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@dawriter

आप किसमें जाऐंगी, इंडियन में या वेस्टर्न में ( हास्य व्यंग्य )

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आज अशोक और मीना के लिए बहुत बड़ा दिन था, दस वर्षो बाद दोनों ने अपने सपनों का घर लिया और उसे बहुत ही सुंदर सजाया( इंटीरियर)और पाँच दिन बाद गृहप्रवेश की पूजा रखी गई। दोनों ने अपने सभी रिश्तेदारों को बुलावा भेज रखा था, दो दिन पहले सभी लोग आ गए लेकिन अशोक की बुआ जी गांव से नहीं आ पाई क्योंकि उस समय उनकी तबियत थोड़ी नासाज थी। उन्होंने अशोक की माँ से कहलवा भेजा था की वो बाद में आ जाएंगी।

अशोक बुआजी का लाडला था, बचपन में वो जब भी आती तो अशोक के लिए उसकी पसंद की चीज बना कर जरूर लाती और अशोक उसे बड़े चाव से खाता, बुआजी के हाथ की बनाई गुझिया पर तो जान देता था। बुआजी के बनाये गुझिया की तारीफ सुन मीना जल मरती। मीना बुआजी को पसंद नहीं करती थी क्योंकि जब वो शादी करके आई थी तो बुआजी जितने दिन रही उसे बस सर पर पल्लु रखवाते फिरती और बिना स्नान किये रसोई घर में घुसने नहीं देती। अशोक बुआ के न आने से दु:खी हुआ लेकिन मीना मन ही मन बहुत खुश हुई चलो अच्छा हुआ फालतू के रोक -टोक से मुक्ति मिली। मीना की सास उसे किसी बात के लिए नहीं टोकती और रोकती थी इसलिए सासू माँ से वो खुश रहती थी। खैर पूजा अच्छे से हो गई, सभी मेहमान वापस चले गए।अब धीरे - धीरे शिफ्टिंग का काम शुरू हुआ, दस दिन के अंदर लगभग सभी सामान नये घर चला गया और आज जो किचन का सामान बाकी था वो जाने वाला था। तभी दरवाजे की घंटी बजी, मीना की बेटी ने दरवाजा खोला और अनजान को देख बोली  रूकीये मैं मम्मी को बुलाती हूँ।

"तभी बुआजी ने कहा देख रमेश ये लड़की तो मोहे पहचान ही नहीं रही, आजा अंदर। इतना कहकर वो सरपट अंदर घुस गई" "अरे आप कहाँ घुसी आ रही हैं, मैंने कहा ना मैं मम्मी को बुलाती हूँ - रीया ने कहा" 'मम्मी मम्मी देखो ना ये कौन जबरदस्ती घुसे आ रहा हैं घर में - रीया चिल्लाई।

मीना, रीया की आवाज सुनकर दौड़ी आई और कहा कौ....न हैं तभी बुआजी नाक - भौ ताने खड़ी दिखी, मीना ने जल्दी से उनके पाँव छुए और बैठने को कह और दौड़ कर रूम में गई और दुपट्टा ओढ कर आई और रिया को बुआजी के पाँव छुने को कहकर, बोला - बुआजी आपने बताया क्यों नहीं की आप आ रही हैं? अशोक आपको लेने चले जाते। 

