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@dawriter

अनजान मुसाफ़िर

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"अनजान मुसाफिर"-भाग-1

कितनी हसीन शाम थी, वही हल्की गुलाबी शाम जो ऋषभ को बहुत पसंद थी। मगर क्यों उदास सा था। क्यूं सब कुछ था। मगर उसको किसी की कमी खल रही थी। कही ये रेवती की कमी तो नहीं। क्यूं उसने उस वक्त रेवती का साथ नहीं दिया। आज भी याद आती है। वो लड़की जिसने कितनी खुशियां दी थी। मगर एक हादसे से दोनों की ज़िंदगी मे जो तूफान आया।ऋषभ जब भी याद करता है वो दिन तो उसकी आँखों मे सिर्फ दर्द और तकलीफ ही होती है। मगर ये हादसा रेवती को उससे बहुत दूर ले गया। लोग कहते है नसीब का लिखा कोई नहीं जानता। काश वो इस नसीब को कैद कर सकता। ऋषभ खो गया उन पुराने दिनों में। कैसे मिली वो लड़की। जिसे हम ऋषभ की ज़िंदगी भी कह सकते हैं।

- तुम्हारी गली की पहली शाम-

शर्मा जी की दो बेटियां और एक बेटा। जिसमें रेवती बड़ी थी। बहुत लाड़ प्यार दिया था शर्मा जी ने। कितनी नटखट थी बचपन से ही। जब जन्म हुआ था उसका तो शर्मा जी ने पूरे मोहल्ले में लड्ड़ू बंटवाए थे। आखिर उनके घर लक्ष्मी जो आयी थी। माँ तो बहुत प्यार करती ही थी। पूरे घर की रानीबिटिया थी। उसके आने से घर मे रौनक आ गयी थी। पूरे मोहल्ले के लोग भी बहुत चाहते थे।

अभी वो पाँच साल की हुई कि। फिर शर्मा जी के यहाँ एक बेटी ने जन्म लिया। मगर माँ बाप के लिए संतान चाहे लड़का हो या लड़की प्यार तो बराबर ही करेंगे।
समय बीत रहा था। दोनो बेटियां अच्छे स्कूल में पढ़ने जाती। शर्मा जी अच्छे पद पर थे। तो घर मे सम्पन्नता थी। मगर रमा के मन मे हमेशा एक पुत्र की इच्छा थी। उनको यही लगता कि बेटियां तो एक दिन छोड़ कर ससुराल चली जायेगी फिर उनका ख्याल कौन रखेगा।शर्मा जी उनको समझाते।मगर चाहें लाख सोच बदले मगर अगर औरतो के मन की कोई ना जाने।

समय ने करवट ली। और शर्मा जी के घर एक बेटे का जन्म हुआ। अब कोई दुख नही था रमा को।

रेवती भी अब थोड़ी बड़ी हो गयी थी। अपने भाई बहन काजल और संदीप दोनो से रेवती बहुत सुंदर थी। माँ तो डर भी जाती कि कल को कोई ऊंच नीच ना हो जाये। शर्मा जी उनको अपने संस्कारो पर भरोसा करने को बोल देते। मगर ये पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता एक बेटी के बाप को भी डरा देता। अखबार में छपती रोज की खबरों से डरते कि पता नहीं इस समाज को क्या हो गया है। रेवती अब कॉलेज से निकलकर यूनिवर्सिटी में आ गयी थी। २१ बर्ष की नवयुवती रेवती की सुंदरता को चार चांद लग गए थे। उसी गली में विष्णु श्रीवास्तव जी ........

क्रमशः

-अनजान मुसाफ़िर-भाग 2 तुम्हारी गली की पहली शाम-

विष्णु श्रीवास्तव जी के दो बच्चे थे। ऋषभ और ऋतु थेे। और पत्नी से शर्मिला जो की खुद टीचर थी। बहुत ही सज्जन थे विष्णु जी। धीरे-धीरे रेवती और ऋषभ के परिवार वालों का आपस मे मिलना जुलना हो गया। या यूँ कहो कि किस्मत दोनो को पास ला रही थी। और दोनों एक ही कॉलेज में ही पढ़ते थे। रेवती बी. कॉम की स्टूडेंट थी और ऋषभ बी.एस .सी कर रहा था। धीरे-धीरे दोनो दोस्त भी बन गये। मोहल्ले की औरतें जो कि अपने पतिदेव के ऑफिस जाने के बाद फ्री होती हैं। तो उनको या सास बहू के सीरियल देखने है। या फिर मोहल्ले के किसी घर पर नज़र रखना।लगता तो यही है कि भगवान ने इनको जासूस बना कर भेजा हो।

