकता है", “....और जितना मैंने आपको पढ़ा है, आपकी कवितायें अद्भुत हैं…”, “अरे नहीं..”, मैंने कहा. “आप लिखते रहिएगा...बहुत अच्छा लिखती हैं आप, मुझ से भी कहीं अधिक !...”

मैंने दीवार घड़ी पर नज़र डाली...रात के ११.१५ का समय था. बातों का सिलसिला जारी था. माधुरी ने मीनाकुमारी से अपने प्रेम के साथ-साथ महादेवी वर्मा, डॉ हरिवंश राय बच्चन और अमृता प्रीतम के लेखन के पहलुओं पर भी चर्चा की. तब मुझे लगा कि मैं कितना अल्प ज्ञानी हूँ, और उसे कितनी समझ है हिंदी साहित्य की. यह अलग बात थी कि कक्षा १२ के बाद कभी हिंदी साहित्य न मेरा विषय रहा, न रूचि और न ही माहौल. पर, माधुरी के लिए भी यह बात उतनी ही लागू होती थी, यकीनन साहित्य की बारीकियों पर उसकी नज़र का पैनापन सराहनीय था. उसके लेखन से किसी का भी मुग्ध हो जाना निश्चित था. उसने एक बार भी मुझे ऐसी बातों का आभास नहीं कराया जो मेरे साहित्यिक बौनेपन की ओर संकेत करती थी. साथ ही, उसकी बातों में कोई अभिमान या गुरूर नहीं था, थी तो बस सौम्यता और सद्भावना.

अचानक उसने पूछा, “बहुत देर हो चुकी है...मेरे लिए तो आम है यह समय, पर आप सो जाइए अब…”, “नहीं, मुझे भी कोई जल्दी नहीं है", मैंने आश्वस्त किया माधुरी को, “श्योर?”, के प्रश्नवाचक चिन्ह के सहमति युक्त प्रत्युत्तर ने बातों के सिलसिले को जमाये रखा. और उन बातों से खुली कई परतें-- ज्ञान की, साहित्य की और कुछ अनजाने से पर अपनत्व युक्त संबंधों की! मैंने ब्राउज़र बंद करते समय देखा. एक घंटा अडतीस मिनट तक का चैट सेशन रहा था हमारा. जहाँ उसने सब अभिरुचियों पर बात की थी, पर फिर भी जितनी बात हुई थी उसकी अपेक्षा बहुतेरे प्रश्न अभी भी अनुत्तरित थे.

अब जब भी वह फेसबुक पर ऑनलाइन होती या तो स्वयं सन्देश भेजती, या मेरे भेजे सन्देश का निश्चित उत्तर देती. साधारणतः उसका समय रात को ही होता, देर रात को. दिन में या दोपहर में उसका फेसबुक से सम्बन्ध विच्छेद ही रहता था. मैंने माधुरी से पूछा भी कि क्या उसने कोई अपना कविता संग्रह प्रकाशित कराया है, जिस पर उसने नकारात्मक उत्तर देते हुए कहा कि न तो छपवाया है और न ही भविष्य में ऐसी कोई संभावना है. मैंने कुरेदा तो, बोली, “जाने दीजिये"!. इस बीच उसने स्वयं हो मुझे मित्रता सूची में जुड़ने का आमन्त्रण भी दे दिया था, जिसे मैंने तत्काल स्वीकार कर लिया था.

मेरे पूछने पर माधुरी ने बताया कि उसका छोटा सा घर तवी नदी के दक्षिणी तट से बायीं ओर स्थित है. दरअसल जम्मू शहर पूरा ही तवी नदी के इर्द-गिर्द बसा है. अंतर इतना है कि नया जम्मू नदी के दक्षिणी ओर स्थित है. शिवालिक पर्वतों की असमान पहाड़ियों व् टीलों के बीच स्थित इस शहर में माधुरी के अहसास जिन्दा हैं-- बचपन से लेकर अब तक के. जिधर निकल पड़ो उधर ही मंदिर--एक से एक प्राचीन और खूबसूरत, श्रद्धालुओं से समृद्ध. क्या नहीं है माधुरी के लिए इस मंदिरों के शहर में जो उसे चाहिए आत्मसंतुष्टि के लिए!

