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@dawriter

1984 की टीस (Pogrom 84)

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यह कविता समर्पित है 1984 सिख विरोधी हिंसा में मारे गये और पीड़ित लोगों को! उस बेरहम वक़्त को झेलती एक जवान सिख लड़की की कहानी....

वीरे पग ना पहनियो,
के किस्मत फिर जायेगी.
बरसो टली क़यामत,
आज बस यूँ आयेगी....

आँखों देखा मंज़र क्यों ये दिल ना माने?
खालिस्तानी बोली भिंदरवाले जाने.
आँगन लाल है मेरा, रो-रो लाल है आँखें.

सुबह जिनके पैरो पर अपने हाथ लगाये,
शाम को चिथड़ो मे से हाथ बस पैर वो आये.

अपनी फसले जलाई,
दीवारे घर की ढहाई.
फिर भी मिली ना ठंडक...
तो पग विच आग लगाई.

सीने पर जो वज़न लदा ऐसे,
सांस लूँ अब बता मै कैसे?
देखे कोई मुझे आसमां से,
खोल रखा है घर के दरो को,
आओ-आओ मुझे मार डालो.

गूँजते नारों ने बताया,
जिसमे मैंने होश संभाला,
हर सावन का झूला डाला,
मेरा देश है वो पराया!

रंगीन टी.वी. जो तू प्यार से लाया,
लाल सड़क पर उसमे तुझे मरता दिखाया.
ढकने सावन को पतझड़ आया,
अब लंगर नहीं लगाता गली का गुरुद्वारा.

भारी और नम हवा कुछ बताये....
खून की गंध अपनों की लाये.
कहते किसको क़यामत पता क्या?
लुट गया मेरा जो भी जहाँ था.

दौड़ी बी जी मेरी चौक तक यूँ,
कितनी चीखें सुनी क्या बताऊँ?
हार कर कानो पर हाथ आये,
तब भी ज़हन से चीखें ना जाये.

राशन-वोटर कार्ड कभी अपने काम ना आये,
सरकारी दफ्तरों से उनकी लिस्ट वो लाये.
सुर्ख निशान घरो पे हमारे बनाये,
सोचती हूँ कहाँ है उसका कलेजा?
लाशों से जो वो लिस्ट मिलाये.

जीते जी मैंने इज्ज़त बचा ली,
खुद ही अपनी नस काट डाली.
बेरहम मौत तब भी ना आये,
दर्द अब तो सहा ना जाये.

घर मे रहकर याद घरवालो की सताये,
पहुंची हूँ मै घिसट कर छत तक....और कुदूँगी...
....क्यों?
...क्योकि...ऊपर देख! मेरे बी जी-वीरा मुझे बुलाये!



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