"क्या मैं मेहमान हूँ जो मैं तुझे बता के आउंगी और मैं अशोक को क्यूँ तकलीफ़ दूँ, बेचारा सारा दिन तो काम करता हैं। इसलिए मैं रमेश के साथ चली आई, क्या बस अब तू सवाल ही करती रहेगी की पानी भी पिलायेगी? - बुआजी ने कहा" 'साँरी बुआजी अभी ला..,(मीना की बात बीच में काटते हुए )- सुन बहु मुझसे तो तू अंग्रेजी में तो खिट - पिट करना भी मत'। ज जी जी- मीना ने कहा और चाय बनाने चली गई। किचन में चाय बनाते हुए मीना बड़बड़ाते हुए बोली - हे भगवान! इन्हें अभी आना था, पता नहीं कितने दिन रहेंगी, मैं तो गई काम से। अब चौबीस घंटे इनके नखरे सहो।तभी रिया किचन में आई और पूछा - मम्मी ये कौन हैं? मुझसे पूछ रही थी की ये मर्दाना कपड़े क्यो पहने हैं? ये तेरे पापा की बुआजी कम मुसीबत हैं और ये ऐसे ही नाँनसैन्स सवाल करती हैं। मम्मा मैं समझ गई ये सीरियल में जो विलेन होती हैं उसी टाइप की हैं, हाँ बेटा जो सबका जीना मुश्किल कर देती हैं - इतना कह दोनों हसँने लगी।

खैर चाय नाश्ता हुआ, शाम को अशोक आया और बुआजी को देख फूले न समाया और उसकी पसंद की गुझियां निकाल कर दी। रात का खाना - पीना हुआ और अशोक ने बुआजी से कहा कल हम फाईनल अपने घर में शिफ्ट हो जायेंगे। बुआजी और अशोक ने देर रात बातें की, फिर सोये। सुबह होने पर बुआजी को शौच जाना था तो मीना ने कहा रिया बुआजी को शौचालय बता दो तो रिया ने उत्सुकतावश पूछा -बुआ दादी आप इंडियन में जाएंगी की वेस्टर्न में?

 हेय जे का होता हैं बिटिया, हमें तो शौच जाना हैं, अरे मैं भी तो वही पूछ रही हूँ की आप को किसमें कंफर्टेबल महसूस होता हैं, मेरा मतलब हैं की आपको घुटनों में पेन रहता होगा ना , हाँ रहता तो हैं - बुआजी ने कहा फिर तो आपके लिए वेस्टर्न ही सही रहेगा। आप इसमें चले जाइए , इतना कह कर रिया वहां से चली गई। बुआ जी जब अंदर गई तो उन्हें कुछ समझ नहीं आया. 

अरे बहु सुन जरा। जी आई बुआजी, क्या हुआ अरे रिया मुझे यहां शौच के लिए ले आई , यहाँ तो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, शौच ऐसा कहाँ होता हैं। मीना ने बुआजी को इंडियन वाले शौचालय बता दिया। मीना नाश्ता बनाने चली गई और शाम को जो बाकि घर का सामान था , उसे लेकर सब नये घर में चले गये। मीना किचन का सारा सामान किचन में लगाने लगी, लागातार दस दिन से शिफ्टिंग का काम, सामान पैक कर फिर पुराने घर से नये घर में लाकर, उसे सही जगह लगाना। इस सबमें मीना और परिवार वाले को थकावट रहती थी। ज्यादातर खाना बाहर से मँगवा लेते थे। 

आज जब अचानक बूआजी आ गई तो मीना की तो शामत आ गई थी, बुआजी ने साफ कह दिया था की मैं तो बाहर का नहीं खाती मेरे लिए तो कुछ बना ही लो बहु, न चाहते हुए भी मीना ने बुआजी के लिए खाना बनाया। रिया और मीना का आज चाइनीज खाने का मन था तो अशोक ने चाइनीज और अपने लिए पराठे आँडर कर दिए। बुआजी जी के लिए मीना ने रोटी और सब्जी बनाया था क्योंकि बुआजी सादा खाना पसंद करती थी और अपने स्वास्थ्य को लेकर काफी सजग रहती थी। 