आज मैंने सोच रखा था कि माधुरी से कुछ न कुछ उसकी जिन्दगी के पन्नों को जरूर सुनूंगा. जैसे ही उसने “हाय”, बोला मैंने भूमिका बांधनी शुरू की. मैंने उसे कुछ ऐसे लोगों के बारे में बताया जो केवल फेसबुक पर ही लिखते थे, और धीरे-धीरे बहुत प्रसिद्ध लेखक बन गए, क्यूंकि वह अपनी रचनाओं का प्रकाशन करा चुके थे. उससे उन्हें एक अलग पहचान मिली. मेरी उसकी बातचीत कुछ यूँ थी,

“माधुरी, वैसे पहली बार आपने कब लिखा था?”

“हम्म...शायद कक्षा आठ में, पर चोरी छिपे!”

“और नियमित कब से?”

“वह तो अभी भी नहीं लिख पाती मैं. दरअसल मेरी गति बहुत धीमी है. जिस गति से मैं जिन्दगी जीती हूँ उससे कुछ कम गति से ही लिख पाती हूँ….और वह भी तब जब आस-पास कोई न हो. या तो बच्चे स्कूल गए हों या खेलने. दबाव में कभी नहीं लिखा मैंने. अगर आप कहें कि मैं अमुक विषय पर लिख दूं, तो यह मेरे लिए असम्भाव है", माधुरी ने जो बताना शुरू किया तो रुकी ही नहीं.

“...हम्म, तो क्या चीज़ आपको प्रेरित करती है लिखने के लिए?”,

“सिर्फ पानी, आकाश और प्रकृति-- झील,नदी, समुन्दर और बारिश का पानी, बस यह आस-पास हो तो मेरी कविता बन जाती है. कुछ नहीं चाहिए मुझे, और हाँ, बारिश तो जैसे मेरे तन के साथ मेरे मन को भी भिगो देती है-- सब भाव धुल जाते हैं बारिश में मेरे, केवल प्यरा, स्नेह और उमंग को छोड़कर! मेरी अधिकतर रचनाएं इसी मौसम की हैं, और अगर उदासी हावी है मेरी रचनाओं पर तो समझ लीजिये कि मैं रूखे-सूखे मौसम में बंद कमरे में बैठ कर नैराश्य के बादलों की ओर ताक रही हूँ, जिन्होंने शायद न बरसने का मन बना रखा है"...आज लगता था कि माधुरी अपनी जीवन के अनछुए तथा सार्वजानिक सभी पन्नों को स्वेच्छा से साझा करने के मन से बात कर रही है. मैंने मर्म पर चोट की, पूछा, “तो कोई संग्रह क्यूँ नहीं प्रकाशित कराती तुम?”...अब हमारे बीच औपचारिकताओं के बोझिल शब्दों ने अपनत्व के शब्दों से स्वयं को परिवर्तित कर लिया था. हालांकि वह मुझे अभी भी आप से संबोधित करती थी पर स्वयं को तुम कहलाने का आग्रह था उसका. साथ ही यह भी कि हमारी बातों में आभार, धन्यवाद तथा इस सरीखे औपचारिक शब्द वर्जित हैं.