खैर कहानी को आगे बढ़ाते हैं। रेवती अपनी बालकनी से बारिश का मजा ले रही थी। उधर ऋषभ भी खड़ा था। उसको ये अंदाजा बिल्कुल ना था कि ये जो सामने खड़ी हुई लड़की कभी उसके लिए ज़िन्दगी बन जाएगी। दोनो ने एक दूसरे को देखा। सुंदरता के साथ साथ सादगी भी थी रेवती में।

रेवती रेवती माँ ने आवाज दी। नीचे आने को बोला। मगर न जाने जाने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। बस देखती रही उस"अनजान " को।

"तुझे देखूँ और वक़्त थम जाये बस देखती
रहूँ सारी उम्र और ये ज़िन्दगी का सफर तुम्हारे साथ ही खत्म हो जाये"।।

कब से तुझे आवाज दे रही हूँ। कहाँ थी? माँ तुम भी ना माँ जब मैं कभी नज़र न आई तब क्या करोगी! रेवती के मुंह से ये बात सुनकर रमा जी की आंखों में आंसू आ गये।तुम नहीं होगी तो हम भी नहीं होंगे। क्यूँ माँ!?रेवती ने सवाल किया?

रमा-अरे पगली हम क्या अमृत पी कर आये है। जो तू हमसे पहले जाएगी। अभी तो तेरी शादी और फिर काजल संदीप की शादी और फिर नाती पोते भी देखने है। बात को टालते हुए रमा जी ने अपने आंसुओं को छिपा कर बोली कि तुम तो मेरी सबसे लाडली बेटी हो। और आज कालेज नहीं जाना।

रेवती-माँ बारिश तो देखो कितनी तेज हो रही है। और मैं लेट हो जाऊँगी।हम्म माँ काम मे व्यस्त थी। अचानक से डोरबेल बजी। रेवती ने दरवाजा खोला सामने ऋषभ की माँ शर्मिला जी थी।जी आंटी अंदर आइये।रेवती ने उनसे आने को बोला।रमा जी किचन से बाहर आई।
रमा- आइये आप शायद अभी अभी आयी हमारे मोहल्ले में।ज्यादा नही मगर रेवती के पापा ने आप लोगो के बारे में बताया था।

शर्मिला-जी भाईसाहब जी आये थे। एक बार हमारे घर।बहुत ही मजाकिया है बहुत अच्छा लगा। बहुत दिन से आप लोगों से मिलने इच्छा थी।
रमा-जी बहुत अच्छा किया।दिन भर घर मे रहकर बोर हो जाती हूं।ये भी ऑफिस चले जाते है। बच्चे भी कॉलेज चले जाते हैं।

शर्मिला - जी मैंने भी अभी कुछ दिन पहले ही रिटायर हुई हूं। पहले कभी फुर्सत ही नहीं मिलती थी कि कही भी जाऊं मगर अब तो पूरे दिन घर मे रहकर लगता है कि ज़िन्दगी जैसे घर मे ही कैद हो गयी है।
रमा-जी बिल्कुल !और घर मे कौन कौन है।
शर्मिला-2 बच्चे है ऋषभ जो कि अभी बी.एस.सी.कर रहा है और बेटी ऋतु जो कि इंटरमीडिएट में है। और श्रीवास्तव जी पी. डव्लू. डी. में अभियंता है। बस यही है छोटी सी फैमिली।
आप बताओ?

क्रमशः

(अनजान मुसाफ़िर-भाग 3 तुम्हारी गली की वो शाम)

रमा और शर्मिला की बात चीत का सिलसिला शुरू हो गया। उधर रेवती भी कॉलेज के लिए निकल गई। बारिश बहुत तेज हो रही थी। रेवती को बारिश बहुत पसंद थी। न जाने क्यूँ जब भी ये मौसम होता वो बहुत खुश हो जाती। बचपन से ही उसको बारिश में भीगना पसंद था।

