Abhidha Mishra Sharma

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उम्मीदों की कश्ती- अंतिम भाग

बहुत दूर तक साथ चलते-चलते अब वक़्त हो चला था कि घर की ओर जाया जाए। अपनी आँखों में उदासी के घने बादल लिए हम दोनों अपने-अपने कमरे में पहुँच गए।अलख रसोई में जाकर आज खुद अपने हाथों से पकोड़े और अदरक वाली चाय बना रही थी मेरे लिए।

उम्मीदों की कश्ती-७

बर्फीले तूफ़ान के गुज़रते ही हमने अपनी चढ़ाई शुरू की। अब धीरे-धीरे जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे हमें ऑक्सीजन की कमी महसूस रही थी परन्तु अलख में पता नहीं कहाँ से एक नयी ऊर्जा का संचार हो गया था

उम्मीदों की कश्ती-६

अगली सुबह से हम लोग अलख के अंडर ट्रेनिंग में थे। कर्नल साहब आर्मी में थे और मैं खुद भी एक बार एवरेस्ट की आधी चढ़ाई चढ़ चुका था इसलिए हमें कोई परेशानी नहीं होती। अलख के नए पैरों की वजह से उसे पहले छोटे-छोटे रास्तों पर ट्रैकिंग करवानी थी जिससे उसके पैरों को पहाड़ी रास्तों की आदत हो जाये।

उम्मीदों की कश्ती-५

सारी रात मुझे नींद नहीं आई। देर रात मैं उठकर कागज़ पर कुछ लिखकर कश्तियाँ बना रहा था। अगली सुबह मैं झरने की ओर भागा देखा तो अलख नहीं थी।

उम्मीदों की कश्ती-४

अलख के साथ जब मैं घर पहुँचा तो कर्नल साहब और तृप्ति जी मुझे हैरानी से देख रही थीं।

उम्मीदों की कश्ती-३

'शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पर बुलाया है'

उम्मीदों की कश्ती-२

यूथ हॉस्टल पहुँचकर जूता एक तरफ फेंक केयर टेकर को आवाज़ दी- काका खाने में क्या है? वो बोला- साब,आज तो जीरा आलू, रोटी और दाल तड़का ही है

उम्मीदों की कश्ती- १

पिछली बारिश पहाड़ों से घिरे छोटे से कस्बे में मैं एक स्टडी टूर पर था, कुछ जड़ी-बूटियाँ खोजने गया था।यूथ हॉस्टल से सुबह-सुबह निकल पड़ता मैं।अभी अपने कमरे से बाहर ही आया था कि केयर टेकर ने आवाज़ दी- 'साब जी वो जन्तो के यहाँ पकोड़े बहुत अच्छे बनते हैं, लौटते में खाते आना, खाने में देर हो जाएगी

मैं और पलाश

मास्टर जी के बेटे के मन से क्या कभी पलाश का बोझ उतर पायेगा।लाख अपराध किये पलाश ने पर जाते-जाते किसी को जीवन दान दे गया था।

रंगीन लिबास

विक्रम हॉस्पिटल से अपने फ्लैट पर लौट आया।खाना खाने का मन नहीं था, चुपचाप रेडियो चलाया और बिस्तर पर लेट गया। रेडियो पर गाना बज रहा था- 'मैं कहीं कवी न बन जाऊँ तेरे प्यार में ऐ कविता' अबकी बार विक्रम ने अपने कान बंद कर लिए थे।।

श श श... सो रहा है देश मेरा

अब लिखने वाले की जात मत पूछना चुपचाप सो जाओ सब.... श...श..श... सो रहा है देश मेरा कृपया हॉर्न तो बिलकुल ही न बजाएं।।

हैप्पी वैलेंटाइन डे

गरीबों के लिए मोहब्बत इतनी आसान नहीं होती।आज कल तो प्यार करने से पहले लोग स्टेटस मैच करते हैं।

Some info about Abhidha Mishra Sharma

  • Female
  • 28/11/1984

लेखिका: कैनवास पर बिखरे यादों के रंग (2015) भावना प्रकाशन दिल्ली, मेरी अवन्तिका (2016) भावना प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित...

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