फिर वही बात… माधुरी ने कहा, “जाने दीजिये ना… देखिये आपके यहाँ कैसा मौसम है, यहाँ तो बादल घुमड़ रहे हैं, लगता है कभी भी बारिश होकर ही रहेगी…”, पर मैं जिद पर अड़ा था. मैंने फिर दोहराया कि, “दिक्कत क्या है अपनी रचनाओं को सामने लाने में?”. “जानना चाहेंगे आप?”, इस बार माधुरी मूड में आ गई थी, “जरूर", मेरे कहते ही उसने लिखना शुरू किया, “अगर संक्षिप्त में कहूं तो वह नहीं चाहते कि मैं लिखूं”. मैं अचंभित सा था. आज के इस समय में, एक पोस्ट-ग्रेजुएट कॉलेज की फैकल्टी की सदस्या यह कहे कि उसे उसके पति से अनुमति नहीं है कवितायें लिखने की, या उनका प्रकाशन करने की, तो कुछ अद्भुत सा है न? मैं तो स्वयं के मानकों से आकलन करता हूँ, किसी भी स्थिति का. मैंने तो अपनी पत्नी की अभिरुचि के किसी कार्य में कभी कोई रोक नहीं लगाई, बल्कि हमेशा प्रेरित किया आगे बढ़ने के लिए.

“ऐसा क्यूँ, माधुरी?”, मेरे पूछने पर उसने बात को घुमाना चाहा, बोली, “ऐसा भी नहीं कि मैं अपने मन का कर नहीं सकती. जिस दिन तूफ़ान आएगा, नदी अपने तटबंध को तोड़ देती है न?...तो उम्मीद कीजिये कोई दिन शायद ऐसा आये, और फिर नदी अपने नैसर्गिक प्रवाह से इतर चल पड़े..”, “पर नैसर्गिक प्रवाह तो बहते जाना है ना, निर्बाध?, मैंने उसे विषय पर लाने की कोशिश जारी रखी. “हाँ, बस वह नियति के फेर में बंध गई है अभी…छोडिये अब…”, कहकर उसने मुझसे अपना पीछा छुड़ाना चाहा. मैं भी समझ गया कि वह और कुछ बताने को तैयार नहीं है, इसलिए मैंने विषयांतर करना ही उचित समझा.

बातें होती रहीं यूँ ही, दिन बीतते गए, कभी वह मेरी कविताओं की गहराई में जाती, कभी मैं उसकी कविताओं पर चर्चा करता, और भी बहुत बातें होती, पर वह विषय अछूता ही रहता. एक दिन उसने बताया कि अब छुट्टियाँ खत्म हो रही हैं, वह ज्यादा देर तक फेसबुक पर नहीं रह पाएगी. हाँ, वीकेंड्स पर अवश्य उपलब्धता बनी रहेगी. इस प्रकार थोड़ी दूरियां होने लगी, फिर से, लेकिन केवल समय की कमी से! उसकी बातों से मेरे प्रति आदर और एक अलग सम्मान झलकता था, जिसे मैं सहजता से महसूस कर पाता था.

इस बीच एक घटना हुई. मेरे मित्र ज्वलंत सपत्नीक एक दिन के लिए आये. वह आर्मी में थे, और उनकी पिछले साल ही पोस्टिंग हुई थी जम्मू में. उनकी पत्नी अनुभा अपना शोध भी वहीँ से कर रही थी, हिंदी साहित्य में ! उनसे जिक्र चला, तो सारी बातें सामने आई. संयोग से उसी कॉलेज से उसके गाइड भी सम्बद्ध थे. हालांकि वह सीधे माधुरी के संपर्क में नहीं थी, पर फिर भी अन्य फैकल्टी के लोगों के साथ उससे जुडी थी. वह एक बार उसके घर भी जा चुकी थी.

अनुभा ने बताया कि माधुरी जम्मू की ही मूल निवासी हैं, और उनके पेरेंट्स भी आर्मी में थे, माधुरी कभी जम्मू छोड़कर नहीं गई थी. उसके पिता भी रिटायरमेंट के बाद वहीँ सेटल हो गए थे. माधुरी का प्रेम विवाह था-- पर ऐसा प्रेम जो उसने काफी अनमने ढंग से स्वीकार किया था. वह अपने विषय में गोल्ड मेडलिस्ट थी, इसलिए उसे यूनिवर्सिटी ने स्वयं ही असिस्टेंट प्रोफेसर की पोस्ट पर ज्वाइन करने का ऑफर दिया था. कृष उसके विपरीत हालांकि एक संपन्न औद्योगिक घराने से जुड़े थे, पर वह कई विवादास्पद मामलों से जुड़े थे. और, जैसा उनके बारे में बताया गया था, और जैसा वह जान पाई, निश्चित रूप से अवसादपूर्ण परिस्थितियां बनाने के लिए काफी थी.