लेकिन रेवती को ये खबर ही नहीं थी कि एक दिन यही बारिश उसकी जिंदगी बदल देगी।

"कुछ बरसात भी हमे भीगो रही थी
और कुछ तेरी मोहब्बत भी हमे भीगो
रही थी।।

प्यार का सिलसिला शायद शुरू हो गया था। ऋषभ कॉलेज में दाखिल हुआ। ये कालेज और वह का माहौल उसके लिए नया था।मगर अपने खुशमिजाज स्वभाव ने उसको सबका चहेता बना दिया। कालेज की हर लड़की ऋषभ से दोस्ती करना चाहती।मगर ऋषभ उन लड़कों जैसे बिल्कुल न था। न जाने अजीब सा अपनापन था ऋषभ में ये महसूस किया रेवती ने। हर रोज आमना सामना होता ऋषभ और रेवती का।

रेवती क्लास अटेंडें करके ऑटो का इंतजार कर रही थी। बारिश के मौसम की वजह से कोई ऑटो भी नहीं मिल रहा था। घर जाने की जल्दी थी रेवती को। रेवती की एक सहेली भी खड़ी थी रेवती के साथ। दोनो बातो में मशगूल थी।अचानक से ऋषभ को देख कर दोनों चुप हो गयी है।
ऋषभ- हेलो ! आप मेरे साथ चल सकती है।
रेवती ने ऋषभ को देखा और बोली ' नो थैंक्स!
अरे शायद आप मुझे जानती नहीं। मगर मैं आपको अच्छे से जानता हूँ आप शर्मा अंकल की बेटी हो ना।
रेवती- जी! आज सुबह देखा था मैंने आपको बालकनी में।आप हमारे मोहल्ले में रहते हो ना।वैसे कभी देखा नहीं।
ऋषभ-जी मैं शर्मिला जी का बेटा हूँ।वो मेरी मॉम है। श्रीवास्तव जी मेरे पापा है।एक छोटी बहन है।
बस कुछ दिन पहले ही शिफ्ट हुए है हम लोग।
रेवती-हम्म! मिली थी आंटी जी ।मगर ज्यादा बात नहीं हो सकी।
बातो बातो में भूल ही गयी ।घर भी जाना है यार।माँ बहुत जल्दी परेशान हो जाती है।अगर देर से पहुँची तो गुस्सा करती हैं।
ऋषभ-चलो ! छोड़ देता हूँ घर । आमने सामने ही तो रहते है हम लोग।
रेवती-अभी नये हो ।मोहल्ले के लोगो को नहीं जानते कितने शरीफ है सब। लेकिन किसी की लड़कियों और बहुओं पर फब्तियां कसना कोई उन लोगों से सीखे।
रेवती-खैर! आप का बहुत बहुत धन्यवाद ! आपने मेरे लिये इतना सोचा।
ऋषभ-जैसी आपकी मर्जी!और बाइक से घर की तरफ निकल गया।
अब रोज रोज का सिलसिला शुरू हो गया। रोज बालकनी पर आना रेवती को देखना ऋषभ को बहुत अच्छा लगता। मगर डर भी था। वो सिर्फ यही की कभी भी जमाने ने सच्ची मोहब्बत को तरजीह नहीं दी। बस यही सोचकर कभी भी किसी से प्यार नहीं किया था। मगर न जाने क्या जादू था।उस लड़की में की कुछ भी अच्छा नहीं लगता जब तक उससे मुलाकात न हो जाती।

" नज़रो को बस तेरा दीदार चाहिये
कुछ नहीं चाहिये मुझे बस जी भर के
देखने की इजाजत चाहिये।।

शाम को घूमने जाते समय वो हर रोज रेवती के मकान के सामने से ही गुजरता। और एक बार उसके घर की तरफ देखता जरूर ये सोचकर कि क्या पता कब वो दिख जाए। हद से ज्यादा किसी को चाहना भी अच्छा नहीं होता।।

क्रमशः

अनजान मुसाफ़िर भाग-4

**💐 मोहब्बत की वो शाम और तुम**💐

अरे क्या है ! क्या पागलपन है। कोई देख लेगा बस इसीलिये मैं इस प्यार व्यार के चक्कर मे नहीं पड़ती हूं यार
ऋषभ- मोहतरमा आज ये गुलाब ले लो वरना ज़िन्दगी भर इंतजार करोगी फिर भी मेरे जैसा हैंडसम बॉय नहीं मिलेगा।
" हैंडसम और आप। हाहाहा आप भी न मस्त जोक्स करते हो। रेवती ने ऋषभ से बोला।
ऋषभ-रियली मैं हैंडसम नहीं हूँ। पता नहीं मुझे उस दिन क्यों लगा कि कोई परी सी लड़की मुझे देख रही हैं।
" मैं कब देख रही थी तुम्हे??

