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मेरे कंधे से ऊपर भी मैं हूँ!

shashankbhartiya   47 views   1 year ago

मेरे कंधे से ऊपर भी मैं ही हूँ, पर तुम देखते ही नहीं,

समय की पीड़ा

harish   9 views   2 years ago

समय दूसरे समय से कह रहा है कि बताओ मैं इन्हे इनके समय के बारे में कैसे बताऊ?

प्रेम व्यथा

Amol Chimankar   5 views   1 year ago

मनुष्य के जीवन में मात्र उसके जीवित रहने हेतु,अन्न,वस्त्र,निवारा की अत्यंत आवश्यकता है,परन्तु-वास्तविकता जीवन की इन सब क्रियाओं से भी कही और भी महत्वपूर्ण हो जाती है,जब जीवन में प्रेम का आगमन हो जाता है। किंतु-आज का प्रेम मात्र युवक और युवतियों हेतु-मात्र शरीर की विलासिता का साधन रह गया है।

​शायद इसीलिए हम हैं चरित्रहीन

dhirajjha123   1 views   2 years ago

शायद इसीलिए हम हैं चरित्रहीन अगर यही है चरित्र का हीन हो जाना है तो हम बिना चरित्र के ही खुश हैं अपनी बेरंग दुनियां में