कृष से विवाह तो हो गया, पर वह चाहते हुए भी उसका संयुक्त परिवार, पेरेंट्स तथा अन्य रिश्तेदारों से तालमेल नहीं बिठा पाई थी. कृष के दो और बड़े भाई भी थे जिनकी पत्नियां भी संपन्न बिज़नस परिवारों से थी और वह उस ताने-बाने में अच्छी तरह से फिट हो गई थी, जबकि माधुरी शादी के सालों बाद भी वहां विशाल घर के एक कमरे में सिमटी हुई अपनी जिन्दगी को जीने की जिजीविषा में तिनका-तिनका टूट रही थी. फिर भी, माधुरी ने अपनी रिक्त्तता को लेखन के माध्यम से पूर्ण करना चाहा तो सबसे पहले विरोध का स्वर स्वयं कृष की ओर से ही उठा. वह बात दीगर थी कि पहले कृष उसकी कविताओं का दीवाना हुआ करता था.

अब कॉलेज, घर, रोजमर्रा के काम, पूरे परिवार के भोजन के लिए किचन में जुटना-- बस यही जिन्दगी रह गई थी माधुरी की. फिर, एक दिन तो हद ही हो गई, जब माधुरी को इस सबसे अपने कुछ निजी लम्हे चुराकर कविता लिखता देख लिया कृष ने. उसी समय उस डायरी को चिंदी-चिंदी कर हवा में लहरा दिया था उसने. चीखते हुए. फिर सालों तक केवल ख़ामोशी बची थी उनके रिश्तों में. अपने बिज़नस में असफल कृष की तरह-तरह की नशे की आदतें असहनीय होती जा रही थी, फिर भी माधुरी ने अपने धर्म के निर्वहन में कोई कमी नहीं छोड़ी.

अनुभा को जो भी जानकारी थी उसने बताई माधुरी के बारे में. उसने यह भी बताया कि लगभग छः साल बाद माधुरी को अंततः उस परिवार से अलग अपने लिए एक ठिकाना बनाना पड़ा. उसके पिता ने मदद की माधुरी की और कुल मिलाकर एक अदद मकान, आस-पास नदी, और वृक्षों से घिरा प्राकृतिक दृश्य...अरावली की पहाड़ियों से उगता सूरज और सांझ के समय अपनी छटा बिखेरता सूर्यदेव इतना मनोरम दृश्य उत्पन्न करता जैसे कि हर रोज़ एक कविता जन्म लेने को तैयार हो. उसने घर को ऐसा खूबसूरत लुक दिया था, कि जो जाता तो उन पगडंडियों से उतरकर उसके छोटे से हरे-भरे खूबसूरत और सुरुचिपूर्ण घर से उसका आने को मन ही नहीं होता. उसने अपने स्टडी रूम को वुड कॉटेज के रूप में बनाया था. कृष ने भी अपना छोटा-मोटा काम अलग से कर लिया था. उसके नशे की आदतों को माधुरी ने अपनी लगन और जिद से, डी-एडिक्शन सेंटर पर जाकर छुडवाने में भी काफी सीमा तक सफलता पा ली थी. पर, उसका लिखना कृष को अभी भी पसंद नहीं था माधुरी का. और जितना लिखा था, उसको प्रकाशित करना तो बिल्कुल भी एप्रूव नहीं किया कृष ने, न जाने किस अनजान भय के चलते!

अनुभा ने यह भी बताया कि दोनों बच्चों अनुज और तृष्णा को पालने की पूरी जिम्मेदारी माधुरी की ही है, पति का कोई योगदान हो उसमें, ऐसा कभी जाना नहीं उसने. माधुरी की ही तरह सौम्य और सरल हैं बच्चे भी, दोनों कुशाग्र ! हमेशा एक मुस्कान के साथ कॉलेज में मौजूद माधुरी को सब-- उसके स्टूडेंट और सहयोगी, एक शांत और एकाकी शिक्षक के रूप में जानते हैं वहां, शायद ही कोई घनिष्ट मित्र हो उसका.