मैंने कब बोला कि आप मुझे देख रही थी। बनावटी हँसी में बोला ऋषभ! बहुत देर तक रेवती ऋषभ को देखती रही ये सोचकर कि कहाँ है वो असली चाहत जो शायद वो ऋषभ की आंखों में ढूंढ रही थी।

" यार सच्ची तुम मेरी बात नहीं कर रहे थे। और देखो मेरी इन आँखों मे फिर कहो।

हाँ यार वो कोई और ही थी। जिसकी नीली आंखों में ये पागल ऋषभ खोने की कोशिश कर रहा था। उदास सा जाने की कोशिश कर रहा था।
अब चलता हूँ और पता नही कब मिलेगी वो लड़की जो सिर्फ इस ऋषभ के लिये बनी होगी।

"अगर मिल कर भी नही मिल पाई कभी तो! रेवती बोली।

"तो ????फिर बहुत काम है मुझे इतनी फुर्सत नहीं है इस बंदे के पास! एक हल्की सी मजाकिया हंसी लाते हुऐ ऋषभ बोला!
रेवती-सच !और अगर वो लड़की मिल जाये अभी तो?फिर भी टाइम नहीं होगा जनाब को।
"सोचेगे सोचेगे (हसंते हुए)ऋषभ बोला।रेवती को देख रहा था वो ।क्या हुआ मोहतरमा आप तो मजाक कर रही हो ना।
रेवती-नहीं! वो लड़की मैं ही हूँ!
हाँ मैंने देखा था तुम्हे। बहुत अच्छे लगते हो तुम मुझे।
मगर????????

मगर क्या रेवती ???? बोलो न यार वैसे भी यार बहुत परेशान कर चुकी हो मुझे!
"मैंने क्या किया ऋषभ?

"क्या किया है ऋषभ बोला रातों को ख्वाबो में आके सोने भी नहीं देती। और तो और कॉलेज में मन नहीं लगता बस दिल करता है बस देखता ही रहूं तुमको। तुम्हारे चक्कर मे ये पढ़ाकू ऋषभ किताबो को छोड़ कर सिर्फ मिस रेवती को देखते है पापा को पता चला तो घर से दूर कही भेज देंगे।कैसे रोका है मैंने मैं ही जानता हूँ।सिर्फ तुम्हारी वजह से नहीं गया अमेरिका वरना आज वहाँ होता किसी अंग्रेजन के साथ होता।

रेवती-( गुस्से मे)- मैंने कब रोका तुम्हे यहाँ. और रही बात जाने की तो कही भी रहो तुम।मगर जब भी दिल धड़केगा मेरा तो वो हर धड़कन सिर्फ तुम्हारे लिए ही होगी। आई लव यू। इंतजार करुँगी यही शाम को कल भी।

क्रमशः

( अनजान मुसाफ़िर भाग -5)


-💐ढलती शाम और इतंजार-💐

सॉरी जान यार घर से निकलने से पहले कितने बहाने करने होते है तुम क्या जानो लड़को हो पूरा फायदा मिलता है लड़को को ।न कोई रोकटोक न कोई बहाना।यार भगवान ने सारी की सारी मुसीबते लड़कियो को क्यों दी यार।

पता है आज कल मम्मी न्यूज़ पेपर खुद तो पढ़ती है और न्यूज़रिपोर्टर बनके बाकी पड़ोस वाली आंटियों को भी सुनाती है कि फलां जगह ये रेप केस हुआ।लड़कियों पर बहुत ध्यान रखना चाहिये। यार पता नही क्या होता चला जा रहा है जमाने को कोई मुझे मेरी जान से ही नहीं मिलने दे रहा है भला बताओ ये कोई बात हुई।