बुआजी को मीना ने खाना दे दिया और जबतक बुआजी ने खाना खतम किया, आँडर किया हुआ खाना भी आ गया तो मीना, रिया और अशोक खाना खाने बैठ गये।" यही सब खिलाओ बेटी को और खुद भी खाओ, इस खाने से मजबूती नहीं आएगी। हमें देखो हमारी हड्डियां कितनी मजबूत है, हमारी उम्र में क्या होगा तुम्हारा" तभी अशोक भी चुटकी लेते हुए बोला - देखो न बूआ मुझे भी यही सब खिलाकर कमजोर बनाया जा रहा हैं। आजकल की बहुए ऐसी ही होती हैं, काम करना पड़े तो सौ घड़े पानी गिर जाता हैं इन पर, हमारे समय की बात ही कुछ और थी - इतना कह सोने चली गई।

भूचाल तो तब आया जब सुबह बुआजी को शौच जाना था, सुबह - सुबह पाँच बजे बूआजी उठी, भगवान का नाम लिया और माला फेरा और फिर मीना को आवाज लगाया - अरे बहू एक कप चाय बना दे। इतना कहते हुए सोफा पर आकर बैठ गई। मीना आँख मीचते हुए आई, चाय चढा दिया और मन ही मन बुदबुदाने लगी , महीने भर से भाग -दौड़ करके इतनी थकान हो गई थी, "सोचा कम से कम शिफ्ट होने के बाद सुबह आराम से उठुंगी लेकिन किसे पता था की मेरे कुंडली में शनि प्रवेश करने वाला हैं"।

बुआजी चाय पीकर शौच जाने लगी, बहु मैं किसमें शौच जाऊ बता दे नहीं तो फिर उसी में चली जाउंगी। इतना सुनते ही मीना हड़बड़ा गई, अरे मुझे तो ध्यान ही नहीं था की बुआजी तो इंडियन में जाती हैं लेकिन यहाँ तो दोनों वेस्टर्न टाँयलेट हैं - मीना बड़बड़ाई। बुआजी इस फ्लैट में तो दोनों ही वेस्टर्न टाँयलेट हैं, आपको इसी में जाना पड़ेगा।

"यहां महानगरों में आजकल वेस्टर्न ही शौचालय बनता हैं, लेकिन पुराने घर में तो ऐसा नहीं था। हाँ बुआजी क्योंकि वो अपार्टमेंट बहुत पहले का बना हुआ था। अभी तो बिल्डर इंडियन का आँपशन ही नहीं देता, आपकी उम्र वालो के लिए ये सही होता हैं, इस पर आप आराम से बैठ सकती हैं -मीना ने समझाया"

हे राम अब यहीं बाकी रह गया था, मैं दिन भर माला फेरती हूँ, शाम को दिया जलाती हूँ , इस पर बैठ कर तो मैं अशुद्ध हो जाउंगी। मैं इस पर शौच नहीं कर पाउंगी। मुझे पुराने घर ले चलो, अभी तो पन्द्रह दिन तक तो पुराने घर की चाबी तो तुमलोगों के ही पास हैं ना।

फिर क्या था बुआजी को रोज नये घर पुराने घर शौच ले जाने का सिलसिला चलने लगा, उनके कारण अशोक को भी सुबह -सुबह उठना पड़ने लगा। पेशाब तो गुशलखाने में कर लेती थी लेकिन शौच नहीं। 

रोज - रोज सर पे पल्लू रखवाना, हर बात में रोकना - टोकना बस यही सब चलने लगा। बेचारे पति -पत्नी और रिया पन्द्रह दिनों में पक गए। आज बुआजी जा रही थी सामान पैक हो गया, रास्ते के लिए मीना ने रोटी सब्जी पैक कर दी। आज मन ही मन सब खुश थे। घर से निकलते ही बुआजी रिया को पकड़कर रोने लगी और बोली - मोहे जाने का मन तो नहीं हो रहा पर क्या करू तुमलोग ने तो ऐसा कर दिया की चाह कर भी रूक न सकू, न जाने अब कब मिलना हो। अशोक ने कहा अरे हम गाँव आ जाऐंगे आप से मिलने, आप चिंता न करें। सबको आशिर्वाद देकर बुआजी को लेकर अशोक स्टेशन के लिए रवाना हो गए..।

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"प्रगति त्रिपाठी"



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