जहाँ तक उसके व्यक्तिगत लुक की बात थी अनुभा ने बताया कि माधुरी विवाह के लगभग डेढ़ दशक बाद और तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी आयु से कम तो लगती ही थी, अपने फीचर और चेहरे पर लगातार बनी रहने वाली मुस्कान के कारण बहुत खूबसूरत लगती थी. उसे अनुभा ने कभी साडी से अलग परिधान में देखा हो, ऐसा याद नहीं था, पर यह बात उसने जरूर बताई कि उसकी साड़ियों की सादगी और रंगों के संयोजन में झलकती भव्य अभिरुचि की सब जगह चर्चा अवश्य होती थी. घने, लम्बे बाल तथा लगभग ५ फीट ५ इंच का उसका कद उसके व्यक्तित्व को निखारने में तो सहायक था ही, जब वह बोलती तो उसके तर्कों तथा अभिव्यक्ति की सौम्यता से सब प्रभावित हो जाते.

अनुभा और ज्वलंत को सड़क मार्ग से श्रीनगर जाना था, सो अगले दिन भोर ही वह चले गए, रात का समय बातों में कैसे निकल गया पता ही नहीं चला. उस रात न तो फेसबुक और न मैसेंजर चेक कर पाया. सवेरे मित्र को विदा करने के बाद, चाय पीते समय जब मैसेंजर चेक किया तो माधुरी का मैसेज पड़ा था.., “मित्र, एक नई कविता भेज रही हूँ, आशा है फेसबुक पर पोस्ट करने की सहमति दोगे?” ऐसा कोई बंधन नहीं था की मुझसे पूछे बगैर माधुरी फेसबुक पर कविता पोस्ट नहीं कर सकती, पर कुछ हफ़्तों से यह अलिखित अनुबंध सा बन गया था दोनों के बीच. कविता यूँ थी..

“बेजान रूह ने पहना है ....

लिबास दमकते जिस्म का..

दिल की अँधेरी दुनिया में

सन्नाटों का शोर पसरा है..

फिर भी आँखों में

चमकते जुगनुओं का पर्दा है ..

कुछ रिश्ते निभाने हैं.. खुद से..

हर बात पे मुस्कुराना

मेरा फ़र्ज़ सा है...

हर एक धड़कन है सौग़ात तेरी

हर एक सांस कोई सौदा..

दिन-रात के सदके के से

मेरी झोली भरी है..

हर पहर...हर पल से

मेरा वादा है..

कि बस.. जिए जाना है…

जिए जाना है..

ऐ जिंदगी ...

मुझ पर तेरा क़र्ज़ सा है…”

मैंने तुरंत सन्देश लिखा, “बहुत खूब माधुरी, पर अधूरी है, कहो तो मैं पूरी कर दूं?”, और उत्तर की प्रतीक्षा के बिना मैंने उसमे जोड़ा,

सपनीले बेल-बूटे..

उसकी हथेली की खुशबूएं भी

सो जाएँगी एक दिन..

जिंदगी, उतरती हुई

मेंहदी के रंग सी हो गयी है…

इक टीस सी हर पल..चुभती रहे सीने में ..

कोई बे-रहम सी याद तो दे जाओ..

ज़रा आईना दिखाओ..

कुछ नुक्स निकालो मुझमें ..

और कोई इल्जा़म तो लगाओ..

ये सन्नाटे सहे नहीं जाते ..

दिल टूटने की आवाज़ तो हो …

इतनी खा़मोशी से ...