ऋषभ जानबूझ कर नाटक कर रहा था। रेवती को परेशान करने के लिए वो ऐसे ही झूठ मुठ गुस्सा होने का बहाना कर रहा था।
"यार प्लीज़ मान जाओ? तुम तो मम्मी से मिल चुके हो सब जानते हो फिर भी। रेवती रुआंसी होकर बोली। ठीक नहीं बोलोगे अपनी एंजेल से
जा रही हूं कितने बहाने से आई थी मगर किसी को मेरी कोई परवाह नही है।
" हाँ यार सही बोला कोई परवाह ही नहीं है हल्की सी मुस्कुराहट चेहरे पर थी ऋषभ के।
फिर क्या करेगी ये बेचारी रेवती !
रेवती- फिर सोच रही हूँ मैं घर ही वापिस चली जाऊं हाँ नहीं तो।क्यों परेशान कर रहे थे।ऐसे परेशान किया तो बहुत दूर चली जाऊंगी बस।
ऋषभ- मुझे छोड़ कर जा पाओगी ।बोलो
रेवती नज़रे चुराते हुए बोली और क्या जाने में क्या है।मगर जाऊंगी नहीं (हँसते हुए)।
फिर गले तो लगो इस खुशी में ऋषभ ने बोला रेवती को।
दोनो गले लग गए।रेवती की आंखों में आंसू थे। ऋषभ ने देखा तो पूछा -अरे एंजेल क्यों रो रही है अब मेरी.

रेवती-यार कभी कभी लगता है कि क्या कभी मिल पाएंगे हम।
ऋषभ- भरोसा है ना प्यार पे।फिर क्यों ऐसे डरा देती हो मुझे।यार डरता हूं कि कही ये मुसाफ़िर कल को अनजान न बन जाये इस सफर को पूरा कर पाऊं यार ।वरना मैं जी नहीं पाऊंगा तुम्हारे बिना।
"मैं भी नहीं जी सकती तुम्हारे बिना कभी मुझसे दूर मत जाना. और अगर जाना तो ये जान भी अपने साथ ले जाना क्योंकि तुम्हारे बिना कुछ भी अच्छा नही लगता है यार।

तुम्हारे बिना जीकर खुद को कोई सजा नही देना चाहती न ही किसी और को भी।
समंदर की लहरों के शोर में रेवती के वो शब्द ऋषभ को अंदर तक महसूस हुए। लगा कि अचानक से शून्य सा लगने लगा सब।

"ऋषभ हमे वो लहरे नही बनना जो समंदर के किनारे को छू तो सकती है मगर मिल नहीं सकती। तुम हो न मेरे साथ? ऋषभ चुप था। उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था। प्यार तो था उसको रेवती से मगर अभी वो नहीं चाहता था कि किसी को भी इस बारे में पता चले। अभी नहीं उठा सकता था वो इस रिश्ते की जिम्मेदारियां। अभी उसको बहुत कुछ करना था। अपनी लाइफ के कुछ सपने जो वो हर पल देखता था। रेवती तो उसका ख्वाब थी ही नहीं।
रेवती तो बस भावनाओ में बही जा रही थी। लेकिन गलत दोनो नहीं थे। हालत ही कुछ ऐसे थे।

ऋषभ ने संभाला खुद को। पागल लड़की कौन जा रहा है किससे दूर। मैं तो अपनी रेवती के दिल मे रहता हूँ कभी नहीं जाऊंगा। बात को टालने के लिए उसने रेवती को बोला ऐसा। नहीं जाऊँगा यार।

अनजान मुसाफ़िर-भाग-6 (वो मनहूस शाम)

ज़िन्दगी का हर पल जी रहे थे रेवती और ऋषभ। वक़्त भी उनके साथ था। रेवती तो खुद को बड़ा खुशनसीब समझ रही थी। अब बस पढ़ायी कंप्लीट होने के बाद जॉब फिर दोनों शादी कर के सेटल होने की बाते करते। और दोनों का प्यार भी परवान चढ़ रहा था।रेवती की दुनिया बस ऋषभ ही था।कभी कभी इतनी चाहत देख कर ऋषभ डर भी जाता कि अगर कल को उसको मजबूरी में रेवती से दूर जाना पड़ा तो क्या होगा। कही कल को ये हद से ज्यादा प्यार रेवती को तबाह न कर दे।मगर रेवती हमेशा ऋषभ को डाँट देती।

'बहुत जल्दी आ गये आज कॉलेज से,हमे तो लगा कही उस दोस्त के घर ही न रुकना पड़े तुमको। श्रीवास्तव जी ने पता नहीं क्यों आज ऋषभ से ऐसेे बात की।
"पापा वो नोट्स चाहिये थे।तो बस यही वजह है लेट होने की। सॉरी अब अगली बार ध्यान रखूंगा।

श्रीवास्तव जी-हां क्योंकि अब इसके बाद मौका ही नहीं मिलेगा।आज तुम्हारे दिल्ली वाले चाचा से बात हुई है अमेरिका शिफ्ट हो रहे हों।शर्मिला ने बताया नही।
क्या????मगर पापा मैंने बोला तो था। अभी मुझे कही नहीं जाना। मुझे यही रहकर तैयारी करनी है आगे की पढ़ायी के लिये। चाचा जी को
मना कर दीजिये।

"तुम्हारी मर्जी बहुत हो चुकी। यहाँ आये अभी बस कुछ दिन ही हुऐ है,सब तमीज भूल गये तुम। यही संस्कार है मेरे। मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि तुम यहाँ और रुको,ये तो भला हो तुम्हारी शोभा मौसी का, जो उस दिन उन्होंने तुम्हे और उस शर्मा की बेटी क्या नाम है हाँ रेवती के साथ देख लिया। उन्होंने बताया हमे कि तुम दोनों रोज समंदर के किनारे घंटो बैठे बाते करते हो। क्या यही दिन दिखाने के लिये हमने तुम्हे इतना बड़ा किया।

ऋषभ-पापा आप जासूसी कर रहे थे हमारी। दुख इस बात का नहीं है कि आपको सब पता चल गया।दुःख सिर्फ ये है कि आपको एक बाहर वाले पर भरोसा था। अपने बेटे पर नहीं। एक बार पूछ लेते तो शायद ठीक रहता, खैर जब जान ही गये है तो बस इतना कहना चाहता हूं कि मैं रेवती को छोड़कर कही नहीं जाऊँगा।
"ओह्ह ! बहुत सही बेटा(गुस्सा में)शर्मिला??(तेज आवाज में)
"जी बोलिये! शर्मिला जी ने श्रीवास्तव जी से बोला।
"आप अपने लाड़ले से बोल दे कि मेरी बात घनश्याम से हो चुकी है उसने सब इंतजाम कर दिया है। परसो की फ्लाइट है अमेरिका तो जाना ही होगा। मैं अपनी बदनामी नहीं करा पाऊंगा। समाज मे कितनी इज्जत है मेरी। मैं घर त्याग दूंगा अगर ये महाशय नहीं गये तो!
"पापा मुझे इस घर से तो दूर कर देंगे। आप ये सब इसीलिये कर रहे हैं ताकि मैं रेवती से दूर हो जाऊं। तो वो कभी नहीं हो सकता! और मैं कही भी रहूंगा तब भी वो मेरी यादों में रहेगी। मैं कभी नहीं भूल सकता उसको।

'मां मैं पैकिंग करने जा रहूँ हूँ। सब कुछ ले जाऊंगा यहाँ से कुछ छूट न जाये। और हाँ मां कभी लौटकर नहीं आऊँगा यहाँ।
"बेटे ऐसे नहीं बोलते! बस कुछ सालों के बाद। तुम यहाँ फिर से आ जाना।
ऋषभ- माँ!बस मेरी रेवती का ख्याल रखना बहुत नादान है। उसको पता चल गया तो रो रोकर मुझे रोकने की कोशिश करेगी। मैं नहीं चाहता कि मैं आपको और पापा को अलग होना पड़े। बस एक चिट्ठी मेरी रेवती को दे देना।और उसका ख्याल रखना। बहुत प्यार करती है मुझसे।
(रुआंसा होके)और माँ आपकी बहुत याद आएगी।
'मुझे भी बहुत याद आएंगी मेरा रिशु(गले लगाकर )रोते नहीं मैं समझाने की कोशिश करुँगी रेवती को।

"हम्म!अच्छा माँ पैकिंग के बाद थोड़ा आराम कर लूं।फिर मुझे जगा देना।
शर्मिला जी के जाने के बाद ऋषभ की आंखों से आंसू बहने लगे। क्या सोचा था उसने और क्या हुआ ये। क्या उसकी और रेवती का साथ बस इतना ही था। क्यूँ दिल लगाया उसने एक नादान सी चंचल सी लड़की जो दुनिया समाज से बेखबर सिर्फ उसमे ही खोती गयी।आज मैं उसको बिना बताये जा रहूँ हूं। क्या से सही है ये??