मेरी ज़िंदगी में मत आओ…

और मैंने सलाम किया माधुरी के जज्बे को, जिसमें उलझी-लिपटी वह जिन्दगी जी रही थी, कुछ अनुभा की बातों के उलझाव, कुछ मेरी माधुरी से निकटता और कुछ यह ताज़ी-ताज़ी जज्बाती पंक्तियाँ. मेरी दृढ़ता के बाद भी आँखें जो नम हुई तो लगा कि अश्रु नीर बहने को ही उतारूं है...और मैंने उन्हें स्वाभाविक रूप से धीरे से बह जाने दिया !

दो घंटे बाद नोटिफिकेशन की ट्रिंग हुई तो दिखा कि माधुरी ने मैसेंजर पर एक थम्स अप का निशान मुझे भेजा था, यानि कि सहमत !

इसी बीच मैंने एक और प्रोफाइल पर जो पढ़ा वह भी मुझे माधुरी और मेरे दिल के करीब दिखा. उसे ज्यूँ का त्यूं उतार रहा हूँ-- “संघर्ष -वह भी अनवरत संघर्ष ! व्यक्ति की जिजीविषा को ,उसकी सोच की दिशा को एक निश्चित आयाम दे देते है! भाग्यवश मुझे भी जीने के लिए सदा एक कठोर रेतीली भूमि ही मिली ,मगर मैंने उस तपिश भरी शुष्कता में भी दूब के नन्हे नर्म कोने ढूंढ लिए ! मेरा समस्त लेखन मेरे गीत,अगीत, कहानियाँ कवितायें ,आदि सब उसी आदृता की स्निग्ध पहचान भर है ...जहाँ निर्मम वर्जनाओं, बाध्यताओं में भी जीवन लगातार साँस लेता रहता है ! एक व्यापक सम्पूर्ण सृजन की तलाश ! लेकिन समय के अभाव में,मुठ्ठी से रेत की तरह साल-दर-साल फिसलते रहे ! जिंदगी का प्रत्येक मुखौटा मुझे केवल डराता रहा” !

“...हर स्याह रात के बाद भोर की किरणों का साम्राज्य फैलता है. मानव मन जो आज सोचता है कल उससे इतर और बेहतर भी सोचता है, फिर कृष भी तो परिवर्तन की राह पर चल रहा था. डेढ़ दशक काफी होता है अपने संबंधों का पुनरावलोकन करने के लिए.…. मै समझती हूँ,अपने अस्तित्व का एक-एक कण भी विश्व की चीत्कार में मिला कर यदि मै कोई उसका उपकार कर सकती ,उसकी छिन्न-भिन्न देह का कोई घाव भर सकती तो ,यह जन्म सार्थक मानती”...!!

एक अनजान, पर जुझारू महिला का यह इंट्रो पढ़कर मुझे एक बहुत ही सकारात्मक सुकून मिला. मुझे माधुरी ने अपना न तो फोन नंबर दिया था, और न ही कोई ई-मेल या वास्तविक पता. मैंने कभी उसकी जरूरत समझी भी नहीं थी. कुछ रिश्तों को अनाम छोड़ देना ही हितकर होता है-- सबके लिए. और उधर, आशा की किरण धूमिल नहीं हुई थी माधुरी के लिए, यह भी संतोष था. गुलदोपहरी का फूल कहीं भी पनपता रहता है, चाहे इसे इंग्लैंड में पोर्टुका कहें या हम देसी भाषा में गुलदोपहरी, वही रहता है न यह...सतत जिजीविषा से संघर्षरत, औरों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए...चाहे जंगल का कोना हो या आपके घर के पीछे की खाली जमीन, या कोई पोर्टिको में रखा उपेक्षित सा गमलों का एक समूह, उसकी रिक्तता को बखूबी भरना, मन मोह लेना, और फिर शाम की तन्हाइयों में धीमे-धीमे शांत भाव से सिमट जाना, कल के नए जीवन के लिए, नई ऊर्जा के साथ-- बस यही इसकी नियति है.

...और मैं निश्चिंत होकर धीरे-धीरे नींद के आगोश में चला गया. वैसे भी पूरी रात ठीक से न सो पाने पर सवेरे जो नींद आती है वह बहुत स्वप्निल होती है न ?



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