बीते लम्हो को याद करते करते कब आंख लग गयी पता ही नहीं चला ऋषभ को। आज की रात बहुत भारी लग रही थी। रह रहकर रेवती की आंखे और उसका चेहरा सामने आ रहा था। खुद को बेहद ही मजबूर समझ रहा था।
आज इस ज़िन्दगी के सफर में वो रेवती को अकेले छोड़कर जा रहा था बहुत दूर।

"कभी हँसते थे साथ,आंखे भी भीगती कभी
और कभी दिल मे होता उदास मगर, तब तो हम दोनों थे साथ"💐

'बेटा सब चेक कर लो कुछ रह तो नहीं गया। शर्मिला जी ने ऋषभ को बोला।
ऋषभ- नहीं माँ सब रख लिया। कुछ नहीं रह गया अगर धोखे से भी छूट जाए तो मेरी अमानत समझ कर हिफाजत से रखना।
'बेटा अपना ख्याल रखना।
"बस जीने की कोशिश करूंगा।जो ख़यालो में है बस उसका ख्याल रखना भगवान।

टैक्सी आ गयी थी सामान रख चुका था सब। शर्मिला जी अपने आसूं छिपाने की कोशिश कर रही थी कि कही उनको रोता देख ऋषभ कमजोर न पड़ जाये।श्रीवास्तव जी साथ जाना चाहते थे स्टेशन तक मगर ऋषभ ने मना कर दिया। जैसे ही उसकी टैक्सी रेवती के घर के पास पहुँची। ऋषभ ने मुँह छिपा लिया मगर पता नहीं रेवती ने कैसे देख लिया। उसको जाते हुए। उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने सोचा कि वहम है उसका मगर जब उसकी एक सहेली ने बताया कि अरे वो ऋषभ ही था जो ठीक ऋषभ के घर के पास रहती थी। ये सुनकर रेवती की आंखों से आंसू बहने लगे। वो तुरन्त ही श्रीवास्तव जी के घर गयी।

शर्मिला जी ने दरवाजा खोला-आंटी नमस्ते! जी कुछ नोट्स चाहिये क्या ऋषभ है घर मे।
शर्मिला जी समझ गयी कि ये बहाने से आई है।
"बेटा मैं सब कुछ जानती हूं तुम दोनो के बारे में।और जो हुआ उसको भूल जाओ और ऋषभ बहुत दूर जा चुका है तुमसे। उसको कोई प्यार नहीं था तुमसे होता तो क्या जाने वाली बात छुपता तुमसे।
'नहीं ये सब झुठ है मेरा ऋषभ मुझे छोड़कर जा ही नहीं सकता। मैं रोकूँगी उसको जाने से। ट्रेन किस टाइम है उसकी
'वो तो निकल चुका है और अब कोई फायदा नहीं है।तुम घर लौट जाओ।
नहीं ??????? मैं कुछ सवालों के जबाब लिए बिना उसको नहीं जाने दूँगी।

'तुम दोनों की ज़िद है जो करना है करो।बस यहाँ से जाओ। ऐसा बोलकर रोने लगी शर्मिला जी।

एनाउंसमेंट हो चुका था। दिल्ली जाने वाली ट्रेन आ चुकी थी स्टेशन पर। ऋषभ के कदम उसको जाने से रोक रहे थे।मगर पापा की वो एक ज़िद जिसकी वजह से उसने रेवती तक को कुछ नहीं बताया जाने के बारे में। ट्रेन में बैठ गया वो। बस पाँच मिनट बाकी थे आज उसको अपने शहर में रुकने के। ट्रेन चल पड़ी।
रेवती लेट हो गई आने में। ऋषभ जा चुका था उससे बहुत दूर। बस नज़र आ रही थी ट्रेन फिर वो भी नज़रो से ओझल हो गयी।

"आज से रेवती का नया सफर शुरू हो गया था।"

"ओझल हो गयी वो शाम जो तेरे साथ गुजारी थी
आज वो आखरी शाम बहुत याद आ रही है मुझे।।

(जल्द ही नया भाग लेकर आउंगी दोस्तो)
क्रमशः
"उपासना पाण्डेय(आकांक्षा)

(मेरी समस्त रचनाये शायरी कॉपीराइट के अंतर्गत है, अतः उनको चुराने और कॉपी करने की भूल न करे।
ये कहानी मेरी कलम के अंर्तगत उपासना पाण्डेय 15-10-2017 कॉपीराइट के अंतर्गत है।)



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